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सुप्रीम कोर्ट का सवाल- बिल पर कुंडली मारकर बैठ जाएँ गवर्नर तो क्या करें? केंद्र का जवाब- इसका समाधान राजनीतिक ही, तय नहीं कर सकते डेडलाइन

सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और राज्यपालों के विधेयकों पर फैसला लेने के लिए डेडलाइन लागू करने के मामले पर सुनवाई चल रही है। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संवैधानिक पीठ इस मामले की सुनावई कर रही है। गुरुवार (21 अगस्त) को तीसरे दिन भी इस मामले पर सुनवाई जारी रही जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विधेयकों से जुड़ी दिक्कतों के न्यायिक समाधान के बजाय राजनीतिक समाधान तलाशने की बात कही है।

यह मामला तमिलनाडु से शुरू हुआ था जहाँ राज्यपाल के बिल रोककर रखने पर राज्य सरकार ने अदालत का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा था कि राज्यपाल के पास पॉकेट वीटो नहीं है। इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रपति को भी राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शीर्ष अदालत ने 14 सवाल पूछे थे जिस पर यह पीठ विचार कर रही है।

बिलों की दिक्कतों के राजनीतिक समाधान तलाशने होंगे: सरकार

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल पूछा था कि अगर राज्यपाल बिलों को अनुमति देने में देरी कर रहे हैं तो इससे निपटने का उपाय क्या हो सकता है। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि अगर राज्यपाल ऐसा करते भी हैं तो राज्यों को न्यायिक समाधान के बजाय राजनीतिक समाधान तलाशने होंगे।

तुषार मेहता ने कहा है, “अगर कोई राज्यपाल विधेयकों में देरी कर रहा है तो राजनीतिक समाधान हो सकते हैं। ऐसे समाधान हो भी रहे हैं और हर बार राज्य को सुप्रीम कोर्ट जाने की जरूरत नहीं होती। मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से मिलकर बात करते हैं, कभी राष्ट्रपति से जाकर मिलते हैं। कई बार नेताओं का दल जाकर कहता है कि ये बिल अटके पड़े हैं, राज्यपाल से इस पर कार्रवाई करने के लिए कहें। कई बार फोन पर ही बात करके मामला सुलझा लिया जाता है। कभी-कभी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राज्यपाल की बैठक होती है और रोकटोक दूर हो जाती है।”

उन्होंने कहा, “अब सवाल ये है कि क्या अदालत कोई तय समय-सीमा तय कर सकती है? संविधान में जब कोई समय-सीमा दी ही नहीं है। ये दिक्कत कई दशकों से हर राज्य में कभी-न-कभी सामने आती रही हैं। जब नेता समझदारी और राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हैं, तो आपस में बैठकर ही हल निकाल लेते हैं। यही असली समाधान है। देश की हर समस्या का समाधान यहाँ (सुप्रीम कोर्ट) नहीं हो सकता। कुछ समस्याएँ ऐसी भी हैं जिनका समाधान आपको सिस्टम में ही मिल जाएगा।”

कानून की व्याख्या में खुद से कुछ नहीं जोड़ सकता SC: सॉलिसिटर

CJI गवई ने कहा कि अगर कुछ चीज गलत है तो उसका समाधान भी होना चाहिए। इस पर मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सभी समस्याओं के लिए समाधान नहीं हो सकता है। कोर्ट ने जब कहा कि ‘कानून की व्याख्या’ न्यायालय द्वारा की जानी चाहिए तो इस पर मेहता ने कहा कि व्याख्या के दौरान संविधान में शब्द जोड़ना बिल्कुल अलग बात है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हम डेडलाइन नहीं तय कर सकते हैं तो ऐसे मामलों का समाधान क्या होना चाहिए। मेहता ने कहा, “आपकी आपत्ति समय-सीमा तय करने के औचित्य पर है लेकिन इससे अदालत को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह खुद समय-सीमा तय करे। कभी–कभार 1-2 राज्यों से ऐसे मामले आते हैं। अगर यही समस्या है तो उसका हल संसद के पास है। सुप्रीम कोर्ट संसद से अनुरोध कर सकता है लेकिन आप सीधे संसद को आदेश नहीं देते। एक संवैधानिक संस्था दूसरी संवैधानिक संस्था को आदेश नहीं देती, यही संवैधानिक मर्यादा है।”

संविधान में 31 जगहों पर है समय-सीमा: मेहता

मेहता ने कहा कि संविधान में कम से कम 31 जगह ऐसी हैं जहाँ समय-सीमा स्पष्ट रूप से लिखी गई है, क्योंकि संविधान निर्माताओं ने माना कि कुछ काम समयबद्ध तरीके से होने चाहिए। जहाँ समय-सीमा नहीं दी गई, वहाँ यह जान-बूझकर छोड़ा गया है। उन्होंने कहा, “संविधान निर्माताओं ने सोच-समझकर तय किया था कि कुछ कार्यों में समय-सीमा होनी चाहिए और कुछ में नहीं।”

संविधान का कोई अंग ऊपर नहीं: मेहता

मेहता ने तर्क दिया कि राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 200 या 201 के तहत लिया गया फैसले को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह मूल रूप से विधायी काम है। उन्होंने कहा, “सहमति की शक्ति एक विधायी कार्य है और चूँकि राज्यपाल/राष्ट्रपति भी संविधान के समान स्तर के संवैधानिक अंग हैं, इसलिए इसकी न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती।” मेहता ने कहा कि भारत में संवैधानिक सर्वोच्चता का सिद्धांत लागू होता है और संविधान का कोई भी अंग यह दावा नहीं कर सकता कि वही सबसे ऊपर है।

न्यायिक आतंकवाद ना बने न्यायिक सक्रियता: CJI

CJI गवई ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि न्यायिक सक्रियता कभी भी न्यायिक आतंकवाद में नहीं बदलनी चाहिए। तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि हमें निर्वाचित लोगों को कभी कमतर नहीं आँकना चाहिए। इस पर CJI ने कहा, “हमने निर्वाचित लोगों के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। मैंने हमेशा कहा है कि न्यायिक सक्रियता कभी भी न्यायिक आतंकवाद या न्यायिक दुस्साहस नहीं बननी चाहिए।”

मेहता ने कहा कि निर्वाचित लोग सीधे तौर पर जनता का सामना करते हैं। अब लोग जनप्रतिनिधियों से सवाल करते हैं। अब मतदाता जागरूक हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता है।

बत्तख-हंस छोड़ सूअर खाने लगे चीनी, पंखों का पड़ा अकाल: ‘स्वाद’ में बदलाव से खतरे में बैडमिंटन का खेल, सिंथेटिक ‘चिड़िया’ से खिलाड़ियों का बिगड़ा जायका

बैडमिंटन की चिड़िया या चिड़ी, जो खेल का सबसे जरूरी हिस्सा होती है, वह अब ‘दुर्लभ’ होने की कगार पर पहुँच रही है। हम बात कर रहे हैं शटलकॉक की, जिसका निर्यात मुख्य रूप से चीन से होता है। बीते कुछ वर्षों से चीन में बदल रही खानपान की आदतों से बैडमिंटन की शटलकॉक खतरे में पड़ गई है। एक ओर चीनी लोगों की खाने की डिशेज बदल रही हैं तो वहीं उसके कारण वैश्विक स्तर पर बैडमिंटन के खिलाड़ियों को परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। आइए जानते हैं क्या है ये पूरा मसला।

शटल कैसे बनती है?

बैडमिंटन की शटल (shuttlecock) आमतौर पर बत्तख (duck) या हंस (goose) के पंखों से बनाई जाती है। एक अच्छी गुणवत्ता वाली शटल में लगभग 16 पंख लगते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेले जाने वाले मैचों में हंस के पंखों से बनी शटल को प्राथमिकता दी जाती है। असल में ये पंख चीन जैसे देशों से निर्यात किया जाता है क्योंकिइन पक्षियों का वहाँ पालन बड़े पैमाने पर होता है।

चीन में खानपान में कैसे हो रहा बदलाव

हाल के वर्षों में चीन में लोगों की खाने की पसंद तेजी से बदली है। जहाँ पहले चीन के लोगों को बत्तख और हंस का मांस काफी पसंद था तो वहीं अब ये जगह सूअर (pork) के मांस ने ले ली है। बीते कई वर्षों से बत्तख खाने वाले लोगों की संख्या में कमी आई है। लोग पोर्क की माँग अधिक करने लगे हैं।

हंस और बत्तख की माँग कम होने से किसान भी बत्तख और हंस को पालना कम कर रहे हैं। इसके चलते इन पक्षियों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है।

शटल के उत्पादन पर असर

बत्तख और हंस की संख्या में कमी आने से उनके पंख भी कम मिलते हैं। यही पंख शटल बनाने में इस्तेमाल होते हैं। नतीजा यह हुआ कि शटल की सप्लाई में भारी कमी आ गई है और कीमतें बहुत बढ़ गई हैं। भारत ही नहीं, फ्रांस, डेनमार्क, इंडोनेशिया और अन्य यूरोपीय देशों में भी बैडमिंटन अकादमियों को शटल की कमी झेलनी पड़ रही है।

भारत में शटल की कीमतों में काफी इजाफा देखा जा रहा है। ये कीमतें ₹12,00 से ₹3,000 प्रति शटल पहुँच गई हैं। गोपीचंद अकादमी में तो दो हफ्ते से भी कम का स्टॉक बचा था। वहीं, छोटे स्तर की अकादमी और खिलाड़ियों को इससे भी अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

क्या हो सकते हैं संभावित समाधान

शटल की कमी के संकट को देखते हुए बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन (BWF) अब प्लास्टिक या सिंथेटिक शटल पर एक बार फिर विचार कर रही है। फ्रांस के बैडमिंटन संघ जूनियर स्तर की प्रतियोगिताओं में वैकल्पिक शटल इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं।

फ्रांस के अलावा डेनमार्क जैसे कई यूरोपीय देशों में राष्ट्रीय संघों को उच्च गुणवत्ता वाली शटल प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। इसके साथ ही शटल की गुणवत्ता और उपलब्धता को लेकर कई समस्याएँ सामने आ रही हैं।

इसके अलावा इंडोनेशिया में शटल की आपूर्ति में कमी के कारण कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और उपलब्धता भी प्रभावित हो रही है।

कृत्रिम शटल में भी हैं कई चुनौतियाँ

इस समस्या से निपटने के लिए कुछ कंपनियाँ हाइब्रिड शटल बना रही हैं। ये आंशिक रूप से प्राकृतिक और आंशिक रूप से कृत्रिम होती हैं। फिलहाल ये शटल बाजार में अभी महँगी हैं और खेल में उतनी टिकाऊ नहीं हैं जितनी कि पारंपरिक शटल होती हैं।

कृत्रिम शटल अपनी दिशा काफी जल्दी बदल लेती हैं। ऐसे में खिलाड़ियों के लिए उनकी गति और दिशा पर काबू पाना मुश्किल होता है। इसके अलावा ये तेज स्मैश या हिट पर जल्दी टूट जाती हैं। इससे मैच को जारी रखने में काफी मुश्किल होती है।

इसके साथ साथ पारंपरिक शटल का फील कृत्रिम शटल नहीं दे पाती। रैकेट से टकराने के बाद खिलाड़ियों को स्पिन देने में परेशानी आती है।

फिलहाल बैडमिंटन के शटलकॉक के लिए कई समाधान खोजे जा रहे हैं। इसे लेकर उत्पादकता को बढ़ाने और पारंपरिक शटल की कमी को पूरा करने की जद्दोजहद जितनी जल्दी खत्म होगी, खेल जगत के लिए ये उतना ही बेहतर होगा।

जहाँ एक ओर शटल की कमी हो रही है वहीं दूसरी ओर बैडमिंटन के खेल में खिलाड़ियों की संख्या में भी तेजी से इजाफा होता जा रहा है। ऐसे में खिलाड़ियों के मनोबल के लिए ‘चिड़िया’ की अनुपलब्धता उनके हौसले को डिगाने का काम कर सकती है।

दावा- बनासकांठा के एक गाँव में पहली बार सैलून में दलित का कटा बाल, हकीकत- आपसी झगड़े को जाति का रंग दिया: ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट से बाहर आई सच्चाई

गुजरात के बनासकांठा जिले के धनेरा तालुका के अलवाड़ा गाँव में दलित समुदाय के साथ नाई की दुकानों पर भेदभाव की खबरें मीडिया में सुर्खियाँ बनीं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने दावा किया कि 24 साल के कीर्ति चौहान पहले दलित बने जिन्होंने गाँव में बाल कटवाए, और इसे दशकों पुराने भेदभाव का अंत बताया। लेकिन ऑपइंडिया की जाँच में अलग तथ्य सामने आए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गाँव के रहने वाले कीर्ति चौहान पहले दलित बने जिन्होंने गाँव की नाई की दुकान पर बाल कटवाए। अखबार ने लिखा कि उस दिन दलित समुदाय के लिए माहौल स्वतंत्रता दिवस जैसा था।

गाँव की सभी पाँच नाई की दुकानें पहली बार दलितों के लिए खोली गईं। लगभग 6,500 की आबादी वाले इस गाँव में करीब 250 दलित रहते हैं, जिन्हें पीढ़ियों से नाई की दुकानों पर जाने से रोका जाता था। मजबूरन वे बाल कटवाने के लिए दूसरे गाँव जाते थे, कई बार अपनी पहचान छिपाकर। लेकिन पिछले हफ़्ते गाँव में सभी समुदायों के नेताओं की बैठक हुई, जिसमें इस अलिखित सामाजिक प्रतिबंध को हटाने पर सहमति बनी। इसके बाद पहली बार दलितों को गाँव की नाई की दुकानों में बराबरी का हक मिला।

TOI की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

गुजरात के बनासकांठा जिले के धनेरा तालुका के अलवाड़ा गाँव में दलितों के साथ बाल कटाने को लेकर पीढ़ियों से जारी भेदभाव खत्म हो गया है। अब गाँव के दलित भी पहली बार खुले तौर पर स्थानीय नाई की दुकानों पर बाल कटवा पा रहे हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में गाँव की दलित युवती कीर्ति चौहान का जिक्र है। भावुक कीर्ति ने कहा “मैं यहाँ बाल कटवाने वाली पहली दलित हूँ। बचपन से ही हमें बाल कटवाने के लिए दूसरे गाँव जाना पड़ता था। अपने 24 साल के जीवन में पहली बार, मैं अपने गाँव में आजाद और स्वीकार्य महसूस कर रही हूँ।”

रिपोर्ट में कार्यकर्ता चेतन डाभी और कुछ अन्य लोगों का नाम भी लिया गया है, जिन्होंने इस पीढ़ियों पुरानी प्रथा को खत्म करवाने में भूमिका निभाई।

गाँव के सरपंच सुरेश चौधरी ने कहा “सरपंच होने के नाते, मुझे इस पुरानी प्रथा पर अफसोस है। गर्व है कि मेरे कार्यकाल में यह समाप्त हुई।” गाँव के एक बुज़ुर्ग छोगाजी चौहान ने याद करते हुए कहा कि उन्हें बाल कटवाने के लिए मीलों पैदल जाना पड़ता था और आजादी से पहले उनके पिता ने भी यही कठिनाई झेली थी।

गाँव के नाई पिंटू नाई ने कहा कि वे पहले सिर्फ समाज के नियमों का पालन करते थे। लेकिन जब बड़े-बुज़ुर्ग मान गए, तो उन्होंने भी दलितों के बाल काटने शुरू कर दिए और कहा कि यह व्यापार के लिए भी अच्छा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट आने के बाद अन्य मीडिया संस्थानों ने भी इसे बड़े पैमाने पर कवर किया। लेकिन रिपोर्टिंग की गुणवत्ता पर सवाल भी उठे कहीं कीर्ति का नाम बदलकर किरण लिख दिया गया, तो कहीं उन्हें महिला बता दिया गया।

कुछ रिपोर्टों में यह तक कहा गया कि आजादी के बाद पहली बार दलितों को गाँव में बाल कटवाने की अनुमति मिली। बाद में गुजराती अखबारों ने भी ऐसी ही खबरें हूबहू प्रकाशित कीं। बीबीसी गुजराती ने भी इस मुद्दे पर रिपोर्ट प्रकाशित की।

उसमें कुछ दलित युवकों और गाँव के नाई के हवाले से कहा गया कि वास्तव में दलितों को नाई की दुकानों पर बाल कटवाने की अनुमति नहीं थी और उन्हें दूसरे गाँव जाना पड़ता था। स्थानीय नाई ने बीबीसी से कहा “हमने दलितों के बाल नहीं काटे क्योंकि गाँव के लोगों से समस्या थी। लेकिन अब समझौता हो गया है और सभी के बाल कट रहे हैं।”

सरपंच ने ऑपइंडिया को क्या बताया

गुजरात के बनासकांठा जिले के अलवाड़ा गाँव में दलितों को नाई की दुकान पर बाल कटवाने से रोके जाने की खबरें मीडिया में तेजी से वायरल हुई थीं। लेकिन ऑपइंडिया की जाँच में इन दावों से अलग सच सामने आया है।

ऑपइंडिया ने गाँव के सरपंच और स्थानीय पुलिस से बात की। दोनों ने स्पष्ट कहा कि गाँव में कभी भी जातिगत भेदभाव नहीं हुआ। यह मामला केवल एक दलित युवक और नाई के बीच हुए झगड़े से जुड़ा था।

गाँव के सरपंच की वास्तविक पदाधिकारी सुरेश चौधरी की पत्नी हैं, जबकि मीडिया ने गलती से सुरेश को ही सरपंच बताया। सुरेश चौधरी ने ऑपइंडिया को बताया “असलियत मीडिया की खबरों से बिल्कुल अलग है। यह सिर्फ दो लोगों का विवाद था, जिसका जाति या समुदाय से कोई संबंध नहीं था। गाँव के दलित हमेशा से स्थानीय दुकानों पर बाल कटवा सकते थे।”

जानकारी के अनुसार, कुछ समय पहले गाँव के एक दलित युवक ने रात करीब 10 बजे नाई को बुलाकर बाल काटने को कहा। नाई ने देर रात काम करने से मना कर दिया, जिसके चलते दोनों के बीच झगड़ा हुआ। मामला थाने तक पहुँचा, लेकिन बाद में पुलिस और सरपंच की मौजूदगी में समझौता हो गया। इसके बाद नाई ने उसी युवक के बाल भी काट दिए और विवाद वहीं खत्म हो गया।

भेदभाव का कोई सवाल ही नहीं: पुलिस

गुजरात के बनासकांठा जिले के अलवाड़ा गाँव में दलितों को नाई की दुकानों पर बाल कटवाने से रोके जाने की खबरों को पुलिस ने खारिज कर दिया है।

धनेरा थाने के पीआई महेश चौधरी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा “ऐसा कोई मामला नहीं है। गाँव में दलित भी बाकियों की तरह बाल कटवाते रहे हैं। यह सिर्फ दो युवकों के बीच का मामूली विवाद था, जिसे सुलझा लिया गया।”

उन्होंने बताया कि हो सकता है किसी नाई ने व्यक्तिगत विवाद के कारण किसी युवक के बाल काटने से मना कर दिया हो, लेकिन बाद में समझौता हो गया और मामला वहीं समाप्त हो गया।

पुलिस अधिकारी ने यह भी कहा कि उन्होंने दलित समुदाय के लोगों से मुलाकात की है। समुदाय के लोगों ने भी उन्हें साफ बताया कि उन्हें कभी किसी तरह के भेदभाव या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। पीआई महेश चौधरी के मुताबिक, उनके पास दलित समुदाय के इन बयानों के वीडियो भी मौजूद हैं।

यह खबर मूल रूप से गुजराती में मेघल सिंह परमार ने लिखी है, मूल खबर को इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

केरल की वायनाड से MP हैं प्रियंका गाँधी, पर ₹10 करोड़ देगी कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार: ‘मेहरबानी’ पर CM सिद्धारमैया को BJP ने घेरा, पूछा- आलाकमान को खुश कर रहे

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार केरल के वायनाड में भूस्खलन से प्रभावित लोगों की मदद कर रही है। वायनाड कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी का संसदीय सीट है। यहाँ भूस्खलन से प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए 10 करोड़ रुपए सिद्धारमैया सरकार दे रही है। इसको लेकर विवाद शुरू हो गया है।

भाजपा ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार केरल के वायनाड के लिए धन आवंटित कर रही है क्योंकि वायनाड लोकसभा क्षेत्र वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी का संसदीय क्षेत्र है। राज्य आपदा कोष यानी SDRF के माध्यम से दिया जा रहा है। इन पैसों से भूस्खलन से प्रभावित 100 परिवारों की मदद की जाएगी।

गौरतलब है कि जुलाई 2024 में वायनाड जिले के मेप्पाडी में भारी बारिश के कारण हुए भूस्खलन हुआ था। इससे जान-माल को भारी नुकसान हुआ था। इस आपदा में सैकड़ों परिवारों के घर तबाह हो गए।

अब कर्नाटक सरकार ने पुनर्वास कार्यों के लिए 10 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। कर्नाटक सरकार ने वर्ष 2024-25 के अपने अनुपूरक अनुमानों में इसका उल्लेख किया है। यह अनुदान एसडीआरएफ के माध्यम से केरल सरकार को हस्तांतरित किया जाएगा। इससे प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता और आवास दिया जाएगा।

इसको लेकर बीजेपी ने कर्नाटक सरकार पर हमला बोला। बीजेपी का कहना है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कर्नाटक के गरीब लोगों की तुलना में पड़ोसी राज्य केरल के वायनाड निर्वाचन क्षेत्र के भूस्खलन पीड़ितों के लिए घर बनाने को अधिक प्राथमिकता दी है। आरोप लगाया गया है कि कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार प्रियंका गाँधी को खुश करने के लिए वायनाड पुनर्वास के लिए 10 करोड़ रुपये दे रही है।

कर्नाटक भाजपा ने X पर टिप्पणी करते हुए कहा, “घर बेचो, प्रियंका पर मेहरबानी करो! यह राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार कर रही है। राज्य में विकास कार्यों के लिए पैसा नहीं है, सरकारी कर्मचारियों के वेतन के लिए पैसा नहीं है, विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों को अनुदान देने के लिए पैसा नहीं है, स्कूलों और कॉलेजों के बुनियादी ढाँचे के लिए पैसा नहीं है। लेकिन अपने आलाकमान को खुश करने के लिए सब कर रही है। पड़ोसी राज्य केरल के वायनाड सीट के लोगों के लिए घर बनाने के लिए उदारतापूर्वक 10 करोड़ रुपये दे रही है, क्योंकि ये प्रियंका वाड्रा का निर्वाचन क्षेत्र है। सीएम @siddaramaiah, अपनी कुर्सी बचाने के लिए कन्नड़ लोगों के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल तुरंत बंद करें।”

गौरतलब है कि फरवरी 2024 में, कर्नाटक भाजपा ने वायनाड में हाथी के हमले में मारे गए एक व्यक्ति के लिए राज्य सरकार द्वारा जारी की गई 15 लाख रुपये की सहायता राशि की आलोचना की थी। यह राशि राहुल गाँधी के निर्देश के बाद जारी की गई थी, जिसमें कहा गया था कि मृतक पर हमला करने वाला हाथी मूल रूप से कर्नाटक का था। तब 15 लाख रुपये और अब 10 करोड़ रुपये, ऐसा लगता है कि कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता अपने लोगों की सेवा करने के बजाय गाँधी परिवार को खुश करना है।

RSS के संस्कारों से बना जीवन, ‘मुख्य शिक्षक’ से बने ‘मोगैम्बो’: कहानी उस स्वयंसेवक की जिन्होंने बचपन में पूछा था- काली भैंस के दूध से कैसे गोरा हो सकता हूँ माँ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) आने वाली विजयदशमी को अपने 100 वर्ष पूरे करने जा रहा है। संघ ने अपनी इस यात्रा में देश सेवा के संस्कार लाखों-करोड़ों स्वयंसेवकों को दिए हैं। इन्हीं में से एक नाम है अमरीश पुरी का। अपनी कड़कती आवाज से पर्दे पर खलनायक की भूमिका निभाने वाले अमरीश पुरी को उनके दोस्त और जानने वाले बेहद सरल और अनुशासित इंसान बताते हैं।

अमरीश पुरी का यह अनुशासन और सरलता संघ के संस्कारों से गढ़ी हुई थी। आज कई लोग आपको संघ को धार्मिक कट्टरवाद से जोड़ते हुए दिख जाएँगे लेकिन अमरीश पुरी जैसे लोगों के लिए यह देशभक्ति की भावना का प्रतीक था। 22 जून 1932 को जन्मे अमरीश पुरी का बचपन पंजाब के नवांशहर की गलियों में बीता था। जब वह 14 वर्ष के हुए तो देश आजादी के दौर की ओर बढ़ रहा था। उसी दौरान अमरीश पुरी ने संघ की शाखा में राष्ट्र भक्ति का ककहरा सीखना शुरू किया था।

अमरीश पुरी ने अपनी आत्मकथा ‘जीवन का रंगमंच’ में संघ से जुड़े अपने अनुभव साझा किया है। पुरी लिखते हैं, “मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य भी बना था और मेरे आदर्श बहुत ऊँचे थे। इससे मेरी विचारधारा पूरी तरह बदल गयी थी और मैं इस व्यवसाय (बॉलीवुड) में कदम भी रखने के विरुद्ध था। मैं RSS की गतिविधियों में भाग लेने लगा था।”

उन्होंने लिखा, “बहुत ईमानदारी से कहूँगा कि मैं उनकी हिंदुत्व की विचारधारा की ओर आकर्षित हुआ था जिसके अनुसार हम हिंदू हैं और हमने हिंदुस्तान की विदेशी शक्तियों से रक्षा करनी है और इन्हें निकाल बाहर करना है, जिससे कि हम अपने देश पर शासन कर सकें। इसका धार्मिक कट्टरता के साथ कुछ संबंध नहीं था, यह मात्र देशभक्ति थी।”

जिन दिनों वह अपनी आत्मकथा भी लिख रहे थे और उन्हें तब भी संघ की प्रार्थना याद थी। वे लिखते हैं, “मुझे हमारी प्रार्थना याद है: नमस्ते सदा वात्सल्य मातृभूमि…। RSS के शिविरों और शाखाओं में संध्या के समय आज भी इस प्रार्थना का गायन होता है। स्वभावतः राष्ट्रवाद की उन भावनाओं में बहकर मैं इस सम्बन्ध में बहुत निश्चित और स्पष्ट था कि मुझे क्या करना है और क्या नहीं करना है।”

अमरीश पुरी की आत्मकथा

वह लिखते हैं, “मैं केवल 14 वर्ष का था जब मुझे युवा विभाग का प्रभारी बना दिया गया। विभाग अधिकारी के रूप में मुझे अन्य युवाओं को सैनिकों की भाँति प्रशिक्षण देना था। हम मात्र ‘हमारा भारत वर्ष’ के सन्दर्भ में सोचते थे। RSS में इस प्रकार के प्रशिक्षण ने मुझे उत्तरदायित्व की भावना से ओतप्रोत कर दिया था। केवल शाब्दिक अर्थ में ही मेरा यह उत्तरदायित्व पूर्ण नहीं था अपितु में सब व्यावहारिक रूप से कर रहा था और उसने मुझे बहुत अनुशासित कर दिया था।”

अमरीश पुरी ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा था कि RSS की शाखाओं में यह सिखाया गया कि उन्हें यह सिखाया गया कि आपातकाल जैसे कठिन समय में कैसे व्यवहार करना है। कैसे सैकड़ों लोगों के समूह से एक ही समय में निपटना है। उनका मानना था कि इस प्रशिक्षण का असली उद्देश्य हिंदुत्व के प्रसार के साथ-साथ बेहतर भारत का निर्माण करना था। उन्होंने लिखा, ” मैं आत्मनिर्भर होने के विचित्र आनंद का अनुभव कर रहा था और यदि आप इसे अपनी युवावस्था में पा लेते हैं तो यह एक मादक एहसास होता है।”

अमरीश पुरी ने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा था कि संघ की शाखाओं में दैनिक सत्रों ने उन्हें समझाया कि स्वयंसेवक होने का अर्थ स्वयं सेवा, साथियों की सेवा और राष्ट्र की सेवा का प्रशिक्षण है। इन सत्रों के जरिए उनके अपरिपक्व मन में एक नई जागरूकता का संचार हुआ। उन्हें अलग-अलग तरीकों से व्यक्तित्व विकास की सही दिशा दी जाती रही।

उन्होंने स्वीकार किया था कि उनकी निष्ठा मुख्यत: शारीरिक प्रशिक्षण और भागीदारी तक सीमित रह लेकिन संघ की शाखाओं में स्वास्थ्य पर दिया गया जोर उनके जीवन की दिशा तय करने में बेहद महत्त्वपूर्ण साबित हुआ। शुरुआत में वे केवल अपनी उत्सुकता और कसरतों के चलते संघ की ओर खिंचे थे पर धीरे-धीरे राष्ट्र के लिए बलिदान की भावना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसी दृढ़ता विश्वास से उनके व्यक्तित्व में सैनिक जैसा अनुशासन आ गया था।

पुरी लिखते हैं, “मैं पूरी ईमानदारी के साथ यह स्वीकार करता हूँ कि मेरी जीवन शैली, रंगमंच और फिल्मों में जो भी अनुशासन बोध दिखाई देता है, वह सब किशारोवस्था के दौरान RSS के साथ मेरे संपर्कों की देन है। जैसा कि कहा जाता है कि समान विचारधारा के लोग इकट्ठे हो जाते हैं, यह अपने आप में विचित्र संयोग ही था कि मेरे रंगमंच के गुरु पण्डित सत्यदेव दुबे भी एक समय RSS में जुड़े रहे हैं। वे मुझसे अक्सर कहते कि हमारी मानसिक अनुशासनबद्धता के कारण हम बचे हुए हैं।”

पाञ्चजन्य को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, “मैं संघ की ‘शाखा’ में इस कदर शामिल हो गया था कि मुझे ‘मुख्य शिक्षक’ बना दिया गया था। मेरा मानना है कि शाखा से जो ‘संस्कार’ मिले उन्होंने मेरे व्यक्तित्व और चरित्र को गढ़ने में बड़ी भूमिका निभाई। आज मैं फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा हूँ, जहाँ चरित्र का पतन सबसे ज्यादा है। मैं आज भी शुद्ध चरित्र वाला हूँ और इसका श्रेय सिर्फ संघ की शिक्षाओं को जाता है। फिल्म इंडस्ट्री के काम की वजह से भले ही मैं संघ की गतिविधियों में सक्रिय न रह पाऊँ लेकिन संघ के दिए हुए संस्कार हमेशा मेरे साथ रहेंगे।”

जब पुरी ने काली भैंस का दूध पीने से किया मना

अमरीश पुरी के जीवन के कई दिलचस्प किस्से हैं। इनमें एक किस्सा उनके बचपन से जुड़ा है। पुरी दिखने में अपने सभी भाई बहनों में दिखने में थोड़े काले थे। अपने काले रंग के चलते पुरी बचपन में खूब दूध पीने लगे थे। उन्हें लगता था कि वे अगर दूध पिएँगे तो उनका रंग गोरा हो जाएगा। एक बार पुरी ने भैंस देखी तो उन्होंने फिर दूध पीने से इनकार कर दिया। उन्हें लगने लगा कि काली भैंस का दूध पीकर तो उनका रंग और भी काला हो जाएगा। इसके बाद उन्होंने अपनी माँ से काली भैंस का दूध ना देने का आग्रह कर दिया था।

अपनी राष्ट्रवादी छवि और लॉबी ना बना पाने की आज से उन्हें कोई नामचीन पुरस्कार तो नहीं मिल पाया लेकिन दर्शकों का बेपनाह प्यार ऐसा मिला की लोग फिल्मी दुनिया के विलेन ‘मोगेम्बो’ से प्रेम करने लगे। हालाँकि, उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि संघ से मिले संस्कार केवल शाखा तक सीमित नहीं रहते बल्कि व्यक्ति के पूरे जीवन को आकार देते हैं। पर्दे पर चाहे उन्होंने खलनायक का किरदार निभाया हो लेकिन असल जिंदगी में वे अनुशासन, देशभक्ति और सादगी के प्रतीक बने रहे। संघ की शिक्षाएँ आजीवन उनके साथ रहीं।

अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में ‘निशांत’, ‘गाँधी’, ‘कुली’, ‘नगीना’, ‘राम लखन’, ‘त्रिदेव’, ‘फूल और कांटे’, ‘विश्वात्मा’, ‘दामिनी’, ‘करण अर्जुन’, ‘कोयला’ आदि शामिल हैं। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय फिल्‍म ‘गाँधी’ में ‘खान’ की भूमिका भी निभाई थी। उनके जीवन की अंतिम फिल्‍म ‘किसना’ थी जो 2004 में ब्रेन ट्यूमर से हुई उनकी मौत के बाद 2005 में रिलीज हुई। 

जो जिले बांग्लादेश से सटे, जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक, वहाँ 9 गुना तक बढ़ा वोटर रजिस्ट्रेशन: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची में ‘घुसपैठ’?

घुसपैठ की समस्या से जूझ रहे पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में नए वोटर रजिस्ट्रेशन में तेजी से उछाल देखने को मिला है। ये नए वोटर रजिस्ट्रेशन राज्य में 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले किए जा रहे हैं।

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 3 महीनों में मुस्लिम बहुल मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर दिनाजपुर, कूच बिहार, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना जिलों में फॉर्म-6 के जरिए नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन 9 गुना तक बढ़ गए हैं। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के दफ्तर ने भी इसकी पुष्टि की है।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है, “नए वोटर रजिस्ट्रेशन की संख्या इतना तेजी से बढ़ी है कि जहाँ पहले हर विधानसभा क्षेत्र में लगभग 100 रजिस्ट्रेशन होते थे, अब वह बढ़कर हर महीने करीब 900 तक पहुँच गए हैं।”

दिलचस्प बात यह है कि ये सभी जिले बांग्लादेश की सीमा से लगे हुए हैं। पश्चिम बंगाल में बीजेपी लंबे समय से चेतावनी देती आई है कि सीमावर्ती जिलों में घुसपैठ और डेमोग्राफी में बदलाव बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है।

फर्जी वोटरों को मतदाता सूची में जोड़ने वाले अधिकारियों पर चुनाव आयोग की सख्ती

इस महीने की शुरुआत में चुनाव आयोग (ECI) ने पश्चिम बंगाल के 4 चुनाव अधिकारियों को निलंबित कर दिया था। इन्होंने अपने पद का दुरुपयोग कर फर्जी वोटर एप्लिकेशन्स को मंजूरी दी थी।

इनकी करतूत राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची के रूटीन अपडेट के दौरान फॉर्म-6 की सैंपल चेकिंग में उजागर हुई थी। इनमें से 2 निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) दिब्बोतम दत्ता चौधरी और बिप्लब सरकार जबकि 2 सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (AERO) तथागत मंडल और सुदीप्त दास थे।

इसके अलावा, चुनाव आयोग ने डेटा एंट्री ऑपरेटर सुरोजित हलदार के खिलाफ भी FIR दर्ज करने का निर्देश दिया है।

चुनाव आयोग ने स्पष्ट आदेश दिया है कि इन अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही जल्द से जल्द शुरू की जाए। आयोग ने कहा कि इन अधिकारियों द्वारा किया गया काम ‘अपराधी आचरण’ के बराबर है और इसलिए इन चारों अधिकारियों पर FIR भी दर्ज की जाए।

आयोग ने बाद में 7 दिन की समयसीमा देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि फर्जी वोटर जोड़ने में शामिल चुनाव अधिकारियों पर तुरंत कार्रवाई हो।

पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर घुसपैठ

पश्चिम बंगाल को उन राज्यों में गिना जाता है जहाँ सबसे ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठिए आकर बसते हैं। पिछले तीन वर्षों में 2688 बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए और उन्हें वापस बांग्लादेश भेजा गया है।

इन दावों को हाल ही में प्रकाशित रिसर्च पेपर से और बल मिला। इसमें खुलासा किया गया कि पश्चिम बंगाल में करीब 1 करोड़ अधिक वोटर मौजूद हैं।

यह रिसर्च पेपर ‘Electoral Roll Inflation in West Bengal: A Demographic Reconstruction of Legitimate Voter Counts (2024)’ 7 अगस्त 2025 को प्रकाशित हुआ था। इस पेपर को डॉ. मिलन कुमार (सहायक प्राध्यापक, IIM, विशाखापट्टनम) और डॉ. विद्यु शेखर (सहायक प्राध्यापक, एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च) ने लिखा है।

यह पेपर मतदाता सूची, जनगणना और नागरिक पंजीकरण सिस्टम से मिले आधिकारिक आँकड़ों पर आधारित है। इसमें 2004 की आधार मतदाता सूची से जीवित बचे वोटरों का अनुमान, नई पीढ़ी (1986–2006 जन्म) के आधार पर जोड़े गए लोग और स्थाई प्रवास के हिसाब से तैयार किया गया था।

पश्चिम बंगाल में घुसपैठ, फर्जी वोटर और कुछ प्रशासनिक लोगों की मिलीभगत से लोकतंत्र के लिए मुसीबत खड़ी करने जैसा काम किया जा रहा है। यह चुनावी खेल बल्कि सीमा और देश की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन सकता है।

‘भारत आकर करें व्यापार, मेक इन इंडिया का फायदा उठाएँ’: US टैरिफ विवाद के बीच मजबूत जयशंकर पहुंचे रूस, कहा- भरोसेमंद साझेदारों की जरूरत

अमेरिका की ओर से भारत पर 50% टैरिफ लागू करने के बाद भारत अलग- अलग देशों के साथ बैठक कर रहा है और अन्य देश भी भारत के साथ अपने रिश्तों में बेहतरी लाने का प्रयास कर रहे हैं। इस कड़ी में मास्को में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूसी कंपनियों को भारत से जुड़ने की अपील की है।

रूस की यात्रा के दौरान जयशंकर ने भारत की अर्थव्यवस्था और ‘मेक इन इंडिया’ का हवाला देते हुए रूसी कंपनियों को देश से जुड़ने और बेहतर कारोबार की बात कही है।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर बुधवार को मॉस्को में भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग (IRIGC-TEC) के 26वें सत्र की सह-अध्यक्षता कर रहे थे। यहाँ उन्होंने रूस के प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंतुरोव से मुलाकात की। डेनिस के बुलावे पर ही वे रूस पहुँचे हैं।

इस दौरान उन्होंने कहा कि भारत और रूस को पारंपरिक तरीकों से हटकर नए और रचनात्मक तरीके अपनाने चाहिए ताकि दोनों देशों के बीच सहयोग को और बेहतर और मजबूत किया जा सके। उन्होंने कहा कि दोनों देशों का मंत्र होना चाहिए: ‘Doing more and doing differently.’

अमेरिका के साथ तनाव है वजह

जयशंकर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ने भारत के कुछ उत्पादों पर 50% टैरिफ (आयात शुल्क) को लगा दिया है। इसके अलावा, भारत के रूसी कच्चे तेल की खरीद पर अतिरिक्त 25% शुल्क लगाया गया है। इसके कारण भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में तनाव आया है।

ऐसे में रूस के साथ संबंधों को मजबूत करना भारत की बहुपक्षीय विदेश नीति का एक अहम हिस्सा है। जयशंकर ने सुझाव दिया कि भारत और रूस को संयुक्त उपक्रमों (Joint Ventures), तकनीकी सहयोग और निवेश के नए क्षेत्रों में कदम आगे बढ़ाने चाहिए। इसके लिए उन्होंने बेहतर लक्ष्य और समय सीमा तय की जानी चाहिए ताकि सहयोग को समुचित तौर पर आगे बढ़ाया जा सके।

रूस-भारत के बीच व्यापारिक असंतुलन पर रखी विदेश मंत्री ने अपनी बात

पिछले चार वर्षों में भारत-रूस व्यापार में पाँच गुना से अधिक की वृद्धि हुई है। वर्ष 2021 में यह व्यापार जहाँ 13 अरब अमेरिकी डॉलर ( ₹1.08 लाख करोड़ ) था, वहीं 2024-25 में बढ़कर 68 अरब डॉलर ( ₹5.95 लाख करोड़) तक पहुँच गया है। इस वृद्धि का मुख्य कारण भारत द्वारा रूस से हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) का बड़े पैमाने पर आयात रहा है। नई दिल्ली स्थित रूसी दूतावास ने अनुमान लगाया है कि पिछले पाँच वर्षों में यह वृद्धि लगभग 700 प्रतिशत रही है।

हालाँकि ने इस बैठक में एक अहम मुद्दा व्यापार असंतुलन का भी रहा। भारत-रूस के बीच व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। जयशंकर ने इस व्यापार में बढ़ते असंतुलन को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि 2021 में यह $6.6 बिलियन (₹54,780 करोड़) था, जो अब $59 बिलियन ( ₹4.9 लाख करोड़ रुपये) तक पहुँच गया है। उन्होंने कहा, “हमें इस मुद्दे को तत्काल सुलझाने की आवश्यकता है।”

जयशंकर ने रूस से भारतीय निर्यात के लिए अपने बाजार को और अधिक खोलने की अपील की ताकि यह असंतुलन कम हो सके। उन्होंने लॉजिस्टिक्स और भुगतान प्रणाली को भी सरल और सुगम बनाने को आज की जरूरत बताई। उन्होंने इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक मार्ग जैसे विकल्पों पर भी काम किए जाने की बात कही।

अपने दौरे में विदेश मंत्री ने थिंक टैंक के प्रतिनिधियों और अन्य लोगों के साथ भी मुलाकात की। इस दौरान भारत-रूस द्विपक्षीय संबंधों, बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य और भारत के दृष्टिकोण पर दोनों देशों के बीच बातचीत हुई ।

जयशंकर ने इसे लेकर एक्स पर लिखा, “रूस के प्रमुख विद्वानों और थिंक टैंक प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करके खुशी हुई। भारत-रूस संबंधों, समकालीन वैश्विक भू-राजनीति और भारत के दृष्टिकोण पर चर्चा की।”

जयशंकर का ये दौरा और रूस के साथ व्यापार को लेकर चर्चा इस बात का साफ संकेत है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपने हितों को लेकर अधिक सक्रिय, रणनीतिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपना रहा है। यह बयान न केवल रूस के साथ संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश है, बल्कि अमेरिका के दबाव के बीच भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को भी दर्शाता है।

ड्रीम-11, पोकरबाजी, MPL… सब होंगे बंद: जानिए क्या है मोदी सरकार का ऑनलाइन गेमिंग बिल, प्रचार पर 3 साल जेल-₹1 करोड़ जुर्माना

हाल ही में लोकसभा ने एक नया कानून पास किया है। इसका नाम है ‘प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025।’ यह बिल ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी समस्याओं को ध्यान में रखकर लाया गया है। देश में ऑनलाइन गेमिंग बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इससे कई लोगों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। बहुत से लोग हर साल हज़ारों करोड़ रुपए हार जाते हैं। इससे समाज में तनाव, झगड़े और मानसिक परेशानी जैसी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं।

इस बिल का मुख्य उद्देश्य लोगों को इन खतरों से बचाना है। भारत में लगभग 45 करोड़ लोग ऑनलाइन गेम खेलते हैं। यह बिल उन्हें पैसे वाले गेम्स के जाल में फँसने से रोकेगा। यह कानून ऑनलाइन गेमिंग को एक नियम के दायरे में लाएगा। इससे भारत में गेमिंग का भविष्य सुरक्षित और साफ़ हो सकता है।

संसद में ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 पास होने के बाद ड्रीम11, माई11सर्किल, एमपीएल, विंजो, गेम्सक्राफ्ट, रम्मी, पोकरबाजी जैसे कई ऐप्स को बंद किए जाएँगे। क्योंकि यह एक ऑनलाइन जुआ की कैटेगिरी में आता है। कुछ गेमिंग कंपनियों का कहना है कि वे जुआ या गलत कामों में शामिल नहीं हैं। और वे कानूनी रूप से काम करती हैं। लेकिन सरकार का कहना है कि पैसा लगाने वाले सभी गेम खतरनाक हैं। इसलिए उन पर रोक जरूरी है।

ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 क्या है?

सरकार ने एक नया कानून बनाया है। यह कानून भारत में ऑनलाइन गेमिंग को कंट्रोल करेगा। इसका मतलब है कि अब गेमिंग के कुछ नियम बनेंगे। सभी को इन नियमों का पालन करना होगा। अब जो ऑनलाइन गेम पैसे से खेले जाते हैं, उन पर रोक लग जाएगी। मतलब आप ऐसे गेम नहीं खेल पाएँगे जहाँ जीतने के लिए पैसे लगाने पड़ते हैं। और न ही ऐसे गेम जहाँ जीतने पर पैसे मिलते हैं। यह नियम लोगों को नुकसान से बचाने के लिए है।

जो गेम बिना पैसे के खेले जाते हैं, उन्हें सरकार बढ़ावा देगी। जैसे ई-स्पोर्ट्स और सोशल गेमिंग। इनमें खिलाड़ी अपने दिमाग और कौशल से खेलते हैं। ये गेम मनोरंजन और सीखने के लिए होते हैं। सरकार इन अच्छे गेम्स के लिए एक अलग विभाग बनाएगी। वह नई योजनाएँ भी शुरू करेगी। इससे ई-स्पोर्ट्स और सोशल गेमिंग को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।

केंद्र सरकार यह बिल क्यों ला रही है?

केंद्र सरकार इस बिल को कई गंभीर कारणों से ला रही है-

सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या: आजकल बहुत लोग ऑनलाइन पैसे वाले गेम खेल रहे हैं। ये गेम अब एक बड़ी सामाजिक और सेहत से जुड़ी समस्या बन गए हैं। कई लोग इन गेम्स में लाखों रुपए हार रहे हैं। उनका पैसा बैंक से खत्म हो जा रहा है। इससे उनके घरों में झगड़े हो रहे हैं। कई बार परिवार बर्बाद हो जाते हैं। कुछ लोग इतना दुखी हो जाते हैं कि आत्महत्या तक कर लेते हैं। ये बहुत चिंता की बात है। सरकार चाहती है कि लोग इस परेशानी से बाहर आएँ। उसका लक्ष्य है कि ऐसी बर्बादी और आत्महत्याएँ रोकी जा सकें।

नकारात्मक प्रभाव: कुछ ऑनलाइन गेम ऐसे होते हैं जो चालाकी से बनाए जाते हैं। इनका डिज़ाइन लोगों को बार-बार खेलने पर मजबूर करता है। ऐसे गेम्स में कुछ छुपे हुए तरीके होते हैं जो दिमाग को धोखा देते हैं। लोग इन गेम्स के इतने आदि हो जाते हैं कि खुद को रोक नहीं पाते। जब लोग बार-बार खेलते हैं तो वे बार-बार पैसे भी लगाते हैं। इससे उनका बहुत सारा पैसा बर्बाद हो जाता है। इन गेम्स में यह साफ नहीं होता कि गेम को कौन चला रहा है। इससे लोगों की सुरक्षा पर खतरा भी बढ़ जाता है।

वित्तीय धोखाधड़ी और अवैध गतिविधियाँ: अब बहुत सारे ऑनलाइन गेम बिना किसी नियम के चल रहे हैं। इनमें लोग असली पैसे लगाते हैं। इन गेम्स की आड़ में कई बार धोखाधड़ी होती है। कुछ लोग इनका इस्तेमाल गलत कामों के लिए करते हैं। कुछ लोग इन गेम्स से कमाए पैसे को छुपा लेते हैं। वे टैक्स नहीं देते। इसे कर चोरी कहा जाता है। कई बार ये पैसे गलत लोगों तक पहुँचते हैं। कुछ मामलों में इनका इस्तेमाल आतंकवाद को पैसे देने में भी होता है। इससे देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

राजस्व की चिंता नहीं: हालाँकि, इस नए कानून से सरकार को शायद करोड़ों रुपए का टैक्स मिलना बंद हो जाएगा, जो ऑनलाइन गेमिंग से आता था। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने साफ कहा है कि सरकार की पहली प्राथमिकता पैसे कमाना नहीं है, बल्कि समाज को इन गेम्स के बुरे असर से बचाना है। उनका मानना है कि लोगों की भलाई और सुरक्षा पैसों से ज़्यादा ज़रूरी है।

लोगों की शिकायतें: इस बिल को लाने का एक और बड़ा कारण है लोगों की ढेरों शिकायतें। सरकार को ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी हजारों शिकायतें मिली थीं, जहाँ लोग अपनी समस्याओं के बारे में बता रहे थे। इसके अलावा, भारत के कई राज्यों ने भी केंद्र सरकार से अनुरोध किया था कि वे इस पर एक सख्त कानून बनाएँ। इन सभी माँगों को देखते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है।

जिम्मेदारी से गेमिंग को बढ़ावा: सरकार ऐसे गेम्स को भी बढ़ावा देना चाहती है जो अच्छे हैं। ये वो गेम हैं जिनसे दिमाग तेज होता है और बच्चों में लीडरशिप की क्वालिटी बढ़ती है। सरकार चाहती है कि ऐसे ई-स्पोर्ट्स और सोशल गेम ज़्यादा से ज़्यादा लोग खेलें। इन गेमों को अब कानूनी पहचान मिलेगी और सरकार इन्हें आगे बढ़ने में पूरी मदद करेगी।

ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 के मुख्य प्रावधान क्या हैं?

इस नए कानून में ऑनलाइन गेमिंग को रोकने के लिए कई बड़े नियम बनाए गए हैं। सबसे खास बात यह है कि अब पैसे वाले सभी ऑनलाइन गेम पूरी तरह से बंद हो जाएँगे। इसका मतलब है कि आप Google Play Store जैसी जगहों से ऐसे गेम डाउनलोड नहीं कर पाएँगे, जिनमें आपको पैसा लगाना पड़ता है। इनमें ऑनलाइन फैंटेसी गेम, पोकर, रम्मी, ड्रीम11, माई11सर्किल, या ऑनलाइन लॉटरी जैसे गेम शामिल हैं।

जो लोग इन नियमों को तोड़ेंगे, उन्हें कड़ी सजा मिलेगी। जो लोग पैसे वाले गेमिंग ऐप चलाएँगे, उन्हें ₹1 करोड़ तक का जुर्माना और तीन साल तक की जेल हो सकती है। अगर कोई सेलिब्रिटी इन गेम्स का विज्ञापन करता है तो उसे भी दो साल तक की जेल और ₹50 लाख का जुर्माना देना पड़ सकता है।

इतना ही नहीं, अगर कोई बैंक या कंपनी इन गेमों में पैसों का लेन-देन करती है तो उन्हें भी ₹1 करोड़ तक का जुर्माना और तीन साल तक की जेल हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति बार-बार यही गलती करता है तो उसकी सजा और भी बढ़ जाएगी। इन बड़े अपराधों में पुलिस आपको बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती है और जमानत मिलना भी बहुत मुश्किल होगा।

इस कानून (ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025) को लाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि पैसे वाले ऑनलाइन गेम हमारे समाज को बहुत नुकसान पहुँचा रहे थे। लोग इन गेम्स में अपनी सारी कमाई गँवा रहे थे। इससे परिवारों में झगड़े बढ़ रहे थे और पैसे की तंगी हो रही थी। इन गेमों की लत लगने से लोग मानसिक रूप से बहुत परेशान हो रहे थे, कुछ को तो डिप्रेशन हो जाता था और कुछ लोग तो आत्महत्या तक कर लेते थे।

आदमियों को कुल्हाड़ी से काटा, बच्चों को गोलियों से भूना… 300+ लाशों में दफन हुई रवांडा-कांगो की वह ‘शांति’ जो लाने का दावा कर रहे थे ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि उन्होंने रवांडा और कांगो के बीच शांति करा दी, लेकिन हकीकत उलट है। जुलाई 2025 में रवांडा समर्थित एम23 विद्रोहियों ने कांगो के नॉर्थ किवु में 14 गाँवों में 140 से 319 लोगों को मार डाला।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रवांडा और कांगो के बीच जिस शांति की बात ट्रंप कर रहे हैं, वहाँ खून की नदियाँ बह रही हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच और संयुक्त राष्ट्र (UN) की ताजा रिपोर्ट्स बताती हैं कि जुलाई 2025 में 140 से 300 से ज्यादा लोग मारे गए। रवांडा समर्थित एम23 विद्रोही समूह ने नॉर्थ किवु प्रांत में नरसंहार मचाया, जिसमें बच्चों और औरतों को भी नहीं बख्शा गया। लोगों को कुल्हाड़ियों से काट डाला गया, लाइन में बैठा कर गोलियों से भून डाला गया।

हमले के चश्मदीद तीन किसानों ने इसकी जानकारी देते हुए बताया है कि 10-11 जुलाई को जब वे लोग कुछ सामान लेने घर से बाहर गए थे, उस वक्त एम 23 विद्रोहियों ने हमला किया था। एक किसान ने बताया कि वे कुछ दूर से छिप कर अपने परिवार के लोगों को देख रहे थे, जिन्हें विद्रोहियों ने गोलियों से भून डाला। उनकी पत्नी और तीन बच्चों को मौत के घाट उतार दिया।

एक और चश्मदीद ने बताया कि 11 जुलाई को किसेगुरु कस्बे से करीब 18 किलोमीटर दूर एक खेत में उन्हें एक 47 साल के व्यक्ति और उसके चार बच्चों के शव मिले। बच्चों की उम्र 11 से 17 साल के बीच थी। इन लोगों को दफनाने वाले एक व्यक्ति ने कहा, “हमने खेत में सिर कटे इन लोगों की लाश मिली। उन सभी को छुरों से मारा गया था। उनके गले काटे गए थे।”

ह्यूमन राइट्स वॉच ने 300+ मौतों की दी जानकारी

ह्यूमन राइट्स वॉच ने हमले की जानकारी देते हुए कहा है कि रवांडा-नियंत्रित एम23 विद्रोहियों ने जुलाई 2025 में पूर्वी कांगो के विरुंगा नेशनल पार्क के पास कम से कम 14 गाँवों के 140 से अधिक नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। ये लोग हुतु समुदाय के हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जुलाई से अब तक इस क्षेत्र में मारे गए लोगों की संख्या 300 से अधिक हो सकती है। इन पर हमला करना वाला एम23 संगठन 2021 से काफी सक्रिय है।

ह्यूमन राइट्स वॉच की सीनियर रिसर्च फेलो क्लेमेंटाइन डी मोंटजॉय ने कहा, “जब तक इन हमलों के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं मिलती, ये अत्याचार और बढ़ेंगे। उनका कहना है कि इस हमले में रवांडा के कई अधिकारी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को इन हमलों में शामिल लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए और युद्ध में शामिल रवांडा के सैन्य कमांडरों पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। साथ ही यूएन को इस मामले की जाँच करनी चाहिए।”

हमलों में रवांडा की सेना भी शामिल

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट तो और भी भयावह आँकड़ा देती है, जिसमें 9 से 21 जुलाई के बीच 319 लोगों के मारे जाने की बात कही गई है। M23 विद्रोहियों ने कांगो के लोगों पर जुल्म की हर हद पार कर दी। एम23 ने कई लाशों को रुशुरु नदी में फेंक दिया, जिसमें औरतों और बच्चों की लाशें भी शामिल थीं। लोगों को लाशें दफनाने की इजाजत नहीं दी गई।

विद्रोहियों ने कहा कि लाशों को खेतों में ही छोड़ दो या दफना दो, लेकिन अंतिम संस्कार करने की मनाही थी। एक स्थानीय निवासी ने बताया, “हम अपने अपनों को दफनाने भी नहीं जा सकते थे। वो हमें धमकाते थे कि अगर हमने कोशिश की तो हमें भी मार देंगे।” बता दें कि रुत्शुरु नदी से बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों के शव बरामद हो चुके हैं।

इन हमलों में ज्यादातर हुतू समुदाय के लोग निशाना बने। एम23 का कहना है कि ये हमले डेमोक्रेटिक फोर्सेस फॉर द लिबरेशन ऑफ रवांडा (एफडीएलआर) के खिलाफ थे, जो 1994 के रवांडा नरसंहार में शामिल हुतू समुदाय के लोग हैं। लेकिन हकीकत में आम लोग, औरतें और बच्चे इस हिंसा का शिकार बने।

संयुक्त राष्ट्र ने एम23 और रवांडा डिफेंस फोर्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है। इन संगठनों का कहना है कि जिम्मेदार लोगों पर प्रतिबंध लगाए जाएँ और युद्ध अपराधों की जाँच हो। लेकिन रवांडा इन आरोपों को खारिज करता है और कहता है कि हत्याएँ किसी और समूह ने कीं।

क्या है रवांडा और कांगो का विवाद?

रवांडा और कांगो का ये संघर्ष 1994 के रवांडा नरसंहार से शुरू हुआ, जिसमें हुतू समुदाय ने तुत्सी समुदाय के लाखों लोगों को मार डाला था। नरसंहार के बाद हुतू उग्रवादी कांगो भाग गए और वहाँ एफडीएलआर जैसे समूह बनाए। तुत्सी समुदाय का एम23 ग्रुप रवांडा का समर्थन पाता है और एफडीएलआर के खिलाफ लड़ता है।

कांगो का कहना है कि रवांडा एम23 को हथियार और सैनिक देता है, जबकि रवांडा इससे इनकार करता है और कहता है कि वो अपनी सुरक्षा के लिए कांगो में है। इस इलाके में सोना, कोल्टन और कोबाल्ट जैसे कीमती खनिजों की खदानें हैं, जो इस संघर्ष को और भड़काती हैं।

रवांडा-कांगो के बीच शांति समझौता

27 जून 2025 को ट्रंप की मौजूदगी में वॉशिंगटन में रवांडा और कांगो के बीच एक समझौता हुआ था, जिसमें रवांडा को अपनी सेना वापस बुलाने और कांगो को एफडीएलआर को खत्म करने का वादा करना था। लेकिन इस समझौते के बाद भी हिंसा रुकी नहीं। जुलाई में हुए नरसंहार ने साफ कर दिया कि ये समझौता कागजों तक ही सीमित है।

कांगो के विदेश मंत्रालय ने कहा, “इन हत्याओं ने वॉशिंगटन समझौते और दोहा वार्ताओं की सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं।” दोहा में कांगो सरकार और एम23 के बीच अलग से बातचीत चल रही थी, लेकिन वहाँ भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। एम23 ने कहा कि कांगो ने समझौते का पालन नहीं किया, जबकि कांगो का कहना है कि एम23 ने ही हमले किए।

ट्रंप भले ही शांति की बात करें, लेकिन नॉर्थ किवु के खेतों और नदियों में बहता खून बता रहा है कि शांति अभी कोसों दूर है। कांगो-रवांडा में जारी इस हिंसा ने ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार के दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं, साथ ही व्हॉइट हाउस के उन दावों पर भी… जिसमें ट्रंप द्वारा बीते 7 माह में 7 जंगों को रोकने का दावा किया था।



‘विषकन्या’ भेज फँसाता, रंगदारी नहीं मिलने पर करवा देता था रेप केस: अखिलेश दुबे का ₹1500 करोड़ का साम्राज्य BJP नेता ने ढहाया, शिकंजा कसा तो दिया उम्र-बीमारियों का हवाला

कानपुर में भाजपा नेता रवि सतीजा को झूठे रेप केस में फँसाने के पीछे अधिवक्ता अखिलेश दुबे का नाम सामने आया है। वह ‘विषकन्या’ जैसी लड़कियों का इस्तेमाल कर फाँसता था। ब्लैकमेल करता था।

रंगदारी नहीं मिलने पर रेप का फर्जी केस करवा देता था, पर बीजेपी नेता रवि सतीजा ने उसके सामने घुटने नहीं टेके। उनकी शिकायत से खुली फाइल ने कानपुर के अखिलेश दुबे के 1500 करोड़ के साम्राज्य को ढहा दिया है।

अखिलेश दुबे वैसे तो वकील है, लेकिन उसने जीवन में कभी प्रैक्टिस नहीं की। चर्चित मामलों की फर्द लिखकर उसने पुलिस महकमे में घुसपैठ की। फिर इन्हीं संपर्कों का धौंस दिखाकर अपना साम्राज्य खड़ा किया।

वह महिलाओं को भी ब्लैकमेल करने से नहीं हिचकता था। एक महिला होटल कारोबारी ने जब उसकी बात नहीं मानी तो कथित तौर पर अखिलेश दुबे ने पीड़िता की गंदी किताबें छपवाकर बँटवा दी। उसे शादी के मंडप से उठा लेने तक की धमकी दी।

रवि सतीजा के साथ की गई साजिश के पीछे अधिवक्ता अखिलेश दुबे, आयुष मिश्रा उर्फ लवी और शैलेंद्र यादव उर्फ टोनू का नाम सामने आया है। पुलिस की जाँच में यह भी पता चला कि ऐसे मामले पहले भी होते आए है, जिनमें ऐसे ही तरीकों से लोगों को झूठे मुकदमों में फँसाकर उनसे पैसे वसूले जाते रहे हैं।

इस पूरे मामले की जड़ एक महिला की शिकायत से जुड़ी है, जिसके जरिये भाजपा नेता पर फर्जी रेप का आरोप लगाने की कोशिश की गई। जब मामला दर्ज हुआ तो अखिलेश दुबे और उसके साथियों ने इस केस को खत्म कराने और FIR लगवाने के नाम पर पैसे की माँग शुरू की। इसी दौरान कई बार फोन पर धमकी दी गई और बातचीत की रिकॉर्डिंग भी हुई, जिसे अब पुलिस ने केस डायरी में पेश किया है।

साकेत धाम से चलता रहा पूरा शहर

वकील अखिलेश दुबे ने वर्ष 2000 में साकेत नगर में ‘साकेत धाम’ नाम से दफ्तर बनाया। यहीं से उसका सिंडीकेट खड़ा हुआ और धीरे-धीरे पुलिस अधिकारियों का आना-जाना शुरू हो गया।

रसूख इतना बढ़ा कि केडीए ने उसे पार्क तक लीज पर दे दिए जिन पर उसने स्कूल और गेस्टहाउस खोल लिए। शहर के बड़े अफसर उसके दरबार में बैठने लगे और हालत यह हो गई कि दरोगा-इंस्पेक्टर पोस्टिंग के लिए उसके दफ्तर सलाम ठोकने पहुँचते थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कानपुर में दुबे ने पुलिस की आड़ में फर्जी FIR दर्ज कराना शुरू किया। जो भी उसके खिलाफ जाता या जमीन कारोबार में बाधा डालता, उसके खिलाफ झूठे रेप और SC-ST एक्ट के मुकदमे दर्ज कराकर जेल भिजवा देता।

डर ऐसा कि कोई उसके खिलाफ खड़ा नहीं हो पाता। बिल्डर, नेता, कारोबारी सब उसकी शरण में जाते। सांसद अशोक रावत की शिकायत पर पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार ने SIT गठित की तो 54 झूठे रेप केस सामने आए, जिनमें 10-12 सीधे दुबे से जुड़े थे।

इन मुकदमों के लिए वह महिलाओं और लड़कियों को पैसे देकर इस्तेमाल करता था। एक FIR दर्ज कराने पर 50 हजार से एक लाख तक देता था। जाँच की भनक लगते ही उसने अपने गैंग की लड़कियों को झारखंड और छत्तीसगढ़ भेज दिया।

इतना ही नहीं, उसके पैर छूने वाले आईपीएस और पीपीएस अफसरों की लंबी लिस्ट थी। हालात ये थे कि कानपुर पुलिस कमिश्नर का पीआरओ तक दुबे का आदमी निकला। वहीं उसकी बेटी की शादी में 40-50 आईपीएस अफसर पहुँचे, एसपी और एएसपी स्तर के अफसर बारातियों की अगवानी और प्लेट परोसते नजर आए।

लखनऊ और दिल्ली तक दुबे ने पुलिस अफसरों की काली कमाई अपनी कंपनियों और जमीनों में लगाई। पत्रकारों और वकीलों को भी अपने सिंडीकेट में शामिल किया। खुद कभी कोर्ट में बहस न करने वाला दुबे अपने दफ्तर से ही पुलिस जाँच लिखता, फैसले करवाता और अफसरों का रूतबा तय करता था।

आखिर भाजपा नेता रवि सतीजा की शिकायत और मुख्यमंत्री तक मामला पहुँचने पर कानपुर पुलिस कमिश्नर ने दुबे को जेल भेजा। लेकिन जाँच में साफ हुआ कि यह सिर्फ एक वकील नहीं बल्कि पुलिस, अफसर, पत्रकार और वकीलों का विशाल सिंडीकेट था जिसने तीन दशक तक कानपुर में खौफ कायम रखा।

‘विषकन्या’ की एंट्री

अखिलेश दुबे का नाम झूठे रेप केसों और रंगदारी वसूली के खेल में सबसे ज्यादा सामने आया। पुलिस कस्टडी में मौजूद लड़की ने कबूल किया कि उसे वकील टोनू ने पैसे का लालच देकर अखिलेश से मिलवाया। बस्ती की कई महिलाएँ भी इस काम में शामिल थीं। जब SIT ने जाँच शुरू की तो टोनू ने कई महिलाओं को छत्तीसगढ़ भगा दिया।

दुबे के गैंग में मिस यूपी रह चुकी युवती भी शामिल थी, जिसे उसने ‘विषकन्या का नाम दिया। इसने झूठे मुकदमे कर करोड़ों वसूले और अखिलेश की खास बन गई। उसे राजनीतिक संरक्षण भी मिला और संगठन में महिला विंग का जिलाध्यक्ष बना दिया गया। सबसे पहले उसने होटल मालिक पर झूठा केस कर 2.5 करोड़ ऐंठे और फिर लापता हो गई।

असल में, दुबे मेरठ से कानपुर भागकर आया था। शुरुआत दीप सिनेमा के बाहर साइकिल स्टैंड चलाने और नशे का कारोबार करने से हुई। धीरे-धीरे अपराध की दुनिया में कदम रखकर उसने खुद को इतना बड़ा बना लिया कि पुलिस, नेता और माफिया सब उसके सिंडीकेट का हिस्सा बन गए।

पुलिस जाँच और सबूत

नौबस्ता थाना प्रभारी शरद तिलारा इस मामले की विवेचना कर रहे हैं। उन्होंने भाजपा नेता से जुड़ी केस डायरी कोर्ट में पेश की, जिसमें कई अहम तथ्य सामने आए। रवि सतीजा, अखिलेश दुबे और लवी मिश्रा की कॉल डिटेल्स निकलवाई गईं।

रिपोर्ट में साफ हुआ कि इन तीनों के बीच लगातार फोन पर बातचीत होती रही है। इसके अलावा आरोपित अधिवक्ता शैलेंद्र यादव उर्फ टोनू और झूठे केस में फँसाने वाली युवती के बीच भी बातचीत के सबूत मिले।

पुलिस ने कोर्ट में एक ऑडियो रिकॉर्डिंग और उसका लिखित रूपांतरण भी दाखिल किया है। यह बातचीत 11 फरवरी 2025 की बताई जा रही है, जिसमें अखिलेश दुबे मुकदमे में FIR लगवाने की बात कर रहे हैं और साथ ही धमकी भी दे रहे हैं।

भाजपा नेता ने दोबारा दिए बयान में साफ कहा कि अखिलेश ने उन्हें कई बार धमकाया और किस्तों में अलग-अलग रकम भी वसूली। इन सबूतों के आधार पर पुलिस ने मुकदमे में और गंभीर धाराएँ जोड़ीं। इनमें मौत या उम्रकैद से संबंधित मुकदमे का डर दिखाकर रंगदारी वसूलने और आपराधिक षड्यंत्र रचने की धाराएँ शामिल की गईं।

वही एक महिला ने आरोप लगाया है कि 2011 में अखिलेश ने उसकी शादी तुड़वाने का भी प्रयास किया। इतना ही नहीं उसके ऑर्डर्स सुनने वाले इंस्पेक्टर्स से फेरों से पहले उसका अपहरण करवाने की भी कोशिश की।

महिला का कहना है कि सोमवार (18 अगस्त 2025) सभी सबूतों के साथ पुलिस आयुक्त से शिकायत करने के बाद SIT ने जाॅंच शुरू कर दी है। वहीं स्टाफ ऑफिसर पुलिस आयुक्त राजेश पांडेय के अनुसार, महिला ने अरिधीश दुबे के खिलाफ मारपीट और लूट के अलावा जान से मारने की धमकी और उसके चरित्र पर दाग लगाने के लिए अश्लील बुकलेट बाँटने का भी आरोप लगाया है। उसने इससे जुड़े सबूत भी उपलब्ध करवाए हैं।

कोर्ट की कार्यवाही

मामले की सुनवाई सीजेएम सूरज मिश्रा की कोर्ट में हुई। कोर्ट में पेशी के दौरान पुलिस और अभियोजन पक्ष ने सबूत पेश किए। कोर्ट ने माना कि आरोप गंभीर हैं और नए तथ्यों के आधार पर बढ़ाई गई धाराओं में भी अभियुक्तों की न्यायिक रिमांड मंजूर करना जरूरी है।

कोर्ट ने भाजपा नेता से रंगदारी माँगने के मामले में अखिलेश दुबे और आयुष मिश्रा उर्फ लवी की 14 दिन की न्यायिक रिमांड मंजूर की। साथ ही कोतवाली थाने में दर्ज अधिवक्ता से रंगदारी वाले केस में भी अखिलेश की 14 दिन की न्यायिक रिमांड दी गई।

वहीं बढ़ाई गई धाराओं में जिनमें मौत या उम्रकैद से संबंधित मुकदमे का डर दिखाकर रंगदारी वसूलने की बात शामिल है, कोर्ट ने फिलहाल एक दिन की न्यायिक हिरासत मंजूर की है। इसका कारण यह था कि इस मुकदमे में पहले से ही 20 अगस्त तक की रिमांड स्वीकृत थी, इसलिए कोर्ट ने कहा कि आगे की सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए 20 अगस्त को की जाएगी।

कोर्ट में पेशी के दौरान अखिलेश दुबे ने अपनी उम्र और तबीयत का हवाला देते हुए गुहार लगाई। उसने कहा कि वह लगभग 68 साल का है और कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित है।

डॉक्टरों ने उसे रोजाना कुछ विशेष दवाएँ लेने की सलाह दी है, लेकिन जेल में रहते हुए उसे वे दवाएँ नहीं मिल पा रही हैं, जिससे उसकी हालत बिगड़ रही है। इस पर उसके अधिवक्ता ने कोर्ट  में एक प्रार्थना पत्र दिया।

सीजेएम ने जेल अधीक्षक को निर्देश दिए कि अखिलेश को जरूरी दवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ और उसकी जाँच भी कराई जाए। जरूरत पड़ने पर उसे इलाज की सुविधा भी दी जाए।

इस पूरे मामले की सुनवाई के बीच कचहरी परिसर में एक और घटना चर्चा का विषय बन गई। मंगलवार को कचहरी के कई स्थानों पर एक स्टिकर चस्पा मिला, जिस पर लिखा था “अधिवक्ता या मुखबिर?”

इसमें इसके अलावा कुछ नहीं लिखा था। वकील आपस में इस स्टिकर को दिखाते और मुस्कुराते नजर आए। यह भी कहते रहे कि आखिर यह किसके लिए लिखा गया है।

यह पूरा घटनाक्रम इस बात की गवाही देता है कि कैसे झूठे मुकदमों को हथियार बनाकर रंगदारी वसूली जा रही थी। भाजपा नेता से पचास लाख और एक अधिवक्ता से दस लाख की माँग ने कानपुर की कानूनी और राजनीतिक दुनिया को हिला दिया है।

पुलिस के पास अब कॉल डिटेल्स, ऑडियो रिकॉर्डिंग और गवाहों के बयान जैसे पुख्ता सबूत हैं, जिनके आधार पर कोर्ट  ने गंभीर धाराओं में भी अभियुक्तों की न्यायिक रिमांड मंजूर कर दी है।