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‘तेल खरीदकर यूक्रेन के खिलाफ युद्ध भड़का रहा दिल्ली’: रूस-भारत के रिश्तों पर ट्रंप के सलाहकार ने उगला जहर, पीटर नवारो ने फाइनेंशियल टाइम्स में लेख लिखकर दी हिदायतें

भारत के रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यावसायिक सलाहकार पीटर नागौर ने सख्त आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि इससे रूस को यूक्रेन के साथ युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक मदद मिल रही है।

अमेरिका हमेशा से ही भारत और रूस के रिश्तों के खिलाफ रहा है। इसी को लेकर भारतीय सामानों पर ट्रंप ने हाल ही में भारत पर 50% टैरिफ भी लगाया है। अब सोमवार (18 अगस्त 2025) को पीटर नवारो ने सोमवार को फाइनेंशियल टाइम्स में एक लेख लिखा।

नवारो के लेख का शीर्षक था- “India’s oil lobby is funding Putin’s war machine – that has to stop” इसमें उन्होंने भारत पर सीधा निशाना साधा है। पीटर ने इसमें लिखा है कि भारत के रूस से तेल खरीदने के कारण ही यूक्रेन युद्ध के लिए रूस को फंडिंग मिल रही है।

नवारो ने लिखा, “भारत के आर्थिक समर्थन को कारण ही रूस लगातार यूक्रेन पर हमला कर रहा है। इसीलिए अमेरिका और यूरोपियन टैक्सपेयर्स को यूक्रेन की रक्षा करने के लिए कई अरब डॉलर्स खर्च करने पड़ रहे हैं। असल में भारत रूस से तेल लेकर वैश्विक स्तर पर ‘क्लियरिंग हाउस’ की तरह काम कर रहा है।”

नवारो ने आगे लिखा, “क्रूड ऑयल को अधिक टैरिफ वाले निर्यात में बदलकर भारत रूस को उसकी आवश्यकतानुसार वित्त देता है। इन कारणों के चलते ही भारत पर अधिक टैरिफ लग रहे हैं और ट्रेड बैरियर से भारत खुद अमेरिकी निर्यात के दरवाजे बंद करता जा रहा है।”

भारत के खिलाफ अमेरिका ने पहली बार जहर नहीं उगला है बल्कि भारतीय सामानों पर टैरिफ लगाकर ट्रंप ने इसे जाहिर भी किया है। साथ ही रूस के साथ रिश्तों को लेकर अमेरिका भारत को जब तब धमकी देता रहता है।

अपने लेख में नवारो भारत को धमकी देने से भी नहीं चूके। उन्होंने लिखा कि अमेरिका के रणनीतिक साझेदार बनने के लिए भारत को रूस और चीन से नजदीकी खत्म करनी होगी। पूरे लेख में नवारो ने भारत के लिए तमाम हिदायतें लिख डालीं लेकिन ये लिखना भूल गए कि अमेरिका को साझेदारी में समानता लाने के लिहाज से किन बातों का ध्यान रखने की जरूरत है।

भारत को ‘विलेन’ बनाने के चक्कर में अमेरिका को अपने व्यापार भी याद नहीं रहे। रूसी तेल का व्यापार भले ही अमेरिका ने कम कर दिया हो लेकिन ऊर्जा समेत कई अन्य सेक्टरों में अमेरिका अब भी रूस के साथ व्यापार कर रहा है।

इसे लेकर भारत के विदेश मंत्रालय ने भी अपने रुख अगस्त की शुरुआथ में स्पष्ट कर दिया था। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत का यूरोपीय संघ को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात 15 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। विदेश मंत्रालय ने साफ लिखा कि भारत संकट से लाभ नहीं उठा रहा, बल्कि यह सुनिश्चित कर रहा है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो और देश की घरेलू जरूरतें भी पूरी हों।

विदेश मंत्रालय ने 4 अगस्त 2025 को साझा की अपनी जानकारी में अमेरिका की पोल भी खोल कर सबके सामने रख दी थी। जानकारी में मंत्रालय ने लिखा था कि नवरी 2022 से अमेरिका ने रूस से 24.5 अरब डॉलर से अधिक के सामान आयात किए हैं।

इस वर्ष अकेले, अमेरिका ने 1.27 अरब डॉलर के उर्वरक, 624 मिलियन डॉलर के यूरेनियम और प्लूटोनियम, और लगभग 878 मिलियन डॉलर के पैलेडियम खरीदे हैं। अकार्बनिक रसायनों का आयात 683 मिलियन डॉलर, बिजली उत्पादन मशीनरी 79 मिलियन डॉलर और कॉर्क व लकड़ी के उत्पाद लगभग 64 मिलियन डॉलर रहे। इस लिहाज से अमेरिका रूस के साथ लगभग 20 प्रतिशत व्यापार बढ़ाता है।

असल में अमेरिका की ये पूरी भड़ास इस लिहाज से भी देखी जा सकती है कि ट्रंप के भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध शांत करवाने की बात को भारत ने सिरे से खारिज कर दिया। इसी के साथ रूस से भी व्यापार करने की बात को नकार दिया।

अलग-अलग देशों के साथ अपने रिश्तों को लेकर भारत हमेशा से ही मुखर और स्पष्ट रहा। इसके अलावा ट्रेड डील में भी अमेरिका के डेयरी और कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार से बाहर रहने का रास्ता दिखा दिया। ये सभी बिंदु अमेरिकी राष्ट्रपति को नागवार गुजरने में अपनी भूमिका काफी अच्छे से निभा सकते हैं।

40-50 अंतरिक्षयात्रियों की टीम तैयार रहनी चाहिए: शुभांशु शुक्ला से बोले PM मोदी, ‘होमवर्क’ का भी लिया जायजा

अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के लिए एक्सिओम-4 अंतरिक्ष मिशन के पायलट ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने सोमवार (18 अगस्त 2025) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस दौरान पीएम मोदी और उनके बीच कई विषयों पर विस्तृत बातचीत हुई। इस मुलाकात के अगले दिन यानी मंगलवार (19 अगस्त 2025) को पूरी मुलाकात और बातचीत की एक वीडियो पीएम ने अपने एक्स हैंडल से साझा किया।

मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री ने अंतरिक्ष यात्री शुक्ला से कहा, “स्पेश स्टेशन और गगनयान हमारे दो मिशन हैं, इसमें आपका अनुभव हमारे बहुत काम आएगा।” इस पर शुभांशु ने कहा, “यह हमारे लिए बहुत बड़ा मौका है। आपकी सरकार जिस तरह से तमाम असफलताओं के बाद भी लगातार बजट दे रही है यह पूरी दुनिया देख रही है। हम इस क्षेत्र में नेतृत्व कर सकते हैं।”

बातचीत में पीएम मोदी ने कहा कि हमारे पास 40-50 एस्ट्रोनॉट की एक टीम होनी चाहिए जो हमेशा तैयार हो। इसे लेकर शुभांशु ने प्रधानमंत्री से कहा कि भारत के गगनयान मिशन में दुनिया भर में काफी रुचि है। बातचीत के दौरान पीएम मोदी ने शुभांशु से उस होमवर्क के बारे में भी पूछा, जो उन्होंने पिछली बातचीत के दौरान ग्रुप कैप्टन को सौंपा था।

पीएम ने कहा, मैंने आपको कुछ होमवर्क दिया था उसका क्या प्रोग्रेस हुआ है? जवाब में शुभांशु शुक्ला ने कहा कि होमवर्क पर काफी अच्छा काम हुआ है। शुभांशु शुक्ला ने कहा, “लोग मुझे चिढ़ा भी रहे थे कि आपके प्रधानमंत्री ने आपको होमवर्क दिया है।”

इसके अलावा शुभांशु ने बताया, “अंतरिक्ष स्टेशन पर खाना एक बड़ी चुनौती है, जगह कम होती है और सामान महँगा होता है। आप हमेशा कम से कम जगह में ज्यादा से ज्यादा कैलोरी और पोषक तत्व पैक करने की कोशिश करते हैं। हर तरह से प्रयोग चल रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “मैं जहाँ भी गया, जिससे भी मिला, सभी मुझसे मिलकर बहुत खुश हुए, बहुत उत्साहित हुए। सबसे बड़ी बात यह थी कि सभी को पता था कि भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में क्या कर रहा है। सभी को इस बारे में पता था और कई लोग ऐसे भी थे जो मुझसे भी ज्यादा गगनयान को लेकर उत्साहित थे, जो आकर मुझसे पूछ रहे थे कि आपका मिशन कब शुरू हो रहा है।”

इसके अलावा जब पीएम मोदी ने शुभांशु शुक्ला से पूछा कि भारतीयों को लेकर दुनिया के अन्य देशों के लोगों के मन मे क्या चलता है। इसका जवाब देते हुए शुभांशु शुक्ला ने कहा, “मेरा निजी अनुभव जो है पिछले एक साल में मैं जहाँ भी गया, जिससे भी मिला सभी लोग बहुत खुश हुए, मुझसे मिलकर, काफी एक्साइटेड थे, बात करने में आ-आकर मुझसे पूछने में कि आपलोग क्या कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं और सबसे बड़ी बात ये थी कि सबको इसके बारे में मालूम था कि भारत स्पेस के क्षेत्र में क्या कर रहा है, सबको इस बारे में जानकारी थी।”

इससे पहले पीएम मोदी ने शुभांशु के साथ की तस्वीरे एक्स पर साझा करते हुए लिखा था, “शुभांशु शुक्ला के साथ बहुत अच्छी बातचीत हुई।”

पीएम ने आगे लिखा, “हमने अंतरिक्ष में उनके अनुभवों, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में प्रगति और भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान मिशन सहित कई विषयों पर चर्चा की। भारत को उनकी इस उपलब्धि पर गर्व है।”

यूक्रेन को सुरक्षा का अमेरिका ने दिलाया भरोसा, अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ जेलेंस्की की हुई बात: रूस के साथ युद्ध खत्म होने की ट्रंप ने जताई उम्मीद

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से कहा कि अमेरिका यूक्रेन में रूस के साथ चल रहे युद्ध को खत्म कराने के साथ-साथ यूक्रेन की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करेगा। हालाँकि यह सहायता किस तरह की होगी और कितनी होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

ट्रंप ने व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति जेलेंस्की और यूरोपीय नेताओं के एक ग्रुप के साथ वार्ता की। बैठक के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि वह रूस और यूक्रेन के बीच शांति की संभावना से बहुत खुश हैं। उन्हें इस बात की भी खुशी है कि जल्द ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन और जेलेंस्की की मुलाकात होगी। उन्होंने कहा कि ये त्रिपक्षीय वार्ता होगी।


(साभार- ट्रूथ)

वहीं जेलेंस्की ने प्रस्तावित वार्ता को लेकर कहा है कि रूस और यूक्रेन को बिना शर्त बातचीत करनी चाहिए और युद्ध को खत्म करने के बारे में सोचना चाहिए।

इससे पहले शुक्रवार (15 अगस्त 2025) को राष्ट्रपति ट्रंप ने अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी। जेलेंस्की के साथ बैठक के बाद ट्रंप ने रूस के राष्ट्रपति से फोन पर बात की। उन्होंने कहा, ” मैनें उच्च स्तरीय बैठक खत्म होने के बाद पुतिन को फोन किया। राष्ट्रपति पुतिन और राष्ट्रपति जेलेंस्की के बीच बैठक को लेकर व्यवस्थाएँ की जा रही हैं। इस बैठक में मैं भी रहूँगा।”

यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल के एक सूत्र के अनुसार, ट्रंप ने यूरोपीय नेताओं को बताया कि पुतिन ने ही ये सुझाव दिया था। हालाँकि मॉस्को ने सार्वजनिक रूप से अपनी सहमति अभी तक नहीं दी है। लेकिन अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि पुतिन-ज़ेलेंस्की की बैठक हंगरी में हो सकती है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ के अनुसार, दोनों अगले दो हफ़्तों के भीतर मिलेंगे।

हालाँकि ट्रंप- जेलेंस्की वार्ता शुरू होने से ठीक पहले, रूस के विदेश मंत्रालय ने शांति समझौते को सुनिश्चित करने में मदद के लिए नाटो देशों के सैनिकों की उपस्थिति को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। इससे ट्रंप की मुश्किलें थोड़ी बढ़ गई थी।

रूस और यूक्रेन के बीच आखिरी सीधी वार्ता जून में तुर्किए में हुई थी। पुतिन ने जेलेंस्की के वहाँ आमने-सामने बैठकर बातचीत करने के सार्वजनिक निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया था। रूस ने अपना एक प्रतिनिधिमंडल वार्ता के लिए भेजा था।

इसको लेकर भी ट्रंप और पुतिन के बीच बात हुई थी। जानकारी के मुताबिक, ट्रंप-पुतिन सीधी वार्ता में भाग लेने वाले यूक्रेनी और रूसी पक्षों के प्रतिनिधियों के स्तर को बढ़ाने की संभावना पर चर्चा की गई।

इस बीच, जेलेंस्की का समर्थन करने अमेरिका गए यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप से आग्रह किया कि वे पुतिन पर साढ़े तीन साल पुराने युद्ध में युद्धविराम के लिए सहमत होने का दबाव डालें, उसके बाद ही कोई भी बातचीत आगे बढ़े। ट्रंप ने पहले इस प्रस्ताव का समर्थन किया था, लेकिन रूस के राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा है कि कोई भी शांति समझौता व्यापक होना चाहिए।

अमेरिकी टैरिफ से भारत पर पड़ने वाले असर को लेकर PM मोदी ने अर्थशास्त्रियों के साथ की अहम बैठक, 7 कैबिनेट मंत्री भी हुए शामिल: US को जवाब देने पर भी हुई चर्चा

अमेरिका के भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के बाद अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 अगस्त 2025 को अर्थशास्त्रियों के साथ बैठक की। बैठक में अमेरिका की टैरिफ, GST सुधारों और निर्यात के लिए वैकल्पिक बाजारों पर चर्चा की गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बैठक सोमवार (18 अगस्त 2025) शाम 6.30 बजे आयोजित की गई। बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, वित्त मंत्री नर्मला सीतारमण के साथ अन्य कैबिनेट मंत्री शामिल हुए। इसके साथ आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और नीति आयोग के अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया।

बैठक अमेरिका द्वारा भारत के निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ पर केंद्रित रही। टैरिफ से भारत की अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर चर्चा की गई। पीएम मोदी ने अर्थशास्त्रियों से अमेरिका की टैरिफ पर कार्रवाई करने को लेकर सलाह ली।

साथ ही इस पहलू पर भी चर्चा की गई कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर टैरिफ का क्या असर पड़ेगा। बता दें कि यह टैरिफ 27 अगस्त 2025 से लागू हो जाएगा।

गौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 1 अगस्त 2025 को 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया। इसके बाद 06 अगस्त 2025 को भारत पर फिर से 25 टैरिफ लगाया। इससे भारत को अब अमेरिका से व्यापार करने के लिए 50 प्रतिशत टैरिफ देना होगा।

अमेरिका की टैरिफ पर अब तक भारत ने कोई भी जवाबी कार्रवाई नहीं की है। इसी संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्थशास्त्रियों के साथ बैठक की, जिसमें टैरिफ को लेकर प्रतिक्रिया पर चर्चा की गई।

असम सरकार ने निजी सीमेंट कंपनी को दी थी 3000 बीघा बंजर जमीन, ग्रामीणों की याचिका पर HC ने जताई हैरानी- जाँच के दिए आदेश: जज की टिप्पणी की आड़ में कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम करने लगा अडानी ग्रुप को टारगेट

असम के दीमा हसाओ क्षेत्र की जिस 3000 बीघा जमीन को एक निजी कंपनी को खनन के लिए सौंपने पर गुवाहाटी हाई कोर्ट ने आपत्ति जताई है। उस हाई कोर्ट के फैसले पर विपक्ष और कुछ मीडिया संस्थानों ने अडानी समूह के खिलाफ प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया है। मामले में जिस कंपनी को जमीन बेची गई है, उसे अडानी समूह से जोड़कर पेश किया गया।

दरअसल, असम के दीमा हसाओ इलाके की 3000 बीघा जमीन को कंपनी को आवंटित किए जाने पर कोर्ट ने तीखा स्वर अपनाया था। कोर्ट ने कंपनी को फटकारते हुए कहा कि पूरा जिला एक कंपनी को सौंप दिया, यह कोई मजाक नहीं है। जस्टिस की इस टिप्पणी का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

इस वायरल वीडियो पर कॉन्ग्रेस ने अडानी समूह के खिलाफ प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया है। कॉन्ग्रेस ने अपने अधिकारिक एक्स अकाउंट पर वीडियो को शेयकर कर अडानी समूह और असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार को घेरना शुरू कर दिया। हमेशा की तरह अडानी समूह के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा गया।

कॉन्ग्रेस ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा, “BJP सरकार की हरकतें घोर क्रोनी कैपिटलिज्म की गवाही देती हैं, क्योंकि वे बेशर्मी से देश के संसाधनों को मोदी के मित्र अडानी को सौंप रहे हैं, जबकि गरीबों को संघर्ष करने के लिए छोड़ दिया गया है। यह जनता के लिए शासन नहीं है; यह मित्र अडानी के लिए शासन है।”

इसी के साथ कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता आलोक शर्मा ने जमीन खरीदने वाली कंपनी को अडानी का बताकर सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा चलाया। आलोक शर्मा ने एक्स पर इस वायरल वीडियो को पोस्ट कर अडानी समूह को सीधे टारगेट किया।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता ने वीडियो को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अडानी समूह से जोड़ा। इस वीडियो के कैप्शन में लिखा गया, “हाई कोर्ट के जज भी अडानी को दी जा रही जमीन की बात सुनकर खुद शॉक्ड हो गए।”

कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनाते ने भी गुवाहाटी हाई कोर्ट के इस वीडियो को अपने एक्स अकाउंट पर शेयर कर अडानी समूह पर निशाना साधा है। इसके अलावा कुछ मीडिया संस्थानों ने भी जस्टिस के बयान को अडानी से जोड़कर धड़ल्ले से खबरें चलाईं।

इन खबरों में भी जमीन खरीदने वाली कंपनी को अडानी की बताई गई है।

वीडियो की हकीकत जाने बिना विपक्ष और मीडिया ने सोशल मीडिया पर इसे शेयर किया और सरकार-अडानी समूह को घेरने का मौका नहीं छोड़ा। जबकि हकीकत यह है कि गुवाहाटी हाई कोर्ट ने जिस कंपनी को जमीन बेचे जाने की बात पर तीखे स्वर अपनाए हैं। वह असल में कोलकाता की ‘महाबल सीमेंट्स कंपनी’ है, जिसका अडानी समूह से कोई लेना-देना नहीं है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, जिन ग्रामीणों की याचिका पर गुवाहाटी हाई कोर्ट ने सुनवाई की है। उस याचिका में भी साफ है कि असम के दीमा हसाओ क्षेत्र की जमीन को खरीदने वाली कंपनी का नाम ‘महाबल सीमेंट्स’ है, जो कि कोलकाता की कंपनी है।

क्या है पूरा मामला ?

मामला असम के दीमा हसाओ क्षेत्र की 3000 बीघा जमीन को महाबल सीमेंट कंपनी को खनन के लिए आवंटन करने से संबंधित है। इस क्षेत्र में जनजातीय समाज के लोग रहते हैं। क्षेत्र की जमीन बंजर हालत में हैं, जिसके चलते जमीन को खनन के लिए आवंटित किया गया है।

ग्रामीणों ने इसके खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की, जिसकी सुनवाई 12 अगस्त 2025 को की गई। इस दौरान जस्टिस संजय कुमार मेधी ने कंपनी को जमीन सौंपने पर आपत्ति जताई थी। जस्टिस मेधा ने कहा कि दीमा हसाओ संविधान की छठी अनुसूची के तहत आता है, जहाँ जनजातीय अधिकारों को पहले रखा जाना चाहिए।

रिपोर्ट्स के अनुसार, सीमेंट कंपनी के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि जमीन बंजर है और कंपनी को चलाने के लिए इसकी जरूरत थी। इस पर जस्टिस मेधा ने कहा, “यह आपकी जरूरत मुद्दा नहीं, जनहित मुद्दा है।”

जस्टिस मेधा ने आगे कहा, “3000 बीघा! यानी पूरा जिला? क्या हो रहा है? 3000 बीघा एक निजी कंपनी को आवंटित कर दिया गया? हम जानते हैं कि जमीन कितनी बंजर है…3000 बीघा? यह कैसा फैसला है? क्या यह कोई मजाक है या कुछ और?”

जस्टिस मेधा की इस टिप्पणी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

भारत पर टैरिफ को लेकर अजीब बहानेबाजी कर रहा अमेरिका, लगा रहा पुतिन की ‘युद्ध मशीनरी को ईंधन देने’ का आरोप- खुद उसका राष्ट्रपति कर रहा मुलाकात: हम करें तो पाप, वो करे तो व्यापार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जुलाई 2025 से ही भारत पर दौहरे रवैये का हमला करना शुरू कर दिया था। उन्होंने भारत पर 50% का टैरिफ लगाया, जिसका कारण रूस के साथ भारत का तेल और रक्षा व्यापार बताया। अब, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस बात को स्वीकार कर माना कि अमेरिका भारत और चीन के लिए अलग-अलग नियम अपनाता है। उन्होंने वाशिंगटन के इस दोहरे रवैये को सही भी ठहराया है।

ट्रंप ने कहा था कि भारत, रूस से तेल खरीदकर यूक्रेन के खिलाफ ‘रूसी युद्ध मशीन’ को बढ़ावा दे रहा है। लेकिन, चीन भी रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार है। चीन हर दिन लगभग 20 लाख बैरल तेल खरीदता है। फिर भी, अमेरिका ने चीन पर कोई शुल्क नहीं लगाया है। यह अमेरिका के पाखंड को साफ दर्शाता है।

डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को अपने टैरिफ से बाहर रखा हुआ है। इस फैसले पर मार्को रुबियो ने 17 अगस्त 2025 को फॉक्स बिजनेस को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि चीन और भारत दोनों अलग है। चीन रूस से जो तेल खरीदता है उसे रिफाइन करके दूसरे देशों को बेच देता है।

रुबियो ने यह भी बताया कि अगर चीन पर प्रतिबंध लगाया गया तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतें बहुत बढ़ जाएँगी। इसके अलावा मार्को रुबियो ने कहा कि चीन जो तेल खरीदकर रिफाइन कर रहा है, उसका बड़ा हिस्सा यूरोप में वापस बेचा जा रहा है। यूरोप अभी भी रूस से गैस खरीद रहा है।” उन्होंने कहा कि यूरोप रूस पर और ज्यादा प्रतिबंध लगा सकता है।

अमेरिका चीन पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाता?

चीन पर कोई सख्त कदम न उठाने के फैसले को रुबियो ने सही बताया। उन्होंने अमेरिका की चुप्पी का बचाव किया। रुबियो ने कहा, “अगर चीन पर प्रतिबंध लगाता हैं तो वह तेल को रिफाइन करके बेच देगा।” जो भी देश यह तेल खरीदेगा उसे ज़्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी। अगर तेल नहीं मिलेगा तो उन्हें कोई दूसरा विकल्प देखना होगा। रुबियो साफतौर पर कहना चाहती थी कि चीन पर रोक लगाने से पूरी दुनिया को नुकसान होगा, इसलिए अमेरिका कुछ नहीं कर रहा है।

मार्को रुबियो ने यह भी कहा कि यूरोपीय देश नहीं चाहते कि चीन पर प्रतिबंध लगाया जाए। क्योंकि वे चीन से रूसी तेल खरीदते हैं। रुबियो ने बताया, “जब हमने सीनेट में चीन और भारत पर 100% टैरिफ लगाने की बात की तो कई यूरोपीय देशों ने चिंता जताई।” उन्होंने कहा कि यह चिंता प्रेस में नहीं, बल्कि सीधे बातचीत में सामने आई।

चीन-यूरोप को छूट, भारत को सजा…यही है अमेरिका का दोहरा रवैया

अमेरिका चीन पर कोई प्रतिबंध इसलिए नहीं लगा रहा है क्योंकि यूरोपीय लोग इसके पक्ष में नहीं है। इसके अलावा अमेरिका यूरोपीय देशों को भी सजा नहीं दे रहा है, जो अभी भी रूस से तेल-गैस खरीदते है।

बात बिल्कुल साफ है कि अमेरिका चीन पर टैरिफ लगाकर यूरोप को गुस्सा नहीं दिलाना चाहता और यूरोप पर किसी प्रकार का प्रतीबंध लगाकर यूरोपीय संघ से झंगड़ा नहीं लेना चाहता।

इसलिए चीन-यूरोप आराम से रूसी तेल खरीद-बेच-इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन सिर्फ भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो रूसी तेल खरीदकर ‘रूसी युद्ध मशीन को मदद कर रहा है’ बाकी कोई नहीं।

पहले, डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकोनॉमी’ बताया। अब, वही लोग यह कह रहे हैं कि यह ‘डेड इकोनॉमी’ रूस जैसे देश को युद्ध लड़ने के लिए पैसा दे रही है।

ट्रंप और मार्को रुबियो के बाद, व्हाइट हाउस के बिजनेस एडवाइजर पीटर नवारो भी भारत पर आरोप लगा रहे हैं। उनका मानना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए सिर्फ भारत ज़िम्मेदार है। जबकि उन्होंने चीन-यूरोप और अमेरिका को इस आरोप से दूर रखा है।

पीटर नवारो ने फाइनेंशियल टाइम्स में एक लेख लिखा है। इस लेख में, उन्होंने भारत पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है। इस खरीददारी से मिलने वाले पैसों का उपयोग रूस यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में कर रहा है। नवारो का मानना है कि भारत को तुरंत यह तेल खरीदना बंद कर देना चाहिए।

बिजनेस एडवाइजर पीटर नवारो ने यह भी कहा है कि अगर भारत चाहता है कि अमेरिका उसे अपना खास दोस्त माने तो उसे रूस-चीन के साथ अपने संबंध कम करने होंगे।

पीटर नवारो ने भारत को यह सिखाने की कोशिश की है कि उसे अमेरिका का अच्छा साथी कैसे बनना चाहिए। लेकिन उन्होंने अमेरिका को यह नहीं बताया कि उसे भारत के साथ बराबर का व्यवहार करने के लिए क्या करना चाहिए।

सबसे पहले, अमेरिका को पाकिस्तान से दूरी बनानी चाहिए। पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देता है। अमेरिका को ऐसे देश के साथ दोस्ती करना बंद कर देना चाहिए।

फाइनेंशियल टाइम्स में एक लेख छपा था। इस लेख की एक हेडलाइन थी, “भारत रूस के तेल के लिए एक वैश्विक क्लियरिंग हाउस के रूप में काम करता है।” इसका मतलब है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है, जिस पर पाबंदी लगी हुई है। फिर भारत उस तेल को रिफाइन करके महँगे उत्पादों में बदल देता है और दूसरे देशों को बेचता है। इस तरह, रूस को जरूरी डॉलर मिलते हैं।

लेख की दूसरी हेडलाइन थी, “भारत की तेल लॉबी पुतिन की युद्ध मशीन को पैसा दे रही है-इसे रोकना होगा।” इसका मतलब है कि भारत में जो तेल कंपनियाँ हैं, वे रूस से तेल खरीदकर पुतिन को युद्ध के लिए पैसे दे रही हैं। लेख में यह कहा गया है कि यह तुरंत बंद होना चाहिए।

व्हाइट हाउस के बिजनेस एडवाइजर ने भारत पर एक और आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भारत की वजह से रूस को ताकत मिल रही है और रूस लगातार यूक्रेन पर हमला कर रहा है, जिसकी कीमत अमेरिका और यूरोप चुका रहे हैं और उन्हें यूक्रेन की मदद के लिए अरबों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। यह पैसा आम लोगों के टैक्स से जा रहा है।

पीटर नवारो ने यह भी लिखा कि अब तक 3 लाख से ज़्यादा सैनिक और आम लोग मारे जा चुके हैं। नाटो का ईस्टर्न पार्ट (पूर्वी हिस्सा) अब ज्यादा खतरे में है और पश्चिमी देश भारत द्वारा रिफाइन किए गए रूसी तेल का खर्च उठा रहे हैं। इस तरह उन्होंने फिर से भारत को ही दोषी बताया और बाकी देशों की भूमिका पर कुछ नहीं कहा।

भारत केवल अपनी जरूरतों को पूरा कर रहा

ऐसा लगता है कि वाशिंगटन में समझ की कमी है, जो बातें साफ हैं उन्हें भी अनदेखा किया जा रहा है। चीन की तरह भारत भी रूस से कच्चा तेल खरीदता है। फिर उसे रिफाइन करके पेट्रोलियम उत्पाद बनाता है और यूरोप को बेचता है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने यूरोप को 15 अरब अमेरिकी डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद बेचे हैं।

भारत को इस संकट से कोई फायदा नहीं हो रहा है। भारत बस यह सुनिश्चित कर रहा है कि इस संकट के बावजूद भी दुनिया में ऊर्जा की कमी न हो। साथ ही वह अपने देश की जरूरतों को भी पूरा कर रहा है।

अगर यूरोप और अमेरिका सच में चाहते हैं कि रूस हार मान ले तो उन्हें खुद सबसे पहले रूसी तेल खरीदना बंद कर देना चाहिए। लेकिन वे ऐसा नहीं करते। वे सीधे रास्ते से नहीं, बल्कि घुमा-फिराकर अब भी रूसी तेल और गैस खरीदते हैं।

एक तरफ वे कहते हैं कि रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है, दूसरी तरफ वे उसी से कारोबार भी जारी रखते हैं। अमेरिका ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं। इनकी वजह से उसने रूसी कच्चे तेल का आयात जरूर घटाया है। लेकिन रूस से व्यापार पूरी तरह बंद नहीं किया गया।

रूस ने 2022 में यूक्रेन पर हमला किया था और इस युद्ध को तीन साल हो चुके हैं। इसके बावजूद अमेरिका रूस से सामान खरीद रहा है। जनवरी 2022 से अब तक अमेरिका रूस से 24.5 अरब डॉलर से ज़्यादा का सामान मंगा चुका है।

सिर्फ इसी साल (2025 में) अमेरिका ने रूस से 1.27 अरब डॉलर का खाद खरीदा। 62.4 करोड़ डॉलर का यूरेनियम और प्लूटोनियम लिया और लगभग 87.8 करोड़ डॉलर का पैलेडियम भी खरीदा। यानी बातें कुछ और की जाती हैं, लेकिन असली काम कुछ और हो रहा है।

जनवरी से नवंबर 2024 के बीच, अमेरिका ने रूस से बहुत सी चीजें खरीदीं। इनमें पैलेडियम और एल्यूमीनियम जैसी धातुएँ भी थीं, जिनकी कीमत 876.5 मिलियन डॉलर थी। अकार्बनिक रसायनों का आयात 683 मिलियन डॉलर का था।

इसके अलावा, बिजली उत्पादन में काम आने वाली मशीनें भी खरीदी गईं। इनका मूल्य 79 मिलियन डॉलर था। कॉर्क और लकड़ी से बनी चीजों का आयात भी लगभग 64 मिलियन डॉलर का हुआ। कुछ और चीजें भी खरीदी गईं, जैसे परमाणु रिएक्टर, मशीनरी, पशुओं का भोजन, लोहा और स्टील। हालाँकि, इनकी खरीद कम थी लेकिन इन पर भी व्यापार चलता रहा।

अमेरिकी सरकार के आँकड़े बताते हैं कि 2024 में अमेरिका ने रूस को सामान कम बेचा। अमेरिका ने सिर्फ 528.3 मिलियन डॉलर का सामान निर्यात किया। लेकिन रूस से बहुत ज्यादा सामान खरीदा। 2023 में अमेरिका ने रूस को 598.8 मिलियन डॉलर का सामान बेचा था।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच चाहे जैसे हालात हो, इसके बावजूद रूस और अमेरिका के बीच व्यापार कभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ और लगातार चलता रहा।

साल 2024 में यूरोपीय संघ और रूस के बीच भारी व्यापार हुआ। सिर्फ सामानों के लेन-देन का आँकड़ा 67.5 अरब यूरो तक पहुँच गया। इससे पहले 2023 में यूरोपीय संघ और रूस के बीच सेवाओं का व्यापार भी खूब हुआ था। उस समय यह कारोबार करीब 17.2 अरब यूरो का था।

2024 में यूरोप ने रूस से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की 16.5 मिलियन टन मात्रा में खरीदारी की। यानी युद्ध के बाद भी यह कारोबार घटा नहीं, बल्कि और बढ़ गया। यूरोप और रूस सिर्फ गैस तक सीमित नहीं हैं। वे एक-दूसरे से खाद, खनन उत्पाद, रसायन, लोहा, स्टील, मशीनरी और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी चीजें भी खरीदते-बेचते हैं। सीधा मतलब है कि रूस से व्यापार करने में यूरोप को कोई परहेज नहीं है। युद्ध के बीच भी उनका लेन-देन लगातार चलता रहा।

ट्रंप प्रशासन को एक बात समझनी चाहिए। जब भारत की रिफाइनरियाँ रूसी कच्चे तेल को साफ करके उसे पेट्रोलियम उत्पाद में बदल देती हैं तो वह तेल अब यूरोपीय संघ के नियमों के मुताबिक ‘रूसी’ नहीं माना जाता। यानी अगर भारत उसे यूरोप को बेचता है तो वह अब ‘रूसी तेल’ नहीं कहलाता, बल्कि ‘भारतीय उत्पाद’ बन जाता है।

साल 2023 में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से इस मुद्दे पर सवाल पूछा गया था। उन्होंने जवाब में यूरोपीय संघ परिषद के नियम 833/2014 का हवाला दिया था। यह नियम कहता है कि परिष्कृत (refined) तेल अब उस देश का नहीं रह जाता जिससे वह आया था। इसलिए जब भारत रूस से तेल खरीद कर उसे रिफाइन करता है तो उस पर ‘रूसी’ मुहर नहीं लगाई जा सकती।

यूरोपीय विदेश नीति प्रमुख जोसेफ बोरेल ने कहा था कि भारत पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन जयशंकर ने नियमों से साफ कर दिया कि भारत कुछ भी गलत नहीं कर रहा है।

4 अगस्त 2025 को भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान दिया। यह बयान डोनाल्ड ट्रंप के भारत पर लगाए गए आरोपों के जवाब में था। बयान में कहा गया कि भारत ने रूस से तेल खरीदना तभी शुरू किया जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ।

इस युद्ध के कारण जो तेल भारत को मिल रहा था, वह यूरोप की तरफ भेज दिया गया। इससे भारत के लिए तेल की सप्लाई घट गई। ऐसे में, भारत ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए रूस से तेल खरीदने का फैसला किया।

भारत ने यह फैसला खुद के फायदे के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए किया। भारत ने यह भी बताया कि उस समय अमेरिका ने खुद भारत को ऐसा करने के लिए कहा था। अमेरिका ने भारत को प्रोत्साहित किया था कि वह रूस से सस्ता तेल खरीदे। ताकि दुनिया भर में तेल की कमी और कीमतें बढ़ने से रोकी जा सकें।

यह बात साफ लगती है कि अमेरिका ने अचानक भारत को गलत ठहराना शुरू किया। यह भारत के रूस से तेल खरीदने की वजह से नहीं है। यह ट्रंप के खुद के अहंकार का नतीजा है। ट्रंप चाहते थे कि भारत पाकिस्तान की तरह उनकी बात माने।

मई 2025 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम हुआ तो ट्रंप चाहते थे कि भारत उनकी तारीफ करे। उन्होंने उम्मीद की थी कि भारत उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दिलवाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए ट्रंप नाराज होकर भारत के खिलाफ बोलने लगे।

भारत ने ट्रंप की ऐसी किसी बात का समर्थन नहीं किया जो बेबुनियाद हो। यहाँ तक कि ट्रंप जिस ‘व्यापार समझौते’ की बात करते हैं, भारत ने उसमें भी वैसी भूमिका नहीं निभाई। ट्रंप का दावा था कि उन्होंने भारत को पाकिस्तानी आतंकवादियों और सेना के हमले रोकने के लिए मनाया था। भारत ने इस दावे पर भी चुप्पी साधे रखी।

भारत ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित नहीं किया। भारत ने अमेरिकी डेयरी और कृषि उत्पादों के लिए अपना बाजार भी नहीं खोला। इन सब बातों ने मिलकर ट्रंप को नाराज कर दिया। शायद वह इतने आहत हो गए कि अब अमेरिका भारत को रूस-यूक्रेन युद्ध का जिम्मेदार ठहराने लगा है।

ऑपइंडिया पहले ही यह बता चुका है कि यूरोपीय संघ ने ट्रंप के दबाव में झुककर अमेरिका से व्यापार समझौता किया था। इस समझौते में यूरोपीय संघ ने अपने ही कई हितों से समझौता कर लिया था। इससे ट्रंप को और बल मिला। उन्हें लगने लगा कि उनकी टैरिफ नीति हर देश पर असर डालेगी। लेकिन भारत ने ट्रंप की यह सोच तोड़ दी। भारत ने ट्रंप की नीतियों के आगे झुकने से इनकार कर दिया।

यह बात दिलचस्प है कि ट्रंप प्रशासन भारत पर निशाना साध रहा है। वो भारत को यूक्रेन के खिलाफ रूस की मदद करने वाला बता रहा है। लेकिन दूसरी ओर, खुद अमेरिका रूस से व्यापार कर रहा है।

16 अगस्त 2025 को अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इसका खुलासा किया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और रूस के बीच व्यापार 20 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ गया है। इससे ट्रंप के उस दावे की सच्चाई सामने आ गई जिसमें वे कहते हैं कि अमेरिका रूस पर दबाव बना रहा है। दरअसल, अमेरिका खुद रूस से व्यापार बढ़ा रहा है, जबकि भारत पर आरोप लगा रहा है।

शायद डोनाल्ड ट्रंप, मार्को रुबियो, पीटर नवारो या लिंडसे ग्राहम ही ये समझा सकें कि अमेरिका रूस से व्यापार बढ़ाकर कैसे उसकी युद्ध मशीन को मदद नहीं कर रहा। क्या रूस को पैसा तब ही मिलता है जब भारत कुछ बैरल तेल अपनी जरूरत के लिए खरीदता है और यूरोप को बेचता है?

जब अमेरिका खुद रूस के साथ 20 प्रतिशत ज़्यादा व्यापार कर रहा है, तब वह भारत पर कैसे आरोप लगा सकता है? अब वक्त आ गया है कि अमेरिका इस दोहरे रवैये को छोड़े या तो खुद को दंडित करे कि वह भी रूसी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। या फिर भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए बार-बार दोषी ठहराना बंद करे।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान एक बड़ा दावा किया था। उन्होंने कहा था कि वे राष्ट्रपति बनने के 24 घंटे के अंदर रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कर देंगे। लेकिन अब आठ महीने बीत चुके हैं। आज तक वे दोनों देशों के बीच एक अस्थायी युद्धविराम भी नहीं करवा सके हैं। अब ट्रंप अपनी नाकामी और झुंझलाहट का गुस्सा भारत पर निकाल रहे हैं। भारत उनके झूठे वादों, सनक या दोहरे मापदंडों का जिम्मेदार नहीं है। भारत को उनके पाखंड का बोझ ढोने की कोई जरूरत नहीं है।

भारत के हमलों से डरकर पाकिस्तान ने छिपाए थे युद्धपोत, कराची पोर्ट से हटाकर लड़ाकू जहाजों को ईरान सीमा पर किया तैनात: सैटेलाइट तस्वीरों से खुली पोल

ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान को धूल चटा दी लेकिन पाकिस्तान यह मानने को तैयार नहीं था। अब ऑपरेशन के दौरान की कराची और ग्वादर बंदरगाह की सैटेलाइट तस्वीरें सामने आई हैं। इन तस्वीरों में पाकिस्तान नेवी (PN) भारत के हमलों से डरकर ईरान बॉर्डर पर छिपती नजर आ रही है, जिसने पाकिस्तान के दावों की फिर एक बार पोल खोलकर रख दी है।

इंडिया टुडे के ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) टीम ने जुटाई ये सैटेलाइट तस्वीरें 08 मई 2025 की हैं। इससे एक दिन पहले ही 06 और 07 मई 2025 को भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के तहत 9 आतंकी ठिकानों पर हमला किया था। इसके बाद नई दिल्ली ने इस्लामाबाद के DGMO को फोन कर बताया कि उनका मिशन पूरा हो गया है।

कराची पोर्ट की सैटेलाइट तस्वीर (फोटो साभार: India Today)

भारत के हमलों के बाद पाकिस्तान करारा जवाब देने के प्रोपेगेंडा फैलाता गया लेकिन इन सैटेलाइट तस्वीरों से पाकिस्तान का सच सामने आ गया है। तस्वीरों में साफ नजर आता है कि पाकिस्तान नेवी ने कराची में अपने लड़ाकू जहाजों को डॉक से हटाकर कमर्शियल टर्मिनलों पर शिफ्ट कर दिया था।

बाकी दूसरे जहाजों को ईरान की सीमा से मुश्किल से 100 किलोमीटर दूर पाकिस्तान के पश्चिमी बंदरगाह ग्वादर में छिपाए गए थे। पाकिस्तान को डर था कि कहीं भारत फिर कराची बंदरगाह को तबाह ना कर दे। जैसे भारत ने 04 दिसंबर 1971 को ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत कराची बंदरगाह पर हमला किया था, जिससे बंदरगाह 7 दिनों तक आग और धुएँ की लपटों से घिरा रहा था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कराची पोर्ट ऑपरेशन सिंदूर के दौरान खाली था लेकिन 08 मई 2025 की सैटेलाइट तस्वीरों में युद्धपोत कमर्शियल कार्गो टर्मिनल पर खड़े दिखे। हल्के बादलों से ढकी इन तस्वीरों में कम से कम चार पाकिस्तानी नेवी जहाज कमर्शियल पोर्ट और कंटेनर टर्मिनल के पास खड़े हैं।

इसमें PNS अलमगीर, एक बाबर-क्लास कोरवेट और एक डेमन ऑफशोर पेट्रोल वेसल (OPV) शामिल थे, जो कार्गो जहाज के पास खड़े थे। यहीं कंटेनर लोड-अनलोड हो रहे थे। एक और नेवी प्रिगेट कंटेनर टर्मिनल पर था ना कि पाकिस्तान नेवी के गोदाम पर।

इस बारे में इंडिया टुडे से बात करते हुए 1971 कराची पोर्ट हमले में शामिल भारतीय नौसेना के पूर्व अफसर कमांडर-इन-चीफ, वाइस एडमिरल एससी सुरेश बंगारा ने कहा, “पाकिस्तान ने कमर्शियल पोर्ट में अपने जहाज खड़े किए। यह भारत के मिसाइल हमलों से बचने की कोशिश का संकेत है। कमर्शियल फ्लाइट के पास अपने सैन्य विमानों को उड़ाने से पता लगता है कि पाकिस्तान अपने सिविलियन संपत्तियों को खतरे में डालने को तैयार हैं।”

रिटायर्ड नौसेना अफसर कहते हैं, “ग्वादर, जहाँ कमर्शियल गतिविधियाँ नहीं थीं। वहाँ अग्रिम पंक्ति के जहाजों को रखना गलत था क्योंकि वे आसानी से नजर आते थे। ऐसा लगता है कि समुद्र में पाकिस्तान की एकमात्र ताकत उनकी पनडुब्बियाँ थीं।”

पाकिस्तान पत्रकार ने अपने मुल्क की पोल खोली

पाकिस्तान के पत्रकार नजम सेठी ने भी अपने ही मुल्क की पोल खोलकर रख दी। एक पाक मीडिया को दिए गए इंटरव्यू में नजम सेठी ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने पाकिस्तान के कैंप और एयरबेस में मिसाइल हमले किए, लेकिन पाकिस्तान इस पर जवाबी कार्रवाई करने में असमर्थ रहा।

नजम सेठी पाकिस्तान फौज की नाकामियाँ बताते हुए कहते हैं, “आपके (पाकिस्तान) पास कोई S-400 तरीके की मिसाइल नहीं है। भारत ने आपके (पाकिस्तान) एयरबेस और कथित फ्रीडम फाइटर के कार्यालय को उड़ा दिया और आप कुछ नहीं कर सके। पाकिस्तान के पास भारत जितनी क्षमता नहीं है।”

पाकिस्तान से सिंधु जल संधि का ‘खलनायक’ भी नेहरू ही: संसद की अनुमति लिए बगैर किया था लागू, न वाजपेयी की सुनी-न ‘दूसरा विभाजन बताने’ वाले कॉन्ग्रेस नेता की

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया है। समझौते को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते 15 अगस्त के अपने भाषण में लाल किले से कहा था कि यह समझौता अन्यायपूर्ण है।

अब इस समझौते को लेकर सामने आई जानकारी से पता चला है कि यह समझौता संसद की बिना अनुमति के लागू हो गया था और मुहर लगने के 2 महीने बाद इस पर सिर्फ 2 घंटे की चर्चा हुई थी। वहीं, जब यह मुद्दा संसद में उठा था तो ज्यादातर सांसदों ने इस समझौते की आलोचना की थी लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किसी की बातों पर ध्यान नहीं दिया।

बिना संसद की अनुमित की सिंधु जल समझौते पर लगी मुहर

न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, यह संधि संसद या विपक्षी नेताओं को विश्वास में लिए बिना ही साइन कर दी गई थी। जब तक इस पर संसद में चर्चा होती तब तक इस पर मुहर लग गई थी।

30 नवंबर 1960 को लोकसभा में सिंधु जल संधि पर छोटी लेकिन तीखी चर्चा हुई थी। इस चर्चा में नेहरू सरकार और विपक्षी सांसदों के बीच खाई नजर आई थी। इस संधि के विरोध में विपक्षी विभिन्न दलों के सांसदों समेत कई कॉन्ग्रेसी सांसद भी थे और उनका मानना था कि भारत ने पाकिस्तान को बहुत रियायत दी है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी इससे जुड़ी जानकारी X पर कई पोस्ट के जरिए साझा की है। नड्डा ने लिखा है, “जब नेहरू ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए थे, तो उन्होंने एकतरफा तौर पर सिंधु बेसिन का 80 प्रतिशत पानी पाकिस्तान को सौंप दिया था, जिससे भारत के पास केवल 20 प्रतिशत हिस्सा रह गया था।”

उन्होंने लिखा कि इस संधि पर सितंबर 1960 में हस्ताक्षर किए गए थे लेकिन इसके सांसद में सिर्फ 2 घंटे की चर्चा के लिए नवंबर में रखा गया था।

कॉन्ग्रेस नेता ने बताया था ‘दूसरा विभाजन’

कॉन्ग्रेस के अशोक मेहता ने इस संधि की कड़ी आलोचना की और इसे देश के लिए ‘दूसरे विभाजन’ जैसा बताया था। नड्डा द्वारा शेयर किए गए डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, अशोक मेहता ने कहा, “यह एक तरह का दूसरा विभाजन है जिसका हम सामना कर रहे हैं। यह उन सभी जख्मों को फिर से हरे करने जैसा है जिनके भरने की हमें उम्मीद थी। यह हमारे प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर से फिर से हो रहा है।”

एक और कॉन्ग्रेस सांसद हरीश चंद्र माथुर ने इसे भारत के नुकसान का समझौता था। उन्होंने कहा था, “अपने लोगों की कीमत पर अधिक उदारता दिखाना कूटनीति नहीं है। इस संधि में राजस्थान के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है।” उनका कहना था, “भारत 1948 से पीछे हटता गया और पाकिस्तान दबाव डालता रहा।”

उनका कहना था कि अगर पाकिस्तान को पानी की गारंटी मिल गई थी तो कश्मीर समस्या का समाधान हो जाना चाहिए थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने चेतावनी दी थी कि राजस्थान को हर साल 70-80 करोड़ रुपए का नुकसान होगा।

वाजपेयी ने की थी नेहरू की कड़ी आलोचना

तब एक युवा सांसद और बाद में प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने इस संधि को लेकर नेहरू सरकार की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार घोषणा कर चुकी थी कि 1962 तक पाकिस्तान का पानी रोका जाएगा फिर अब स्थाई अधिकार क्यों दिए जा रहे हैं।

वाजपेयी ने चेतावनी दी थी कि पाकिस्तान की अनुचित माँगों के आगे झुकने से मित्रता स्थापित होने का नेहरू का तर्क गलत है। उनका कहना था, “यह दोस्ती का तरीका नहीं है। दोस्ती केवल न्याय पर आधारित हो सकती है, तुष्टिकरण पर नहीं।”

संधि पर क्या बोले थे नेहरू?

अंत में नेहरू ने बोलना शुरू किया था और उनकी आवाज में थकान और उदासी थी। उन्होंने कहा कि यह भारत के लिए एक ‘अच्छी संधि’ है। जो लोग इसे ‘दूसरा बँटवारा’ कह रहे थे, उन्हें झिड़कते हुए नेहरू ने पूछा, “भला, एक बाल्टी पानी का बँटवारा कैसा बँटवारा हुआ?”

नेहरू ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हर कदम पर संसद की अनुमति लेना व्यावहारिक नहीं होता। उन्होंने यह भी माना कि पाकिस्तान ने शुरुआत में 300 करोड़ रुपए की मांग की थी लेकिन भारत ने मात्र 83 करोड़ रुपए में समझौता कर लिया। उन्होंने कहा था, “हमने शांति खरीदी है।”

साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह संधि न होती, तो पश्चिम पंजाब उजाड़ हो जाता और पूरा उपमहाद्वीप अस्थिरता की चपेट में आ जाता।

नेहरू के उत्तर के बाद भी सांसद पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुए। बहस का समापन बिना किसी वोट के ही हो गया क्योंकि संधि पहले ही पक्की हो चुकी थी। हालाँकि, इस चर्चा ने साफ कर दिया था कि असहमति केवल विपक्ष तक सीमित नहीं थी बल्कि सत्ता पक्ष के कई सांसद भी नेहरू के रुख से सहमत नहीं थे।

19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी प्रणाली के जल के उपयोग के संबंध में भारत और पाकिस्तान के बीच संधि हुई थी। जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि में सिंधु, झेलम और चेनाब को पश्चिमी नदियाँ बताया गया जिनका पानी पाकिस्तान के लिए तय किया गया था। जबकि रावी, व्यास और सतलुज को पूर्वी नदियाँ बताते हुए इनका पानी भारत के लिए तय किया गया था।

संधि के बाद पानी का करीब 80% हिस्सा पाकिस्तान के पास चला गया था जबकि 20% भारत के पास बचा रहा था। पहलगाम आतंकी हमले के बाद नरेंद्र मोदी ने इस संधि को निलंबित कर दिया था जिसके बाद पाकिस्तान में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने PM मोदी को किया फोन, अलास्का में डोनाल्ड ट्रम्प से हुई चर्चा के बारे में बताया: भारत ने यूक्रेन विवाद के शांतिपूर्ण समाधान पर दिया जोर

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सोमवार (18 अगस्त 2025) को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन किया। इस बातचीत में पुतिन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ अलास्का में हुई अपनी मुलाकात का ब्योरा साझा किया। पुतिन ने यूक्रेन संघर्ष को लेकर चल रही स्थिति पर भी चर्चा की।

पीएम मोदी ने इस दौरान भारत के उस रुख को दोहराया, जिसमें यूक्रेन विवाद का समाधान बातचीत और कूटनीति से करने की वकालत की गई है। उन्होंने कहा कि भारत इस दिशा में हर संभव प्रयास का समर्थन करता है।

पीएम मोदी ने पुतिन को उनकी विस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद दिया और भारत-रूस के बीच विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सहयोग के कई मुद्दों पर बात की, जिसमें व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और अन्य क्षेत्र शामिल रहे।

इस बातचीत का मकसद दोनों देशों के बीच रिश्तों को और गहरा करना था। पीएम मोदी ने पुतिन को इस साल के अंत में भारत आने का निमंत्रण भी दिया, ताकि 23वाँ भारत-रूस शिखर सम्मेलन हो सके।

पीएम मोदी ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा कि वह पुतिन के साथ निरंतर बातचीत की उम्मीद करते हैं। इस कॉल से भारत की कूटनीतिक स्थिति और मजबूत हुई, जो वैश्विक मंच पर शांति और सहयोग को बढ़ावा देती है। यह बातचीत भारत-रूस संबंधों को और प्रगाढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

इस कॉल से पहले पुतिन ने बेलारूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और चीन के नेताओं से भी यूक्रेन मुद्दे पर बात की थी। यह बातचीत ऐसे समय में हुई, जब अमेरिका ने भारत के रूसी तेल आयात पर 50% टैरिफ लगाया है। भारत ने इसका जवाब देते हुए कहा कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए बाजार आधारित निर्णय लेता है। दोनों नेताओं ने सहमति जताई कि वे भविष्य में भी लगातार संपर्क में रहेंगे।

हिंदी अखबार के 4 दिन पुराने संपादकीय का अक्षर-अक्षर गुजराती में अनुवाद कर छाप दिया, न इजाजत ली-न क्रेडिट दिया: ‘गुजरात समाचार’ ने पत्रकारिता का नया प्रतिमान गढ़ा

समाचार पत्र का संपादकीय किसी भी अखबार की आत्मा होती है। अखबार की सोच होती है, जिसे पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाया जाता है। आज कल अखबारों के साथ संपादकीय भी महत्व खोते जा रहे हैं। हालाँकि ये अभी भी प्रकाशित होते हैं।

गुजराती पत्रकारिता में ‘क्रांति’ हुई है। मोदी से लेकर ट्रंप तक के खिलाफ ‘अग्रणी’ अखबार ‘ गुजरात समाचार ‘ में भी संपादकीय प्रकाशित होते रहते हैं। 18 अगस्त को भी एक लेख ‘गुजरात समाचार’ में प्रकाशित हुआ है। शीर्षक है – ‘देश के सामने की चुनौतियाँ।’ शीर्षक पढ़कर या ‘गुजरात समाचार’ का नाम सुनकर लेख में ‘मोदी के शासन के तहत देश बर्बाद हो चुका है और उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए’ ऐसा भाव होगा, स्वाभाविक तौर पर ऐसा लग सकता है। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है। लेख का टोन बहुत सामान्य है। यह एक सामान्य संपादकीय लेख की तरह है।

समाचार के संपादकीय लेख की शुरुआत हाल ही में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस से होती है। लेख में कहा गया है कि जश्न मनाने के लिए उपलब्धियों की कमी नहीं है। भारत ने जो ऊँचाइयाँ हासिल की हैं, वह छोटी बात नहीं है, क्योंकि भिन्नताएँ और विविधताएँ होने के बावजूद देश लगातार मजबूत बनता जा रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और राष्ट्रीय एकता का उल्लेख आता है।

इसके बाद आर्थिक मामलों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भारत सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है और गरीबी भी घट रही है।इसके बाद दूसरे चरण की शुरुआत होती है। इसमें कुछ खामियों और चुनौतियों की बात की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की थोड़ी चर्चा होती है और अमेरिका और टैरिफ का उल्लेख दिखाई देता है। मजबूत संस्थाएँ होनी चाहिए और नियमों के आधार पर व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, ऐसी सारी बातें लिखी गई हैं।

आखिरी पैराग्राफ में संपादक लिखते हैं, “कभी-कभी बहुमत भेड़ों के झुंड जैसा होता है। भाजपा शासित राज्यों में विधानसभा सत्र होने से पहले विधायक पूछने वाले प्रश्नों की चिट्ठी पार्टी की तरफ से दी जाती है। विधायक अपने क्षेत्र के असली प्रश्न नहीं पूछ सकते… ये सभी लोकतंत्र को अपंग करने वाली हैं और ये एक बड़ा चुनौती है। विपक्ष भारत के चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है। ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं पैदा हुई थी।”

आगे लिखा, “चुनाव आयोग का निष्पक्ष व्यवहार भारतीय राजनीतिक प्रणाली की नींव है, जिस पर बाकी सब निर्भर है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मतदाताओं दोनों के मन में कोई संदेह या उलझन की स्थिति नहीं होनी चाहिए। यह लेख सामान्य है।” जैसा अखबार में छपता है, वैसा ही है। लेकिन मूल बात यह है कि यही लेख, शब्दशः चार दिन पहले एक अंग्रेजी अखबार ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के हिंदी संस्करण में प्रकाशित हो चुका है।

14 अगस्त, 2025 को रात 11:01 बजे प्रकाशित इस लेख का शीर्षक है– ’79वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत की उपलब्धियां और चुनौतियाँ, मजबूत संस्थाओं की आवश्यकता ‘

चार दिन बाद गुजरात समाचार में प्रकाशित संपादकीय और बिजनेस स्टैंडर्ड के इस लेख में अंतर इतना है कि एक हिंदी में है और एक गुजराती में। दूसरी बात ये है कि ‘गुजरात समाचार’ ने अंतिम पैराग्राफ में भाजपा-विरोधी टिप्पणियाँ की हैं, जो बिजनेस स्टैंडर्ड के लेख में नहीं हैं। बाकी का पूरा लेख पहले से आखिरी तक शब्दशः एक जैसा है। कहीं कोई बदलाव नहीं किया गया है। पैराग्राफ भी समान हैं, शुरुआत भी एक जैसी है और अंत में गुजरात समाचार द्वारा जोड़ी गई कुछ टिप्पणियों के अलावा बाकी का हिस्सा समान है।

गुजरात समाचार का अंडरलाइन किया हुआ भाग मूल हिंदी लेख में नहीं है

आमतौर पर एक अखबार का लेख दूसरे में प्रकाशित होती रहती हैं,लेकिन संपादकीय लेखों की अदला-बदली आम तौर पर नहीं होती है। कई अखबार-मीडिया संस्थाएँ एक-दूसरे से सामग्री लेती रहती हैं, लेकिन इसमें उस तथ्‍य का स्पष्ट उल्लेख होता है। कई गुजराती अखबार विदेशी अखबारों की रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं, लेकिन इसके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। दोनों के बीच एक प्रकार का टाई-अप होता है।

‘गुजरात समाचार’ ने ऐसी कोई स्पष्टता नहीं लिखी है। फिर भी वास्तविकता जानने के लिए ऑपइंडिया ने जब ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ से संपर्क किया, तो यह पता चला कि दोनों अखबारों के बीच ऐसा कोई टाई-अप नहीं किया गया है। न ही अंग्रेजी अखबार ने या उसके हिंदी संस्करण ने गुजरात समाचार को अपने लेख प्रकाशित करने के लिए विशेष अधिकार दिए हैं। गुजरात समाचार के सूत्र भी कहते हैं कि उनका कोई टाई-अप नहीं है।

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, बिज़नेस स्टैंडर्ड इस विषय में जाँच कर रहा है और जाँच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

(मूल रूप से ये लेख गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)