लखनऊ की स्पेशल SC/ST कोर्ट ने एक वकील परमानंद गुप्ता को झूठे मुकदमे दर्ज कराने के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई है। साथ ही ₹5.10 लाख का जुर्माना भी लगाया गया है। वकील ने एक जमीन विवाद में पड़ोसियों को फँसाने के लिए पत्नी के ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली महिला से झूठा रेप केस दर्ज करवाया। जाँच में सभी आरोप बेबुनियाद निकले।
क्या है पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वकील परमानंद गुप्ता ने एक जमीन विवाद में अपने पड़ोसी अरविंद यादव और उनके परिवार को फँसाने के लिए दलित महिला पूजा रावत से बलात्कार और उत्पीड़न का फर्जी केस दर्ज कराया। पूजा रावत वकील की पत्नी संगीता गुप्ता के ब्यूटी पार्लर में काम करती थी।
मुकदमे में आरोप लगाया गया कि मार्च से जुलाई 2024 के बीच उसके साथ दुराचार हुआ। वकील परमानंद गुप्ता का मकसद था कि इस आरोप के बाद उसके विरोधियों को जेल हो जाएगी और वह व्यक्तिगत बदला भी ले लेगा।
जाँच में कैसे खुला फर्जीवाड़ा?
सीबीआई जाँच अधिकारी ने पाया कि पूजा रावत घटना के समय 1 मार्च 2024 से 24 जुलाई 2024 तक मौके पर मौजूद नहीं थी। जहाँ उसे किरायेदार बताया गया था, वह मकान उस समय निर्माणाधीन था। मोबाइल लोकेशन, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेज़ों से साबित हुआ कि मामला पूरी तरह फर्जी है।
पूजा रावत ने कोर्ट में हलफनामा देकर बताया कि वकील परमानंद गुप्ता और उसकी पत्नी ने दबाव बनाकर झूठे बयान दिलवाए। वह डर के कारण मजिस्ट्रेट के सामने झूठा बयान देने को मजबूर हुई।
कोर्ट का फैसला: उम्रकैद और AI निगरानी का आदेश
स्पेशल जज विवेकानंद त्रिपाठी ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि दूध से भरे महासागर में खट्टे पदार्थों की बूंदों को गिरने से नहीं रोका गया तो पूरा महासागर खराब और नष्ट हो जाएगा।” जज ने यह भी कहा कि अगर ऐसे वकीलों को नहीं रोका गया तो भारतीय न्यायपालिका पर से जनता का विश्वास उठ जाएगा।
कोर्ट ने बताया कि परमानंद गुप्ता ने 11 और पूजा गुप्ता ने 18 फर्जी मुकदमे दर्ज करवाए, इसलिए दोषी वकील को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके अलावा कोर्ट ने झूठे मुकदमों को रोकने के लिए AI का उपयोग करने का निर्देश दिया है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएँ रोकी जा सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR दर्ज होते ही मुआवजे की राशि न दी जाए, बल्कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद ही दी जाए।
कोर्ट ने पूजा रावत को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। हालाँकि, अदालत ने उसे चेतावनी दी कि अगर वह भविष्य में ऐसा करती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।
भारत निर्वाचन आयोग ने राहुल गाँधी से अपने आरोपों के साथ औपचारिक शिकायत दर्ज कराने को कहा है, ताकि जाँच शुरू की जा सके। लेकिन विपक्ष के नेता ने अभी तक किसी भी प्राधिकारी के समक्ष कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई है। राहुल गाँधी के निराधार आरोपों के बाद ‘मकान नंबर 0’ को लेकर लोगों की जिज्ञासा बढ़ गई है।
लगभग दो हफ्ते पहले राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग ने भाजपा के साथ मिलीभगत करके, लाखों फर्जी मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल किए हैं। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कई लोगों के मतदाता पहचान पत्र में उनके घर के पते की जगह ‘0’ लिखा हुआ था। यानी ये फर्जी मतदाता थे, जिनके घर का पता नहीं था।
अपने आरोपों की पुष्टि के लिए राहुल गाँधी ने एक दस्तावेज भी दिखाया। उन्होंने दावा किया कि यह कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची है। इसमें मकान नंबर ‘0’ वाले कई मतदाता हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने रविवार (17 अगस्त 2025) को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राहुल गाँधी के दावों का खंडन किया। मकान संख्या ‘0’ को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि बेघर लोगों को ये नंबर दिया गया है। इनका पता स्पष्ट नहीं होता है।
चुनाव आयोग ‘मकान संख्या 0’ का इस्तेमाल इसलिए करता है ताकि वे मतदाता छूट न जाएँ, जिनके पास स्पष्ट रूप से घर का पता नहीं है या जिनका कोई घर नहीं है। ऐसे लोगों का चुनावी फॉर्म में पूरा पता दर्ज नहीं होता है। कई बार संयुक्त परिवार, साझा आवास या किराए के घरों में एक ही पते पर कई लोगों के नाम दर्ज होते हैं। ऐसे में एक ही पते पर कई मतदाताओं के नाम भी मिलते हैं।
2013 में शुरू मकान संख्या ‘0’
चुनाव आयोग ने मकान संख्या शून्य देने की शुरूआत 2013 में की थी। उस वक्त बेघर लोगों का मतदाता पहचान पत्र बनाने का काम शुरू हुआ। सबसे पहले दिल्ली में इसे लागू किया गया। पहली बार बेघर लोगों को मतदाता पहचान पत्र जारी किए गए।
एक ब्लॉक जिला अधिकारी (बीडीओ) ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि मतदाता बनने के लिए किसी बेघर व्यक्ति को फॉर्म 6 भरना पड़ता है। वह जिस घर में रहता है, उसका निवास प्रमाण पत्र और बर्थ सर्टिफिकेट देना होगा। फॉर्म जमा करने के बाद, बीएलओ सत्यापन के लिए दिए गए पते पर जाता है।
दिल्ली में मकान संख्या ‘0’ वाले बेघर मतदाता
द इंडियन एक्सप्रेस ने राष्ट्रीय राजधानी के कुछ मतदाताओं से बात की, जिनके मतदाता पहचान पत्र में उनके घर के पते की जगह ‘0’ लिखा है। पश्चिम बंगाल से आए 67 वर्षीय अपूर्व चटर्जी ने बताया कि वह शंकर गली सीता राम बाजार के एक घर में रहते हैं, लेकिन उनके मतदाता पहचान पत्र में उनके घर के पते में ‘0’ लिखा है। चटर्जी ने ये भी कहा, “मैंने 2024 के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ इस फरवरी में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी अपना वोट डाला था।”
रैन बसेरा बंगला साहिब आश्रय गृह में रहने वाले एक बेघर व्यक्ति ने भी मीडिया को बताया कि उसने घर के पते ‘0’ का इस्तेमाल करके एक बैंक खाता भी खोला है। वह पहले वसंत कुंज के शेल्टर होम में रहता था, जहाँ से यहाँ आया है। उसने बताया कि 2013 से चुनावों में उसने वोट डाला था, वोटर आईडी कार्ड में उसके घर का पता ‘0’ लिखा है।
एक और बेघर महिला, दर्शना ने राष्ट्रीय राजधानी के एक शेल्टर होम में रहते हुए अपना मतदाता पहचान पत्र बनवाया। दर्शना के पास आधार कार्ड नहीं है। वह कई साल पहले पंजाब से दिल्ली आई थी जब उसका परिवार उसे छोड़कर चला गया था। वह अब एक दुकान में काम करती है। उसका कहना है कि पिछले दो लोकसभा चुनावों में उसने वोट डाला था।
राहुल की संसदीय सीट में मकान संख्या ‘0’ वाले मतदाता
‘0’ मकान संख्या वाले मतदाता सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मौजूद हैं। इनमें उत्तर प्रदेश का रायबरेली लोकसभा क्षेत्र भी शामिल है। गाँधी परिवार का गढ़ रहे रायबरेली निर्वाचन क्षेत्र में कई मतदाता ऐसे हैं, जो मकान संख्या ‘0’ वाले हैं। कई मतदाताओं का पता भी एक ही है। क्या इसका मतलब यह है कि राहुल गाँधी ने फर्जी मतदाताओं का इस्तेमाल करके अपनी सीट जीती है?
कर्नाटक में मकान संख्या ‘0’ वाले मतदाता
करीब एक हफ्ते पहले, कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र में मकान संख्या ‘0’ वाले कई मतदाताओं के वीडियो सामने आए थे। इसमें कई लोगों ने अपना मतदाता पहचान पत्र दिखाया। इनमें उनके घर का पता ‘0’ लिखा हुआ था। इनमें से कुछ मतदाता 10-15 सालों से इस इलाके में रह रहे थे। उन्होंने बताया कि उनके घरों पर नंबर नहीं थे। चुनाव अधिकारियों ने उनके मतदाता पहचान पत्र में मकान संख्या की जगह ‘0’ लिख दिया। उनके चुनावी फोटो पहचान पत्र (EPIC) में भी पते की जगह मकान संख्या 0 लिखा था।
गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने अपने आरोपों के सबूत देने के लिए राहुल गाँधी को एक हफ्ते की मोहलत दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अपनी प्रेस वार्ता में आरोप को लेकर सबूत माँगे थे। सवाल यह है कि धोखाधड़ी का चुनाव आयोग पर आरोप लगा कर हंगाम खड़ा करने वाले राहुल गाँधी आरोपों की जाँच क्यों नहीं कराना चाहते।
(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी में बनी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
‘वोट चोरी’ के नाम पर राहुल गाँधी के सुर में सुर मिलाते हुए अब अखिलेश यादव भी राग अलापने लगे हैं। सपा सुप्रीमो ने उत्तर प्रदेश के कई जिलों जैसे- लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी और जौनपुर की ओर उंगली उठाते हुए आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट से लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने फिर इन दावों को खारिज कर पोल खोल दी। जाँच में सारे आरोप झूठे निकले। इतना ही नहीं, इन जिलों के DM ने अखिलेश यादव के पोस्ट पर खुद फैक्ट चेक करते हुए जवाब भी दिया है।
अखिलेश यादव का आरोप
अखिलेश यादव ने 17 अगस्त 2025 को X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर बताया कि यूपी के कई विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, जो वोट चोरी का एक तरीका है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने इस संबंध में चुनाव आयोग को कई सबूत दिए हैं, लेकिन आयोग इन्हें नजरअंदाज कर रहा है। इसके अलावा अखिलेश यादव ने 4 तस्वीरें भी पोस्ट में शेयर की, जो लखनऊ, कासगंज, बाराबंकी, जौनपुर की है।
जो चुनाव आयोग ये कह रहा है कि हमें यूपी में समाजवादी पार्टी द्वारा दिये गये ऐफ़िडेविट नहीं मिले हैं, वो हमारे शपथपत्रों की प्राप्ति के प्रमाण स्वरूप दी गयी अपने कार्यालय की पावती को देख ले। इस बार हम मांग करते हैं कि चुनाव आयोग शपथपत्र दे कि ये जो डिजिटल रसीद हमको भेजी गयी है वो… pic.twitter.com/9A4njvF9Tw
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि लखनऊ के बक्शी का तालाब में 13 मतदाताओं के नाम हटाए गए। कासगंज के अमांपुर में 8 मतदाताओं के नाम हटाए गए। बाराबंकी के कुर्सी में 2 मतदाताओं के नाम हटाए गए। जौनपुर में 5 मतदाताओं के नाम हटाए गए। अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग द्वारा दी गई डिजिटल रसीद अगर गलत साबित होती है तो ‘डिजिटल इंडिया’ की विश्वसनीयता भी खतरे में है।
लखनऊ DM का फैक्ट चेक
अखिलेश का दावा था कि लखनऊ के ‘बक्शी का तालाब’ क्षेत्र में 13 मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए। लखनऊ DM ने जब जाँच की तो पता चला कि सिर्फ एक मतदाता का नाम 2012 में हटाया गया था। इसका कारण यह था कि वह व्यक्ति उस क्षेत्र में नहीं रहता था। बाकी सभी 12 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद हैं।
लखनऊ जिले के विधान सभा क्षेत्र 169-बक्शी का तालाब के 13 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से गलत ढंग से काट दिये जाने के संबंध में शिकायत प्राप्त हुयी थी। जांच में पाया गया कि एक मतदाता का नाम अपने क्षेत्र में निवासरत न रहने के कारण वर्ष 2012 में नियमानुसार विलोपित किया गया था। (1/2) https://t.co/14Y4E6S22r
अखिलेश यादव ने दावा किया कि कासगंज के अमांपुर क्षेत्र से 8 मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए थे। काजगंज DM ने जब इसकी जाँच की तो पाया कि 7 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दो बार लिखे हुए थे। नियमानुसार एक नाम को विलोपित (हटा दिया गया) किया गया। एक मतदाता का नाम अभी भी मतदाता सूची में है।
ईमेल के माध्यम से जनपद कासगंज की विधान सभा 101 अमांपुर के अंतर्गत 8 मतदाताओं के नाम गलत ढंग से काटने की शिकायत प्राप्त हुयी थी।जांच में पाया गया कि 7 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दो बार होने के कारण नियमानुसार एक नाम को विलोपित किया गया था। (1/2) https://t.co/icgH4iyy00
अखिलेश यादव ने दावा किया कि बाराबंकी के 266 कुर्सी क्षेत्र में 2 मतदाताओं ने शपथ पत्र दिया था कि उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। लेकिन जब बाराबंकी DM ने जाँच की तो पाया कि दोनों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं। किसी का भी नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया गया है।
बाराबंकी जिले के विधान सभा क्षेत्र 266-कुर्सी के 2 मतदाताओं के शपथ पत्र उनके नाम मतदाता सूची से गलत ढंग से काट दिये जाने के संबंध में प्राप्त हुए। जांच में पाया गया कि उपर्युक्त दोनों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं। https://t.co/Qk2axJ5UEe
अखिलेश यादव ने दावा किया कि जौनपुर में पाँच मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। जौनपुर DM ने जब की तो पाया कि ये सभी पाँचों मतदाता 2022 से पहले ही मर चुके थे। इसकी पुष्टि उनके परिवार के सदस्यों और स्थानीय लोगों ने भी की थी। इसलिए इन पाँचों मतदाताओं के नाम नियमानुसार हटाए गए थे।
ईमेल के माध्यम से जनपद जौनपुर की विधान सभा 366 जौनपुर के अंतर्गत पांच मतदाताओं के नाम गलत ढंग से काटने की शिकायत प्राप्त हुयी थी। वर्णित सभी पांचों मतदाता वर्ष 2022 के पूर्व ही मृतक हो चुके थे। इसकी पुष्टि सम्बंधित मृतक मतदाता के परिवार के सदस्यों, स्थानीय लोगों सहित स्थानीय… https://t.co/waiNov1BJ9
आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह से नियमानुसार और पारदर्शी है। जिन मामलों में नाम हटाए गए, वे या तो दोहरे नामांकन के कारण थे या फिर मतदाता की मृत्यु हो गई थी। इस तरह के झूठे आरोप लगाकर अखिलेश यादव न केवल एक संवैधानिक संस्था पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि जनता को भी गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।
लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने संविधान संशोधन से जुड़े 3 विधेयक पेश किए। बुधवार (20 अगस्त 2025) को सदन में पेश करते समय विपक्ष ने जमकर हंगामा किया। इन विधेयकों में प्रावधान है कि आपराधिक मामलों में जेल गए पीएम, सीएम या मंत्री अपने पद पर बने नहीं रह सकेंगे।
ये विधेयक हैं-
संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025
संघ राज्य क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक 2025
जम्मू कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025
VIDEO | Parliament Monsoon Session: Opposition MPs tear copies of three bills introduced by Union Home Minister Amit Shah and throw paper bits towards him in Lok Sabha. Speaker Om Birla adjourns the House amid uproar. #ParliamentMonsoonSession#MonsoonSession
संविधान संशोधन विधेयक 2025 के तहत अनुच्छेद 75, 164 और 230ए में संशोधन कर प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री या अन्य मंत्री को हटाने का प्रावधान किया जा रहा है।
विधेयक में कहा गया है, ” कोई भी मंत्री जो गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किया जाता है या 30 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है, जिसमें 5 साल या उससे अधिक जेल हो सकती है, तो प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकते हैं। अगर उसे हटाया नहीं जाता है तो वह 31वें दिन से पदमुक्त माना जाएगा।”
इसी तरह प्रधानमंत्री भी आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किए जाते हैं या 30 दिनों तक हिरासत में रहते हैं, जिसमें कम से कम 5 साल जेल की सजा हो सकती है, तो उन्हें भी पद से हटना होगा। अगर नहीं हटते हैं तो 31वें दिन उन्हें पदमुक्त समझा जाएगा।
संघ राज्य क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक 2025
केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार अधिनियम, 1963 (1963 का 20) के तहत गंभीर आपराधिक आरोपों के कारण गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए मुख्यमंत्री या मंत्री को हटाने का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार (संशोधन) विधेयक 2025 लाया गया है। इसमें केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार अधिनियम, 1963 की धारा 45 में संशोधन किया जाएगा।
ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री या दूसरे मंत्री को हटाने के लिए कानूनी प्रावधान किया जा रहा है। इसमें कहा गया है कि ऐसे आपराधिक मामले, जिसमें 5 साल या उससे अधिक जेल हो सकती है, उसके तहत गिरफ्तार मंत्री को उसके पद से हटाया जा सकता है या 31वें दिन वह खुद ही पदमुक्त माना जाएगा।
जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक में जुड़ेगा खंड
जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 में मुख्यमंत्री या अन्य मंत्रियों को गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी और 30 दिन तक हिरासत में रहने पर पदमुक्त हो जाने का प्रावधान है। इससे पहले जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। इसलिए इसकी धारा 54 में संशोधन कर 4ए जोड़ा जा रहा है।
इसमें बताया गया है कि 30 दिन हिरासत में रहने पर 31वें दिन मुख्यमंत्री की सलाह पर उपराज्यपाल आरोपित मंत्री को पद से हटा देंगे। अगर मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर रहे हैं तो अगले दिन वह खुद ही पदमुक्त हो जाएगा।
विधेयक का मकसद जनता में विश्वास पैदा करना है ताकि संवैधानिक तौर पर नैतिकता की रक्षा की जा सके। इसमें कहा गया है कि जनता अपना प्रतिनिधि विश्वास के साथ चुनती है। लोगों की आशाओं पर खड़े उतरना इनका कर्तव्य है। इसमें ये भी कहा गया है कि मंत्रियों का आचरण किसी भी संदेह से परे होना चाहिए।
दिल्ली के सीएम ने जेल से चलाई सरकार
दिल्ली में शराब घोटाले को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को ईडी ने 21 मार्च 2024 को गिरफ्तार किया था। केजरीवाल जेल गए थे, लेकिन उन्होने पद से इस्तीफा नहीं दिया। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने सीएम पद छोड़ा। दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया का भी रहा। उन्हें शराब घोटाले को लेकर गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में वे जेल गए थे। जनता की अदालत में वे भी हार गए। दिल्ली के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सत्येन्द्र जैन को 2022 में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया गया। वो जेल गए लेकिन पद से इस्तीफा काफी दिनों बाद दिया।
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी इस समय बिहार के नवादा में ‘वोट अधिकार यात्रा’ पर निकले हुए है। रैली के दौरान राहुल गाँधी की गाड़ी पर एक शख्स सवार होता है और चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर कहता है कि ‘वोट चोरी’ हुई है और उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है।
आश्चर्य नहीं कि चुनाव आयोग की फैक्ट चेक में यह दावा पूरी तरह झूठा निकला। चुनाव आयोग ने बताया कि सुबोध कुमार नाम का यह शख्य कोई आम मतदाता नहीं है, बल्कि ये राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का बूथ लेवल एजेंट (BLA) हैं और उसका नाम कभी भी वोटर लिस्ट में था ही नहीं।
चुनाव आयोग पर राहुल गाँधी का ‘नकली ड्रामा’
राहुल गाँधी को तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं। वो हर चुनाव से पहले बच्चों जैसी जिद पर अड़े रहते हैं कि ‘वोट चोरी हो गई’ और हर बार चुनाव आयोग फैक्ट चेक कर उनके झूठ को उजागर करता है, फिर भी वो वही रट लगाते रहते हैं।
दरअसल, अपनी ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ के दौरान नवादा में एक शख्स को मंच पर माइक थमाकर राहुल गाँधी ने कहा, “इनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है, यही लाखों लोगों के साथ हो रहा है।” यह शख्स सुबोध कुमार था, जिसने राहुल गाँधी के रथ पर चढ़ते ही कैमरे के सामने आरोप जड़ा कि उसका नाम वोटर लिस्ट से गायब है।
राहुल गाँधी ने इस पूरे वाकये को रैली से लाइव दिखाया और फिर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैलाया। X (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा, “जो सुबोध कुमार जी के साथ हुआ, वही लाखों लोगों के साथ बिहार में हो रहा है। वोट चोरी भारत माता पर आक्रमण है– बिहार की जनता ये होने नहीं देगी।”
जो सुबोध कुमार जी के साथ हुआ, वही लाखों लोगों के साथ बिहार में हो रहा है।
सुबोध कुमार नाम के व्यक्ति को मंच पर बुलाना, माइक थमाना और कैमरे के सामने आरोप लगवाना… यह सब पहले से स्क्रिप्टेड था। राहुल गाँधी ने इसे ‘भारत माता पर हमला‘ बताया। लेकिन असल हमला जनता की समझदारी पर किया गया छल था। रंजू देवी के झूठ के बाद अब सुबोध कुमार पर राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ की कहानी हर बार फेल होती है।
फैक्ट चेक: चुनाव आयोग ने आरोपों को किया तार-तार
चुनाव आयोग की विस्तृत जाँच रिपोर्ट के अनुसार, सुबोध कुमार नाम का व्यक्ति कोई आम मतदाता नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का बूथ लेवल एजेंट है। 29 अक्तूबर 2024 को प्रकाशित सूची और फिर 2025 के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में भी सुबोध कुमार का नाम कभी भी मतदाता सूची में नहीं था। उसके परिवार के कुछ सदस्य सूची में शामिल है, लेकिन खुद उसका नाम कभी दर्ज नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर प्रकाशित विलोपित मतदाताओं की सूची में भी उसका नाम दर्ज नहीं है।
#Factcheck *श्री राहुल गांधी द्वारा वीडियो में दिखाए गए श्री सुबोध कुमार द्वारा लगाए गए निर्वाचक सूची में नाम न होने के आरोपों का जांच प्रतिवेदन*
वारिसलीगंज विधानसभा क्षेत्र (239) के निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी-सह-भूमि सुधार उपसमाहर्त्ता, नवादा सदर ने बताया कि दिनांक 19.08.2025… https://t.co/yDgp1eerPr
— Chief Electoral Officer, Bihar (@CEOBihar) August 19, 2025
चुनाव आयोग बताता है कि सुबोध कुमार ने ना तो फॉर्म-6 भरा और ना ही किसी प्रकार का घोषणा पत्र (Annexure-D) दिया। जब बीएलओ ने विलोपित मतदाताओं की सूची बूथ पर चिपकाई तब सुबोध वहीं मौजूद था, लेकिन उसने कोई आपत्ति नहीं दर्ज की। तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि वह स्वयं हस्ताक्षर कर चुका है, फिर भी मंच पर दावा किया कि उसका नाम हटा दिया गया। चुनाव आयोग ने कहा कि सुबोध कुमार ने जो आरोप लगाए, वो निराधार एवं असत्य है। यदि वे भविष्य में नियमानुसार फॉर्म-6 एवं घोषणा पत्र प्रस्तुत करेंगे तो उनका नाम जोड़ा जा सकता है।
बार-बार दोहराया गया झूठ
यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गाँधी ने इस तरह का निराधार आरोप लगाया है। इससे पहले, औरंगाबाद में उन्होंने रंजू देवी नाम की एक महिला का मामला उठाया था, यह दावा करते हुए कि उनका नाम भी वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। लेकिन बाद में रंजू देवी ने खुद एक वीडियो में बताया कि उनका नाम मतदाता सूची में मौजूद है और उन्हें गुमराह किया गया था।
राहुल गाँधी का बार-बार एक ही तरह के निराधार आरोप लगाना, एक बच्चे की तरह रट्टा लगाने जैसा लगता है, जो ‘फैक्ट चेक’ के बाद भी अपनी बात पर अड़े रहते हैं। यह न सिर्फ उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर भी गलत आरोप लगाने का प्रयास करता है।
राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ वाले प्रोपेगेंडा की पोल खोलने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अब कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम टारगेट कर रहा है। यहाँ तक की उनके परिवार को भी सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है। ज्ञानेश कुमार की दोनों बेटी मेधा रूपम और अभिश्री को भी इसका हिस्सा बनाया गया।
सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने ज्ञानेश कुमार के परिवार को बीजेपी का परिवार करार दिया। कॉन्ग्रेसियों ने सोशल मीडिया पर एक क्रम से ज्ञानेश कुमार के परिवार पर पोस्ट डालने चालू किए। हर पोस्ट में ज्ञानेश कुमार के परिवार का डाटा निकालकर ट्रोल किया गया।
पोस्ट में बताया गया कि ज्ञानेश कुमार की पहली बेटी मेधा रूपम, जो नोएडा की डीएम हैं और उनके पति मनीष बंसल सहारनपुर के डीएम हैं। इसके बाद दूसरी बेटी अभिश्री श्रीनगर IRS की डिप्टी डायरेक्टर हैं और उनके पति अखय लाब्रू श्रीनगर के डीएम हैं।
अब ज्ञानेश कुमार की बेटी और उनके पति को प्रशासन में उच्च पद हासिल करने को लेकर सवाल उठाए गए। कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने इसे बीजेपी से जोड़ दिया। इनमें कॉन्ग्रेस के सोशल मीडिया स्टार और कॉन्ग्रेस की चापलूसी करने वाले कई वामपंथी लोग शामिल हैं।
मुंबई कॉन्ग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के परिवार को टारगेट किया। उन्होंने भी ज्ञानेश कुमार, उनकी बेटी और दामाद के प्रशासनिक पद हासिल करने पर सवाल उठाते हुए ज्ञानेश के परिवार को ‘बीजेपी का परिवार’ करार दिया।
भारतीय युवा कॉन्ग्रेस (IYC) के सोशल मीडिया की स्टार मिनी नागरारे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के परिवार को टारगेट किया।
इसी क्रम में आगे ज्ञानेश कुमार को ‘बीजेपी का परिवार’ बताते हुए कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने पोस्ट किए।
ये वही लोग हैं जो ऑपरेशन सिंदूर की मीडिया ब्रीफिंग करने वाले विदेश सचिव विक्रम मिस्री की बेटी के ट्रोल होने पर दक्षिणपंथी को जिम्मेदार ठहरा रहे थे। उस समय ट्रोलर्स को राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने फटकार भी लगाई थी।
ज्ञानेश कुमार और उनके परिवार पर ये हमला ऐसे समय में शुरु हुआ है, जब उन्होंने वोट चोरी के आरोपों पर राहुल गाँधी से 7 दिनों के भीतर हलफनामा देने या माफी माँगने के लिए कहा है। इसके बाद से वो लगातार कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम से जुड़े लोगों के निशाने पर आ चुके हैं।
धर्मांतरण और यौन शोषण के लिए कुख्यात छांगुर पीर गैंग का एक और मामला सामने आया है। कुशीनगर की एक पीड़िता ने विश्व हिंदू रक्षा परिषद के लखनऊ कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी आपबीती सुनाई। पीड़िता ने बताया कि समाजवादी पार्टी के नेताओं ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया, उसका धर्मांतरण कराया और फिर शारीरिक शोषण के बाद उसे छोड़ दिया।
नशीला पदार्थ, जूठा पान, निकाह और धर्मांतरण
जानकारी के अनुसार, पीड़िता ने बताया कि 2017 में जब वह हाई स्कूल की छात्रा थी, तब उसकी मुलाकात बबलू खान उर्फ रफी खान से हुई। बबलू उसे अपने घर ले गया और तीन दिन तक उसका रेप करता रहा।
बाद में उसने अपने दोस्त नौशाद उर्फ नाटा नवाब और आलमगीर अंसारी से मिलवाया, जो उसे छांगुर पीर के पास ले गए। पीड़िता ने बताया कि छांगुर ने उसे नशीला पदार्थ और जूठा पान खिलाकर नौशाद के साथ उसका निकाह करवाया और धर्मांतरण करा दिया।
आरोपितों की पहचान समाजवादी पार्टी के नेता के रूप में हुई है, जिनकी तस्वीरें सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ भी हैं। पीड़िता ने आरोप लगाया कि नौशाद उसे मुंबई ले गया, जहाँ वह एक साल तक रही और लगातार उसका शारीरिक शोषण किया गया।
गैंगरेप और ब्लैकमेलिंग का खुलासा
यह पहली बार नहीं है जब छांगुर पीर गैंग के जघन्य अपराधों का खुलासा हुआ है। इससे पहले बेंगलुरु और औरैया की पीड़ितों ने भी अपनी कहानियाँ सुनाई थीं। बेंगलुरु की पीड़िता ने बताया था कि सऊदी अरब में उसके साथ गैंगरेप हुआ और उसे ब्लैकमेल कर ₹10 लाख ऐंठे गए।
आरोपित राजू राठौर ऊर्फ वसीम ने इंस्टाग्राम पर दोस्ती की थी। औरैया की पीड़िता ने बताया कि शराब की लत छुड़ाने के बहाने उसके पिता को झाँसे में लिया गया और फिर आरोपित ने उससे शादी कर ली।
इन सभी मामलों में पीड़िताएँ बताती हैं कि अपराधियों को स्थानीय पुलिस का संरक्षण प्राप्त था, जिसके कारण उनकी शिकायत दर्ज नहीं हो सकी। विश्व हिंदू रक्षा परिषद के अध्यक्ष ने पुलिस पर बिना पैसे के मदद न करने का आरोप लगाया है। उन्होंने सरकार से माँग की है कि छांगुर पीर के गिरोह पर सख्त कार्रवाई की जाए, क्योंकि उसके गुर्गे अभी भी बाहर घूम रहे हैं और पीड़ितों के लिए खतरा बने हुए हैं।
बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान के भाई फैसल खान एक बार फिर चर्चा में है। उन्होंने एक लेटर लिखकर भाई आमिर और पूरे परिवार से नाता तोड़ लिया है। इसके बाद मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर परिवार पर बड़े आरोप लगाए हैं। फैसल ने दावा किया है कि उन पर अम्मी की बहन यानि उनकी खाला से निकाह करने का दबाव बनाया गया था।
फैसल खान ने कहा, “मेरा परिवार मुझ पर मेरी खाला से निकाह करने का दबाव डाल रहा था, जो मेरी अम्मी की चचेरी बहन हैं। मैं ऐसा कभी नहीं चाहता था। मैं अपने काम में लगा रहता था और उसमें कोई दिलचस्पी नहीं रखता था। इस वजह से घर में काफी बहस होती थी इसीलिए मैं उनसे दूर रहने लगा। यहाँ तक कि खाला से निकाह ना करने के लिए मेरी अम्मी भी मुझसे नाराज थी।”
फैसल खान ने यह भी दावा किया है कि आमिर खान का ब्रिटिश पत्रकार जेसिका हाइन्स से एक बेटा है। फैसल ने कहा, “आमिर का रीना के साथ रिश्ता टूट चुका था और वह जेसिका हाइन्स के साथ रिलेशनशिप में थे। जेसिका से उनको बिना निकाह के एक बेटा भी है। उस वक्त आमिर किरण राव के साथ लिव-इन में भी थे।”
कानूनी तौर पर परिवार से अलग होंगे फैसल खान
फैसल खान ने 18 अगस्त 2025 को मुंबई में एक प्रेस वार्ता की। फैसल ने बताया कि वह परिवार से कानूनी तौर पर अलग होने के लिए एक महीने के भीतर कोर्ट में याचिका दायर करने वाले हैं। इस मामले पर खुलकर बात करते हुए फैसल ने बताया कि 2005 से उनकी जिंदगी खराब हो गई है। फैसल ने आरोपों की झड़ी लगाते हुए आमिर खान और पूरे परिवार को लपेटे में लिया।
फैसल ने कहा, “पूरा परिवार मिलकर मेरे निकाह के पीछे पड़ा रहा। मेरी निकाह के अगले साल ही तलाक हो गया। इसके बाद निखत ने आमिर को भड़काया और दोनों मिलकर मुझे ड्रग्स देने लगे। मुझे टेस्ट कराने के बहाने क्लीनिक में कैद किया गया। पानी में ड्रग्स मिलाकर दिए जाते थे, जिससे मैं 20-20 घंटे सोने लगा।”
फैसल खान ने यह भी कहा, “2008 में बिग बॉस ने मुझे 4 लाख रुपए का साइनिंग अमाउंट ऑफर किया था लेकिन मुझे यकीन है कि आमिर को ये पता चल गया होगा और उन्होंने इसे ना होने देने की व्यवस्था की होगी। अब मैं कानूनी तरीके से परिवार से नाता तोड़ दूँगा। मैं इस मामले में एक महीने के भीतर एक याचिका दायर करूँगा। मैं मानहानि का मुकदमा नहीं करूँगा क्योंकि मुझे कुछ नहीं चाहिए।”
पहले भी भाई आमिर पर फैसल लगा चुके गंभीर आरोप
यह पहली बार नहीं है जब फैसल खान अपने भाई आमिर खान और परिवार के खिलाफ बोल रहे हैं। वे पिछले कुछ सालों में कई बार खुद पर आमिर द्वारा की गई प्रताड़ना के बारे में बात कर चुके हैं।
साल 2022 में बॉलीवुड हंगामा को दिए गए इंटरव्यू में फैसल खान ने कहा था कि उन्हें जबरन एक साल तक हाउस अरेस्ट में रखा गया और गलत-गलत दवाएँ खिलाई गईं। इसके अलावा फैसल ने करण जौहर का नाम लेते हुए फिल्म इंडस्ट्री में पक्षपात के बारे में भी बात की है।
फैसल ने यह भी कहा था कि उन्होंने इंडस्ट्री में पक्षपात व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। साथ ही फैसल ने आमिर के 50वें जन्मदिन पर करण जौहर द्वारा अपमानित किए जाने पर भी खुलकर बात की थी।
भारत में धर्मांतरण का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है, खासकर जब यह शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत जरूरतों के नाम पर गरीब और कमजोर समुदायों को निशाना बनाता है। बिहार के पटना के पास कन्नौजी गाँव में हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया, जहाँ एक कोचिंग सेंटर की आड़ में अवैध धर्मांतरण की गतिविधियाँ चल रही थीं।
कोचिंग सेंटर की आड़ में धर्मांतरण का जाल
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पटना से लगभग 15 किलोमीटर दूर कन्नौजी गाँव के वार्ड नंबर 5 में गोपालपुर पुलिस स्टेशन के अंतर्गत एक चौंकाने वाला धर्मांतरण रैकेट सामने आया। इस गाँव में यादव, मल्लाह, कुर्मी और SC समुदाय, जिसमें खास तौर पर मुसहर जाति के लोग रहते हैं, वो सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े हैं।
इस मामले की शुरुआत तब हुई जब नालंदा के राजगीर की रहने वाली सुषमा कुमारी ने दो-तीन साल पहले संजय कुमार के घर को किराए पर लिया। उसने खुद को एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पेश किया और धीरे-धीरे गाँव में अपनी पैठ बनाई।
सुषमा ने साल 2024 में किराए के ही मकान में हॉल जैसी व्यवस्था कर ली, जिसमें एक शेड और मंच था। उसने दावा किया कि यह गरीब बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा प्रदान करने वाला कोचिंग सेंटर है। इस दावे के आधार पर उसने पास के मुसहर समुदाय के बच्चों को आकर्षित करना शुरू किया। लेकिन इस कोचिंग सेंटर में शिक्षा के नाम पर जो गतिविधियाँ हो रही थीं, वे चौंकाने वाली थीं।
पटना धर्मांतरण रैकेट की मुख्य आरोपित सुषमा
सुषमा के सेंटर के पास रहने वाले अभिषेक कुमार ने बताया कि वहाँ नियमित रूप से ईसाई प्रार्थना होती थी। उसने कहा, “जब भी हम अपने घर में भोले बाबा की पूजा करते, सेंटर वाले अजीब-अजीब आवाज़ें निकालते और ‘हालेलुइया’ बोलते ताकि हमारी पूजा में खलल पड़े।” उसने ये भी कहा, “वो दावा करते थे कि वो बुरी आत्माओं को भगा सकते हैं।”
धर्मांतरण की रणनीति और निशाने पर गरीब
स्थानीय लोगों के बयानों से पता चला कि इस तथाकथित कोचिंग सेंटर में बच्चों को ईसाइयत की ओर आकर्षित करने के लिए व्यवस्थित तरीके से काम किया जा रहा था। कुछ प्रमुख गतिविधियाँ इस प्रकार हैं-
धार्मिक प्रचार और हिंदू परंपराओं का विरोध: बच्चों को ‘आमीन’ कहना सिखाया जाता था, जबकि ‘जय विश्वकर्मा’ या ‘जय श्री राम’ कहने पर उन्हें डाँटा जाता था। कुछ बच्चों ने बताया कि सुषमा और उनके सहयोगी उन्हें मारते थे अगर वे हिंदू देवी-देवताओं का नाम लेते।
हिंदू प्रथाओं का अपमान : बच्चों को सिखाया जाता था कि हनुमान और राम जैसे हिंदू देवता ‘झूठे और काल्पनिक’ हैं, जबकि ‘येशु’ उनके असली भगवान हैं। उनकी माताओं को बिंदी, सिंदूर और चूड़ियाँ पहनने से मना किया जाता था, जो हिंदू संस्कृति में महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।
लालच का जाल: सुषमा और उनके तीन सहयोगियों (रेखा कुमारी, सीता कुमारी और आशीष कुमार) द्वारा बच्चों और उनके परिवारों को प्रलोभन दिए जाते थे। इनमें मुफ्त शिक्षा, बीमारियों का इलाज और आर्थिक सहायता का वादा शामिल था। इसके अलावा वे ‘येसु के प्रति प्रेम’ दिखाने के लिए नाटकीय प्रदर्शन करते थे।
सामाजिक और आर्थिक कमजोरी का शोषण: अत्यंत गरीबी और अशिक्षा से जूझ रहा मुसहर समुदाय इस रैकेट का आसान निशाना बना। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी जरूरतों की आड़ में इन लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाया गया। यह एक ऐसी रणनीति थी जो भारत के कई हिस्सों में मिशनरी गतिविधियों में देखी गई है, जहाँ आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों को निशाना बनाया जाता है।
समुदाय का विरोध और पुलिस कार्रवाई
रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग एक साल तक यह रैकेट चुपके-चुपके चलता रहा, लेकिन मई 2024 में गाँव के एक युवा दीपक कुमार ने इस अवैध गतिविधि के खिलाफ आवाज उठाई। दीपक और विश्वास कुमार ने मिलकर स्थानीय लोगों को संगठित किया और गोपालपुर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की।
How a conversion racket entered a Bihar village in the guise of coaching center – a shocking field investigation by @RashtraJyoti
1. One Sushma Kumari rented a house in Musahar (SC) colony of Kannauji village near Patna. She used most of the open space to make a hall with a… pic.twitter.com/MhWz182Fbm
इस शिकायत के आधार पर 18 मई 2024 को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR नंबर 208/2025) दर्ज की गई। FIR में कहा गया कि सुषमा कुमारी और उनके सहयोगी लगभग दो साल से अवैध धार्मिक गतिविधियाँ चला रहे थे। जब गाँव वालों ने इसका विरोध किया, तो उन्हें झगड़ा, शारीरिक हमला और यहाँ तक कि जान से मारने की धमकी दी गई।
पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सुषमा कुमारी और उसके तीन सहयोगियों रेखा कुमारी, सीता कुमारी और आशीष कुमार को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए जानबूझकर किए गए कार्य) और धारा 302 (किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुँचाना) के तहत गिरफ्तार किया। पुलिस द्वारा तैयार की गई जब्ती सूची में बाइबल, इवेंजलिस्ट मैनुअल और ‘चुने हुए लोग’ (Chosen People) जैसी किताबें शामिल थीं।
हालाँकि, बिहार में अभी तक कोई विशेष ‘विरोधी-जबरन धर्मांतरण कानून’ नहीं है, जिसके कारण आरोपितों पर केवल धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की धाराओं के तहत कार्रवाई की गई। यह एक महत्वपूर्ण कमी है, क्योंकि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसे कानूनों ने धर्मांतरण के मामलों में सख्त कार्रवाई को संभव बनाया है।
फिलहाल, कोचिंग सेंटर अब बंद हो चुका है और गाँव वालों ने इस धर्मांतरण रैकेट को पूरी तरह से बाहर कर दिया है। हालाँकि, गोपालपुर पुलिस स्टेशन से संपर्क करने की कोशिशें नाकाम रहीं, क्योंकि पुलिस का संपर्क नंबर बंद या रेंज से बाहर था। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि गिरफ्तार आरोपितों को जमानत मिली है या नहीं।
स्थानीय लोगों ने बताया कि इस घटना ने गाँव में डर और तनाव का माहौल पैदा किया। कुछ महिलाओं ने भास्कर की टीम को बताया कि पिछले दो सालों से हर रविवार को सेंटर से अजीब आवाजें आती थीं, और जब भी उन्होंने वहाँ झाँकने की कोशिश की, तो पर्दे लटकाए जाते थे। यहाँ तक कि जिस जगह को पहले छठ पूजा की तैयारी के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वहाँ अब दूसरी प्रार्थनाएँ होने लगी थीं।
बिहार में इस तरह के अन्य मामले
यह बिहार में धर्मांतरण का पहला मामला नहीं है। छह महीने पहले, बक्सर में एक समान मामला सामने आया था, जहाँ दो पादरियों पर 50-60 हिंदू पुरुषों और महिलाओं को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने का आरोप लगा था। एक वीडियो में दिखाया गया कि पादरी महिलाओं को गंगा में डुबकी लगवाकर उनका सिंदूर मिटा रहे थे। पादरी ने दावा किया कि सभी प्रतिभागी स्वेच्छा से बाइबल पढ़ने के बाद शामिल हुए थे, लेकिन स्थानीय लोगों ने इसे जबरन धर्मांतरण करार दिया।
कन्नौजी गाँव का यह मामला भारत में अवैध धर्मांतरण की गहरी समस्या को उजागर करता है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी जरूरतों की आड़ में गरीब और कमजोर समुदायों को निशाना बनाना एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। स्थानीय लोगों की साहसी पहल ने इस रैकेट को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हालाँकि, इस मामले से यह भी स्पष्ट होता है कि बिहार जैसे राज्यों में मजबूत विरोधी-जबरन धर्मांतरण कानून की आवश्यकता है। साथ ही सामुदायिक जागरूकता और स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा देना जरूरी है ताकि इस तरह की गतिविधियों को समय रहते रोका जा सके। यह घटना न केवल धार्मिक संवेदनशीलता का मामला है, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता का भी सवाल उठाती है।
किश्तवाड़ में 14 अगस्त 2025 को आई भयानक त्रासदी के दौरान कई ऐसे लोग सामने आए, जिन्होंने अपनी जान पर खेल कर दूसरों की जान बचाई। एनडीआरएफ और दूसरी टीमों के काम में मदद की और मलबे के अंदर दबे लोगों को बाहर निकाला। ऐसा ही एक नाम है भीम सिंह ठाकुर का।
चशौती गाँव, गुलाबगढ़ और मचैल माता मंदिर का वह इलाका, जहाँ 14 अगस्त को अचानक बादल फटा और सब कुछ बह गया। घटना में अब तक 62 लोगों के मौत की पुष्टि हुई है। लेकिन जब घटना घटी तो स्थानीय लोगों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए लोगों को बचाने के लिए आगे आए।
भीम सिंह ठाकुर का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह एक 9 महीने की छोटी सी बच्ची के लिए फरिश्ता बन कर आए। मलबे से बचाकर बच्ची को गोद लिए वो बोल रहे हैं। गुड़िया उठो, उठो गुड़िया, थपथपाते हुए बच्ची को उठाने की जद्दोजहद करते वो दिख रहे हैं। बच्ची को सीपीआर दे रहे हैं ताकि उसकी साँसे चले। इधर-उधर दौड़ रहे हैं। पत्थरों के ढेर और टूटे-फूटे रास्ते वीडियो में दिखाई दे रहा है, जो वहाँ का मंजर बताने के लिए काफी है। ये वीडियो जब वायरल हुआ तो लोगों ने उनके बारे में जानने की कोशिश की।
न्यूज 18 की टीम भी उन तक पहुँची। उन्होंने अपने इंटरव्यू में बच्ची के बारे में बताते हुए कहा, ” बच्ची बेहोश हो गई थी। ऐसा लग रहा था कि उसकी साँसें थम गई हैं, लेकिन मैंने हार नहीं मानी। बच्ची को उठाया और उसे बचाने के लिए हरसंभव कोशिश करने लगा।” इस दौरान उन्हें लगा कि बच्ची को दूध की जरूरत है। उन्होंने आस-पास दिख रही महिलाओं से आग्रह किया कि कोई इसे दूध पिला दे। घटना को एक बार सुनाते हुए वह भावुक हो जाते हैं और ईश्वर से कामना करते हैं कि ऐसी घटना फिर कहीं न हो।
भीम सिंह ठाकुर का कहना है कि अफरा-तफरी के बीच वे लोगों को बचाने में जुटे हुए थे। मलबों के बीच कई लोग फँसे थे, जिनकी साँसे चल रही थी। उन्हें निकालने में मदद की। इस बीच ये बच्ची मिली। बच्ची जिंदा है या नहीं ये उन्हें नहीं पता था। बस किसी तरह बच्ची को दोबारा जिंदगी मिल जाए यही वह सोच रहे थे। उनका कहना है कि वह उस मंजर को जीवन में कभी नहीं भूल सकते।
Such heroes need to be celebrated! Journalist Bheem Singh ji saved an infant by giving CPR. One thing I’ve seen is that national media floods only for TRP, but it’s the local ecosystem at every level that genuinely stands strong in such tragedies.#Kishtwarpic.twitter.com/tk0K52Ik2N
पेशे से पत्रकार भीम सिंह ठाकुर की मेहनत और जज्बे को लोग सलाम कर रहे हैं। उनका वीडियो शेयर कर एक यूजर ने लिखा है कि ऐसे रियल हीरो की देश को जरूरत है। उन्होंने छोटी सी बच्ची को सीपीआर दिया, ताकि उसकी साँस चल सके। जब नेशनल मीडिया सिर्फ बाढ़ की खबर टीआरपी बढ़ाने के लिए करता है, वहाँ एक पत्रकार ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाया। वहीं एक यूजर ने कहा ऐसे वीरों का सम्मान जरूरी है! पत्रकार भीम सिंह जी ने सीपीआर देकर एक मासूम की जान बचाई। मैंने देखा है कि राष्ट्रीय मीडिया सिर्फ़ टीआरपी के लिए ही आगे आता है, लेकिन हर स्तर पर स्थानीय लोग ही ऐसी त्रासदियों में मजबूती से खड़े होते हैं।