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भगवान श्रीकृष्ण की फोटो पोस्ट कर की गंदी बातें, ​तमिलनाडु पुलिस पता भी नहीं लगा पाई: हाई कोर्ट ने लगाई क्लास, कहा- हिंदू देवी-देवताओं का अपमान नहीं कर सकते

फेसबुक पर भगवान श्रीकृष्ण की फोटो पोस्ट कर एक व्यक्ति ने अपमानजनक बातें की। तमिलनाडु पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट यह कहते हुए दाखिल कर दी कि ‘आरोपित’ का पता नहीं चल सका है। मद्रास हाई कोर्ट ने इस पर फटकार लगाते हुए कहा है कि हिंदू देवी-देवताओं का अपमान नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी कहा है कि बोलने की स्वतंत्रता का मतलब हिंदुओं की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। इससे धार्मिक आक्रोश भड़क सकता है और कानून व्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो सकता है। मजिस्ट्रेट कोर्ट की रिपोर्ट को रद्द कर पुलिस को तीन महीने के भीतर जाँच कर इस मामले में रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।

हाई कोर्ट ने कहा है कि तूतीकोरिन पुलिस ने जाँच में लापरवाही की है। फाइनल रिपोर्ट जल्दबाजी में दाखिल की है। उल्लेखनीय है कि सतीश कुमार नाम के व्यक्ति ने अगस्त 2022 में फेसबुक पर यह अपमानजनक पोस्ट की थी। उसने भगवान कृष्ण द्वारा गोपियों के वस्त्र चुराने की तस्वीर के साथ अभद्र कैप्शन लिखे थे।

भगवान श्रीकृष्ण के अपमान पर मद्रास हाई कोर्ट सख्त

बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने कहा कि देवी-देवताओं के चित्रण को लेकर ज्यादा संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना न हो। जस्टिस के मुरली शंकर ने 4 अगस्त के आदेश में कहा है, “हिंदू देवी-देवताओं को अपमानजनक तरीके से दिखाना, जानबूझकर लाखों-करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाना है। इसे किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। इससे धार्मिक शत्रुता और सामाजिक अशांति फैल सकती है।”

उन्होंने कहा, “धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था को देखते हुए उनका अपमान समाज के बड़े हिस्से को आहत कर सकता है और सामाजिक अशांति फैल सकती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना न हो।”

अदालत ने कहा कि भगवान कृष्ण द्वारा गोपियों के कपड़े छिपाने की कहानी एक प्रतीकात्मक कथा है। इसकी कई तरह से व्याख्या की जाती है। इनमें से एक के अनुसार यह जानने के लिए भगवान ने परीक्षा ली थी कि क्या गोपियों की भक्ति सांसारिक मोह-माया से ऊपर है? कोर्ट ने कहा, “यह कहानी आध्यात्मिक साधना और विरक्ति के महत्व को दर्शाती है।”

भगवान श्रीकृष्ण को लेकर किया था अपमानजनक पोस्ट

सतीश कुमार नामक व्यक्ति के अकाउंट से टिप्पणी की गई थी कि कृष्ण जन्माष्टमी उनका त्योहार है, जिन्होंने नहाती हुई महिलाओं के कपड़े चुरा लिए थे। इस मामले में पी. परमेसिवन नामक शख्स ने शिकायत दर्ज कराई थी कि यह पोस्ट हिंदू देवी-देवताओं के अपमान के इरादे से की गई है। शिकायतकर्ता ने यह भी चिंता जताई थी कि यह पोस्ट कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ सकती है।

इसी साल फरवरी में पुलिस ने निचली कोर्ट में ‘निगेटिव फाइनल रिपोर्ट’ दाखिल की। इसमें कहा गया कि उन्होंने पोस्ट अपलोड करने वाले फेसबुक यूज़र की जानकारी के लिए मेटा से संपर्क किया। लेकिन उन्हें यूज़र की जानकारी नहीं मिल पाई। ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की इस निगेटिव रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और मामले को बंद कर दिया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी।

तमिलनाडु पुलिस को हाई कोर्ट ने फटकारा

हाई कोर्ट ने इस मामले में एमके स्टालिन सरकार की पुलिस को फटकार लगाई है कि उन्होंने गंभीरता नहीं दिखाई। कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया है कि फिर से जाँच शुरू कर 3 महीने के भीतर फाइनल रिपोर्ट दाखिल करे। हाई कोर्ट ने कहा, “गंभीर आरोपों के बावजूद पुलिस ने मामले को लापरवाही से देखा, जाँच रोक दी और इसे ‘अनडिटेक्टेड’ बताकर बंद कर दिया।”

हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने जाँच सिर्फ फेसबुक से जानकारी माँगने तक सीमित रखा। कोर्ट ने बताया कि जिस फेसबुक पेज की बात हो रही है, उस पर पहले से कुछ निजी जानकारी मौजूद थी जिसे देखकर फेसबुक यूजर को खोजा जा सकता था। हाई कोर्ट ने कहा कि जाँच को गंभीरता से नहीं किया गया और फाइनल रिपोर्ट बस औपचारिक तौर पर दाखिल कर दी गई।

हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को लेकर कहा कि उन्होंने केस बंद करते समय फाइनल रिपोर्ट पर उठाए गए आपत्तियों पर ध्यान ही नहीं दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि फाइनल रिपोर्ट को स्वीकार करने का मजिस्ट्रेट का आदेश कानूनी रूप से सही नहीं था।

जिस इलाके में पसरा था आतंकी संगठन SIMI, वही ‘लव जिहाद’ का अड्डा: MP में 283 मामले हुए दर्ज, इस्लामी साजिश के विरोध में सड़क पर उतरे हिंदू

मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने विधानसभा में लव जिहाद से जुड़े आँकड़े पेश किए हैं। इसके अनुसार जनवरी 2020 से 15 जुलाई 2024 तक प्रदेश में लव जिहाद के 283 मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें 73 पीड़िता नाबालिग है।

इन आँकड़ों से यह भी पता चलता है कि लव जिहाद के सर्वाधिक मामले मालवा-निमाड़ अंचल से सामने आए हैं। इसी इलाके में कभी प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी (SIMI) भी पसरा हुआ था। इंदौर भी इसी इलाके में आता है, जहाँ से हाल ही में ‘मुस्लिम गैंग’ द्वारा हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने के कई मामले सामने आए हैं।

विधानसभा में रखे गए आँकड़ों से यह भी पता चलता है कि काफी मामलों में पीड़िता दबाव नहीं झेल पाती हैं। वे या तो गवाही के दौरान पलटने को मजबूर हो जाती हैं या फिर दबाव बनाकर ‘सुलह’ कर लिया जाता है। आँकड़े बताते हैं कि अब तक ऐसे 86 मामलों में से 50 मामलों में आरोपित बरी हो चुके हैं। सजा केवल 7 मामलों में हुई है। एक मामला ‘सुलह’ के कारण खत्म हो गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहर, जहाँ पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू है, वहाँ भी लव जिहादी लड़कियों को अपना निशाना बना रहे हैं। इंदौर के सिर्फ नगरीय क्षेत्र के पुलिस थानों में लव जिहाद के 55 मामले दर्ज किए गए है। वहीं, पूरे इंदौर जिले में लव जिहाद के 74 मामले सामने आए हैं। यह पूरे राज्य में सर्वाधिक है। इसके अलावा राजधानी भोपाल में लव जिहाद के 33 मामले, खंडवा और उज्जैन में 12-12 मामले और छतरपुर में 11 मामले दर्ज किए गए हैं। राज्य के अलग-अलग पुलिस थानों में दर्ज 283 मामलों में से 197 कोर्ट में लंबित हैं।

लव जिहाद पर MP सरकार ने विधानसभा में क्या बताया?

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बीजेपी विधायक आशीष गोविंद शर्मा के सवाल के जवाब में विधानसभा में लव जिहाद के मामलों को लेकर जानकारी दी। उन्होंने कहा, “2020 से लेकर अब तक हुए लव जिहाद के प्रकरणों में प्रदेश के सभी जिलों में असुरक्षित बालिकाओं/महिलाओं को लक्ष्य बनाकर उनका शोषण करने एवं भय या दबाव पूर्वक मतांतरण कराने की घटनाओं की जाँच के लिए पुलिस मुख्यालय ने 4 मई 2025 को राज्य स्तरीय विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया है।”

CM मोहन यादव ने विधानसभा में स्पष्ट किया कि पुलिस मामले की गंभीरता से जाँच कर रही है और पीड़ितों को कानूनी मदद भी मिल रही है। ये मामले मध्य प्रदेश धार्मिक स्वंतत्रता अधिनियम 2021 के तहत दर्ज किए गए हैं।

लव जिहाद के खिलाफ हिंदू पंचायत

मध्य प्रदेश में लव जिहाद की बढ़ती घटनाओं को लेकर उज्जैन में शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को हिंदू पंचायत का आयोजन किया गया। इसमें साधु-संतों समेत हजारों हिंदू परिवार शामिल हुए और पूरे शहर में लव जिहाद की घटनाओं के खिलाफ रैली निकाल गई। साथ ही, इस पंचायत में जिहादियों का समर्थन करने वाले समाज का आर्थिक बहिष्कार करने का फैसला लिया गया।

लव जिहाद कहीं बड़ी आतंकी साज़िश तो नहीं?

हिंदू युवतियों को लव जिहाद के जाल में फँसा कर उनकी जिंदगी तबाह करने की साजिश का केंद्र बना मालवा-निमाड़ अंचल वही इलाका है, जहाँ सिमी जैसे इस्लामिक आतंकी संगठन गहराई से अपनी जड़ें जमा चुके थे। सिमी का गढ़ रहे बुरहानपुर, खंडवा, खरगोन जैसे जिलों से कुछ वर्षों पहले खबरें आई थीं कि ISIS यहाँ अपना नेटवर्क बना रहा है।

ऐसे में यह सवाल भी उठने लगे हैं कि लव जिहाद की साजिश के पीछे आतंकियों का कोई संगठित गिरोह तो साजिश नहीं कर रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी लव जिहाद के पीछे संगठित किसी साजिश की ही आशंका जताई है। ऐसे में इन तथ्यों को और बल मिलता है कि शहरी क्षेत्रों में सफेदपोश लोगों ने सिमी या उस जैसा कोई आतंकी नेटवर्क ने खड़ा कर लिया है और यही लोग लव जिहाद को अंजाम दे रहे हैं।

354 वैगन, 7 इंजन-6 रेक, लंबाई- 4.5 किमी… क्या है ‘रुद्रास्त्र’ जिससे भारतीय रेलवे ने रचा नया कीर्तिमान, जानिए दुनिया की सबसे लंबी मालगाड़ी कहाँ

भारतीय रेलवे ने अपनी अब तक की सबसे लंबी मालगाड़ी ट्रेन ‘रुद्रास्त्र (Rudrastra)’ लॉन्च किया है। यह ट्रेन करीब 4.5 किलोमीटर लंबी है। इसमें 7 इंजन हैं। इसे 6 खाली बॉक्सन रेक को जोड़कर तैयार किया गया है। इसमें 354 वैगन हैं।

जानकारी के अनुसार, इसका संचालन पूर्व मध्य रेल के दीनदयाल उपाध्याय मंडल (DDU) के गंजख्वाजा स्टेशन से गढ़वा रोड स्टेशन तक किया गया। ‘रुद्रास्त्र’ ने उत्तर प्रदेश के गंजख्वाजा स्टेशन से झारखंड के गढ़वा रोड स्टेशन तक का 200 किलोमीटर का सफर लगभग 5 घंटे में पूरा किया।

इस दौरान इसकी औसत रफ्तार 40 किलोमीटर प्रति घंटा रही। ट्रेन का कुछ हिस्सा Dedicated Freight Corridor (DFC) पर चला और बाकी सफर सामान्य पटरियों पर हुआ।

यह मालगाड़ी मुगलसराय के पास स्थित गंज ख्वाजा स्टेशन से खुलने के बाद भभुआ रोड, सासाराम, डेहरी ऑन सोन और सोननगर होते हुए झारखंड के गढ़वा रोड स्टेशन पहुँची। इसके बाद इसे अगले रेल मंडल को हैंडोवर कर दिया गया। केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक्स पर इस मालगाड़ी का एक वीडियो भी साझा किया है।

क्यों है ‘रुद्रास्त्र’ खास?

इस ट्रेन को 6 अलग-अलग रेक को जोड़कर बनाया गया है। अगर ये 6 एक अलग-अलग चलाई जातीं, तो हर एक के लिए अलग क्रू व्यवस्था, शेड्यूलिंग और रूटिंग करनी पड़ती। एक साथ चलाने से रेलवे का समय, स्टाफ और संचालन खर्च बचता है। इससे माल ढुलाई तेज और किफायती हो जाती है, जो भारत के लॉजिस्टिक्स सेक्टर के लिए बड़ा कदम है।

इसे लेकर पूर्व मध्य रेलवे मुख्य जनसंपर्क अधिकारी सरस्वती चन्द्र ने कहा,“ रुद्रास्त्र’ न केवल संसाधनों के बेहतर उपयोग का उदाहरण है, बल्कि यह माल ढुलाई के भविष्य के लिए एक आदर्श मॉडल साबित हो सकती है जो समय, लागत और श्रम की बचत करेगी। 54 वैगन, 7 इंजन और 4.5 किलोमीटर लंबी ‘रुद्रास्त्र’ मालगाड़ी का सफल संचालन डीडीयू मंडल की नई सोच और नवाचार की शानदार मिसाल है।” 

एशिया की सबसे लंबी मालगाड़ी है रुद्रास्त्र

‘रुद्रास्त्र’ के संचालन के लिए पूर्व मध्य रेलवे के DDU डिवीजन ने विशेष तकनीकी समन्वय और नियंत्रण किया है। यहाँ मालगाड़ियों के डिब्बों की मरम्मत और तकनीकी जाँच कर उन्हें फिर से जोड़ने का कार्य किया जाता है। यह डिवीजन मालगाड़ी डिब्बों की मरम्मत और निरीक्षण में माहिर है। इस उपलब्धि को इनकी दक्षता, नवाचार और टीम वर्क का परिणाम माना जा रहा है।

DDU मंडल के डिविजनल रेलवे मैनेजर (DRM) उदय सिंह मीणा ने कहा, “यह एक नया प्रयोग है। इससे माल ढुलाई और लोडिंग तेज होगी। इससे न केवल संसाधनों की बचत होगी, बल्कि समय की भी बचत होगी। इससे भारतीय रेलवे को फायदा होगा। रुद्रास्त्र मालगाड़ी रेलवे के रिकॉर्ड के अनुसार एशिया की सबसे लंबी मालगाड़ी है।”

वैसे दुनिया की सबसे लंबी मालगाड़ी अभी ऑस्ट्रेलिया की BHP कंपनी के पास है। इसकी लंबाई 7.3 किलोमीटर है और उसमें 682 वैगन हैं।

रॉबर्ट वाड्रा को गुरुग्राम में 3.5 एकड़ जमीन रिश्वत में मिली, सोनिया गाँधी के दामाद होने का फायदा: ED, संपत्ति छिपाने में कॉन्ग्रेस MP प्रियंका वाड्रा भी नपेंगी?

कॉन्ग्रेस महासचिव और वायनाड की सांसद प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा को गुरुग्राम में 3.5 एकड़ जमीन रिश्वत में मिली थी। बाद में यह जमीन वाड्रा ने 58 करोड़ रुपए में रियल एस्टेट कंपनी DLF को बेच दी। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोर्ट में दाखिल चार्जशीट में यह खुलासा किया है।

यह जमीन गुरुग्राम के सेक्टर 83 में है। वाड्रा ने जमीन के बदले 7.5 करोड़ रुपए भुगतान का दावा किया था। लेकिन यह चेक कभी क्लियर ही नहीं हुआ। चार्जशीट में कहा गया है कि सोनिया गाँधी के दामाद होने का फायदा वाड्रा को मिला। इसके कारण हरियाणा के तत्कालीन कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा उनके प्रभाव में थे।

रॉबर्ट वाड्रा पर ED की चार्जशीट

ED ने 17 जुलाई 2025 को यह चार्जशीट दाखिल की थी। इसमें कहा गया है कि ओंकारेश्वर प्रॉप्रटीज प्राइवेट लिमिटेड (OPPL) ने जमीन स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड (SLHPL) को रिश्वत के तौर पर दी थी ताकि SLHPL के निदेशक रॉबर्ट वाड्रा अपनी व्यक्तिगत पहुँच का इस्तेमाल कर हरियाणा के तत्कालीन ‘नगर एवं ग्राम नियोजन’ मंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से OPPL को उसी गाँव में हाउसिंग लाइसेंस दिला सकें।

इससे पहले ED ने बताया था कि उन्होंने वाड्रा से जुड़ी 37 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ अटैच की थी। इसमें वाड्रा और 10 अन्य लोगों पर 58 करोड़ रुपए की ‘अपराध की कमाई’ को मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए सफेद करने का आरोप है।

प्रियंका गाँधी तक पहुँची जाँच की आँच

इस मामले में वायनाड की सांसद प्रियंका गाँधी वाड्रा तक भी जाँच की आँच पहुँच गई है। ED की चार्जशीट में फरीदाबाद के अमीपुर गाँव में 39.7 एकड़ की 3 हाई-वैल्यू संपत्तियों का जिक्र है, जिनकी जानकारी प्रियंका ने चुनावी हलफनामे में नहीं दी है। यह मामला केरल हाई कोर्ट में है और अदालत ने नोटिस भी जारी किया है। गौरतलब है कि चुनावी हलफनामे में झूठी या अधूरी जानकारी देने को ‘भ्रष्ट आचरण’ के तौर पर देखा जाता है और इसमें अयोग्यता और जेल की सजा हो सकती है।

कैसे खुला रॉबर्ट वाड्रा का फर्जीवाड़ा?

ED की जाँच के दौरान हरियाणा सरकार के अधिकारियों और OPPL के प्रमोटरों सहित कम से कम 20 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। इन लोगों ने शुरू में दावा किया था कि वाड्रा ने जमीन के लिए 7.5 करोड़ रुपए का भुगतान किया था, लेकिन ED ने इस बयान को झूठा बताया है।

ED ने गुरुग्राम पुलिस से वाड्रा के इस कथित भुगतान की जाँच करने को कहा। जाँच में पुलिस उपायुक्त ने पाया कि SLHPL ने OPPL से 3.53 एकड़ ज़मीन 12 फरवरी 2008 को सेल डीड नंबर 4928 के जरिए खरीदी थी। कागजों में दिखाया गया कि भुगतान चेक नंबर 607251 से किया गया है, लेकिन यह चेक कभी क्लियर ही नहीं हुआ। इसके 6 महीने बाद एक और चेक से रकम दी गई।

यह चेक Skylight Realty Pvt Ltd (SLRPL) का था, न कि खरीददार कंपनी SLHPL का। SLHPL की पूँजी केवल 1 लाख थी और SLRPL के खाते में भी 7.5 करोड़ रुपए नहीं थे। 45 लाख का स्टांप ड्यूटी भी बेचने वाले ने दी थी, न कि वाड्रा की कंपनी ने। ईडी के अनुसार, रजिस्ट्री में झूठा भुगतान दिखाकर सौदा बेनामी तरीके से किया गया।

भारत पर बेअसर ट्रंप की टैरिफ की धमकियाँ, ब्राजील के राष्ट्रपति लूला के बाद पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन से की बात: उल्टा पड़ेगा अमेरिका का टैरिफ वाला दाँव?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए टैरिफ वॉर और भारत की दी गई रूस से तेल ना खरीदने की धमकी के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को फोन पर बातचीत की। इस बातचीत में भारत ने यूक्रेन संकट का शांतिपूर्ण समाधान निकालने का अपना रुख दोहराया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के साथ जो टैरिफ वॉर शुरू किया था, वो अब अन्य देशों को और पास लाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगाकर भारत को धमकाने की कोशिश की कि वो रूस से तेल ना खरीदे लेकिन भारत ने दिखा दिया है कि वो किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। पुतिन से पीएम मोदी की यह बातचीत भारत की स्वतंत्र नीति पर मुहर की तरह है।

मोदी-पुतिन की बातचीत पर क्या बोली भारत सरकार?

पीआईबी ने दोनों नेताओं की बातचीत को लेकर प्रेस रिलीज जारी की है। इसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति पुतिन ने पीएम मोदी को यूक्रेन के ताजा हालात की जानकारी दी और पीएम मोदी ने रूस-यूक्रेन संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के लिए भारत के रुख को दोहराया है।

पीआईबी ने बताया कि दोनों नेताओं ने अपने द्विपक्षीय एजेंडे में हुई प्रगति को लेकर भी बातचीत की है और भारत-रूस के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। साथ ही, पीएम मोदी ने पुतिन को इस साल के अंत में होने वाले 23वें भारत-रूस वार्षिक सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया है।

रूस पहुँचे थे अजित डोभाल

भारत और रूस की बढ़ती नजदीकियों और भारत अपने हितों को किस हद तक आगे रखता है इसका अनुमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की रूस यात्रा से भी लगा था। ट्रंप की धमकियों के बीच डोभाल ने मॉस्को जाकर पुतिन से मुलाकात की थी।

पुतिन और डोभाल की मुलाकात के दौरान जो गर्मजोशी दिखाई दी उस पर भी दुनिया की नजरें बनी हुई थीं। साथ ही, डोभाल ने अपने रूस के समकक्ष सर्गेई शोइगु से भी मुलाकात की है। । इस साल के अंत में पुतिन भारत यात्रा पर आने वाले हैं और इसकी जमीन तैयार करने के लिए अजीत डोभाल मॉस्को पहुँचे थे।

ब्राजील के राष्ट्रपति से पीएम मोदी ने की बात

पुतिन से पहले पीएम मोदी ने ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा से फोन पर बात की थी। इस बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने साझेदारी के विकास और निकट संपर्क में रहने पर सहमति जताई थी।

ब्राजील भी ट्रंप के टैरिफ की मार से जूझ रहा है और उस पर भी भारत की तरह 50% टैरिफ लगाया गया है। इससे पहले लुला डा सिल्वा ने स्पष्ट कर दिया था कि वे ट्रंप से टैरिफ के मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं करेंगे। उन्होंने कहा था कि ट्रंप किसी तरह के समझौते के लिए तैयार नहीं हैं, बल्कि वो अपमानित कर रहे हैं। पीएम मोदी ने लूला से बातचीत के बाद जो ट्वीट किया था उसमें ग्लोबल साउथ की बात प्रमुखता से की गई थी।

चीन जाएँगे पीएम मोदी

रूस के साथ बढ़ती बातचीत के बीच पीएम मोदी इस महीने के अंत में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में भाग लेने के लिए चीन का दौरा करेंगे। 31 अगस्त और 1 सितंबर होने वाली उनकी यह यात्रा 2020 की गलवान घाटी में भारत-चीन सैन्य झड़प के बाद पहली चीन यात्रा होगी। इस सम्मेलन में क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, व्यापार और आपसी संबंधों को लेकर चर्चा होगी।

उल्टा पड़ेगा अमेरिका का टैरिफ वाला दांव?

ट्रंप जहाँ एक और चेतावनी पर चेतावनी दे रहे हैं तो वहीं दुनिया के दूसरे देश करीब आ रहे हैं। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर रूस ने करीब चार साल से चल रहे यूक्रेन युद्ध को शुक्रवार तक खत्म नहीं किया, तो वह रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर एक और प्रतिबंध लगाएगा।

भारत और रूस के बीच रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों में संबंधों पर ही अमेरिका को ऐतराज है लेकिन भारत अपने इरादों से साफ कर चुका है कि वह रूस से व्यापार बंद नहीं करेगा। पीएम मोदी की बातचीत और डोभाल का दौरा बताता है कि भारत, अमेरिका के किसी दबाव में आने वाला नहीं है। यानी अगर आने वाले समय में अमेरिका का साथ छोड़ने की ज़रूरत हुई तो भारत उसके लिए भी पूरी तरह तैयार नजर आ रहा है।

भारत के अलावा कई अन्य देश भी ट्रंप की इन धमकियों से नाराज हैं और नए विकल्पों की तलाश में है। एकजुट होते देशों को देखकर अमेरिकी विदेश नीति पर ट्रंप का टैरिफ वॉर उल्टा पड़ने की संभावनाएँ ज्यादा नज़र आ रही हैं।

एथेनॉल मिक्स्ड पेट्रोल को लेकर अफवाहें फैला रहा एंटी-इंडिया गिरोह, नितिन गड़करी बोले – एक भी गाड़ी नहीं हुई खराब: डॉलर की बचत से अर्थव्यवस्था होगी मजबूत, किसानों की कमाई ₹1.14 लाख करोड़ के पार

केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ऑटो सेक्टर में आ रहे बदलाव पर बात करते हुए ‘पेट्रोलियम लॉबी’ की चर्चा की है। उन्होंने कहा कि एथेनॉल युक्त पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ियों पर कोई असर नहीं पड़ता है। इससे माइलेज कम देने की बात पर नितिन गडकरी ने कहा, “ऐसी कोई चर्चा नहीं हो रही है। ये पेट्रोलियम लॉबी वाले पॉलिटिकली इसे मैनिपुलेट कर रहे हैं।” 

क्या है एथेनॉल?

एथेनॉल एक ऐसा अल्कोहल है जो गन्ने और मक्के से मिलकर बनाया जाता है। इसे पेट्रोल में फ्यूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। ई 10, ई 20, ई 27 एथेनॉल पेट्रोल के कटेगरी हैं। ई 10 का मतलब है ऐसा पेट्रोल जिसमें 10 फीसदी एथेनॉल है, ई 20 का मतलब है ऐसा पेट्रोल जिसमें 20 फीसदी एथेनॉल है और ई 27 का मतलब है ऐसा पेट्रोल जिसमें 27 फीसदी एथेनॉल है।

E-20 एक बायोफ्यूल है इससे प्रदूषण कम फैलता है। इसलिए इसका इस्तेमाल ज्यादातर देशों में हो रहा है। भारत में तो अभी पेट्रोल में ही एथेनॉल मिलाया जा रहा है लेकिन कई देशों ने डीजल में भी एथेनॉल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है क्योंकि ज्यादार बड़ी एसयूवी गाड़ियाँ डीजल से चलती हैं।

देश की बचत, किसानों का फायदा

एथेनॉल गन्ने और मक्के से बनता है इसलिए गन्ना किसानों और मक्का पैदा करने वाले किसानों को इससे सीधा फायदा हो रहा है। गन्ना के मिल मालिक को भी इससे फायदा हो रहा है साथ ही मक्का उत्पादन करने वाले किसान भी लाभांवित हो रहे हैं। साथ ही देश को भी इसका फायदा मिल रहा है। भारत सबसे ज्यादा आयात पेट्रोलियम पदार्थों का करता है। एथेनॉल के इस्तेमाल से इसमें कमी आएगी।

केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा, “देश में फ्यूल के आयात पर 22 लाख करोड़ रुपए खर्च होते हैं। एथेनॉल के इस्तेमाल से इसमें कमी आ रही है। इससे सरकार को करीब 1 लाख करोड़ रुपए की बचत हुई है। एथेनॉल बनाने के लिए मक्के का इस्तेमाल हो रहा है, इसका फायदा किसानों को मिल रहा है। किसानों को करीब 1.14 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई है।

ऊर्जा आयात नहीं बल्कि निर्यात करने वाला बनें- गडकरी

रूस से कच्चे तेल आयात से खफा अमेरिका ने 50 फीसदी टैरिफ भारत पर लगा दिया है। ऐसे में ऊर्जा उत्पादक देश बनना भारत की अहम प्राथमिकता है। गडकरी ने कहा कि हमें ऊर्जा आयात करने वाला नहीं बल्कि ऊर्जा निर्यात करने वाला देश बनना चाहिए। इससे पेट्रोल-डीजल से होने वाले प्रदूषण में कमी आएगी। केन्द्रीय मंत्री गडकरी ने कहा कि पेट्रोल में अभी 20 फीसदी एथेनॉल मिलाया जाता है। लेकिन इसे 27 फीसदी करने को लेकर सरकार की योजना चल रही है, हालाँकि ये अभी फाइनल नहीं हुआ है। ARAI के ट्रायल के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय ये तय करेगा कि 27 फीसदी एथेनॉल मिलाना सही है या नहीं। गडकरी के मुताबिक इंडियन ऑयल के एथेनॉल युक्त पेट्रोल के 350 पेट्रोल पंप चल रहे हैं।

फोटो साभार- X @PetroleumMin

ईवी और फ्लेक्स फ्यूल को बराबर महत्व

केन्द्र सरकार ने कहा है कि ग्राहकों को फ्लेक्स फ्यूल और इलेक्ट्रिक वाहनों को बराबर महत्व देगी। उन्होंने कहा कि अब तक जितने भी नियम बनाए गए हैं वो इलेक्ट्रिक वाहनों को सपोर्ट कर रहे हैं। अप्रैल 2027 से कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी 3 (CAFE3)लागू किया जाएगा जिसमें दोनों वाहनों को बराबर वरीयता मिलेगी। CAFE3 ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने के लिए चर्चाओं का दौर जारी है। सड़क परिवहन मंत्रालय, बिजली मंत्रालय और पीएम के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार ने 6 अगस्त 2025 को बैठक की है। इसमें चर्चा की गई है कि छोटी और बड़ी कारों के नियम अलग बनाए जाएं या नहीं।

CAFE नॉर्म्स क्या है?

CAFE नॉर्म्स यानी कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी सालभर वाहन निर्माताओं द्वारा बेची गई वाहनों का औसत कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को तय करता है। ये नियम कंपनियों को ज्यादा फ्यूल एफिशिएंट वाहनों को बनाने के लिए मजबूर करती हैं। फिलहाल सीएएफई 2 नियम लागू है जो 2027 तक मान्य है।

शुद्ध पेट्रोल और मिले हुए पेट्रोल में अंतर

भारत में प्रीमियम पेट्रोल सबसे शुद्ध माना जाता है। इस पेट्रोल में मिलावट नहीं होती। जब इस पेट्रोल में एथेनॉल मिला दिया जाता है तो ये एथेनॉल पेट्रोल कहलाता है। पीएम मोदी ने 2023 में 20 फीसदी एथेनॉल युक्त पेट्रोल को लॉन्च किया था। इसके तहत एक लीटर फ्यूल में 800 मिलीलीटर पेट्रोल और 200 मिलीलीटर एथेनॉल डाला जाता है। अब एथेनॉल युक्त पेट्रोल हर जगह उपलब्ध है।

सोशल मीडिया पर इस तरह के दावे किए जाते हैं कि ऐसे पेट्रोल के इस्तेमाल से इंजन खराब होते हैं, गाड़ियों में गड़बड़ियाँ आ जाती है और माइलेज पर असर पड़ता है। इसका इस्तेमाल प्राइवेट कारों के लिए सही है या नहीं। सरकार ने इन सभी बातों को खारिज करते हुए कहा इससे गाड़ियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता, हालाँकि माइलेज थोड़ा कम हो सकता है। लेकिन इंजन के कुछ हिस्सों में बदलाव और सही ट्यूनिंग के जरिए माइलेज की कमी को दूर किया जा सकता है।

सड़क परिवहन मंत्री गड़करी ने कहा, ” पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल डालने से किसी भी गाड़ी में कोई दिक्कत नहीं आती है। इस मुद्दे पर ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी (ARAI) और सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM)ने पहले ही साफ कर दिया है। अभी तक एक भी वाहन में इससे दिक्कत नहीं आई है।”

माइलेज पर कितना पड़ता है असर?

ई 20 फ्यूल के इस्तेमाल से गाड़ियों पर तो असर नहीं पड़ेगा लेकिन माइलेज को लेकर पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा है कि इसमें मामूली कमी आएगी। ई-20 के लिए डिजाइन और कैलिब्रेट किए गये वाहनों में एक-दो फीसदी माइलेज कम हो सकता है। वहीं बाकी गाड़ियों में तीन से छह फीसदी माइलेज कम हो सकता है। हालाँकि सही इंजन ट्यूनिंग और ई20 कम्पलायंट एलिमेंट के जरिए इसे कम किया जा सकता है। एथेनॉल के इस्तेमाल से गाड़ियों की माइलेज में कमी को लेकर केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि ये बात सच है कि पेट्रोल में एथेनॉल डालने पर उसकी कैलोरिक वैल्यू कम हो जाती है जिससे माइलेज थोड़ा कम हो सकता है।

एथेनॉल को बेहतर बनाने की कोशिश

रूसी तकनीक की सहायता से एथेनॉल को क्षमता बेहतर बनाने की कोशिश सरकार कर रही है। केन्द्रीय मंत्री के मुताबिक अगर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय इसकी टेस्टिंग कर रहा है। इससे पेट्रोल के बराबर एथेनॉल की क्षमता हो जाएगी। केन्द्रीय मंत्री गडकरी ने साफ कर दिया कि देशहित सर्वोपरि है। किसी भी लॉबी के दबाव में नहीं आएंगे। किसानों का फायदा, पेट्रोल आयात, लागत और प्रदूषण को ध्यान में रखकर सरकार कदम उठाएगी।

11 नदियों का जल, 21 तीर्थों की मिट्टी और 11 हजार लड्डू…पुनौरा धाम में संपन्न हुआ भूमिपूजन का काज: 67 एकड़ में राम मंदिर जैसा ही होगा ‘माँ जानकी’ का धाम

बिहार के सीतामढ़ी में पुनौरा धाम पर भव्य जानकी मंदिर के शिलान्यास का कार्य शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को संपन्न हुआ। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, प्रदेश मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत असंख्य साधु-संतों की उपस्थिति रही। इस दौरान नीतीश कुमार ने कहा कि सभी को इसके लिए गृहमंत्री को बधाई देना चाहिए।

अमित शाह ने भूमिपूजन करने के बाद कहा, “भारत की संस्कृति में माँ सीता का स्थान अनन्य है। माँ सीता ने एक ही जन्म में आदर्श माँ, पत्नी और बेटी का स्वरूप दिखाया है। आज बिहार ही नहीं पूरे देश के लिए खुशी का दिन है।”

गृहमंत्री ने कहा, “पहले जब लालू जी रेल मंत्री थे, तब बिहार के रेल के विकास के लिए हर साल 1132 करोड़ रुपए खर्च करते थे, और मोदी जी ने सिर्फ 2025-26 में 10066 करोड़ रुपए का खर्च रेल के लिए किया। मैं मिथिलांचल के लोगों से कह रहा हूँ कि यह सिर्फ मंदिर नहीं है, बल्कि मिथिलांचल और बिहार के भाग्योदय की शुरुआत है।”

उन्होंने आगे कहा,”नीतीश जी ने सैकड़ों करोड़ रुपये से इसका विकास करने का जो कार्य शुरू किया है, यह न केवल मिथिलांचल और बिहार, बल्कि पूरे देश के भक्तों के लिए आनंद की बात है। यहां वर्षों पहले रामायण काल में अकाल के निवारण के लिए राजा जनक ने भूमि में सोने का हल चलाया था, और वहीं से माँ जानकी प्रकट हुई थीं। बारिश के लिए हल चलाया गया था, और आज भूमि पूजन में भी माँ जानकी ने बारिश भेजकर आशीर्वाद देने का कार्य किया।”

इस मौके पर तिरुपति से आए हलवाइयों ने लड्डू का महाप्रसाद बनाया है। जानकारी के अनुसार, 11 पवित्र नदियों के जल का उपयोग कर 11 हजार लोगों के लिए लड्डू बनाया गया है। माता सीता के मंदिर के शिलान्यास में काशी और मिथिला के आचार्य ने 21 तीर्थों की मिट्टी, चाँदी के विशेष कलश और बर्तन और 11 नदियों के जल के साथ भूमि पूजन कराया।

अमित शाह ने अयोध्या के राम मंदिर की तर्ज पर 67 एकड़ में करीब 882 करोड़ की लागत से बनने वाले इस भव्य मंदिर की नींव रखी। रिपोर्ट के मुताबिक, 1 जुलाई 2025 को बिहार कैबिनेट ने पुनौरा धाम में मंदिर निर्माण के लिए 882.87 करोड़ रुपए के बजट को मंजूरी दी थी।

इसमें से 137 करोड़ रुपए से जानकी मंदिर का निर्माण किया जाएगा, वहीं 728 करोड़ रुपए से पर्यटन से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास होना है। सबसे बड़ी बात ये है कि 10 वर्षों तक इसके रख-रखाव पर 16.62 करोड़ रुपए खर्च करने का भी प्रावधान किया गया है।

शिलान्यास से पूर्व माँ जानकी की जन्मस्थली को फूलों और दीपों से सजा दिया गया था। बता दें कि कोलकाता से आए कलाकारों ने मंदिर और परिसर में फूलों की सजावट की है।   भूमिपूजन कार्यक्रम से पहले प्रशासन ने सुरक्षा-व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए केवल 200 लोगों को ही भूमि-पूजन स्थल पर प्रवेश की अनुमति दी थी।

मंदिर के शिलान्यास के मौके पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आगमन को ध्यान में रखते हुए सीतामढ़ी में प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था भी दुरुस्त की गयी थी। जिला पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से पुनौरा धाम को केंद्र मानते हुए 5 किलोमीटर के एरिया में स्थित क्षेत्र को अस्थायी रेड जोन / नो ड्रोन फ्लाई जोन घोषित किया है।

अमृत भारत का मिला उपहार

मोदी सरकार ने सीतामढ़ी को ‘अमृत भारत एक्सप्रेस’ का भी उपहार दिया है। सीतामढ़ी से दिल्ली के बीच चलने वाली इस ट्रेन को अमित शाह ने शिलान्यास के अवसर पर हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

पुनौरा धाम के साथ बिहार की नीतीश सरकार भगवान राम और माँ सीता से जुड़े फुलहर जैसे अन्य स्थलों का भी पुनरुद्धार कर रही है। इतना ही नहीं अयोध्या से पुनौरा धाम को सीधे जोड़ने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग का भी निर्माण हो रहा है। वहीं पर्यटन सुविधाओं के विकास के तहत परिसर में होटल, रेस्टहाउस, संग्रहालय, स्मृति द्वार और स्मारक भवन का निर्माण किया जाएगा।

गौरतलब है कि राम मंदिर के वास्तुकार रहे आशीष सोमपुरा ही इस मंदिर के भी आर्किटेक्ट हैं। उनका कहना है कि हमारी पूरी कोशिश है कि माँ जानकी के मंदिर का आर्किटेक्चर राम मंदिर के जैसा ही भव्य हो। बता दें कि मंदिर का निर्माण राजस्थान के बंसी पहाड़पुर के लाल बलुआ पत्थरों (रेड सैंडस्टोन) से किया जा रहा है।

मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में हरियाली बनाए रखने के लिए सुंदर जलाशय और फव्वारे लगाए जाएँगे और बगीचों का निर्माण भी किया जाएगा। साथ ही, ‘सीता-वाटिका’ और ‘लव-कुश वाटिका’ का भी विकास किया जाएगा।

यह मात्र एक मंदिर का भूमि पूजन ही नहीं… जहाँ ‘इस्लामी कट्टरपंथी-मिशनरी’ बन चुके हैं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा, उसकी मुक्ति-वैभव की पुर्नस्थापना का मार्ग भी

बिहार के सीतामढ़ी में शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को माता जानकी के भव्य मंदिर का शिलान्यास हुआ। यह भव्य मंदिर क्षेत्र पुनौरा धाम कहलाता है। यह न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि मिथिला क्षेत्र की बदलती डेमोग्राफी और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में भी इसकी गहरी प्रासंगिकता है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उपस्थिति में संपन्न इस समारोह ने एक बार फिर सनातन धर्म की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया।

इस लेख में पुनौरा धाम के शिलान्यास के महत्व को मिथिला क्षेत्र की बदलती सामाजिक-जनसांख्यिकीय स्थिति और सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के संदर्भ में विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

पुनौरा धाम – सनातन का गौरवशाली प्रतीक

माता सीता की जन्मस्थली पुनौरा धाम मिथिला की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का केंद्र है। 67 एकड़ में 882 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह मंदिर न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई ऊँचाइयों तक ले जाएगा।

मंदिर का निर्माण राजस्थान के बंसी पहाड़पुर के लाल बलुआ पत्थरों से हो रहा है। इसके वास्तुकार आशीष सोमपुरा हैं, जिन्होंने अयोध्या के राम मंदिर का भी डिजाइन तैयार किया। मंदिर परिसर में ‘सीता वाटिका’, ‘लव-कुश वाटिका’, जलाशय, फव्वारे, संग्रहालय, स्मृति द्वार और पर्यटक सुविधाओं जैसे होटल और रेस्टहाउस का निर्माण होगा।

शिलान्यास समारोह में 11 पवित्र नदियों के जल और 21 तीर्थों की मिट्टी का उपयोग हुआ। तिरुपति के हलवाइयों ने 11,000 लोगों के लिए लड्डू प्रसाद बनाया और कोलकाता के कलाकारों ने परिसर को फूलों और दीपों से सजाया।

सुरक्षा के लिए पाँच किलोमीटर का क्षेत्र रेड जोन घोषित किया गया और केवल 200 लोगों को ही भूमि पूजन स्थल पर प्रवेश की अनुमति दी गई। साथ ही सीतामढ़ी से दिल्ली के लिए ‘अमृत भारत एक्सप्रेस’ ट्रेन को हरी झंडी दिखाई गई, जो क्षेत्र को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगी।

मिथिला की बदलती डेमोग्राफी: एक चिंताजनक तस्वीर

अपनी सांस्कृतिक समृद्धि और मैथिली भाषा के लिए जाने जाने वाला मिथिला क्षेत्र पिछले कुछ दशकों में जनसांख्यिकीय और सामाजिक बदलावों का गवाह रहा है। विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय अध्यक्ष और राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य रहे स्वर्गीय कामेश्वर चौपाल ने 2023 में ऑपइंडिया को दिए एक साक्षात्कार में इस बदलाव को रेखांकित किया था। उनके अनुसार, मिथिला में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार, किशनगंज में 78%, कटिहार में 65%, पूर्णिया में 50%, और मधुबनी-दरभंगा में 32% मुस्लिम आबादी थी। चौपाल का अनुमान था कि अब यह आँकड़ा 39% तक पहुँच चुका होगा।

इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं, मुख्यत: इन्हें तीन बिंदुओं में समझ सकते हैं।

  1. बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों का प्रभाव।
  2. तबलीगी जमात जैसे संगठनों की गतिविधियाँ, जो कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रही हैं।
  3. अल्पसंख्यक संस्थानों को मिलने वाली सरकारी सहायता, जिसने मुस्लिम समुदाय के लिए आर्थिक आधार तैयार किया है।

चौपाल के अनुसार, इन संस्थानों में इस्लामिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाता है, जबकि हिंदू धर्म और संस्कृति को नजरअंदाज किया जाता है। इसके अलावा राजनीतिक तुष्टिकरण ने भी मिथिला में हिंदुओं को जातीय आधार पर बाँटकर कमजोर किया है।

तुष्टिकरण और इस्लामी कट्टरपंथ का बढ़ता प्रभाव

दरअसल, बिहार के मिथिला क्षेत्र में न केवल डेमाग्राफी तेजी से बदल रही है, बल्कि मुस्लिमों का कैरेक्टर भी बदला है। गाँव-गाँव में धर्मांतरण हो रहा है। यह है कॉन्ग्रेस की पुरानी प्लानिंग का नतीजा।

कामेश्वर चौपाल ने कहा था, “80 के दशक में जब मैथिली को संविधान की अष्टम अनुसू​ची में शामिल करवाने का संघर्ष चल रहा था, तब अचानक से एक कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री (डॉ. जगन्नाथ मिश्रा) ने उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दे दिया। त्रि भाषा सूत्र से संस्कृत को बाहर कर उर्दू को शामिल कर दिया। मि​थिला के नौ जिलों को मुस्लिम प्रभावी बताकर इसकी शुरुआत की गई। नतीजा जिस स्कूल में दो भी उर्दू पढ़ने वाले बच्चे थे, उर्दू शिक्षक की बहाली हुई। लेकिन मैथिली की स्कूलों में पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस तुष्टिकरण ने एक तरफ मैथिल हिंदुओं को अपनी भाषा से काट दिया, दूसरी तरफ गैर मैथिली भाषी मुस्लिमों का बीज बो दिया।”

स्वर्गीय चौपाल ने 2023 में बताया था कि 1980 के दशक में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने उर्दू को बिहार की दूसरी राजभाषा बनाकर मैथिली को दरकिनार किया। इससे मैथिल हिंदुओं की सांस्कृतिक पहचान कमजोर हुई और गैर-मैथिली भाषी मुस्लिमों का प्रभाव बढ़ा।

जाति के पॉलिटिक्स ने हिंदुओं को कमजोर कर दिया है। इसलिए मिथिला में अब कोई हिंदू नहीं दिखता। जिनको मुस्लिम का भय है, वही हिंदू है। बाकी अपनी जातीय पहचान के साथ जी रहे हैं। दूसरी तरफ 72 फिरके होने के बावजूद कोई मुस्लिम जातीय पहचान के साथ नहीं जी रहा। वो एक ही बात कहेगा हम मियाँ हैं।

आज आप देखिए मुस्लिम मैथिली नहीं बोलते हैं। कुछ दशक पहले तक उनकी बोली हमारी तरह थी। हमारी तरह वे कपड़े पहनते थे। आज उनका बच्चा पैदा होते ही टखने से ऊपर उठे पायजामे और सिर पर टोपी डाले दिखने लगता है।

जो बीजारोपण कॉन्ग्रेस ने किया उसे लालू प्रसाद यादव ने खुलमखुल्ला MY (मुस्लिम+यादव) से फलने-फूलने दिया। यह राजनीतिक समीकरण तुष्टिकरण का चरम था। बिहार में तबलीगी जमात का असर बढ़ता गया। मुस्लिमों में कट्टरपंथ बढ़ता गया।

तबलीगी जमात और इस्लामिक मुल्कों से आए पैसों से मुस्लिमों की सोच बदली गई तो रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों ने डेमोग्राफी चेंज करने में भूमिका निभाई। जैसे ही मुस्लिमों की आबादी बढ़ी तो मिथिला की हालत कश्मीर जैसी हो जाएगी। खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियाँ इसकी जमीन तैयार कर रही हैं। असल में ये पार्टियाँ इस्लामी कट्टरपंथ के लिए स्लीपर सेल का काम कर रही हैं।

गृहमंत्री अमित शाह ने घुसपैठियों के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “बिहार विधानसभा चुनाव से पहले, क्या बिहार की वोटर लिस्ट से घुसपैठियों को हटाना चाहिए या नहीं? हमारा संविधान भारत में पैदा न हुए किसी व्यक्ति को वोट देने का अधिकार नहीं देता। राहुल बाबा, तुम संविधान लेकर घूम रहे हो, कम से कम इसे खोलकर ठीक से पढ़ तो लो। घुसपैठियों को इस देश की चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। और यही वजह है कि वे SIR का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि घुसपैठिए उनका वोट बैंक हैं…”

पुनौरा धाम का शिलान्यास: सनातन की पुनर्स्थापना

पुनौरा धाम में जानकी मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक परियोजना नहीं है, बल्कि यह मिथिला में सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। राम मंदिर की तरह यह मंदिर भी सांस्कृतिक गौरव को पुनर्जनन देगा।

इस प्रोजेक्ट के महत्वपूर्ण होने की कई वजहे हैं-

आर्थिक और सामाजिक विकास: मंदिर निर्माण से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। होटल, रेस्टहाउस, और संग्रहालय जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। ‘अमृत भारत एक्सप्रेस’ और राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण क्षेत्र की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाएगा, जिससे आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण: मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में यह मंदिर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। ‘सीता वाटिका’ और ‘लव-कुश वाटिका’ जैसे प्रतीकात्मक स्थल मैथिली संस्कृति को पुनर्जनन देंगे।

राष्ट्रीय सुरक्षा का दृष्टिकोण: मिथिला में बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ और घुसपैठ की समस्या को देखते हुए, सनातन धर्म के प्रतीकों का उद्धार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जरूरी है। यह मंदिर हिंदुओं में एकता और सांस्कृतिक गौरव की भावना को प्रबल करेगा, जो कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ एक मजबूत जवाब होगा।

धर्मांतरण पर अंकुश: चौपाल ने बताया था कि मिथिला में गाँव-गाँव में धर्मांतरण की गतिविधियाँ चल रही हैं। इस मंदिर के निर्माण से सनातन धर्म की जड़ें मजबूत होंगी, जिससे मिशनरी और इस्लामी गतिविधियों पर अंकुश लगेगा।

राष्ट्रीय सुरक्षा और सनातन की पुनर्स्थापना

मिथिला में बदलती डेमोग्राफी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक चुनौती बन रही है। किशनगंज, कटिहार, और पूर्णिया जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी का तेजी से बढ़ना और कट्टरपंथी गतिविधियों का उभार चिंता का विषय है। बांग्लादेशी घुसपैठ और तबलीगी जमात की गतिविधियाँ इस क्षेत्र को अस्थिर कर सकती हैं। ऐसे में पुनौरा धाम जैसे धार्मिक स्थलों का पुनरुद्धार न केवल सांस्कृतिक गौरव को बढ़ाएगा, बल्कि हिंदुओं में एकता और आत्मविश्वास को भी प्रबल करेगा।

मोदी सरकार और नीतीश सरकार की यह पहल मिथिला में सनातन धर्म की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में एक ठोस कदम है। फुलहर जैसे अन्य धार्मिक स्थलों का विकास और अयोध्या-पुनौरा धाम को जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग इस क्षेत्र को धार्मिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाएगा।

पुनौरा धाम में जानकी मंदिर का शिलान्यास मिथिला के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। यह मंदिर न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है, बल्कि बदलती डेमोग्राफी और बढ़ते कट्टरपंथ के खिलाफ एक मजबूत जवाब भी है। यह परियोजना रोजगार, पर्यटन और आर्थिक विकास को बढ़ावा देगी, साथ ही सनातन धर्म की पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को बचाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ऐसे प्रयासों की जरूरत है। यह मंदिर माता सीता की जन्मस्थली को न केवल एक धार्मिक केंद्र बनाएगा, बल्कि मिथिला के लोगों में गर्व और एकता की भावना भी जगाएगा।

क्या ‘मनोविकारी’ हैं राहुल गाँधी? भारतीय राजनीति के इस ‘शिशुपाल’ के कितने अपराध क्षमा करेंगी हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ?

झूठ बोलने पर उसे फटकार लग चुकी है। वह सार्वजनिक माफी माँग चुका है। अनर्गल प्रलाप के लिए अदालत उसे दोषी मानकर सजा सुना चुकी है। पर वह इतना निर्लज्ज है कि फिर भी आए दिन अनाप-शनाप बोलता रहता है। जैसे वह इस देश का विपक्ष का नेता नहीं, गली-मुहल्ले का लंपट हो। आदतन अपराधी हो।

7 अगस्त 2025 को कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक लंबे प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए चुनाव आयोग पर जो हमला किया है, यह उसी सिलसिले का एक नया अध्याय है। कभी चुनाव आयोग, कभी भारतीय सेना, कभी ईवीएम, कभी कोर्ट, कभी संसद… भारतीय विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का शायद ही कोई अंग बचा हो, जिसको लेकर कॉन्ग्रेस नेता ने दुष्प्रचार न किया हो।

कुछ भी अनाप-शनाप बोल देने का यह ‘साहस’ राहुल गाँधी को वही व्यवस्था देती है, जिसे वे सत्ता में आने पर देख लेने की धमकी देते हैं। यही व्यवस्था उन्हें एहसास कराती है कि वे हर हाल में सुरक्षित रहेंगे। उन्हें उनके अपराधों का दंड नहीं मिलेगा। यदि एक बार यही व्यवस्था दंड की नई मिसाल कायम कर दे तो राहुल गाँधी का यह ‘साहस’ स्वत: स्खलित हो जाएगा। ऐसा होना ही भारतीय लोकतंत्र के हित में भी है।

फटकार के बाद भी जारी राहुल का प्रलाप

2014 में मोदी के उदय के बाद राहुल गाँधी ने जिन संस्थाओं को निशाना बनाया उसमें संसद भी है। वहीं, बाद से ही वो उन सभी संस्थाओं को निशाना बनाते रहें जिनके कारण भारत का लोकतंत्र मजबूत है, ऐसा संस्थाएं जिनमें लोगों की आस्था है। जिस संसद को लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है लेकिन राहुल गाँधी ने संसद पर भी लगातार सवाल खड़े किए हैं। जिस लोकसभा में उन्होंने लंबे-लंबे भाषण दिए, उसी में उन्हें ना बोलने देने के फर्जी दावे किए हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी उनके आरोपों से अछूता नहीं रहा है। राफेल डील पर कोर्ट के एक फैसले को उन्होंने अपने मन से ही सरकार का भ्रष्टाचार मानते हुए ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया था। बाद में उन्हें सुप्रीम कोर्ट में इसके लिए माफी माँगनी पड़ी।

राहुल गाँधी ने RSS और सावरकर को लेकर भी बेतुके बयान दिए हैं। राहुल गाँधी ने RSS की तुलना आतंकी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से की है, RSS को कौरव बताया है और तमाम तरह के फर्जी आरोप लगाए हैं। स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर का अपमान करने में राहुल गाँधी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। साफ है कि राहुल गाँधी को सावरकर के हिंदुत्व से घृणा की हद तक चिढ़ है। सावरकर के खिलाफ बयान देने को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट राहुल गाँधी को फटकार लगा चुका है। RSS को गाँधी हत्या में शामिल होने का आरोप लगाने को लेकर भी राहुल गाँधी को कोर्ट से फटकार पड़ चुकी है।

राहुल गाँधी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कहा था कि सभी चोरों का उपनाम (सरनेम) मोदी क्यों है? राहुल के इस बयान के बाद स्थानीय अदालत ने उन्हें 2 वर्षों की सजा दी और उनकी इसे लेकर सांसदी तक चली गई थी।

इन संस्थाओं के अलावा राहुल गाँधी सेना पर भी अनर्गल टिप्पणियाँ कर चुके हैं। कुछ ही दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी पर सेना का अपमान करने को लेकर तल्ख टिप्पणी की थी। कोर्ट ने यहाँ तक कहा था कि अगर राहुल गाँधी सच्चे भारतीय होते तो इस तरह की टिप्पणी ना करते। राहुल गाँधी ‘सेना की पिटाई’ जैसे बयान दे चुके हैं और पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक पर भी उनके सहयोगियों ने सवाल उठाए हैं।

कॉन्ग्रेस के ‘उपकृत’ चुनाव आयुक्तों पर तो BJP ने नहीं उठाए सवाल

आज राहुल गाँधी चुनाव आयोग पर खुला हमला बोलते हैं और उसे ‘बीजेपी का औजार’ बताते हैं क्योंकि लगातार तीसरी बार नरेंद्र मोदी को सत्ता सौंपी है। कई राज्यों में बीजेपी की सरकार है।

लेकिन लंबे समय तक केंद्र और राज्य में कॉन्ग्रेस की सत्ता रही है। उसके बाद किसी भी दल ने चुनाव आयोग पर आरोप नहीं लगाए थे जबकि ऐसे चुनाव आयुक्त हुए हैं जिनके गाँधी परिवार से सीधे संबंध मिलते हैं।

मसलन, टीएन शेषन। उन्हें कई चुनाव सुधारों का श्रेय दिया जाता है। उनके मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले देश के आम लोगों को यह पता भी नहीं था कि चुनाव आयोग नाम की कोई संस्था होती है।

दिलचस्प तथ्य यह है कि चुनाव आयुक्त बनने से पहले शेषन राजीव गाँधी की सरकार में पहले उनके करीबी सुरक्षा सचिव रहे और कैबिनेट सचिव भी बनाए गए। और जब वे रिटायर हो गए तो कॉन्ग्रेस ने उन्हें बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ गुजरात की गाँधीनगर सीट से 1999 के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया था।

शेषन ऐसे इकलौते नहीं है, एम.एस. गिल का नाम भी गौर करने लायक है। गिल भी मुख्य चुनाव आयुक्त रहे और इस पद रिटायर होने के बाद कॉन्ग्रेस ने गिल को राज्यसभा में भेजा और बाद में केंद्रीय मंत्री भी बनाया। गिल का यह राजनीतिक सफर कॉन्ग्रेस की कृपा से ही संभव हुआ लेकिन तब भाजपा ने कभी आरोप नहीं लगाए कि गिल ने चुनाव आयोग में रहते हुए कॉन्ग्रेस के लिए काम किया था।

नवीन चावला की नियुक्ति भी विवादों से घिरी रही। 1975-77 के आपातकाल के दौरान नवीन चावला दिल्ली के उपराज्यपाल किशन चंद के सचिव थे। जस्टिस शाह कमीशन ने उनके विषय में कहा था कि चावला ने आपातकाल के दौरान अपार शक्तियों का प्रयोग किया क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री आवास तक उनकी आसान पहुँच थी। शाह कमीशन ने यहाँ तक कहा कि उन्हें कोई पद न दिए जाए लेकिन इसके बावजूद वे कॉन्ग्रेस के राज में मुख्य चुनाव आयुक्त तक बने।

कॉन्ग्रेस ने उनकी नजदीकियों को लेकर चुनाव आयुक्त के तौर पर लगातार उन्हें हटाने की माँग की जाती रही थी। खुद मुख्य चुनाव आयुक्त ने उन्हें हटाने की सिफारिश की थी। चावला के कार्यकाल में कई फैसले विपक्ष के खिलाफ होंगे लेकिन भाजपा ने चुनाव हारने के बाद भी चुनाव आयोग को कठघरे में नहीं खड़ा किया था।

चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर निराधार हमला असल में उसी संस्था पर हमला है जिसकी निगरानी में नेता संसद तक पहुँचते हैं। आज बेशक राहुल गाँधी सवाल उठाएँ लेकिन कॉन्ग्रेस के राज में संस्थाओं की स्थिति कैसी थी यह सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी से भी जिसमें शीर्ष अदालत ने सीबीआई को ‘पिंजड़े में बंद तोता’ तक बता दिया था।

मोदी विरोध बन गया है ‘मनोविकार’

नरेंद्र मोदी से पहले भी कई लोग देश के प्रधानमंत्री बने हैं। मोदी के बाद भी देश कई प्रधानमंत्री देखेगा। देश ने विपक्ष के भी कई नेता देखे हैं और भविष्य में भी देखेगा। पर मोदी घृणा में राहुल गाँधी जिस तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं को निशाना बना रहे हैं वैसा कोई ‘मनोविकारी’ ही कर सकता है।

यह मनोविकार ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ जैसी कॉन्ग्रेसी मानसिकता से ही पैदा होता है। इसके कारण आप ना लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए नेताओं और न ही लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बर्दाश्त कर पाते हैं। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी का हाल ही में यह कहना- ‘कौन सच्चा भारतीय है, कौन नहीं, यह न्यायपालिका तय नहीं करेगी’ भी इस तरह के मनोविकार से उपजता है।

‘शिशुपाल’ की कितनी गलतियाँ बची हैं?

अब सवाल उठता है कि इस मनोविकार का उपचार क्या है? सत्ताधारी दल होने के कारण यह केवल बीजेपी की जिम्मेदारी नहीं है कि वह ऐसे हर हमलों को जवाब दे। यह उन संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है जिनसे लोकतंत्र मजबूत होता है। यह हर एक उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जिसकी सहभागिता से लोकतंत्र का निर्माण होता है और जिसके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था कार्य करती है।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह राहुल गाँधी के ऐसे बेतुके हमलों पर स्वत: संज्ञान ले। चुनाव आयोग को कॉन्ग्रेस नेता को अदालत में घसीटना चाहिए। केवल सोशल मीडिया या पत्रों के जरिए उनसे सबूत माँगने की औपचारिकता तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। ऐसा हर उस संस्था को करना चाहिए जिस पर बेबुनियाद आरोप लगाकर राहुल गाँधी भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करना चाहते हैं। अराजकता पैदा करना चाहते हैं।

उनके लिए दंड का ऐसा विधान सुनिश्चित करना चाहिए जिससे कल को कोई फिर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास ना कर सके। या फिर इन्हें बताना चाहिए कि वे द्वापर के श्रीकृष्ण की तरह राजनीति के इस ‘शिशुपाल’ के 100 अपराध पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। साथ ही, यह बताना चाहिए कि इस ‘शिशुपाल’ के अपराधों की गिनती कहाँ तक पहुँची है।

इससे आम जनता को यह जानने में सहूलियत रहेगी कि राजनीति के इस ‘शिशुपाल’ को दंड देने का समय कब आएगा। वह इस बात की निगरानी करेगी कि गिनती पूरी होने के बाद यह ‘शिशुपाल’ दंड के विधान से बच ना सके।

SC ने हाईकोर्ट जज के खिलाफ आदेश लिया वापस, 2 पैराग्राफ भी किए डिलीट: जस्टिस प्रशांत के फैसले को गलत माना, वापस इलाहाबाद HC को सौंपी सुनवाई; जानिए – पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अपने ही एक आदेश को वापस ले लिया। ये आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार के खिलाफ था। पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जस्टिस प्रशांत कुमार को रिटायरमेंट तक आपराधिक मामलों की सुनवाई से हटा दिया जाए और उन्हें किसी सीनियर जज के साथ बैठकर काम करना होगा। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया है।

पूरा मामला क्या था?

ये बात शुरू होती है मेसर्स शिखर केमिकल्स नाम की कंपनी से, जिसने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। कंपनी का कहना था कि उनका एक आर्थिक विवाद है, जो दीवानी (सिविल) मामला है, लेकिन इसके बावजूद उनके खिलाफ आपराधिक केस चल रहा है। कंपनी चाहती थी कि ये आपराधिक केस रद्द हो।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार ने 5 मई 2025 को इस याचिका को खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि अगर कोई दीवानी रास्ता (सिविल केस) उपलब्ध है, तो भी आपराधिक केस चल सकता है, क्योंकि सिविल केस में समय लगता है और शिकायतकर्ता को तुरंत राहत चाहिए।

इस फैसले से कंपनी खुश नहीं थी। उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 4 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को गलत बताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस प्रशांत का फैसला ‘विकृत’ और ‘गैरकानूनी’ है।

यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस प्रशांत के खिलाफ सख्त टिप्पणी की और आदेश दिया कि उन्हें आपराधिक मामलों से हटाकर किसी सीनियर जज के साथ डिवीजन बेंच में काम करना होगा।

फिर क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश जैसे ही आया, इलाहाबाद हाईकोर्ट में हंगामा मच गया। हाईकोर्ट के 13 जजों ने इस आदेश के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली को पत्र लिखकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश गलत है और इसे लागू नहीं करना चाहिए।

जजों का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने बिना जस्टिस प्रशांत को नोटिस दिए या उनका पक्ष सुने ये टिप्पणियाँ की, जो ठीक नहीं है। इन जजों ने फुल कोर्ट मीटिंग बुलाने की माँग की, ताकि इस आदेश के खिलाफ प्रस्ताव पास किया जाए। ये पत्र सोशल मीडिया पर भी वायरल हो गया, हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।

उधर, भारत के चीफ जस्टिस (CJI) बी.आर. गवई ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की बेंच को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि जस्टिस प्रशांत के खिलाफ दिए गए आदेश पर दोबारा विचार किया जाए। CJI के इस अनुरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को फिर से सुनवाई के लिए लिस्ट किया।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश क्यों वापस लिया?

8 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने नया फैसला सुनाया। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि उनका मकसद जस्टिस प्रशांत को शर्मिंदा करना या उनकी बेइज्जती करना नहीं था। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का काम न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखना है। अगर कोई फैसला गलत है और वो जनता के भरोसे को कम करता है, तो सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ता है।

लेकिन इस बार CJI के पत्र और हाईकोर्ट जजों की आपत्ति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने 4 अगस्त के आदेश के दो पैराग्राफ (25 और 26) हटा दिए। इन पैराग्राफ में जस्टिस प्रशांत को आपराधिक मामलों से हटाने और सीनियर जज के साथ बैठने का आदेश था।

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी साफ किया कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ही तय करते हैं कि कौन सा जज कौन से केस सुनेगा। सुप्रीम कोर्ट ने ये मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के हवाले कर दिया कि वो जस्टिस प्रशांत के केस की सुनवाई को लेकर फैसला लें। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ये माना कि हाईकोर्ट का 5 मई का फैसला गलत था, लेकिन अब वो इसकी नई सुनवाई के लिए हाईकोर्ट को भेज रहे हैं।

इस मामले से क्या समझ आता है?

ये पूरा मामला दिखाता है कि न्यायपालिका में एक-दूसरे की गरिमा और स्वायत्तता कितनी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले जस्टिस प्रशांत के फैसले को गलत माना और सख्त टिप्पणी की, लेकिन जब हाईकोर्ट के जजों और CJI ने इस पर सवाल उठाए, तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को वापस ले लिया।

ये पूरा मामला दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट भी अपनी गलतियों को सुधारने के लिए तैयार है। साथ ही ये भी साफ हुआ कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को अपने कोर्ट में जजों के कामकाज का पूरा अधिकार होता है और सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल नहीं देना चाहता।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने ये जरूर कहा कि जस्टिस प्रशांत का फैसला गलत था, क्योंकि दीवानी मामले को आपराधिक केस में बदलना ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ऐसे फैसले जनता का भरोसा कम कर सकते हैं। इसीलिए उन्होंने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेजा।