ब्रिटेन के लीसेस्टर में एक बार फिर हिंदू विरोधी माहौल खड़ा करने की कोशिश हो रही है। गणेश चतुर्थी की शोभायात्रा में भगवा झंडे लगाने पर मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB) ने आपत्ति जताई है। इसे ‘हिंदुत्व कट्टरवाद’ बताकर कार्रवाई की माँग की गई है। हिंदू संगठनों ने इसे न सिर्फ गलत बताया है, बल्कि चेतावनी दी है कि इससे नफरत को बढ़ावा मिल सकता है। 2022 में लीसेस्टर हिंसा के जख्म अभी भरे नहीं हैं, और एक बार फिर वही स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है।
भगवा झंडे पर क्यों हुआ विवाद?
गुरुवार (28 अगस्त 2025) को मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB) ने एक बयान जारी किया। इसमें उन्होंने कहा कि गणेश चतुर्थी की शोभायात्रा में भगवा झंडों का इस्तेमाल ‘हिंदुत्व अतिवाद’ को दिखाता है। उन्होंने प्रशासन से इस पर तुरंत कार्रवाई करने की माँग की।
इसके बाद लीसेस्टर की 40 हिंदू संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले हिंदू कम्युनिटी ऑर्गनाइजेशन ग्रुप (HCOG) ने इसका कड़ा विरोध किया। HCOG के संयोजक विनोद पॉपट ने कहा कि भगवा झंडा सदियों से हिंदू धर्म में पूज्य है। यह शांति, साहस और सच्चाई का प्रतीक है, न कि कट्टरता का। उन्होंने कहा कि ऐसे आरोप हिंदुओं का अपमान हैं और इससे समाज में नफरत फैल सकती है।
2022 में भी हुआ था ऐसा ही विवाद
यह पहली बार नहीं है कि लीसेस्टर में इस तरह का विवाद हुआ हो। 2022 में, भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के बाद भी यहाँ हिंसा भड़की थी। उस समय भी झूठी खबरें और अफवाहें फैलाई गई थीं। झूठे दावे किए गए कि हिंदुओं ने मुस्लिमों के खिलाफ नारे लगाए और मस्जिद को तोड़ा।
पुलिस ने इन दावों को बाद में गलत बताया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। झूठी खबरों के कारण एक महीने तक हिंसा हुई, जिसमें हिंदू घरों और मंदिरों पर हमले हुए, भगवा झंडों का अपमान किया गया और लोगों को चाकू तक मारा गया।
2022 की हिंसा के पीछे कई तरह की अफवाहें थीं। जैसे, हिंदूओं द्वारा मुस्लिम लड़की को अगवा करना या कुरान का अपमान करना, जिसे पुलिस ने झूठा पाया। कुछ सोशल मीडिया पर कट्टरपंथियों ने वीडियो फैलाए और भीड़ को भड़काया। उन्होंने ‘मुस्लिम पेट्रोल इन लीसेस्टर’ जैसे नारे भी लगाए।
नवंबर 2022 में आई एक रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि हिंसा ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ से नहीं, बल्कि इस्लामी दुष्प्रचार से भड़की थी। इस रिपोर्ट ने यह भी बताया कि कई मीडिया संस्थानों ने इन झूठी खबरों को बढ़ावा दिया, जिससे हिंदुओं के लिए ख़तरा पैदा हुआ।
आगे क्या?
लीसेस्टर की घटना एक बड़ा सबक है। यह दिखाती है कि जब झूठे दावे और अफवाहें समाज और मीडिया द्वारा फैलाए जाते हैं, तो वे एक समुदाय के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। भगवा झंडे को ‘कट्टरपंथ’ बताना केवल एक अपमान नहीं है, बल्कि यह हिंदुओं को अलग-थलग करने और डराने की एक सोची-समझी कोशिश है।
जब तक ब्रिटिश सरकार और मीडिया इस तरह के झूठे आख्यानों को रोकना नहीं सीखेगी, तब तक ब्रिटेन में हिंदुओं को ऐसी राजनीति का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
भारत, चीन और रूस के राष्ट्राध्यक्ष जब चीन में एक साथ आए, तो इसका सीधा असर अमेरिका पर देखने को मिला। चीन में चल रहे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई गर्मजोशी भरी मुलाकात से अमेरिका की चिंता बढ़ गई है।
इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50% का भारी टैरिफ लगाने और उनके सलाहकारों के सख्त बयानों के बावजूद, भारत में अमेरिकी दूतावास का लहजा एकदम बदल गया है। अमेरिकी दूतावास ने तुरंत सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया, जिसमें भारत के साथ अपनी दोस्ती और साझेदारी की तारीफ कर कहा कि भारत-अमेरिका की दोस्ती 21वीं सदी की ‘परिभाषित साझेदारी’ है।
अमेरिका के लहजे में बदलाव की वजह
भारत, चीन और रूस के बीच बढ़ती नजदीकी ने अमेरिका पर दबाव बढ़ा दिया है। SCO सम्मेलन में मोदी, जिनपिंग और पुतिन का एक साथ आना और खासकर प्रधानमंत्री मोदी का रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक ही कार में बैठकर मीटिंग स्थल तक जाना, ये सब अमेरिका के लिए एक बड़ा संकेत है। अब अमेरिका को यह अहसास हो गया है कि अगर उसे एशिया में अपने हितों की रक्षा करनी है, तो भारत के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने ही होंगे।
ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत पर कई तीखे बयान दिए थे, जिसमें रूस से तेल खरीदने को लेकर भी आलोचना की गई थी। लेकिन SCO सम्मेलन में जो तस्वीरें और संदेश सामने आए हैं, उसने अमेरिकी सरकार को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है। अब वे भारत के साथ अपने रिश्तों को ’21वीं सदी की निर्णायक साझेदारी’ कह रहे हैं, जो पहले के बयानों से एकदम अलग है।
अमेरिकी दूतावास का नया रवैया
चीन में हो रहे सम्मेलन के बीच, भारत में अमेरिकी दूतावास ने एक बेहद खास पोस्ट किया। इस पोस्ट में उन्होंने भारत और अमेरिका की दोस्ती को ’21वीं सदी का एक निर्णायक रिश्ता’ बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों की साझेदारी लगातार नई ऊँचाइयों को छू रही है और इसकी असली वजह दोनों देशों के लोगों के बीच की दोस्ती है।
The partnership between the United States and India continues to reach new heights — a defining relationship of the 21st century. This month, we’re spotlighting the people, progress, and possibilities driving us forward. From innovation and entrepreneurship to defense and… pic.twitter.com/tjd1tgxNXi
इस पोस्ट में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भी एक बयान था, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के लोगों के बीच की गहरी दोस्ती ही उनके संबंधों का आधार है। उन्होंने यह भी माना कि यही दोस्ती उन्हें आर्थिक संबंधों की अपार संभावनाओं को पूरा करने के लिए प्रेरित करती है। यह बयान दिखाता है कि अमेरिका अब भारत के साथ रिश्तों को सिर्फ सरकार के स्तर पर नहीं, बल्कि लोगों के बीच की दोस्ती के नजरिए से भी देख रहा है।
चीन और रूस का कड़ा रुख
SCO सम्मेलन में चीन और रूस ने भी अपनी बात खुलकर रखी। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सीधे तौर पर अमेरिका का नाम लिए बिना ‘चौधराहट’, ‘शीत युद्ध की मानसिकता’ और ‘धमकाने वाली प्रथाओं’ का विरोध किया। उन्होंने दुनिया को एक समान और बहुध्रुवीय बनाने की वकालत की।
वहीं, रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी शी जिनपिंग की बातों का समर्थन किया और पश्चिमी देशों के गठबंधनों के विकल्प के तौर पर एशिया और यूरोप में एक नई सुरक्षा प्रणाली बनाने का आह्वान किया। इन बयानों ने यह साफ कर दिया कि चीन और रूस मिलकर पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका के प्रभाव को कम करना चाहते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का साफ संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने भी SCO के मंच से दुनिया को एक साफ संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ की उम्मीदों को पुराने तौर-तरीकों में बांधकर रखना गलत है। उन्होंने कहा, “नई पीढ़ी के सपनों को हम पुराने जमाने की ब्लैक-एंड-व्हाइट स्क्रीन पर नहीं देख सकते, इसके लिए स्क्रीन बदलनी होगी।”
पीएम मोदी ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में बदलाव लाने की भी माँग की और कहा कि इसकी 80वीं वर्षगांठ पर इस काम की शुरुआत की जा सकती है। प्रधानमंत्री का यह बयान सीधे तौर पर उन वैश्विक संगठनों और ढाँचों पर सवाल उठा रहा है, जिन पर अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबदबा है।
कुल मिलाकर, SCO सम्मेलन ने भारत के लिए एक मजबूत स्थिति बनाई है, जिसने अमेरिका को अपनी विदेश नीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। अमेरिकी दूतावास का बदलता रवैया इसी सोच का नतीजा है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रूस से कच्चा तेल खरीदना काफी बढ़ा दिया है और इसका सीधा फायदा भारतीय रिफाइनरियों और देश की तेल खरीद पर पड़ा है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2022-23 से लेकर अब तक भारत ने रूसी तेल से कम से कम 12.6 बिलियन डॉलर (1.046 लाख करोड़ रुपए) की बचत की है।
यह बचत केवल रूसी तेल की कीमतों में मिलने वाली छूट से ही नहीं, बल्कि इस बात से भी जुड़ी है कि अगर भारत ने रूस से तेल नहीं खरीदा होता, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें और अधिक बढ़ जातीं और देश का तेल आयात बिल और भारी हो जाता।
शुरू में रूसी तेल पर मिलने वाली छूट काफी अधिक थी, जो 2022-23 में लगभग 13.6 प्रतिशत थी और इसने भारत को 4.87 अरब डॉलर (40,421 करोड़ रुपए) की बचत करने में मदद की। हालाँकि समय के साथ यह छूट कम हुई और वित्त वर्ष 2024-25 में यह केवल 2.8 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद यह भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।
रूसी तेल से भारत को हुआ काफी फायदा
रूसी तेल की खरीद का भारत में सबसे बड़ा फायदा रिफाइनरी कंपनियों को हुआ, जिसे सस्ते कच्चे तेल मिले। 2023-24 में रूस से तेल की मात्रा 373 मिलियन बैरल (59.3 बिलियन लीटर) से बढ़कर 609 मिलियन बैरल (96.83 बिलियन लीटर) हो गई, जिससे बचत भी बढ़ी और कुल 5.41 अरब डॉलर (44,903 करोड़ रुपए) की बचत दर्ज हुई।
इस दौरान रूसी तेल की औसत पहुँच मूल्य 76.39 डॉलर (6,340 रुपए) प्रति बैरल रही, जबकि अन्य आपूर्तिकर्ताओं से तेल की औसत पहुँच मूल्य 8.89 डॉलर (738 रुपए) अधिक थी। 2024-25 में छूट घटने के बावजूद, भारत की रिफाइनरियों ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा, क्योंकि यह आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, वास्तविक लाभ केवल कीमत में छूट तक सीमित नहीं है, भारत की तेजी से बढ़ती माँग ने वैश्विक तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखने में मदद की, जिससे तेल पर देश का कुल खर्च कम हुआ।
इस पूरे मुद्दे में अमेरिकी दबाव भी एक अहम पहलू है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने रूस से तेल आयात पर भारत को दबाव में लाने के लिए अतिरिक्त टैरिफ लगाए। अगस्त में ट्रम्प ने भारतीय आयात पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा की, जिससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुँच गया। यह कदम अमेरिकी नीति का हिस्सा था, ताकि भारत रूस से तेल खरीदना कम करे और मास्को को यूक्रेन युद्ध में दबाव में लाया जा सके।
भारत ने इस दबाव के आगे झुकने का कोई संकेत नहीं दिया। भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि देश अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखेगा और अमेरिका यह तय नहीं करेगा कि भारत किस देश से व्यापार करे। भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने कहा कि वे रूसी तेल खरीदना जारी रखेंगे।
रूस के लिए भारत का महत्व भी लगातार बढ़ा है। फरवरी 2022 में, जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया, भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से भी कम थी। पश्चिमी देशों ने रूसी तेल से दूरी बनानी शुरू की और रूस ने इच्छुक खरीदारों को छूट देना शुरू कर दी।
भारतीय रिफाइनरियों ने इस मौके का तुरंत लाभ उठाया और रूस कुछ ही महीनों में भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बन गया। पारंपरिक पश्चिम एशियाई आपूर्तिकर्ताओं भी इस दौर में पीछे छूट गए।
अब भारत के कुल तेल आयात में रूस का हिस्सा एक तिहाई से अधिक है और यह दुनिया में रूस का दूसरा सबसे बड़ा ग्राहक बन गया है। इसके अलावा, रूसी तेल मास्को के लिए राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत है और भारत की लगातार बढ़ती खरीद ने क्रेमलिन को वित्तीय मदद भी दी।
वैश्विक आपूर्ति को स्थिर रखने में मिली मदद
रूसी तेल खरीद में समय के साथ छूट घटने के पीछे कई कारण हैं। इसमें मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में सामान्य गिरावट और माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि शामिल है। पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूसी तेल की ढुलाई और बीमा महंगा हुआ है, जिससे वास्तविक लैंडेड कीमत पर छूट कम हो गई है।
भारत के लिए लैंडेड मूल्य ही मायने रखता है, क्योंकि यही वह राशि है जो रिफाइनिंग कंपनियाँ वास्तव में चुकाती हैं। व्यापारियों के अनुसार, रूस से तेल की बढ़ती खरीद ने न केवल भारतीय रिफाइनरियों को सस्ता तेल उपलब्ध कराया, बल्कि वैश्विक आपूर्ति को स्थिर रखने में भी मदद की, जिससे भारत को अन्य स्रोतों से महंगा तेल खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी।
सप्लाई की स्थिति और भविष्य की संभावनाओं की बात करें, तो सितंबर में भारत की रूसी तेल की खरीद अगस्त से 10-20 प्रतिशत बढ़ने की संभावना है, यानी प्रतिदिन लगभग 1.5 लाख से 3 लाख बैरल तक। रूस ने यूरोप और अमेरिका की खरीद सीमित होने के कारण अपनी आपूर्ति बढ़ाई है।
हाल ही में यूक्रेन ने रूसी रिफाइनरियों पर हमला किया, जिससे देश की रिफाइनिंग क्षमता का 17 प्रतिशत हिस्सा बंद हो गया है। इसके बावजूद रूस के पास अगले महीने निर्यात करने के लिए पर्याप्त तेल हैं।
भारत की दो सबसे बड़ी रिफाइनरियाँ, रिलायंस और नायरा एनर्जी ने संकेत दिया है कि वे तेल खरीदना जारी रखेंगी। ये कंपनियाँ मुख्य रूप से रूसी तेल पर निर्भर हैं।
वैश्विक बाजार पर प्रभाव
वैश्विक बाजार पर इसका असर भी महत्वपूर्ण है। अगर भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया होता, तो वैश्विक आपूर्ति में लगभग दस लाख बैरल प्रतिदिन की कमी होती और कीमतें अल्पकालिक रूप से लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती थीं।
इसके अलावा, भारत रूस का सबसे बड़ा खरीदार बनकर वैश्विक तेल बाजार में संतुलन बनाए रखने में भी योगदान दे रहा है। अमेरिका और यूरोप के प्रतिबंधों के बावजूद भारत की माँग रूस को अपनी आपूर्ति बनाए रखने में मदद कर रही है।
हाल के वर्षों में भारत द्वारा रूसी तेल की बढ़ती खरीद ने देश को सस्ते कच्चे तेल का लाभ दिया है। 2024 में OPEC का हिस्सा बढ़ा और पेट्रोलियम निर्यातक देशों से महंगी आपूर्ति के कारण भारत की रणनीति और महत्वपूर्ण हो गई।
सितंबर में रूस ने यूराल क्रूड को ब्रेंट के मुकाबले 2-3 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर बेचा, जो अगस्त के 1.50 डॉलर से सस्ता था। इसका मतलब है कि भारत आर्थिक रूप से लाभ उठा रहा है और अमेरिकी टैरिफ के बावजूद अपने तेल मिश्रण में रूसी तेल को प्रमुख बनाए रखेगा।
अगले कुछ महीनों में भारत का रूसी तेल आयात बढ़ते रह सकता है, क्योंकि न केवल यह सस्ता है, बल्कि वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनाए रखने में भी मदद करता है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तेल पर प्रतिबंध नहीं होने तक वह जहां से सबसे अच्छा सौदा मिलेगा, वहाँ से तेल खरीदेगा।
अमेरिकी टैरिफ और दबाव के बावजूद, देश ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी है और रूसी तेल की खरीद को प्राथमिकता दी है। इस वजह से भारतीय रिफाइनरियों को आर्थिक लाभ मिला है और वैश्विक तेल बाजार में भारत का प्रभाव भी मजबूत हुआ है।
सैयदा हमीद, आज से करीब एक हफ्ते पहले तक देश का बड़ा वर्ग इस नाम को नहीं जानता होगा। अब हालात बदल गए हैं, सैयदा वामपंथी और अर्बन नक्सल गिरोह की ‘पोस्टर गर्ल’ बन गई हैं। आपको लगेगा उन्होंने कोई क्रांतिकारी काम किया है लेकिन ऐसा है नहीं।
उन्होंने भारत में घुसपैठियों की वकालत की है, उनका मानना है कि असम में बांग्लादेशियों को रहने देना चाहिए क्योंकि ये धरती अल्लाह ने इंसानों के लिए ही बनाई है। गैर-कानूनी घुसपैठ की इस वकालत को अपूर्वानंद जैसे अर्बन नक्सल गिरोह के लोग ‘इंसानियत’ बता रहे हैं।
अपूर्वानंद ने ‘द वायर’ में एक लंबा लेख लिखकर सैयदा हमीद को विक्टिम बनाने की पूरी कोशिश की है, उनकी नजर में असली दिक्कत भारत के लोग हैं ना की सैयदा। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की वकालत करने वाली सैयदा असल में मासूम हैं, जो लोग नहीं समझ पा रहे हैं।
अपूर्वानंद का विक्टिम कार्ड
अपूर्वानंद ने लिखा, “वह वीडियो देखा जिसमें वे बांग्लादेशियों के बारे में कुछ कह रही हैं, देखा कि वे कैमरेवालों से घिरी हुई हैं। जाहिरा तौर पर उनसे बांग्लादेशियों के बारे में कुछ पूछा जा रहा है। सवालों की बौछार से आजिज़ आकर सैयदा कहती हैं।“
द वायर के लेख का हिस्सा
यानी, अपूर्वानंद बता रहे हैं कि सैयदा ने जो कह दिया सो ठीक है क्यों पत्रकारों ने उन्हें परेशान कर दिया था, जाहिर है कि जब कोई किसी दौरे पर किसी राज्य में एक प्रोपेगेंडा के तहत जाएगा तो सवाल तो पूछे ही जाएँगे।
सैयदा का पूरा बयान सुनकर कहीं आपको नहीं लगेगा कि वो परेशान हैं, तनाव में हैं या उन्हें कोई समस्या है। इसके अल्ट वो आक्रामक लहजे में अपनी बात कह रही हैं। अपूर्वानंद द्वारा सैयदा को विक्टिम बनाने की शुरुआत यहीं से हो जाती है।
This is Syeda Hameed, former member of the Planning Commission during congress era. Just look at the audacity! If she feels so strongly about the “rights” of illegal Bangladeshis in Assam, why doesn’t she accommodate them in her own home? Perhaps her like-minded friends can also… pic.twitter.com/7ZVdtx3uDc
दरअसल, सैयदा हमीद, प्रशांत भूषण और हर्ष मंदर जैसे वामपंथियों का एक गुट 2 दिन के लिए असम के दौरे पर ‘बेदखली’ का अध्ययन करने गया था। यह गुट घुसपैठियों को पीड़ित बनाने पर तुला हुआ था, लगे हाथ सैयदा ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को भी पीड़ित ही बना दिया।
भारतीयों पर ही अपूर्वानंद का निशाना
खैर, वापस अपूर्वानंद पर लौटते हैं। वह सैयदा के बयान का आशय खुद ही समझाते हुए लिखते हैं, “भारत में बांग्लादेशियों का अपराधीकरण कर दिया गया है। उनके साथ किसी इंसानी बर्ताव की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सैयदा सिर्फ इतना कह रही थीं कि बांग्लादेशियों को इंसान की तरह देखने की जरूरत है। उनके किसी लफ्ज से यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि वे भारत में गैर-कानूनी तरीके से बांग्लादेशियों के रहने की वकालत कर रही हैं।“
द वायर का लेख
हालाँकि, जब आपने सैयदा का बयान सुना तो स्पष्ट था तो वो बांग्लादेशियों के भारत में रहने की वकालत कर रही हैं। कोई बांग्लादेशी घुसपैठ करने भारत में आता है और यहाँ कब्जा कर लेता है तो वो किस तरह से रहना हुआ। बांग्लादेशी किस नियम का पालन कर भारत में घुसपैठ करता है? घुसपैठिए का भारत में कानून रहना कैसे संभव है?
अपूर्वानंद प्रोफेसर हैं तो, शब्दों के जाल से लोगों को उलझाने की कोशिश कर रहे हैं। जब बात घुसपैठ पर हो रही हो, और कोई कहे कि ‘बांग्लादेशी भी यहाँ रह सकते हैं’ तो इसका मतलब यही होता है।
बहुत चालाकी से अपूर्वानंद ने इसमें यह भी कहने की कोशिश की है कि बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों पर भारत में हमले हो रहे हैं। जैसे उन्होंने सैयदा के बयान का खुद आशय निकाला है, उनका आशय भी साफ है कि वो बंगाल को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह महीन सोच देश के भीतर ही यह बताने की कोशिश है कि भारत में बांग्ला भाषियों को मारा-पीटा जा रहा है।
पूरा देश ही अपूर्वानंद के निशाने पर है
अब इस लेख में आगे बढ़ते हैं। अपूर्वानंद ‘द वायर’ में लिखते हैं, “सैयदा अपने भोलेपन में भूल गईं कि आज के हिंदुस्तान और असम में उनकी इस इंसानियत की माँग का जवाब हिंसा ही हो सकता है। वह हमला मुख्यमंत्री ने शुरू किया। बाकी सब उस हमले में शामिल हो गए। लेकिन इस हमले के लिए उनके इस बयान की ज़रूरत भी न थी।“
अब इसे महीनता से समझें तो इसमें दो बाते हैं एक ‘सैयदा का भोलापन और असम के मुख्यमंत्री की हिंसा’। अपूर्वानंद ने सैयदा के सारे बयानों को उनके भोलेपन के आवरण में ढंक दिया। अब शब्दों पर गौर करिए ‘आज के हिंदुस्तान और असम’…’इंसानियत की माँग का जवाब हिंसा’…’हमला मुख्यमंत्री ने शुरू किया’। इन शब्दों के जरिए महीन तरीके से माहौल बनाया जा रहा है। वो भी देश के खिलाफ, असम के सीएम के खिलाफ और यह साबित करने की कोशिश है कि आज के भारत में इंसानियत की कोई जगह नहीं बस हिंसा की जगह है।
आगे बढ़िए, ‘हमले के लिए उनके इस बयान की ज़रूरत भी नहीं थी’ यानी बयान को भूल जाओ और बस यह याद रखो कि इस बयान के बाद जो सवाल उठ रहें हैं वो तो बेमानी ही हैं। ये कोशिश है कि कैसे लोगों को आरोपी बनाया जाए और सैयदा को क्लीन चिट दे दी जाए।
द वायर का लेख
याद रखिए कि अपूर्वानंद जैसे लोग जो आज इंसानियत की दुहाई दे रहे हैं वो CAA के खिलाफ भर-भरकर बयानबाजी कर रहे थे। इनका यह इंसानियत का चोला सुविधा के अनुसार ओढ़ा जाता है। जब पीड़ितों में अधिकतर हिंदू थे तो इन्हें ना इंसानियत याद आई, ना भोलापन याद आया।
जिस CAA के खिलाफ यह गिरोह लिख रहा था, उसमें तो प्रताड़ितों को भारत की नागरिकता मिलनी थी। वो लोग तो घुसपैठ करके किसी दूसरे देश पर ‘कब्जा’ करने की नियत से नहीं आए थे। उनकी तो पुण्यभूमि भी यही थी। तब भी इस गिरोह के पेट में दर्द था।
घुसपैठियों पर दर्द से दिक्कत में क्यों अपूर्वानंद?
अपूर्वानंद ने लिखा, “पिछले 11 साल भारतीय जनता पार्टी और भारत का बड़ा मीडिया ‘घुसपैठियों’ के खिलाफ युद्ध कर रहा है। उस युद्ध में सैयदा, हर्ष और प्रशांत जैसे भारतीयों को गद्दार ठहराया जा रहा है जो दुश्मन के साथ मिले हुए हैं।”
द वायर का लेख
अगर, घुसपैठियों के खिलाफ युद्ध चल भी रहा है तो इससे अपूर्वानंद जैसे लोगों को क्या दिक्कत हो सकती है। कल को ये लोग हत्यारों, बलात्कारियों के समर्थन में भी उतर आएँगे कि इन पर कार्रवाई क्यों? इनके खिलाफ युद्ध क्यों? कोई अगर गैरकानूनी काम करेगा तो उसकी पूजा तो नहीं की जाएगी। उसके खिलाफ कार्रवाई ही होगी। वहीं, सरकार कर रही है।
भारत के लिए खतरा हैं घुसपैठिए
ये घुसपैठिए भारत की डेमोग्राफी के लिए इतना बड़ा खतरा है कि खुद पीएम मोदी को लाल किले की प्राचीर से घुसपैठ के खिलाफ मिशन की शुरुआत करने की बात कहनी पड़ी है। ये घुसपैठिए आज भारत में गली-नुक्कड़ से लेकर बड़े-बड़े शहरों में क्राइम में लिप्त हैं।
पिछले दिनों एक बांग्लादेशी द्वारा सैफ अली खान पर हमले की खबर सुर्खियों में रही थी, इसके अलावा भी ये घुसपैठिए हत्या से लेकर बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त हैं। ये घुसपैठिए अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है बल्कि देश के भीतरी इलाकों में भी फैल गए हैं।
ये ना केवल हमारी डेमोग्राफी को बदल रहे हैं बल्कि हमारे मठ, मंदिर, जंगल हर जगह जमीन पर कब्जा कर रहे। यहाँ तक की देश में ये घुसपैठिए संगठित हिंसा में भी शामिल हैं। ये दंगा फैलाने में भी सबसे आगे नज़र आते हैं।
खुद बांग्लादेश में किस तरह अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। ये लोग महिलाओं, नाबालिग बच्चियों को निशाना बना रहे हैं। हिंदू धर्म स्थलों को तोड़ा जा रहा है। हिंदुओं की चुन-चुनकर हत्याएँ की जा रही हैं।
कल इनमें से ही कोई भारत में घुस आएगा तो ये आज जो इंसानियत का रोना रो रहे हैं, घुसपैठियों की वकालत कर रहे हैं। ये खुद भी उनके निशाने पर होंगे। यह बात समझने की जरूरत है कि देश विरोधी बातें कर ‘कूल’ बनने का जो नया चलन शुरू हुआ है, यह असल में बेहद खतरनाक है। यह क्रूरता है।
घुसपैठियों की वकालत ‘कूल’ नहीं ‘क्रूर’
आज अपूर्वानंद भारत के लोगों को इंसानियत सिखाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन भारत के लोगों ने कट्टरपंथी सोच के जख्म सदियों तक झेले हैं। ये घुसपैठिए जो भारत में आकर भारत को खोखला कर अपनी कट्टरपंथी सोच को आगे बढ़ाना चाहते हैं, भारत को उससे बचने की जरूरत है।
16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के नाम पर कोलकाता की सड़कों पर हिंदुओं के कत्लेआम कोई कैसे भूल सकता है। हजारों हिंदुओं को मुस्लिम कट्टरपंथी ने सिर्फ अपनी मानसिकता की वजह से मार गिराया था।
भारत ने ऐसी ही कट्टरपंथी सोच के चलते अपना बड़ा भू-भाग खो दिया है। देश ने इसी सोच के कारण बँटवारे का दंश झेला है। यही बांग्लादेश, जिससे आज लोग भारत में जबरन घुसपैठ कर रहे हैं, कभी भारत का हिस्सा हुआ करता था। फिर यहाँ कट्टरपंथी सोच आती गई, जिहादियों के इलाके बन गए और देश बँट गया।
बँटवारे के दौरान लाखों लोगों की हत्याएँ हुई, बहन-बेटियों के बलात्कार हुए और चोरी-डकैती की घटनाओं की बाढ़ आ गई। ये आज के ‘कूल’ दिखने वाले लोग देश को वापस उसी दौर में ले जाने पर आमादा है।
पर, अपूर्वानंद और ‘द वायर’ कितनी भी कोशिश कर लें लेकिन ये देश, देश के लोग एक बार फिर भारत को नहीं बँटने देंगे। भारत घुसपैठियों के खिलाफ मजबूती से खड़ा है और खड़ा रहेगा। भारत को इंसानियत का सबक सीखने के लिए अपूर्वानंद की जरूरत नहीं है। भारत ने इस दुनिया को इंसानियत और मानवता का पाठ पढ़ाया है।
चीन के शहर तियानजिन में रविवार (31 अगस्त 2025) को हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बढ़ती दोस्ती ने वैश्विक राजनीति में एक नया समीकरण खड़ा कर दिया है।
जहाँ एक ओर तीनों देशों के एक साथ आने से दुनिया नई संभावनाओं की ओर देख रही है तो वहीं, दूसरी तरफ ये साझेदारी अमेरिका के लिए कई स्तरों पर चुनौती के तौर पर सामने आ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई नीतियों और रणनीतिक दृष्टिकोण को यह गठजोड़ असहज कर रहा है।
पीएम मोदी के साथ पुतिन और शी जिनपिंग की मुलाकात जियोपॉलिटिकल मसले के आधार पर कभी अहम मानी जा रही है। ट्रंप पहले से ही BRICS समूह के लिए खरी-खोटी सुना चुके हैं। अब SCO को लेकर भी उनकी बेचैनी साफ तौर पर देखा जा सकती है।
गौरतलब है कि ट्रंप ने अपनी धौंस और सत्ता की हनक दिखाने के लिए दुनियाभर में टैरिफ जंग छेड़ दी। अपनी मनमर्जी पर अलग-अलग देशों से अमेरिका में आयातित सामानों पर लगाए टैरिफ से हर देश किलस उठा। इसका नतीजा ये हुआ कि टैरिफ के कारण भारत, चीन और रूस के बीच नजदीकियाँ बढ़ गई। तीनों देश मिलकर अमेरिका की ‘टैरिफ धमकियों’ का जवाब देने की रणनीति बना रहे हैं।
भारत को घुटनों पर लाने की हर कोशिश रही नाकाम
ट्रंप ने पहले भारत-पाकिस्तान के बीच चले सैन्य संघर्ष में संघर्षविराम का श्रेय लेने की कोशिश की। इसे भारत की ओर से नकार दिया गया। उन्हें लगा था कि इसके जरिए वे नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामिक किए जा सकेंगे। लेकिन ये हुआ नहीं।
इसके बाद अमेरिका ने ट्रेड डील के तहत पहले भारत के कृषि और डेयरी समेत उन बाजारों में घुसने की कोशिश की जिसमें भारत का प्रभुत्व कहीं अधिक है। लेकिन भारत की ओर से इस पर मंजूरी नहीं मिल पाई और अमेरिका की खुद के मुनाफा कमाने की चाहत धरी की धरी रह गई।
इसके बाद ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत को उलाहना देना शुरू किया। इसके बाद ही भारत पर 25% टैरिफ लगाया और रूसी तेल की खरीद पर अपनी खीझ उतारने के लिए अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाकर इसे दोगुना कर दिया।
असल में तो भारत और चीन, दोनों ही रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीद रहे हैं। इसे अमेरिका यूक्रेन युद्ध को फंड करने के रूप में देखता है। हालाँकि इस पर अपना पक्ष भारत ने मजबूती से रखा है। साथ ही अमेरिका को भी रूस के साथ कर रहे व्यापार के लिए पलटवार किया।
SCO सम्मेलन में न केवल पीएम मोदी, जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति पुतिन मिले हैं बल्कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी शामिल हैं। इस लिहाज से दुनिया को स्पष्ट संदेश मिला है कि चीन इस मंच को ग्लोबल साउथ की एकता के रूप में दिखाने की कोशिश में है।
BRICS असल में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका देशों का समूह है तो वहीं SCO शंघाई सहयोग संगठन है। हाल के वर्षों में ब्रिक्स एक बड़ा आर्थिक संगठन बनकर उभर रहा है, जिसकी अर्थव्यवस्था 20 ट्रिलियन डॉलर (लगभग ₹1,763 लाख करोड़) से ज्यादा है।
अमेरिका को क्या है खतरा?
भारत, रूस और चीन जैसे बड़े राष्ट्र जब BRICS और SCO जैसे बड़े मंच पर साथ आते हैं तो यह अमेरिका की एकध्रुवीय ताकत को चुनौती देता है। असल में तीनों देशों का यह गठजोड़ एक नया पावर सेंटर बना सकता है जो पश्चिमी देशों पर अपना प्रभाव बढ़ा सकता है।
SCO जैसे मंचों पर इन देशों के बीच सैन्य अभ्यास और सुरक्षा सहयोग बढ़ रहा है, जिससे अमेरिका की एशिया में रणनीतिक पकड़ कमजोर हो सकती है।
दूसरी ओर देखा जाए तो BRICS देशों की ओर से एक वैकल्पिक वित्तीय ढाँचे को लेकर चर्चा की जा रही है। इसके तहत डॉलर के बजाय स्थानीय या साझा करेंसी का उपयोग हो सकता है। इससे अमेरिका की आर्थिक ताकत को सीधा झटका लग सकता है।
ट्रंप की क्यों बढ़ रही बेचैनी?
ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने भारत और चीन जैसे देशों को अमेरिका से दूर कर दिया है। साथ ही भारत और चीन के बीच की दूरियों को भी खत्म करने का में भूमिका निभाई है। अब जब ये देश रूस के साथ मिलकर एक मंच साझा कर रहे हैं तो यह अमेरिका के लिए कूटनीतिक सिरदर्द बन गया है।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साफतौर पर कहा है कि उनके रिश्तों से ‘किसी तीसरे देश को टेंशन लेने की जरूरत नहीं’, ये ट्रंप के लिए एक सीधा और कड़ा संदेश था।
अमेरिका की कोशिश थी कि भारत को चीन के खिलाफ अपने खेमे में बनाए रखे, लेकिन अब भारत चीन और रूस के साथ सहयोग बढ़ाकर संतुलन की राजनीति अपना रहा है।
इस लिहाज से ये दोस्ती न केवल अमेरिका की विदेश नीति को चुनौती दे रही है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी एक नई परिभाषा देने की कोशिश कर रही है।
ड्रग तस्करी रैकेट चलाने वाले भोपाल के यासीन मछली और उसके चाचा शाहवर मछली ने पूरी पीढ़ी को बर्बाद किया हुआ था। इनका सबसे बड़ा खरीदार जिम संचालक मोनिस खान था। इन ड्रग्सत को जिम में आने वाले युवक और युवतियों को दवा बताकर दिया जाता था।
यह खुलासा 18 अगस्त 2025 को ड्रग तस्करी के आरोप में सबसे पहले गिरफ्तार किए गए सैफुद्दीन ने पुलिस पूछताछ में किया था। उसने बताया कि मोनिस जिस जिम का चलाता है, उसकी भोपाल में तीन ब्रांच हैं। जिम में शहर के हाई प्रोफाइल लोग आते थे और उन्हें ड्रग्स की लत लगवाई जाती थी।
इस मामले में नाम आने के बाद से मोनिस मलेशिया फरार हो गया है। पुलिस ने उसे मेमोरेंडम के आधार पर आरोपित बनाया है। फरारी के बाद अब पुलिस उसके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी करने की तैयारी कर रही है। पुलिस ने बताया कि जिम संचालक से पहले मोनिस खान फिटनेस ट्रेन भी रह चुका है।
नाइनजीरियन से खरीदते थे ड्रग्स
यासीन मछली को ड्रग्स बेचने वाले अंशुल सिंह उर्फ भूरी को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। ये बेन नाम के नाइजीरियन व्यक्ति से ड्रग्स खरीदते थे और भोपाल में बेचते थे। खास पार्टियों में ड्रग्स को बेचा जाता था। यासीन मछली और शाहवर मछली भी इनके ग्राहक थे।
देनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, यासीन और शाहवर मछली ने ही पुलिस पूछताछ में इसका नाम उगला थी, जिसके बाद निशानदेही पर पुलिस ने अंशुल को दबोच लिया।
यासीन मछली पर हिंदू युवती के रेप में FIR दर्ज
भोपाल में ड्रग तस्करी के आरोप में पकड़े गए यासीन मछली और चाचा सारिक मछली ने सालों से लोगों पर अत्याचार किए। युवाओं को नशे में धखेलने का काम करते थे। इससे पहले एक हिंदू युवती ने भी यासीन मछली पर रेप का मुकदमा दर्ज करवाया था।
युवती ने शिकायत में बताया था कि करीब एक साल पहले एक पब में यासीन से मुलाकात हुई थी। यासीन ने युवती से दोस्ती की। दोनों के बीच बातचीत बढ़ने लग गईं। यासीन ने युवती को शादी का झाँसा देकर फाइव स्टार में बुलाया और रेप किया।
युवाओं को रेव पार्टी में बुलाकर नशे की लत डालते
यासीन मछली भोपाल में युवाओं को टारगेट कर रेव पार्टी में बुलाता था। इस काम के लिए कई पब और लॉन्ज अड्डा बने हुए थे। पार्टी में आने वाली हिन्दू लड़कियों को ड्रग्स की डिलीवरी के लिए इस्तेमाल करता था। इन लड़कियों को प्रेम जाल में फँसा कर उनका रेप करता और फिर ब्लैकमेल करता था। रेव पार्टियों से जुड़े कई वीडियो भी पुलिस के हाथ लगे थे।
वह शहर के बाहरी इलाकों में रेव पार्टी आयोजित करता था। इन पार्टियों में एंट्री के लिए 10 से 25 हजार रुपए वसूले जाते थे। पार्टी में ड्रग्स के लिए अलग से रकम ऐंठी जाती थी। इस पूरे काले कारोबार में यासीन मछली और उसका परिवार शामिल था।
यासीन के परिवार ने 55 साल में अवैध काम कर खड़ा किया ‘साम्राज्य’
ड्रग तस्कर यासीन मछली के परिवार ने 55 साल में अवैध कारोबार के जरिए बड़ा साम्राज्य खड़ा किया। यासीन का परिवार 1970 से पहले बुधवारा में रहता था और मछलियों की दलाली करता था। इसके बाद हथाईखेड़ा आया और यहाँ मछली पालने का ठेका लिया।
1980 में राजनीतिक पार्टियों की मदद कर इलाके में दबदबा बनाया। राजनीतिक मदद से ही मुस्लिमों की बस्ती बसा ली और पत्थर खदानों ने अवैध खनन शुरू किया।
जानें पूरा मामला
18 जुलाई 2025 को भोपाल के गोविंदपुरा से सैफुद्दीन और आशू उर्फ शाहरुख को गिरफ्तार किया गया था। इनके पास से ₹3 लाख और बड़ी मात्रा में ड्रग्स बरामद की गई। इन्हीं की निशानदेही पर ड्रग तस्करी का सरगना शाहवर मछली और उसका भतीजा यासीन मछली को क्राइम ब्रांच ने दबोचा। दोनों के पास से 3 ग्राम एमडी ड्रग और एक देशी पिस्टल बरामद की गई थी।
जाँच में सामने आया कि यासीन और उसके चाचा शाहवर ड्रग्स तस्करी का धंधा करते थे। मुंबई, राजस्थान और पंजाब से चरस और अन्य ड्रग्स लाते थे। फिर इन्हें शहर के पब, लाउंज और क्लब में पार्टियों में बेचा करते थे। ड्रग्स की डिलीवरी के लिए हिंदू लड़कियों को इस्तेमाल किया जाता था।
युवाओं के लिए रेव पार्टी आयोजित कर उन्हें नशे की लत लगाते थे। ये दोनों हिंदू लड़कियों का शारीरिक शोषण करते थे और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव भी बनाते थे।
पूर्वी अफगानिस्तान में रविवार (31 अगस्त 2025) देर रात आए भयानक भूकंप में 800 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है, जबकि 2500 से ज्यादा लोग घायल हैं। अधिकारियों ने भूकंप से हुए जान-माल ही हानि की जानकारी देते हुए कहा कि हेलीकॉप्टरों से घायलों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया है। लापता लोगों की तलाश की जा रही है।
यूएस जियोलोजिकल सर्वे के मुताबिक, भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6 थी। भूकंप का केन्द्र जमीन से 8 किलोमीटर अंदर अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा से लगे कुनर और नंगरहर में था।
टूटी सड़कें, लोगों तक राहत पहुँचाना हुआ मुश्किल
अफगानिस्तान के हेल्थ विभाग के प्रवक्ता सरफराज जमीन के मुताबिक, रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है। भूकंप में कई गाँव पूरी तरह ध्वस्त हो गए हैं। अफगानिस्तान के रक्षा विभाग ने 30 डॉक्टरों और 800 किलो मेडिसिन भेजी है। लेकिन सड़कों की खस्ता हालत के कारण कुनार और नंगरहार प्रांत के ग्रामीणों तक मदद पहुँचाना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है।
इस इलाके में सड़कें पक्की नहीं हैं। भूकंप के कारण ज़्यादातर सड़कें चट्टानों से ढकी हुई हैं, जिससे आवागमन में काफी मुश्किलें आ रही हैं। इन इलाकों में ज्यादातर घर मिट्टी के बने हैं, इसलिए वे आसानी से ढह गए।
Video: Residents of the Mazar Valley in Nurgal district of Kunar say that hundreds of villagers have been buried under debris due to last night’s earthquake and call for urgent help in rescuing them.
They told TOLOnews that children, women and elderly have been struck under the… pic.twitter.com/UbcQTQQYgN
कर्टिन विश्वविद्यालय में पेट्रोलियम भूविज्ञान के प्रोफेसर क्रिस एल्डर्स के मुताबिक, पूर्वी अफगानिस्तान का भूकंप प्रभावित ये इलाका पहाड़ी है और यहाँ लोगों की अच्छी खासी तादाद है, इसलिए मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है। पहाड़ी इलाकों में सिर्फ मकानें ध्वस्त नहीं हुई हैं, बल्कि पहाड़ियाँ के हिलने से आगे भूस्खलन का खतरा भी बना हुआ है।
सुबह तक 5 बार धरती डोली
राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र की वेबसाइट के मुताबिक, अफगानिस्तान के अलग- अलग इलाकों में रविवार (31 अगस्त 2025) देर रात से सुबह तक 5 बड़े भूकंप आए थे। पहला भूकंप देर रात 12 बजकर 47 मिनट पर आया। इसकी तीव्रता 6.3 थी। दूसरा भूकंप कुछ देर बाद रात 1 बजकर 8 मिनट पर आया। इसकी तीव्रता 4.7 थी। तीसरा भूकंप रात 1 बजकर 59 मिनट पर आया, जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 4.3 थी। चौथा भूकंप तड़के 3 बजकर 3 मिनट 25 सेकंड पर आया। इस वक्त तीव्रता 5 थी। इसी तरह सुबह 5 बजकर 16 मिनट 30 सेकंड पर पाँचवी बार 5 तीव्रता वाले भूकंप के झटके महसूस किए गए।
ویډیو: د کونړ له زلزله ځپلو سیمو د ننګرهار حوزوي روغتون ته د ژوبل شويو د لېږد بهیر لا هم روان دی. تر اوسه سلګونه ژوبل کسان دغه روغتون ته لېږدول شوي دي.#طلوعنیوزpic.twitter.com/wihg8jRjFd
यह आपदा पहले से ही संकटों से जूझ रहे अफगानिस्तान के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला है। एक और अफगानिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मदद में भारी कमी आई है। साथ ही पड़ोसी देश उसके नागरिकों को वापस भेज रहे हैं। इससे संसाधनों पर पहले से ही भारी दबाव है।
यूएन ने जताया दुख
संयुक्त राष्ट्र ने भूकंप में मारे गए लोगों के प्रति दुख जताते हुए कहा है कि ‘विनाशकारी’ भूकंप ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली। अफगानिस्तान स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय ने एक पोस्ट साझा करते हुए कहा है कि उसकी टीमें प्रभावित लोगों तक आपातकालीन सहायता प्रदान कर रही हैं। यूएन ने X पर एक पोस्ट में कहा, “अफगानिस्तान के पूर्वी क्षेत्र में आए विनाशकारी भूकंप से बेहद दुखी है, इसमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई और कई अन्य घायल हो गए।”
The UN in Afghanistan is deeply saddened by the devastating earthquake that struck the eastern region & claimed hundreds of lives, injuring many more. Our teams are on the ground, delivering emergency assistance & lifesaving support. Our thoughts are with the affected communities pic.twitter.com/rCE6b3WzSU
हाल के दिनों में रूस का कुरिल द्वीप समूह भूकंप से काँपा था। उस वक्त भी रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 6 मापी गई थी। 30 जुलाई को रूस के कामचटका द्वीपों पर 8.8 की तीव्रता वाला भूकंप आया था। हालाँकि यहाँ जनसंख्या काफी कम होने की वजह से हताहतों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी।
व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ को उचित ठहराया। नवारो ने भारतीय ब्राह्मणों पर रूस से तेल खरीदकर मुनाफा कमाने की बात कही। इसके अलावा भारत को सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए चीन और रूस से दोस्ती पर सवाल खड़े किए।
FOX News के साथ इंटरव्यू के दौरान पीटर नवारो ने भारत को ‘टैरिफ का महाराजा’ बताते हुए कहा कि नई दिल्ली पर दुनिया में सबसे ज्यादा टैरिफ हैं। नवारो ने पीएम मोदी को बड़ा नेता बताया और कहा, “वह(पीएम मोदी) पुतिन और शी जिनपिंग के साथ बिस्तर पर जा रहे हैं, जबकि वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र है।”
नवारो ने आगे कहा, “मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि भारतीय लोग कृपया समझें कि यहाँ क्या हो रहा है। ब्राह्मण, भारतीय लोगों की कीमत पर मुनाफ़ा कमा रहे हैं। हमें इसे रोकना होगा।”
“I want Indians to understand what is going on. Brahmins are profiteering by buying Russian oil at the expense of the Indian people,” says Trump’s trade adviser Peter Navarro pic.twitter.com/9FVfRR5lks
यह बातें नवारों ने तब कहीं जब उनसे पूछा गया, “क्या भारत पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क व्लादिमीर पुतिन को रोकने के लिए काफी हैं?” नवारो ने जवाब दिया कि फिलहाल भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लागू है, इससे सिर्फ थोड़ी सी ज्यादा चीन पर भी है। नवारो ने कहा कि सवाल यह भी है कि अमेरिका खुद को नुकसान पहुँचाए बिना कितनी ऊपर जाना चाहता है।
बात को आगे बढ़ाते हुए ट्रंप के सलाहकार तुरंत भारत पर वार शुरू कर देते हैं। वे कहते हैं, “फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले भारत रूसी तेल काफी कम मात्रा में खरीदता था। अब उसी कच्चे तेल पर पीएम मोदी को पुतिन छूट देते हैं। वे इसे रिफाइन कर यूरोप, अफ्रीका और एशिया में बेचकर पैसा कमाते हैं।”
नवारो कहते हैं, “देखिए? भारत सिर्फ क्रेमलिन के लिए लॉन्ड्रोमैट के अलावा कुछ नहीं है। ये (रूस) यूक्रेनियों को मारता है और करदाताओं के तौर पर हम उन्हें पैसा भेजते हैं, जिससे यूक्रेन अपनी रक्षा कर सके।”
यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी राष्ट्रपति के व्यापार सलाहकार ने भारत के खिलाफ ऐसी टिप्पणी की है। इससे पहली भी उन्होंने भारत को ‘तेल का लॉन्ड्रोमैट’ कहा था। उन्होंने नई दिल्ली द्वारा रूसी तेल की लगातार खरीद पर निशाना भी साधा और रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध‘ करार दिया था, जिससे भारत और अमेरिका के बीच शुरू हुआ व्यापारिक विवाद और गहरा गया था।
जब एलन मस्क ने पीटर नवारो का कहा था ‘मूर्ख’
पीटर नवारो को उनके विवादित बयानों और झूठे दावों के चलते लताड़ लगती रहती है। हाल ही में एलन मस्क ने नवारो को ‘मूर्ख’ बताया था। जब नवारो ने दावा किया था कि टेस्ला एक कार निर्माता नहीं बल्कि कार असेंबलर कंपनी है।
PETER NAVARRO ON ELON MUSK:
“We all understand in the White House (and the American people understand) that Elon's a car manufacturer. But he's not a car manufacturer — He's a car assembler.
In many cases, if you go to his Texas plant, a good part of the engines that he gets… pic.twitter.com/mkp1wRGcvX
नवारो ने दावा किया था कि एलन मस्क की कार EV के इंजन जापान और चीन से मँगाए जाते हैं जबकि अमेरिका के कई शहरों में भी ऐसे इंजन बनते हैं। इस दावे पर एलन मस्क ने नवारो को लताड़ लगाई थी, उन्होंने नवारो के दावे को नकारते हुए कहा कि नवारो सच में ‘मूर्ख’ हैं।
जेल जा चुका है ट्रंप का सलाहकार पीटर नवारो
डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो जेल की सजा काट चुके हैं। नवारो को साल 2021 में US कैपिटल पर हुए हमले के मामले में 4 महीने जेल की सजा सुनाई गई थी।
मार्च 2024 में अमेरिका की तत्कालीन सरकार (कॉन्ग्रेस) की अवमानना के आरोप में जेल जाने वाले व्हाइट हाउस के पहले अधिकारी बने थे। अमेरिका इस सजा को इतिहास के पन्नों में संजोकर रखता है।
कर्नाटक में एक बार फिर नाबालिग लड़की से शादी और गर्भवती करने का गंभीर मामला सामने आया है। आरोपित कोई आम व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ग्राम पंचायत अध्यक्ष है। इससे पहले बुधवार (27 अगस्त 2025) को भी एक 9वी कक्षा की 17 वर्षीय छात्रा ने शौचालय में एक बच्चे को जन्म दिया था। इस घटना ने राज्य में लगातार बढ़ रही नाबालिग गर्भावस्था की समस्या को फिर उजागर कर दिया है।
आँकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में 80,000 से अधिक किशोरियाँ गर्भवती हुई हैं। बावजूद इसके कॉन्ग्रेस सरकार के पास केवल बहाने हैं, न कोई ठोस कार्रवाई, न कोई असरदार नीति। वहीं, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी हेब्बालकर ने बेतुका बयान देते हुए कहा कि इसका कारण ‘सोशल मीडिया’ और ‘लव अफेयर्स’ है।
बेलगावी में पंचायत अध्यक्ष की करतूत
बेलगावी जिले में एक नाबालिग लड़की की डिलीवरी के बाद जो सच्चाई सामने आई, वह किसी को भी चौंका सकती है। जिस लड़की को अस्पताल में भर्ती किया गया, उसकी उम्र महज 15 साल थी। वह पिछले साल ग्राम पंचायत अध्यक्ष से शादी कर चुकी थी। यह बाल विवाह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा किया गया जघन्य अपराध है।
जब मामला सामने आया, तब जिला बाल संरक्षण इकाई ने शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने पॉक्सो एक्ट, बाल विवाह निषेध कानून और भारतीय न्याय संहिता के तहत मामला दर्ज किया। यह घटना कोई पहली नहीं है। यह इस हफ्ते की दूसरी घटना है। इससे साफ है कि बाल विवाह और नाबालिग लड़कियों का शोषण अब आम होता जा रहा है और कॉन्ग्रेस सरकार इस पर लगाम लगाने में नाकाम साबित हो रही है।
सरकार के आँकड़े खुद बना रहे चार्जशीट
कर्नाटक सरकार के अपने आँकड़े ही सरकार के खिलाफ चार्जशीट की तरह हैं। पिछले तीन वर्षों में राज्य में 80,813 किशोर गर्भावस्था के मामले सामने आए हैं। इनमें से 3,459 लड़कियाँ 14 से 17 साल की उम्र की थीं। अकेले बेंगलुरु शहरी जिले में 8,891 मामले दर्ज हुए। इसके बाद विजयपुरा जिले में 7,143 मामले आए।
सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि किशोर गर्भावस्था के मामलों में 54% की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इसके बावजूद सरकार की ओर से कोई ठोस नीति, कड़ी कार्रवाई या जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया नजर नहीं आती।
मंत्री का गैरज़िम्मेदाराना बयान– जमीनी सच्चाई से मुँह मोड़ती सरकार
राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी हेब्बालकर ने इस संकट की वजह ‘सोशल मीडिया’ और ‘लव अफेयर्स’ को बताया। उन्होंने इसे ‘डरावनी और खतरनाक स्थिति’ कहा, लेकिन इसके समाधान के नाम पर कोई गंभीर पहल नहीं की।
जब एक मंत्री खुद यह स्वीकार करती हैं कि लड़कियाँ सोशल मीडिया और रिश्तों के जाल में फँस रही हैं, तो सवाल उठता है कि फिर सरकार क्या कर रही है? सोशल मीडिया पर निगरानी कहाँ है? स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान कहाँ चल रहे हैं? ऐसे बयानों से साफ है कि कॉन्ग्रेस सरकार केवल जिम्मेदारी टालने में लगी है। असली अपराधियों के खिलाफ सख्ती करने के बजाय, सरकार समस्या को ही सामान्य बताने में जुटी है।
‘अक्का फोर्स’– प्रचार ज्यादा, असर कम
सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए एक नई योजना ‘अक्का फोर्स’ की घोषणा की। इसके तहत महिला पुलिस अधिकारी और एनसीसी कैडेट कॉलेजों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी रखेंगे। यह योजना 15 अगस्त 2025 से शुरू हो चुकी है।
लेकिन यह पहल केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित है। गाँवों में, जहाँ इंटरनेट और मोबाइल का दुरुपयोग सबसे ज्यादा हो रहा है, वहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। जिस बेलगावी जिले में पंचायत अध्यक्ष ने नाबालिग से शादी की, वहीं की लड़कियाँ सरकार की नजरों से कैसे बच रहीं हैं? इससे साफ है कि यह योजना केवल एक दिखावा है, जो जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं लाएगी।
ब्लैकमेलिंग, पोर्न और इंटरनेट का आतंक– जड़ में गहरी बीमारी
विशेषज्ञ बताते हैं कि अब नाबालिग लड़कियों को अश्लील फोटो भेजने को मजबूर किया जाता है। उन्हें ब्लैकमेल कर यौन शोषण किया जाता है। यह समस्या अब सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रही, गाँवों में भी इंटरनेट का गलत इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है।
पिछले दो दशकों में अश्लीलता का स्तर बहुत बढ़ गया है। पहले जहाँ टीवी और सिनेमा को दोष दिया जाता था। वहीं, अब सोशल मीडिया, रील्स और ऑनलाइन पोर्न ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। बच्चियाँ कम उम्र में ही यौन संबंधों की ओर आकर्षित की जा रही हैं। सरकार ने इस दिशा में न तो कोई शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया, न कोई साइबर निगरानी तंत्र मजबूत किया। ये लापरवाही कई मासूम जिंदगियों को तबाह कर रही है।
बिल तो आया, लेकिन कानून से ज्यादा जरूरत है नीयत की
कॉन्ग्रेस सरकार ने हाल ही में बाल विवाह निषेध (कर्नाटक संशोधन) विधेयक 2025 विधानसभा में पेश किया है। इस बिल के तहत बाल विवाह की योजना या तैयारी को भी अपराध माना जाएगा। दोषियों को दो साल की सजा या ₹1 लाख जुर्माना हो सकता है।
यह कानून दिखने में सख्त जरूर है, लेकिन इसके असर तब तक नहीं होंगे जब तक जमीनी अमल सख्त न हो। आज भी बाल विवाह अक्सर त्योहारों या सामूहिक विवाह आयोजनों में हो जाते हैं। इनमें से कई घटनाएँ कभी सामने ही नहीं आतीं।
अगर पंचायत अध्यक्ष जैसे लोग खुलेआम बाल विवाह कर सकते हैं, तो कानून केवल किताबों में रह जाएगा। जरूरत है कि गाँव से लेकर शहर तक निगरानी तंत्र मजबूत हो और अपराधियों को सार्वजनिक रूप से सजा दी जाए।
कॉन्ग्रेस सरकार की ढुलमुल नीति से बिगड़ रहे हालात
कर्नाटक में नाबालिग गर्भावस्था और बाल विवाह की घटनाएँ अब अपवाद नहीं, बल्कि एक भयावह नियमितता बन चुकी हैं। कॉन्ग्रेस सरकार के बयान, योजनाएँ और आँकड़े एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। जहाँ एक ओर मंत्री सोशल मीडिया को दोष देती हैं, वहीं सरकार इंटरनेट के दुरुपयोग पर कोई ठोस कदम नहीं उठाती। जहाँ एक तरफ कानून लाया जा रहा है, वहीं पंचायत अध्यक्ष जैसे जनप्रतिनिधि खुद कानून तोड़ते हैं।
यह सब दिखाता है कि कॉन्ग्रेस सरकार इस समस्या को लेकर न तो ईमानदार है, न गंभीर। जब तक सरकार सख्ती से कार्रवाई नहीं करती और जमीनी स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक मासूम बेटियाँ इसी तरह शिकार बनती रहेंगी। यह सिर्फ सामाजिक नहीं, राजनीतिक अपराध है और इसका जिम्मेदार सत्ता में बैठा हर व्यक्ति है।
बरेली में हिन्दू युवकों को हनी ट्रैप में फँसाकर इस्लाम कबूल करवाने वाले बड़े गिरोह का पर्दाफाश होने के बाद हर दिन नए-नए खुलासे हो रहे हैं। युवकों को 4 बार निकाह करने और ऐशो आराम की जिंदगी जीने का सपना दिखाया जाता था। युवकों का ब्रेशवॉश कर इस्लाम कबूल करवाया जाता था। यहाँ तक कि दिव्यांग लोगों को भी फँसा कर उनका धर्मपरिवर्तन कराया जाता था और निकाह कराए जाते थे।
पुलिस ने कुछ दिन पहले नेत्रहीन प्रोफेसर प्रभात उपाध्याय को मदरसे से बरामद किया था। उन्हें बंधक बनाकर धर्मपरिवर्तन कराया जा रहा था। मदरसे में खतने की प्रक्रिया चल रही थी, उसी दौरान पुलिस ने दबिश देकर उन्हें मुक्त कराया। गिरोह ने उनका नाम ‘हामिद’ रखा था। इस मामले में मदरसे का मौलवी अब्दुल मजीद, सलमान, मोहम्मद आरिफ समेत 4 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था। आरोपितों के पास से ज़ाकिर नाइक की सीडी, धर्मांतरण प्रमाणपत्र, 22 बैंक खातों में संदिग्ध ट्रांजैक्शन और विदेशी फंडिंग से जुड़े सुराग मिले थे।
दैनिक भास्कर के रिपोर्ट के मुताबिक, रविवार (31अगस्त 2025) को जब उनकी टीम सुभाषनगर के करेली गाँव और फैजनगर पहुँची। आरोपित सलमान और मोहम्मद आरिफ इस गाँव के रहने वाले हैं। इनलोगों ने गाँव के बृजपाल, उसकी माँ और बहन को इस्लाम कबूल करवाया था। इनलोगों ने ही फैजनगर के पीयूष और एक नाबालिग का धर्मांतरण करवाया था। गाँव के लोगों में इस गैंग को लेकर दहशत है। इन्हें डर है कि कहीं उनके बच्चों को ये शिकार न बना लें।
व्हाट्सएप ग्रुप बना ‘हनी ट्रैप’ किया जाता था
गिरोह के 20 से अधिक व्हाट्सएप ग्रुप थे। इसमें हर दिन फोटो और वीडियोज डाले जाते थे। धीरे-धीरे अश्लील फोटो और वीडियोज डालकर हिन्दू युवकों को फँसाया जाता था। अगर युवक दिलचस्पी दिखाए, तो उसे मदरसे में बुलाया जाता था।वहाँ लड़कियाँ होती थी, जो उसका ब्रेनवॉश करती थी। मौलाना उसे समझाता था कि अगर चार लड़कियाँ चाहिए, जन्नत चाहिए और ऐशो-आराम से रहना है, तो मुस्लिम बन जाओ।
हिन्दू देवी-देवताओं को लेकर अपशब्द बोले जाते थे। गिरोह के सदस्य इस्लाम की अच्छाई बताते हुए ये जानकारी भी देते थे कि कैसे आसानी से इस्लाम कबूल किया जा सकता है। इसके फायदे क्या हैं। चार बीवियाँ, घर, नौकर, पैसे और दूसरी चीजें आसानी से मिल सकती हैं। युवकों को उर्दू सिखाया जाता, कुरान-हदीस पढ़ाया जाता। अगर युवक सीख जाता, तो उसे मौलाना और मौलवी बनने का मौका मिलने की बात भी कही जाती।
फैजपुर के पीयूष को बनाया मोहम्मद अली
प्रभात मामले में गिरफ्तार अब्दुल माजिद ने अपनी बहन आयशा की फोटो और वीडियो भेज कर पीयूष को चंगुल में फँसाया था। उसे पहले मदरसा बुलाया गया और आयशा से निकाह करने मौका मिलने की बात कही गई। लेकिन पहले इस्लाम कबूल करने को कहा गया। पीयूष के ब्रेनवॉश के बाद उसका खतना किया गया। नया नाम दिया गया- मोहम्मद अली। धीरे-धीरे पीयूष खुद ही गिरोह का हिस्सा बन गया और 5 वक्त नमाज अदा करने लगा।
बरेली का ये मदरसा 2014 में अस्तित्व में आया है। पुलिस की जाँच में बरेली में 6 लोगों के धर्मांतरण की बात अब तक सामने आई है। लेकिन ये आँकड़ा और भी बढ़ सकता है।
गिरोह के सदस्यों को अलग-अलग काम दिए गए
गिरोह का मास्टमाइंड अब्दुल माजिद था। उसने गिरोह के सदस्यों को काम बाँट दिया था। सलमान दर्जी का काम करता था। लेकिन उसका असली काम इस्लाम से जुड़े किताब, सीडी और दूसरी सामग्री उपलब्ध करना था। आरिफ उसकी मदद करता था। जबकि फहीम नाई की दुकान चलाता था। उसे आने-जाने वालों की सारी जानकारी होती थी। वह इसे माजिद से शेयर करता था।
मदरसा संचालक अब्दुल माजिद के 27 जिलों से जुड़े तार
पुलिस का मानना है कि ये लोग अलग-अलग राज्यों से चंदा इकट्ठा करते थे और इसी पैसे से धर्मांतरण का धंधा चलाते थे। इस बड़े लेन-देन को देखते हुए एजेंसियाँ पाकिस्तान समेत अन्य देशों से फंडिंग की संभावना की जाँच कर रही हैं।
एसपी साउथ अंशिका वर्मा ने बताया कि इस गिरोह का नेटवर्क सिर्फ बरेली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई राज्यों में फैला हुआ है। अब्दुल माजिद के ट्रेवल की हिस्ट्री 27 से अधिक जिलों से जुड़ी हुई है। उसके अकाउंट से 13 लाख रुपए बरामद हुए हैं। साथ ही कई बैंकों के चेकबुक और 21 बैकखाते मिले हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस इस मामले में और भी लोगों को गिरफ्तार करेगी। इस घटना ने एक बार फिर से धर्मांतरण गिरोहों की गंभीरता को उजागर कर दिया है, जो हमारे समाज के लिए एक बड़ा खतरा हैं।