केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ऑटो सेक्टर में आ रहे बदलाव पर बात करते हुए ‘पेट्रोलियम लॉबी’ की चर्चा की है। उन्होंने कहा कि एथेनॉल युक्त पेट्रोल के इस्तेमाल से गाड़ियों पर कोई असर नहीं पड़ता है। इससे माइलेज कम देने की बात पर नितिन गडकरी ने कहा, “ऐसी कोई चर्चा नहीं हो रही है। ये पेट्रोलियम लॉबी वाले पॉलिटिकली इसे मैनिपुलेट कर रहे हैं।”
क्या है एथेनॉल?
एथेनॉल एक ऐसा अल्कोहल है जो गन्ने और मक्के से मिलकर बनाया जाता है। इसे पेट्रोल में फ्यूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। ई 10, ई 20, ई 27 एथेनॉल पेट्रोल के कटेगरी हैं। ई 10 का मतलब है ऐसा पेट्रोल जिसमें 10 फीसदी एथेनॉल है, ई 20 का मतलब है ऐसा पेट्रोल जिसमें 20 फीसदी एथेनॉल है और ई 27 का मतलब है ऐसा पेट्रोल जिसमें 27 फीसदी एथेनॉल है।
E-20 एक बायोफ्यूल है इससे प्रदूषण कम फैलता है। इसलिए इसका इस्तेमाल ज्यादातर देशों में हो रहा है। भारत में तो अभी पेट्रोल में ही एथेनॉल मिलाया जा रहा है लेकिन कई देशों ने डीजल में भी एथेनॉल का इस्तेमाल शुरू कर दिया है क्योंकि ज्यादार बड़ी एसयूवी गाड़ियाँ डीजल से चलती हैं।
देश की बचत, किसानों का फायदा
एथेनॉल गन्ने और मक्के से बनता है इसलिए गन्ना किसानों और मक्का पैदा करने वाले किसानों को इससे सीधा फायदा हो रहा है। गन्ना के मिल मालिक को भी इससे फायदा हो रहा है साथ ही मक्का उत्पादन करने वाले किसान भी लाभांवित हो रहे हैं। साथ ही देश को भी इसका फायदा मिल रहा है। भारत सबसे ज्यादा आयात पेट्रोलियम पदार्थों का करता है। एथेनॉल के इस्तेमाल से इसमें कमी आएगी।
केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा, “देश में फ्यूल के आयात पर 22 लाख करोड़ रुपए खर्च होते हैं। एथेनॉल के इस्तेमाल से इसमें कमी आ रही है। इससे सरकार को करीब 1 लाख करोड़ रुपए की बचत हुई है। एथेनॉल बनाने के लिए मक्के का इस्तेमाल हो रहा है, इसका फायदा किसानों को मिल रहा है। किसानों को करीब 1.14 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई है।
ऊर्जा आयात नहीं बल्कि निर्यात करने वाला बनें- गडकरी
रूस से कच्चे तेल आयात से खफा अमेरिका ने 50 फीसदी टैरिफ भारत पर लगा दिया है। ऐसे में ऊर्जा उत्पादक देश बनना भारत की अहम प्राथमिकता है। गडकरी ने कहा कि हमें ऊर्जा आयात करने वाला नहीं बल्कि ऊर्जा निर्यात करने वाला देश बनना चाहिए। इससे पेट्रोल-डीजल से होने वाले प्रदूषण में कमी आएगी। केन्द्रीय मंत्री गडकरी ने कहा कि पेट्रोल में अभी 20 फीसदी एथेनॉल मिलाया जाता है। लेकिन इसे 27 फीसदी करने को लेकर सरकार की योजना चल रही है, हालाँकि ये अभी फाइनल नहीं हुआ है। ARAI के ट्रायल के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय ये तय करेगा कि 27 फीसदी एथेनॉल मिलाना सही है या नहीं। गडकरी के मुताबिक इंडियन ऑयल के एथेनॉल युक्त पेट्रोल के 350 पेट्रोल पंप चल रहे हैं।
फोटो साभार- X @PetroleumMin
ईवी और फ्लेक्स फ्यूल को बराबर महत्व
केन्द्र सरकार ने कहा है कि ग्राहकों को फ्लेक्स फ्यूल और इलेक्ट्रिक वाहनों को बराबर महत्व देगी। उन्होंने कहा कि अब तक जितने भी नियम बनाए गए हैं वो इलेक्ट्रिक वाहनों को सपोर्ट कर रहे हैं। अप्रैल 2027 से कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी 3 (CAFE3)लागू किया जाएगा जिसमें दोनों वाहनों को बराबर वरीयता मिलेगी। CAFE3 ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने के लिए चर्चाओं का दौर जारी है। सड़क परिवहन मंत्रालय, बिजली मंत्रालय और पीएम के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार ने 6 अगस्त 2025 को बैठक की है। इसमें चर्चा की गई है कि छोटी और बड़ी कारों के नियम अलग बनाए जाएं या नहीं।
CAFE नॉर्म्स क्या है?
CAFE नॉर्म्स यानी कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी सालभर वाहन निर्माताओं द्वारा बेची गई वाहनों का औसत कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को तय करता है। ये नियम कंपनियों को ज्यादा फ्यूल एफिशिएंट वाहनों को बनाने के लिए मजबूर करती हैं। फिलहाल सीएएफई 2 नियम लागू है जो 2027 तक मान्य है।
शुद्ध पेट्रोल और मिले हुए पेट्रोल में अंतर
भारत में प्रीमियम पेट्रोल सबसे शुद्ध माना जाता है। इस पेट्रोल में मिलावट नहीं होती। जब इस पेट्रोल में एथेनॉल मिला दिया जाता है तो ये एथेनॉल पेट्रोल कहलाता है। पीएम मोदी ने 2023 में 20 फीसदी एथेनॉल युक्त पेट्रोल को लॉन्च किया था। इसके तहत एक लीटर फ्यूल में 800 मिलीलीटर पेट्रोल और 200 मिलीलीटर एथेनॉल डाला जाता है। अब एथेनॉल युक्त पेट्रोल हर जगह उपलब्ध है।
सोशल मीडिया पर इस तरह के दावे किए जाते हैं कि ऐसे पेट्रोल के इस्तेमाल से इंजन खराब होते हैं, गाड़ियों में गड़बड़ियाँ आ जाती है और माइलेज पर असर पड़ता है। इसका इस्तेमाल प्राइवेट कारों के लिए सही है या नहीं। सरकार ने इन सभी बातों को खारिज करते हुए कहा इससे गाड़ियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता, हालाँकि माइलेज थोड़ा कम हो सकता है। लेकिन इंजन के कुछ हिस्सों में बदलाव और सही ट्यूनिंग के जरिए माइलेज की कमी को दूर किया जा सकता है।
सड़क परिवहन मंत्री गड़करी ने कहा, ” पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल डालने से किसी भी गाड़ी में कोई दिक्कत नहीं आती है। इस मुद्दे पर ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी (ARAI) और सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM)ने पहले ही साफ कर दिया है। अभी तक एक भी वाहन में इससे दिक्कत नहीं आई है।”
माइलेज पर कितना पड़ता है असर?
ई 20 फ्यूल के इस्तेमाल से गाड़ियों पर तो असर नहीं पड़ेगा लेकिन माइलेज को लेकर पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा है कि इसमें मामूली कमी आएगी। ई-20 के लिए डिजाइन और कैलिब्रेट किए गये वाहनों में एक-दो फीसदी माइलेज कम हो सकता है। वहीं बाकी गाड़ियों में तीन से छह फीसदी माइलेज कम हो सकता है। हालाँकि सही इंजन ट्यूनिंग और ई20 कम्पलायंट एलिमेंट के जरिए इसे कम किया जा सकता है। एथेनॉल के इस्तेमाल से गाड़ियों की माइलेज में कमी को लेकर केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि ये बात सच है कि पेट्रोल में एथेनॉल डालने पर उसकी कैलोरिक वैल्यू कम हो जाती है जिससे माइलेज थोड़ा कम हो सकता है।
एथेनॉल को बेहतर बनाने की कोशिश
रूसी तकनीक की सहायता से एथेनॉल को क्षमता बेहतर बनाने की कोशिश सरकार कर रही है। केन्द्रीय मंत्री के मुताबिक अगर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय इसकी टेस्टिंग कर रहा है। इससे पेट्रोल के बराबर एथेनॉल की क्षमता हो जाएगी। केन्द्रीय मंत्री गडकरी ने साफ कर दिया कि देशहित सर्वोपरि है। किसी भी लॉबी के दबाव में नहीं आएंगे। किसानों का फायदा, पेट्रोल आयात, लागत और प्रदूषण को ध्यान में रखकर सरकार कदम उठाएगी।
बिहार के सीतामढ़ी में पुनौरा धाम पर भव्य जानकी मंदिर के शिलान्यास का कार्य शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को संपन्न हुआ। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, प्रदेश मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत असंख्य साधु-संतों की उपस्थिति रही। इस दौरान नीतीश कुमार ने कहा कि सभी को इसके लिए गृहमंत्री को बधाई देना चाहिए।
अमित शाह ने भूमिपूजन करने के बाद कहा, “भारत की संस्कृति में माँ सीता का स्थान अनन्य है। माँ सीता ने एक ही जन्म में आदर्श माँ, पत्नी और बेटी का स्वरूप दिखाया है। आज बिहार ही नहीं पूरे देश के लिए खुशी का दिन है।”
गृहमंत्री ने कहा, “पहले जब लालू जी रेल मंत्री थे, तब बिहार के रेल के विकास के लिए हर साल 1132 करोड़ रुपए खर्च करते थे, और मोदी जी ने सिर्फ 2025-26 में 10066 करोड़ रुपए का खर्च रेल के लिए किया। मैं मिथिलांचल के लोगों से कह रहा हूँ कि यह सिर्फ मंदिर नहीं है, बल्कि मिथिलांचल और बिहार के भाग्योदय की शुरुआत है।”
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उन्होंने आगे कहा,”नीतीश जी ने सैकड़ों करोड़ रुपये से इसका विकास करने का जो कार्य शुरू किया है, यह न केवल मिथिलांचल और बिहार, बल्कि पूरे देश के भक्तों के लिए आनंद की बात है। यहां वर्षों पहले रामायण काल में अकाल के निवारण के लिए राजा जनक ने भूमि में सोने का हल चलाया था, और वहीं से माँ जानकी प्रकट हुई थीं। बारिश के लिए हल चलाया गया था, और आज भूमि पूजन में भी माँ जानकी ने बारिश भेजकर आशीर्वाद देने का कार्य किया।”
इस मौके पर तिरुपति से आए हलवाइयों ने लड्डू का महाप्रसाद बनाया है। जानकारी के अनुसार, 11 पवित्र नदियों के जल का उपयोग कर 11 हजार लोगों के लिए लड्डू बनाया गया है। माता सीता के मंदिर के शिलान्यास में काशी और मिथिला के आचार्य ने 21 तीर्थों की मिट्टी, चाँदी के विशेष कलश और बर्तन और 11 नदियों के जल के साथ भूमि पूजन कराया।
अमित शाह ने अयोध्या के राम मंदिर की तर्ज पर 67 एकड़ में करीब 882 करोड़ की लागत से बनने वाले इस भव्य मंदिर की नींव रखी। रिपोर्ट के मुताबिक, 1 जुलाई 2025 को बिहार कैबिनेट ने पुनौरा धाम में मंदिर निर्माण के लिए 882.87 करोड़ रुपए के बजट को मंजूरी दी थी।
इसमें से 137 करोड़ रुपए से जानकी मंदिर का निर्माण किया जाएगा, वहीं 728 करोड़ रुपए से पर्यटन से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास होना है। सबसे बड़ी बात ये है कि 10 वर्षों तक इसके रख-रखाव पर 16.62 करोड़ रुपए खर्च करने का भी प्रावधान किया गया है।
शिलान्यास से पूर्व माँ जानकी की जन्मस्थली को फूलों और दीपों से सजा दिया गया था। बता दें कि कोलकाता से आए कलाकारों ने मंदिर और परिसर में फूलों की सजावट की है। भूमिपूजन कार्यक्रम से पहले प्रशासन ने सुरक्षा-व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए केवल 200 लोगों को ही भूमि-पूजन स्थल पर प्रवेश की अनुमति दी थी।
मंदिर के शिलान्यास के मौके पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आगमन को ध्यान में रखते हुए सीतामढ़ी में प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था भी दुरुस्त की गयी थी। जिला पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से पुनौरा धाम को केंद्र मानते हुए 5 किलोमीटर के एरिया में स्थित क्षेत्र को अस्थायी रेड जोन / नो ड्रोन फ्लाई जोन घोषित किया है।
अमृत भारत का मिला उपहार
मोदी सरकार ने सीतामढ़ी को ‘अमृत भारत एक्सप्रेस’ का भी उपहार दिया है। सीतामढ़ी से दिल्ली के बीच चलने वाली इस ट्रेन को अमित शाह ने शिलान्यास के अवसर पर हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
पुनौरा धाम के साथ बिहार की नीतीश सरकार भगवान राम और माँ सीता से जुड़े फुलहर जैसे अन्य स्थलों का भी पुनरुद्धार कर रही है। इतना ही नहीं अयोध्या से पुनौरा धाम को सीधे जोड़ने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग का भी निर्माण हो रहा है। वहीं पर्यटन सुविधाओं के विकास के तहत परिसर में होटल, रेस्टहाउस, संग्रहालय, स्मृति द्वार और स्मारक भवन का निर्माण किया जाएगा।
गौरतलब है कि राम मंदिर के वास्तुकार रहे आशीष सोमपुरा ही इस मंदिर के भी आर्किटेक्ट हैं। उनका कहना है कि हमारी पूरी कोशिश है कि माँ जानकी के मंदिर का आर्किटेक्चर राम मंदिर के जैसा ही भव्य हो। बता दें कि मंदिर का निर्माण राजस्थान के बंसी पहाड़पुर के लाल बलुआ पत्थरों (रेड सैंडस्टोन) से किया जा रहा है।
मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में हरियाली बनाए रखने के लिए सुंदर जलाशय और फव्वारे लगाए जाएँगे और बगीचों का निर्माण भी किया जाएगा। साथ ही, ‘सीता-वाटिका’ और ‘लव-कुश वाटिका’ का भी विकास किया जाएगा।
बिहार के सीतामढ़ी में शुक्रवार (8 अगस्त 2025) को माता जानकी के भव्य मंदिर का शिलान्यास हुआ। यह भव्य मंदिर क्षेत्र पुनौरा धाम कहलाता है। यह न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि मिथिला क्षेत्र की बदलती डेमोग्राफी और राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में भी इसकी गहरी प्रासंगिकता है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उपस्थिति में संपन्न इस समारोह ने एक बार फिर सनातन धर्म की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
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इस लेख में पुनौरा धाम के शिलान्यास के महत्व को मिथिला क्षेत्र की बदलती सामाजिक-जनसांख्यिकीय स्थिति और सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के संदर्भ में विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
पुनौरा धाम – सनातन का गौरवशाली प्रतीक
माता सीता की जन्मस्थली पुनौरा धाम मिथिला की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का केंद्र है। 67 एकड़ में 882 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह मंदिर न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई ऊँचाइयों तक ले जाएगा।
मंदिर का निर्माण राजस्थान के बंसी पहाड़पुर के लाल बलुआ पत्थरों से हो रहा है। इसके वास्तुकार आशीष सोमपुरा हैं, जिन्होंने अयोध्या के राम मंदिर का भी डिजाइन तैयार किया। मंदिर परिसर में ‘सीता वाटिका’, ‘लव-कुश वाटिका’, जलाशय, फव्वारे, संग्रहालय, स्मृति द्वार और पर्यटक सुविधाओं जैसे होटल और रेस्टहाउस का निर्माण होगा।
शिलान्यास समारोह में 11 पवित्र नदियों के जल और 21 तीर्थों की मिट्टी का उपयोग हुआ। तिरुपति के हलवाइयों ने 11,000 लोगों के लिए लड्डू प्रसाद बनाया और कोलकाता के कलाकारों ने परिसर को फूलों और दीपों से सजाया।
सुरक्षा के लिए पाँच किलोमीटर का क्षेत्र रेड जोन घोषित किया गया और केवल 200 लोगों को ही भूमि पूजन स्थल पर प्रवेश की अनुमति दी गई। साथ ही सीतामढ़ी से दिल्ली के लिए ‘अमृत भारत एक्सप्रेस’ ट्रेन को हरी झंडी दिखाई गई, जो क्षेत्र को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगी।
मिथिला की बदलती डेमोग्राफी: एक चिंताजनक तस्वीर
अपनी सांस्कृतिक समृद्धि और मैथिली भाषा के लिए जाने जाने वाला मिथिला क्षेत्र पिछले कुछ दशकों में जनसांख्यिकीय और सामाजिक बदलावों का गवाह रहा है। विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय अध्यक्ष और राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य रहे स्वर्गीय कामेश्वर चौपाल ने 2023 में ऑपइंडिया को दिए एक साक्षात्कार में इस बदलाव को रेखांकित किया था। उनके अनुसार, मिथिला में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार, किशनगंज में 78%, कटिहार में 65%, पूर्णिया में 50%, और मधुबनी-दरभंगा में 32% मुस्लिम आबादी थी। चौपाल का अनुमान था कि अब यह आँकड़ा 39% तक पहुँच चुका होगा।
इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं, मुख्यत: इन्हें तीन बिंदुओं में समझ सकते हैं।
बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों का प्रभाव।
तबलीगी जमात जैसे संगठनों की गतिविधियाँ, जो कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रही हैं।
अल्पसंख्यक संस्थानों को मिलने वाली सरकारी सहायता, जिसने मुस्लिम समुदाय के लिए आर्थिक आधार तैयार किया है।
चौपाल के अनुसार, इन संस्थानों में इस्लामिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाता है, जबकि हिंदू धर्म और संस्कृति को नजरअंदाज किया जाता है। इसके अलावा राजनीतिक तुष्टिकरण ने भी मिथिला में हिंदुओं को जातीय आधार पर बाँटकर कमजोर किया है।
तुष्टिकरण और इस्लामी कट्टरपंथ का बढ़ता प्रभाव
दरअसल, बिहार के मिथिला क्षेत्र में न केवल डेमाग्राफी तेजी से बदल रही है, बल्कि मुस्लिमों का कैरेक्टर भी बदला है। गाँव-गाँव में धर्मांतरण हो रहा है। यह है कॉन्ग्रेस की पुरानी प्लानिंग का नतीजा।
कामेश्वर चौपाल ने कहा था, “80 के दशक में जब मैथिली को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल करवाने का संघर्ष चल रहा था, तब अचानक से एक कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री (डॉ. जगन्नाथ मिश्रा) ने उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दे दिया। त्रि भाषा सूत्र से संस्कृत को बाहर कर उर्दू को शामिल कर दिया। मिथिला के नौ जिलों को मुस्लिम प्रभावी बताकर इसकी शुरुआत की गई। नतीजा जिस स्कूल में दो भी उर्दू पढ़ने वाले बच्चे थे, उर्दू शिक्षक की बहाली हुई। लेकिन मैथिली की स्कूलों में पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस तुष्टिकरण ने एक तरफ मैथिल हिंदुओं को अपनी भाषा से काट दिया, दूसरी तरफ गैर मैथिली भाषी मुस्लिमों का बीज बो दिया।”
स्वर्गीय चौपाल ने 2023 में बताया था कि 1980 के दशक में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने उर्दू को बिहार की दूसरी राजभाषा बनाकर मैथिली को दरकिनार किया। इससे मैथिल हिंदुओं की सांस्कृतिक पहचान कमजोर हुई और गैर-मैथिली भाषी मुस्लिमों का प्रभाव बढ़ा।
जाति के पॉलिटिक्स ने हिंदुओं को कमजोर कर दिया है। इसलिए मिथिला में अब कोई हिंदू नहीं दिखता। जिनको मुस्लिम का भय है, वही हिंदू है। बाकी अपनी जातीय पहचान के साथ जी रहे हैं। दूसरी तरफ 72 फिरके होने के बावजूद कोई मुस्लिम जातीय पहचान के साथ नहीं जी रहा। वो एक ही बात कहेगा हम मियाँ हैं।
आज आप देखिए मुस्लिम मैथिली नहीं बोलते हैं। कुछ दशक पहले तक उनकी बोली हमारी तरह थी। हमारी तरह वे कपड़े पहनते थे। आज उनका बच्चा पैदा होते ही टखने से ऊपर उठे पायजामे और सिर पर टोपी डाले दिखने लगता है।
जो बीजारोपण कॉन्ग्रेस ने किया उसे लालू प्रसाद यादव ने खुलमखुल्ला MY (मुस्लिम+यादव) से फलने-फूलने दिया। यह राजनीतिक समीकरण तुष्टिकरण का चरम था। बिहार में तबलीगी जमात का असर बढ़ता गया। मुस्लिमों में कट्टरपंथ बढ़ता गया।
तबलीगी जमात और इस्लामिक मुल्कों से आए पैसों से मुस्लिमों की सोच बदली गई तो रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों ने डेमोग्राफी चेंज करने में भूमिका निभाई। जैसे ही मुस्लिमों की आबादी बढ़ी तो मिथिला की हालत कश्मीर जैसी हो जाएगी। खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियाँ इसकी जमीन तैयार कर रही हैं। असल में ये पार्टियाँ इस्लामी कट्टरपंथ के लिए स्लीपर सेल का काम कर रही हैं।
गृहमंत्री अमित शाह ने घुसपैठियों के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “बिहार विधानसभा चुनाव से पहले, क्या बिहार की वोटर लिस्ट से घुसपैठियों को हटाना चाहिए या नहीं? हमारा संविधान भारत में पैदा न हुए किसी व्यक्ति को वोट देने का अधिकार नहीं देता। राहुल बाबा, तुम संविधान लेकर घूम रहे हो, कम से कम इसे खोलकर ठीक से पढ़ तो लो। घुसपैठियों को इस देश की चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। और यही वजह है कि वे SIR का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि घुसपैठिए उनका वोट बैंक हैं…”
Bihar: Union Home Minister Amit Shah says, "Before the Bihar Assembly elections, should infiltrators be removed from Bihar's voter list or not? Our Constitution does not give the right to vote to anyone who was not born in India. Rahul Baba, you're roaming around with the… pic.twitter.com/9Bxlt2WfhQ
पुनौरा धाम में जानकी मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक परियोजना नहीं है, बल्कि यह मिथिला में सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। राम मंदिर की तरह यह मंदिर भी सांस्कृतिक गौरव को पुनर्जनन देगा।
इस प्रोजेक्ट के महत्वपूर्ण होने की कई वजहे हैं-
आर्थिक और सामाजिक विकास: मंदिर निर्माण से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। होटल, रेस्टहाउस, और संग्रहालय जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। ‘अमृत भारत एक्सप्रेस’ और राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण क्षेत्र की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाएगा, जिससे आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण: मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में यह मंदिर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। ‘सीता वाटिका’ और ‘लव-कुश वाटिका’ जैसे प्रतीकात्मक स्थल मैथिली संस्कृति को पुनर्जनन देंगे।
राष्ट्रीय सुरक्षा का दृष्टिकोण: मिथिला में बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ और घुसपैठ की समस्या को देखते हुए, सनातन धर्म के प्रतीकों का उद्धार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जरूरी है। यह मंदिर हिंदुओं में एकता और सांस्कृतिक गौरव की भावना को प्रबल करेगा, जो कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ एक मजबूत जवाब होगा।
धर्मांतरण पर अंकुश: चौपाल ने बताया था कि मिथिला में गाँव-गाँव में धर्मांतरण की गतिविधियाँ चल रही हैं। इस मंदिर के निर्माण से सनातन धर्म की जड़ें मजबूत होंगी, जिससे मिशनरी और इस्लामी गतिविधियों पर अंकुश लगेगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा और सनातन की पुनर्स्थापना
मिथिला में बदलती डेमोग्राफी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक चुनौती बन रही है। किशनगंज, कटिहार, और पूर्णिया जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी का तेजी से बढ़ना और कट्टरपंथी गतिविधियों का उभार चिंता का विषय है। बांग्लादेशी घुसपैठ और तबलीगी जमात की गतिविधियाँ इस क्षेत्र को अस्थिर कर सकती हैं। ऐसे में पुनौरा धाम जैसे धार्मिक स्थलों का पुनरुद्धार न केवल सांस्कृतिक गौरव को बढ़ाएगा, बल्कि हिंदुओं में एकता और आत्मविश्वास को भी प्रबल करेगा।
मोदी सरकार और नीतीश सरकार की यह पहल मिथिला में सनातन धर्म की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में एक ठोस कदम है। फुलहर जैसे अन्य धार्मिक स्थलों का विकास और अयोध्या-पुनौरा धाम को जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग इस क्षेत्र को धार्मिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाएगा।
पुनौरा धाम में जानकी मंदिर का शिलान्यास मिथिला के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। यह मंदिर न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है, बल्कि बदलती डेमोग्राफी और बढ़ते कट्टरपंथ के खिलाफ एक मजबूत जवाब भी है। यह परियोजना रोजगार, पर्यटन और आर्थिक विकास को बढ़ावा देगी, साथ ही सनातन धर्म की पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। मिथिला की सांस्कृतिक पहचान को बचाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ऐसे प्रयासों की जरूरत है। यह मंदिर माता सीता की जन्मस्थली को न केवल एक धार्मिक केंद्र बनाएगा, बल्कि मिथिला के लोगों में गर्व और एकता की भावना भी जगाएगा।
झूठ बोलने पर उसे फटकार लग चुकी है। वह सार्वजनिक माफी माँग चुका है। अनर्गल प्रलाप के लिए अदालत उसे दोषी मानकर सजा सुना चुकी है। पर वह इतना निर्लज्ज है कि फिर भी आए दिन अनाप-शनाप बोलता रहता है। जैसे वह इस देश का विपक्ष का नेता नहीं, गली-मुहल्ले का लंपट हो। आदतन अपराधी हो।
7 अगस्त 2025 को कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक लंबे प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए चुनाव आयोग पर जो हमला किया है, यह उसी सिलसिले का एक नया अध्याय है। कभी चुनाव आयोग, कभी भारतीय सेना, कभी ईवीएम, कभी कोर्ट, कभी संसद… भारतीय विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का शायद ही कोई अंग बचा हो, जिसको लेकर कॉन्ग्रेस नेता ने दुष्प्रचार न किया हो।
कुछ भी अनाप-शनाप बोल देने का यह ‘साहस’ राहुल गाँधी को वही व्यवस्था देती है, जिसे वे सत्ता में आने पर देख लेने की धमकी देते हैं। यही व्यवस्था उन्हें एहसास कराती है कि वे हर हाल में सुरक्षित रहेंगे। उन्हें उनके अपराधों का दंड नहीं मिलेगा। यदि एक बार यही व्यवस्था दंड की नई मिसाल कायम कर दे तो राहुल गाँधी का यह ‘साहस’ स्वत: स्खलित हो जाएगा। ऐसा होना ही भारतीय लोकतंत्र के हित में भी है।
फटकार के बाद भी जारी राहुल का प्रलाप
2014 में मोदी के उदय के बाद राहुल गाँधी ने जिन संस्थाओं को निशाना बनाया उसमें संसद भी है। वहीं, बाद से ही वो उन सभी संस्थाओं को निशाना बनाते रहें जिनके कारण भारत का लोकतंत्र मजबूत है, ऐसा संस्थाएं जिनमें लोगों की आस्था है। जिस संसद को लोकतंत्र का मंदिर माना जाता है लेकिन राहुल गाँधी ने संसद पर भी लगातार सवाल खड़े किए हैं। जिस लोकसभा में उन्होंने लंबे-लंबे भाषण दिए, उसी में उन्हें ना बोलने देने के फर्जी दावे किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट भी उनके आरोपों से अछूता नहीं रहा है। राफेल डील पर कोर्ट के एक फैसले को उन्होंने अपने मन से ही सरकार का भ्रष्टाचार मानते हुए ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया था। बाद में उन्हें सुप्रीम कोर्ट में इसके लिए माफी माँगनी पड़ी।
राहुल गाँधी ने RSS और सावरकर को लेकर भी बेतुके बयान दिए हैं। राहुल गाँधी ने RSS की तुलना आतंकी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से की है, RSS को कौरव बताया है और तमाम तरह के फर्जी आरोप लगाए हैं। स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर का अपमान करने में राहुल गाँधी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। साफ है कि राहुल गाँधी को सावरकर के हिंदुत्व से घृणा की हद तक चिढ़ है। सावरकर के खिलाफ बयान देने को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट राहुल गाँधी को फटकार लगा चुका है। RSS को गाँधी हत्या में शामिल होने का आरोप लगाने को लेकर भी राहुल गाँधी को कोर्ट से फटकार पड़ चुकी है।
राहुल गाँधी ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कहा था कि सभी चोरों का उपनाम (सरनेम) मोदी क्यों है? राहुल के इस बयान के बाद स्थानीय अदालत ने उन्हें 2 वर्षों की सजा दी और उनकी इसे लेकर सांसदी तक चली गई थी।
इन संस्थाओं के अलावा राहुल गाँधी सेना पर भी अनर्गल टिप्पणियाँ कर चुके हैं। कुछ ही दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी पर सेना का अपमान करने को लेकर तल्ख टिप्पणी की थी। कोर्ट ने यहाँ तक कहा था कि अगर राहुल गाँधी सच्चे भारतीय होते तो इस तरह की टिप्पणी ना करते। राहुल गाँधी ‘सेना की पिटाई’ जैसे बयान दे चुके हैं और पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक पर भी उनके सहयोगियों ने सवाल उठाए हैं।
कॉन्ग्रेस के ‘उपकृत’ चुनाव आयुक्तों पर तो BJP ने नहीं उठाए सवाल
आज राहुल गाँधी चुनाव आयोग पर खुला हमला बोलते हैं और उसे ‘बीजेपी का औजार’ बताते हैं क्योंकि लगातार तीसरी बार नरेंद्र मोदी को सत्ता सौंपी है। कई राज्यों में बीजेपी की सरकार है।
लेकिन लंबे समय तक केंद्र और राज्य में कॉन्ग्रेस की सत्ता रही है। उसके बाद किसी भी दल ने चुनाव आयोग पर आरोप नहीं लगाए थे जबकि ऐसे चुनाव आयुक्त हुए हैं जिनके गाँधी परिवार से सीधे संबंध मिलते हैं।
मसलन, टीएन शेषन। उन्हें कई चुनाव सुधारों का श्रेय दिया जाता है। उनके मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले देश के आम लोगों को यह पता भी नहीं था कि चुनाव आयोग नाम की कोई संस्था होती है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि चुनाव आयुक्त बनने से पहले शेषन राजीव गाँधी की सरकार में पहले उनके करीबी सुरक्षा सचिव रहे और कैबिनेट सचिव भी बनाए गए। और जब वे रिटायर हो गए तो कॉन्ग्रेस ने उन्हें बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ गुजरात की गाँधीनगर सीट से 1999 के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया था।
शेषन ऐसे इकलौते नहीं है, एम.एस. गिल का नाम भी गौर करने लायक है। गिल भी मुख्य चुनाव आयुक्त रहे और इस पद रिटायर होने के बाद कॉन्ग्रेस ने गिल को राज्यसभा में भेजा और बाद में केंद्रीय मंत्री भी बनाया। गिल का यह राजनीतिक सफर कॉन्ग्रेस की कृपा से ही संभव हुआ लेकिन तब भाजपा ने कभी आरोप नहीं लगाए कि गिल ने चुनाव आयोग में रहते हुए कॉन्ग्रेस के लिए काम किया था।
नवीन चावला की नियुक्ति भी विवादों से घिरी रही। 1975-77 के आपातकाल के दौरान नवीन चावला दिल्ली के उपराज्यपाल किशन चंद के सचिव थे। जस्टिस शाह कमीशन ने उनके विषय में कहा था कि चावला ने आपातकाल के दौरान अपार शक्तियों का प्रयोग किया क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री आवास तक उनकी आसान पहुँच थी। शाह कमीशन ने यहाँ तक कहा कि उन्हें कोई पद न दिए जाए लेकिन इसके बावजूद वे कॉन्ग्रेस के राज में मुख्य चुनाव आयुक्त तक बने।
कॉन्ग्रेस ने उनकी नजदीकियों को लेकर चुनाव आयुक्त के तौर पर लगातार उन्हें हटाने की माँग की जाती रही थी। खुद मुख्य चुनाव आयुक्त ने उन्हें हटाने की सिफारिश की थी। चावला के कार्यकाल में कई फैसले विपक्ष के खिलाफ होंगे लेकिन भाजपा ने चुनाव हारने के बाद भी चुनाव आयोग को कठघरे में नहीं खड़ा किया था।
चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर निराधार हमला असल में उसी संस्था पर हमला है जिसकी निगरानी में नेता संसद तक पहुँचते हैं। आज बेशक राहुल गाँधी सवाल उठाएँ लेकिन कॉन्ग्रेस के राज में संस्थाओं की स्थिति कैसी थी यह सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी से भी जिसमें शीर्ष अदालत ने सीबीआई को ‘पिंजड़े में बंद तोता’ तक बता दिया था।
मोदी विरोध बन गया है ‘मनोविकार’
नरेंद्र मोदी से पहले भी कई लोग देश के प्रधानमंत्री बने हैं। मोदी के बाद भी देश कई प्रधानमंत्री देखेगा। देश ने विपक्ष के भी कई नेता देखे हैं और भविष्य में भी देखेगा। पर मोदी घृणा में राहुल गाँधी जिस तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं को निशाना बना रहे हैं वैसा कोई ‘मनोविकारी’ ही कर सकता है।
यह मनोविकार ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ जैसी कॉन्ग्रेसी मानसिकता से ही पैदा होता है। इसके कारण आप ना लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए नेताओं और न ही लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बर्दाश्त कर पाते हैं। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी का हाल ही में यह कहना- ‘कौन सच्चा भारतीय है, कौन नहीं, यह न्यायपालिका तय नहीं करेगी’ भी इस तरह के मनोविकार से उपजता है।
‘शिशुपाल’ की कितनी गलतियाँ बची हैं?
अब सवाल उठता है कि इस मनोविकार का उपचार क्या है? सत्ताधारी दल होने के कारण यह केवल बीजेपी की जिम्मेदारी नहीं है कि वह ऐसे हर हमलों को जवाब दे। यह उन संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है जिनसे लोकतंत्र मजबूत होता है। यह हर एक उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जिसकी सहभागिता से लोकतंत्र का निर्माण होता है और जिसके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था कार्य करती है।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि वह राहुल गाँधी के ऐसे बेतुके हमलों पर स्वत: संज्ञान ले। चुनाव आयोग को कॉन्ग्रेस नेता को अदालत में घसीटना चाहिए। केवल सोशल मीडिया या पत्रों के जरिए उनसे सबूत माँगने की औपचारिकता तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। ऐसा हर उस संस्था को करना चाहिए जिस पर बेबुनियाद आरोप लगाकर राहुल गाँधी भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करना चाहते हैं। अराजकता पैदा करना चाहते हैं।
उनके लिए दंड का ऐसा विधान सुनिश्चित करना चाहिए जिससे कल को कोई फिर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास ना कर सके। या फिर इन्हें बताना चाहिए कि वे द्वापर के श्रीकृष्ण की तरह राजनीति के इस ‘शिशुपाल’ के 100 अपराध पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। साथ ही, यह बताना चाहिए कि इस ‘शिशुपाल’ के अपराधों की गिनती कहाँ तक पहुँची है।
इससे आम जनता को यह जानने में सहूलियत रहेगी कि राजनीति के इस ‘शिशुपाल’ को दंड देने का समय कब आएगा। वह इस बात की निगरानी करेगी कि गिनती पूरी होने के बाद यह ‘शिशुपाल’ दंड के विधान से बच ना सके।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अपने ही एक आदेश को वापस ले लिया। ये आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार के खिलाफ था। पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जस्टिस प्रशांत कुमार को रिटायरमेंट तक आपराधिक मामलों की सुनवाई से हटा दिया जाए और उन्हें किसी सीनियर जज के साथ बैठकर काम करना होगा। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया है।
पूरा मामला क्या था?
ये बात शुरू होती है मेसर्स शिखर केमिकल्स नाम की कंपनी से, जिसने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। कंपनी का कहना था कि उनका एक आर्थिक विवाद है, जो दीवानी (सिविल) मामला है, लेकिन इसके बावजूद उनके खिलाफ आपराधिक केस चल रहा है। कंपनी चाहती थी कि ये आपराधिक केस रद्द हो।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस प्रशांत कुमार ने 5 मई 2025 को इस याचिका को खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि अगर कोई दीवानी रास्ता (सिविल केस) उपलब्ध है, तो भी आपराधिक केस चल सकता है, क्योंकि सिविल केस में समय लगता है और शिकायतकर्ता को तुरंत राहत चाहिए।
इस फैसले से कंपनी खुश नहीं थी। उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 4 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को गलत बताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस प्रशांत का फैसला ‘विकृत’ और ‘गैरकानूनी’ है।
यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस प्रशांत के खिलाफ सख्त टिप्पणी की और आदेश दिया कि उन्हें आपराधिक मामलों से हटाकर किसी सीनियर जज के साथ डिवीजन बेंच में काम करना होगा।
फिर क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश जैसे ही आया, इलाहाबाद हाईकोर्ट में हंगामा मच गया। हाईकोर्ट के 13 जजों ने इस आदेश के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली को पत्र लिखकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश गलत है और इसे लागू नहीं करना चाहिए।
जजों का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने बिना जस्टिस प्रशांत को नोटिस दिए या उनका पक्ष सुने ये टिप्पणियाँ की, जो ठीक नहीं है। इन जजों ने फुल कोर्ट मीटिंग बुलाने की माँग की, ताकि इस आदेश के खिलाफ प्रस्ताव पास किया जाए। ये पत्र सोशल मीडिया पर भी वायरल हो गया, हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।
उधर, भारत के चीफ जस्टिस (CJI) बी.आर. गवई ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की बेंच को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि जस्टिस प्रशांत के खिलाफ दिए गए आदेश पर दोबारा विचार किया जाए। CJI के इस अनुरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को फिर से सुनवाई के लिए लिस्ट किया।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश क्यों वापस लिया?
8 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने नया फैसला सुनाया। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि उनका मकसद जस्टिस प्रशांत को शर्मिंदा करना या उनकी बेइज्जती करना नहीं था। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का काम न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखना है। अगर कोई फैसला गलत है और वो जनता के भरोसे को कम करता है, तो सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ता है।
लेकिन इस बार CJI के पत्र और हाईकोर्ट जजों की आपत्ति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने 4 अगस्त के आदेश के दो पैराग्राफ (25 और 26) हटा दिए। इन पैराग्राफ में जस्टिस प्रशांत को आपराधिक मामलों से हटाने और सीनियर जज के साथ बैठने का आदेश था।
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी साफ किया कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ही तय करते हैं कि कौन सा जज कौन से केस सुनेगा। सुप्रीम कोर्ट ने ये मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के हवाले कर दिया कि वो जस्टिस प्रशांत के केस की सुनवाई को लेकर फैसला लें। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ये माना कि हाईकोर्ट का 5 मई का फैसला गलत था, लेकिन अब वो इसकी नई सुनवाई के लिए हाईकोर्ट को भेज रहे हैं।
इस मामले से क्या समझ आता है?
ये पूरा मामला दिखाता है कि न्यायपालिका में एक-दूसरे की गरिमा और स्वायत्तता कितनी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले जस्टिस प्रशांत के फैसले को गलत माना और सख्त टिप्पणी की, लेकिन जब हाईकोर्ट के जजों और CJI ने इस पर सवाल उठाए, तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश को वापस ले लिया।
ये पूरा मामला दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट भी अपनी गलतियों को सुधारने के लिए तैयार है। साथ ही ये भी साफ हुआ कि हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को अपने कोर्ट में जजों के कामकाज का पूरा अधिकार होता है और सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल नहीं देना चाहता।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने ये जरूर कहा कि जस्टिस प्रशांत का फैसला गलत था, क्योंकि दीवानी मामले को आपराधिक केस में बदलना ठीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि ऐसे फैसले जनता का भरोसा कम कर सकते हैं। इसीलिए उन्होंने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेजा।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकर अजीत डोभाल ने मॉस्को में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। दोनों देशों ने द्विपक्षीय साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई। ये मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 25 फीसदी एक्स्ट्रा टैरिफ लगाते हुए भारत पर दुनिया में सबसे ज्यादा 50 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा की। माना जा रहा है कि यह मुलाकात अमेरिकी दबाव को संतुलित करने की दिशा में अहम पहल है।
अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने का हवाला देते हुए टैरिफ दोगुना कर दिया है। साथ ही चेतावनी दी है कि अगर रूस ने करीब चार साल से चल रहे यूक्रेन युद्ध को शुक्रवार तक खत्म नहीं किया, तो वह रूसी तेज खरीदने वाले देशों पर एक और प्रतिबंध लगाएगा।
क्रेमलिन प्रेस सेवा ने एक वीडियो शेयर किया है। इसमें डोभाल वार्ता से पहले रूस के राष्ट्रपति से हाथ मिलाते दिख रहे हैं। डोभाल ने अपने रूस के समकक्ष सर्गेई शोइगु से भी मुलाकात की। भारत और रूस के बीच रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों में संबंधों पर ही अमेरिका को ऐतराज है। हालाँकि भारत साफ कर चुका है कि वह रूस से व्यापार बंद नहीं करेगा।
इस साल के अंत में राष्ट्रपति पुतिन भारत यात्रा पर आने वाले हैं इसकी जमीन तैयार करने के लिए अजीत डोभाल मॉस्को गए हैं। डोभाल ने खुद जानकारी दी है कि पुतिन भारत आने वाले हैं। वहाँ पुतिन और डोभाल की गर्मजोशी दुनियाभर में सुर्खियाँ बन रही हैं। पुतिन जिस तेजी और जोश के साथ आकर डोभाल से मिलते हैं, उनका हाथ पकड़ते हैं और मुस्कुराते हुए बातें करते हैं और बैठने का आग्रह करते हैं। इनमें भी संकेत छुपे हुए हैं।
ब्राजील के बाद भारत पर ट्रंप ने लगाया सबसे ज्यादा टैरिफ
भारत पर 7 अगस्त को 25 फीसदी टैरिफ लागू होगा और फिर 21 अगस्त को दूसरे दौर की 25 फीसदी यानी पूरा 50 फीसदी टैरिफ लागू हो जाएगा। भारत ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। विदेश मंत्रालय ने इसे अन्यायपूर्ण, असंगत कहा है। साथ ही कहा है कि देशहित में जरूरी कदम उठाए जाएँगे।
अमेरिका पर लगातार दोहरे मापदंड के आरोप लग रहे हैं। खुद अमेरिका यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, पैलेडियम और उर्वरक रूस से आयात करता है। इसके अलावा यूरोपीय यूनियन का कारोबार भी अभी तक रूस से पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में भारत पर दबाव डालने की रणनीति हैरान करने वाली हैं। इसको लेकर जब राष्ट्रपति ट्रंप से पत्रकार ने सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें रूस से व्यापार की जानकारी ही नहीं है।
देशहित में लेंगे फैसला – पीएम मोदी
पीएम मोदी ने कहा है कि किसानों के हितों की रक्षा हमारी पहली प्राथमिकता है। भारत मछुआरों, डेयरी किसानों और अन्य किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि इसकी भारी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी लेकिन वे इसके लिए तैयार हैं।
दरअसल भारत ने अमेरिकी टैरिफ बम से निपटने की तैयारी तेज कर दी है। एक तरफ डोभाल रूस में हैं तो पीएम मोदी जापान और फिर चीन की यात्रा पर जा रहे हैं। ब्राजील ने पहले ही ब्रिक्स देशों को अमेरिकी टैरिफ से मुकाबला करने के लिए साथ आने का आह्वान कर चुका है। रूस के राष्ट्रपति इस साल के अंत में भारत आने वाले हैं।
जम्मू और कश्मीर दशकों से पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का शिकार रहा है। यहाँ हिन्दुओं को हिंसा का खामियाजा भुगतना पड़ा है। 90 के दशक में डोडा जिला कश्मीर घाटी से अलग जम्मू का वो जगह है, जहाँ हिन्दुओं का कत्लेआम किया गया था। यहाँ जिहादियों ने हिन्दुओं को चुन-चुन कर मारा था। बंदूक की नोक पर उनके घर द्वार छीन लिए गए। बेरहमी से कत्ल किया गया, हिन्दू महिलाओं का रेप किया गया। ये सब जिहाद के नाम पर किया गया।
हिन्दुओं के प्रति घृणा और किसी भी तरह से मुस्लिम बहुल घाटी को भारत से अलग करने की कोशिश में जिहादियों ने ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया। लेकिन डोडा घाटी का हिस्सा नहीं था। उसके सामरिक महत्व के चलते आतंकवादियों ने साजिश के तहत हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर किया। उस वक्त डोडा तक पहुँचना भी काफी मुश्किल होता था।
ये ऐसा पहाड़ी क्षेत्र है जहाँ पगडंडियों और खच्चरों के सहारे ही पहुँचा जा सकता था। ये क्षेत्र हिमाचल प्रदेश, उधमपुर, लद्दाख और अनंतनाग से घिरा हुआ है। लेकिन इसके सामरिक महत्व को पाकिस्तान ने पहचान लिया और आतंकियों के सहारे यहाँ हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर किया। स्वराज के अभिमन्यु सिंह के मुताबिक 1991 में इस क्षेत्र में सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ की केवल 5 यूनिट थी।
सेना की संख्या में कमी होने की वजह से आतंकियों के लिए यहाँ पैर जमाना और आसान हो गया क्योंकि भारत की सेना घाटी में अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर चुकी थी।
डोडा घाटी अब डोडा, किश्तवाड़ और रामबन में बंटा हुआ है, लेकिन उस वक्त 11,691 वर्म किलोमीटर में पूरा घाटी फैला हुआ था, जहाँ जम्मू कश्मीर का करीब 26 फीसदी वन मौजूद थे।
फोटो साभार-Swarajya
एक और उबर-खाबड़ पहाड़ी रास्ते और दूसरी तरफ घने जंगल, ऐसे दुर्गम जगह पर अभियान के लिए अधिक सैनिकों की जरूरत थी। इसके विपरीत आतंकियों को चप्पा-चप्पा पता था जहाँ वो खुलकर ‘हिन्दुओं से मुक्त क्षेत्र’ बनाने का काम कर रहे थे।
1991 की जनगणना के मुताबिक, मुस्लिम जनसंख्या 57.3% ( 90% कश्मीरी) , हिन्दुओं की 42.22%, अनुसूचित जाति ( 8.74%) थे, जिससे इस क्षेत्र की संवेदनशीलता और भी बढ़ गई। इसके अलावा डोडा की कठुआ और उधमपुर से निकटता और एनएच-1ए के कारण आतंकवादी घाटी से आसानी से पहुँच पाए।
1993 से 2001 के बीच आतंकवादियों ने 310 हिन्दुओं को मार डाला। ये घटनाएँ सुनियोजित तरीके से चिनाब नदी के दक्षिण में हिन्दुओं की संख्या कम कर डेमोग्राफी बदलने के लिए किया गया। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि कुछ स्थानीय मुस्लिमों ने ‘भविष्य में आजादी’ की संभावना को देखते हुए हिन्दुओं के जमीन जायदाद, घर-द्वार को आपस में बाँट लिया।
पहले से असहाय हिन्दुओं का शोषण इस क्षेत्र में और बढ़ गया क्योंकि जिहादियों की संख्या यहाँ बढ़ने लगी। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र भी जिम्मेदार है क्योंकि 1950 में संयुक्त राष्ट्र के मध्यस्थ ओवेन डिक्सन ने 1950 में जनमत संग्रह के जरिए जम्मू-कश्मीर को विभाजित करने की कोशिश की थी। वह डोडा, राजौरी और पुंछ जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्र को घाटी में मिलाना चाहते थे और चिनाब नदी के उत्तर में सीमा बनाना चाहते थे।
पाक समर्थित आतंकवाद से डोडा त्रस्त
1990 तक डोडा में कश्मीर घाटी की तुलना में शांति थी। इस वक्त यहाँ के युवक पाकिस्तानी आतंकी शिविरों में प्रशिक्षण के लिए सीमा पार गए। इस दौरान यहाँ एक फ्रांसीसी इंजीनियर का अपहरण यहाँ हुआ था, मंत्री बीए किचलू के घर और उनके निजी सुरक्षा अधिकारी पर हमले हुए थे।
शुरुआत में आतंकवादी यहाँ सेना से बचने और पनाहगार के रूप में इस्तेमाल के लिए घुसे थे। 19 दिसंबर 1992 को बीजेपी के जिला महासचिव संतोष कुमार ठाकुर की उनके घर के बाहर हत्या कर दी गई। यहाँ से अल्पसंख्यकों को टारगेट कर हत्या करने का सिलसिला शुरू हुआ।
18 फरवरी 1993 को आतंकवादियं ने मोहन सिंह को उनके बिजरानी स्थित घर से अगवा कर लिया और प्रताड़ित किया। उनके शव को घोड़े की पीठ पर बाँधकर भगवा सहकारी भंडार के पास लटका दिया गया था।
उसी दिन कश्मीरा सिंह का भद्रवाह स्थित उनके आवास से अपहरण कर लिया गया था। छह दिन बाद उनका शव पास की एक नहर में मिला, जिस पर यातना के स्पष्ट सबूत थे। दो दिन बाद बीजेपी सदस्य दीवान चंद की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
पूर्व भाजपा सदस्य और जनता दल के राजनेता मस्त नाथ योगी के भतीजे को 14 अप्रैल 1993 को भद्रवाह में हत्या कर दी गई। मस्त नाथ योगी को इसलिए मारा गया, क्योंकि उन्होंने डोडा में आतंकवाद को खत्म करने के लिए सेना के हस्तक्षेप का समर्थन किया था।
हिंदू रक्षा समिति के नेता सतीश भंडारी की एक महीने बाद ही 10 मई को डोडा में हत्या कर दी गई। जून के अंत में भद्रवाह में तीन हिंदू युवकों का अपहरण कर उन्हें प्रताड़ित किया गया। 30 जून को उनमें से एक भागने में कामयाब रहा, लेकिन बाकी दो को मौत के घाट उतार दिया गया।
हिन्दुओं के कत्लेआम का सबसे बुरा वक्त
14 अगस्त 1993 को पाँच हथियारबंद आतंकवादियों ने किश्तवाड़ से जम्मू जा रही एक यात्री बस को रोक लिया। इसके बाद हमलावरों ने हिंदू पुरुष यात्रियों को अलग कर दिया और उन्हें अंधाधुंध गोलियों से भून दिया गया। इस दौरान हिंदू बच्चों को भी नहीं बख्शा गया था। ये पाकिस्तान की आजादी का दिन था।
आतंकवादियों ने चौदह लोगों की हत्या कर दी और दो अन्य को गंभीर रूप से घायल कर दिया, जिनमें से एक की अस्पताल में मौत हो गई। एक स्थानीय सरकारी अधिकारी का बेटा आरिफ हुसैन ने यह हमला किया था। वह आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन का नेता था।
डोडा में 1994 आते आते आतंकवाद पूरी तरह हावी था। पूरी घाटी के आकार के इस क्षेत्र में सेना की केवल दो बटालियन, बीएसएफ की सात और सीआरपीएफ की एक बटालियन रह गई। स्थानीय प्रशासन ने भी डरे सहमे बचे हुए हिंदू समुदाय को कोई सुरक्षा मुहैया नहीं कराई।
मई में गोहा में करतार सिंह और मान सिंह के घरों पर धावा बोलने की कोशिश कर रहे दो आतंकवादियों को गोली मार दी गई थी। लेकिन उन्हें आतंकियों के बदले की कार्रवाई का डर था। स्थानीय प्रशासन पर कोई विश्वास नहीं था इसलिए गोहा और गुंडोह तहसील के कलजुगासर, सीरू और कुठेरा जैसे गाँव के 822 हिन्दू पलायन कर हिमाचल प्रदेश के चंबा चले गए।
20 मई को आसपास के जिलों से लगभग 2,000 मुस्लिम भीड़ 4-5 घंटे पैदल चलकर गोहा पहुँची। इनलोगों ने करतार सिंह के रिश्तेदारों के 13 घरों को आग के हवाले कर दिया और एक आतंकवादी का शव अपने साथ ले गई।
27 मई को भाजपा नेता बलवंत सिंह की हत्या होते-होते बची, लेकिन उनका सुरक्षा गार्ड घायल हो गया। इसके अलावा, उसी दिन हडयाल-ग्राभा में जिहादियों ने तीन दलित भाइयों की हत्या कर दी। खबरों के मुताबिक, सुंबर में भी चरमपंथियों ने तीन लोगों का सिर कलम कर दिया।
30 मई को भद्रवाह में भाजपा के जिला उपाध्यक्ष स्वामी राज कटल की एक महिला समेत दो अन्य लोगों के साथ गोली मारकर हत्या कर दी गई। कटल एक साल पहले हुए एक हत्याकांड में बाल-बाल बच गए थे। 7 जून को एके-47 से लैस तीन आतंकवादियों ने रुचिर कुमार की हत्या कर दी। वह बीजेपी के तहसील अध्यक्ष थे।
इसके बाद भद्रवाह के वासक डेरा में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए। मुस्लिम बहुल किला मोहल्ला में दस हिंदू घरों को लूट लिया गया और नष्ट कर दिया गया। इसके एक हफ्ते से भी कम समय बाद जीलाना के लोक निर्माण विभाग के एक जूनियर इंजीनियर की हत्या कर दी गई।
भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुओं की हत्याओं की आलोचना की। 23 जून को भाजपा नेताओं ने अपने “डोडा बचाओ” प्रदर्शन के तहत विरोध प्रदर्शन शुरू किया और इस गंभीर स्थिति के मद्देनजर इस क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित करने की माँग की। भाजपा कार्यकर्ताओं, सांसदों, विधायकों और पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को हिरासत में ले लिया गया।
हत्याओं का दौर जारी रहा और 18 सितंबर को गंडोह के बथोली गाँव में छह हिंदुओं की हत्या कर दी गई तथा 19 दिसंबर को पुशाल गाँव में बीजेपी कार्यकर्ता सुमित कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
हिंदुओं ने जवाबी कार्रवाई की कोशिश की
इलाके के हिंदू समुदाय ने आतंकवादियों के अत्याचारों से त्रस्त होकर जवाबी कार्रवाई की। भद्रवाह के पास मोंडा गाँव में गुस्साए हिंदुओं ने एक आतंकवादी के घर में आग लगा दी। कुछ जगहों पर आत्मरक्षा के लिए हथियार भी जुटाना शुरू कर दिया।
मई में चंबा आकर बसे लोगों में भी यह जोश साफ दिखाई दे रहा था। ज़्यादातर लोग 30 जून तक अपने-अपने गाँव लौट आए थे, लेकिन वे सुरक्षा के लिए बंदूक रखने पर अड़े रहे।
सरकार ने ग्राम रक्षा समिति (वीडीसी) कार्यक्रम फिर से शुरू किया। ये कार्यक्रम बढ़ती हिंसा के बीच हिंदुओं के पलायन को रोकने के प्रयास के लिए काफी जोखिम वाले क्षेत्रों में पूर्व सैनिकों और कमजोर समुदायों को आत्मरक्षा के लिए हथियार प्रदान करता था। 1995 के अंत तक डोडा जिले के लगभग 330 समुदाय वीडीसी के अंतर्गत आ गए थे।
इसके अलावा आतंकवाद विरोधी अभियानों में मदद के लिए डोडा में सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई। सितंबर 1994 में सीआई (आतंकवाद विरोधी) बल (डेल्टा) का गठन किया गया। इसमें सीआरपीएफ की 35 कंपनियां, बीएसएफ की छह बटालियन और राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) की चार बटालियनें शामिल थीं।
फोटो साभार- स्वराज्य
1996 की शुरुआत तक कई कुख्यात आतंकियों का सफाया हो चुका था। लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के ज़िला कमांडर जुलकर नैन, हरकत-उल-अंसार (एचयूए) के ज़िला कमांडर राजा दाउद मन्हास और हिज़्बुल मुजाहिदीन (एचएम) के प्रांतीय कमांडर जावेद कुरैशी भी इसमें शामिल थे। इससे आतंकवादी समूह काफी कमजोर पड़ा, लेकिन हिंदुओं की हत्याएँ फिर भी नहीं रुकीं।
हिंदुओं की हत्या का सिलसिला जारी
आतंकवादियों ने हिंदुओं को मारने के लिए मुखबिरी का संदेह और झूठे आरोप लगाए और दिनदहाड़े हत्या करना शुरू कर दिया। 5-6 जनवरी की रात को बरसाला में 15 हिंदुओं की हत्या कर दी गई, क्योंकि स्वामी राज नामक एक स्थानीय हिंदू कथित तौर पर सुरक्षा बलों का मुखबिर था। 8-9 जून की रात को कमलारी में 9 ग्रामीणों की हत्या कर दी गई और 25 जुलाई को सारोधर में 13 अन्य लोगों की हत्या कर दी गई।
हालाँकि, डोडा में सुरक्षा बलों की संख्या कम कर दी गई क्योंकि बाद में और सैनिकों को तैनात करने के बजाय छह बीएसएफ बटालियनों को हटा दिया गया। यह घटनाक्रम कथित तौर पर उसी समय हुआ जब इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) ने घाटी के बाहर और डोडा सहित जम्मू क्षेत्र में अपने आतंकवाद के व्यापक प्रसार के लिए अपनी रणनीति बदल दी।
इस प्रकार, 1997 और 1998 में डोडा में सशस्त्र संघर्ष फिर से शुरू हो गया, जब लगभग 60 से 70 विदेशी आतंकवादियों ने इस क्षेत्र में घुसपैठ की। अक्टूबर 1997 में कुदधार में छह वीडीसी सदस्यों की हत्या कर दी गई। जिहादियों ने 1998 में सामूहिक हत्याओं का सिलसिला एक बार फिर शुरू कर दिया।
चंपानेरी गाँव के पास 19 जून 1997 को गाड़ी का इंतजार कर रहे एक बारात को पाँच आतंकवादियों ने निशाना बनाया। उन्होंने पुरुषों को महिलाओं से जबरन अलग किया और फिर 32 में से 25 पुरुषों को गोलियों से भून डाला। एक महीने बाद,कलाबन में हुए एक और हमले में 23 हिंदू मारे गए। 27 जुलाई को किश्तवाड़ के पास हॉर्ना और केशवान गाँवों में 16 हिंदुओं की हत्या कर दी गई।
आतंकवाद का जाल हिमाचल प्रदेश तक फैला
आतंक किसी एक क्षेत्र या जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं था। इस साल उधमपुर के निकटवर्ती इलाके प्राणकोट, डाकीकोट और थूब के साथ-साथ डोडा के बाहरी इलाके वंधामा में भी अल्पसंख्यकों का उतना ही भयावह नरसंहार हुआ। इसके अलावा, 27 जून 1997 को भद्रवाह के आतंकवादियों ने हिमाचल प्रदेश में चार जड़ी-बूटी बीनने वालों की हत्या कर दी। 2 और 3 अगस्त 1997 की रात को डोडा से चंबा जिले में घुसते समय आतंकवादियों ने बारागढ़-पांगी मार्ग पर स्थित मजदूर शिविरों को निशाना बनाया।
कलाबन में जब मुस्लिम मजदूरों को हिंदुओं से अलग किया गया, तो उन्हें उनके तंबुओं की रस्सियों से बाँध दिया गया। फिर या तो उन्हें गोली मार दी गई या उनका गला काट दिया गया।
फोटो साभार- स्वराज्य
इसके बाद वे सतरुंडी की ओर बढ़े, जहाँ उन्होंने 11 और मजदूरों की हत्या कर दी और 12 अन्य को घायल कर दिया। कुली के रूप में काम करने वाले नौ मजदूरों का भी अपहरण कर लिया गया और बाद में तीन मुसलमानों को छोड़ दिया गया। 4 अगस्त को, तीसा और शिम्बा गाँवों में 35 पीड़ितों का अंतिम संस्कार किया गया।
इसको लेकर मुस्लिम गुज्जर चरवाहा गुटों और हिंदू गद्दियों के बीच तनाव पैदा हो गया। आतंकियों ने मौके का फायदा उठाकर हिंदुओं पर और भी बड़ा हमला किया। 18 अगस्त को तीन गद्दियों का अपहरण कर लिया गया। उन्हें प्रताड़ित किया गया और फिर उनकी हत्या कर दी गई। इनकी हत्या एक मुस्लिम गुज्जर की वजह से हुई थी। उसने आतंकवादियों को बताया कि उन्होंने जो हथियार छिपाए थे उनके बारे में गद्दियों ने ही सेना को जानकारी दी।
कारगिल युद्ध और ‘ऑपरेशन विजय’ के वक्त हिन्दुओं की स्थिति
जैसे-जैसे समय बीतता गया हिंदुओं की स्थिति और भी खराब होती गई। ‘ऑपरेशन विजय‘ और 1999 में कारगिल पर पाकिस्तानी आक्रमण का दूर-दराज के इलाकों पर असर पड़ा। राजौरी-पुंछ क्षेत्र में पाकिस्तानी आक्रमण की आशंका को देखते हुए 9-सेक्टर के सैनिकों को किश्तवाड़ से हटाकर वहाँ रियर एरिया सिक्योरिटी ड्यूटी पर तैनात करना पड़ा।
हमलावरों ने सैनिकों की कमी का फायदा उठाया। आतंकियों ने अनगिनत सेना के सूत्रों और मुखबिरों की हत्या कर दी। यहाँ तक कि कुछ लोगों की तो ज़िदा खाल भी उधेड़ दी गई।
20 जुलाई 1999 को लियोटा गाँव में आतंकवादियों ने आठ महिलाओं सहित 15 हिंदुओं को निशाना बनाया। इसके बाद सैनिकों की संख्या यहाँ बढ़ाई गई। राष्ट्रीय राइफल्स की दो बटालियनों और सिख लाइट इन्फैंट्री की 5वीं बटालियन यहाँ तैनात की गई। वर्ष 2000 में हिंदुओं ने हिंसा का एक और दौर झेला। 1 अगस्त 2000 को मुरलाकोट में 5, कुंडा में 12 और धम्मोता में 4 हिंदुओं की हत्या कर दी गई। 2 अगस्त 2000 को कियार में 8 हिंदुओं की जान ले ली गई।
21 नवंबर को खानपुरा में 4 हिंदुओं का नरसंहार हुआ और 24 नवंबर को 5 अन्य लोगों की भी इसी तरह हत्या कर दी गई। इन छह सामूहिक हत्याओं का जिक्र मेजर जनरल डीजी बख्शी की किताब “किश्तवाड़ कॉल्ड्रॉन” में किया गया है।
हिंदुओं के खिलाफ क्रूरता अगले साल भी जारी रही। 10 मई 2001 को आतंकवादियों ने स्थानीय पुलिस चौकी से पुलिसकर्मियों का अपहरण कर उन्हें अपने हथियार सौंपने के लिए कहा। हालाँकि पुलिस ने ऐसा नहीं किया। परिणामस्वरूप सात पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया गया, जबकि 3 घायल हो गए।
20 जुलाई 2001 को तागुड़ गाँव के ऊपर एक चरागाह में चार ग्रामीणों की हत्या कर दी गई और अगले दिन चीरजी के पास आठ और लोगों को मार डाला गया। इसके बाद 3 और 4 अगस्त को सरहोट धार में सबसे बड़ी घटना घटी।
सीढ़ी के 22 दलित और राजपूतों को आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया। ये लोग अपने मवेशियों को चराने के लिए ऊंचाई वाली जगह शरोट धार लेकर गए थे। इस दौरान आतंकियों ने हिंदुओं का मज़ाक भी उड़ाया और कहा, “क्या पता भी है कि बंदूक क्या होती है,” और कहा, “क्या उन्हें पता है कि बंदूक से क्या निकलता है?”
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वर्ष 2002 भी हिंदुओं के लिए कोई राहत लेकर नहीं आया। 6 जनवरी को लुड्डू और रामसू में 8 हिंदुओं की हत्या कर दी गई तथा 9 अप्रैल को डोडा के नागनी में एक परिवार के पाँच सदस्यों जिसमें दो महिलाएँ और तीन बच्चे शामिल थे, उनकी हत्या कर दी गई।
थर्वा और कुलहंड में 2006 में आखिरी बड़ा नरसंहार हुआ। 30 अप्रैल को, भारतीय सेना के वेश में आए आतंकवादियों ने इलाके को घेर लिया और स्थानीय लोगों को गाँव के मुखिया के घर इकट्ठा होने को कहा। आतंकवादियों ने तब तक गोलीबारी की जब तक उनके कारतूस खत्म नहीं हो गए। इस दौरान 22 लोग मारे गए जिसमें एक तीन साल की बच्ची और गाँव का मुखिया भी शामिल था।
उसी शाम, उधमपुर ज़िले के बसंतगढ़ में आतंकवादियों ने दो स्थानीय चरवाहों, मोहम्मद सिराजुद्दीन और उनके बेटे रुकुनुद्दीन को पास के लालोन गल्ला नामक घास के मैदान में ले जाने के लिए कहा। कई हिंदू चरवाहों ने वहाँ गर्मियों के लिए डेरा डाला हुआ था। 13 हिंदू चरवाहों को बुलाया गया और उन्हें जंगल में ले जाया गया जहाँ उन्हें मार डाला गया ।
13 मई को आतंकवादियों ने डोडा शहर में भाजपा कार्यकर्ताओं और कुलहंड से विस्थापित हुए स्थानीय लोगों के एक जुलूस पर ग्रेनेड से हमला किया। इससे दो पार्टी कार्यकर्ताओं की मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए।
यह हमला मई 1998 में हुए डेसा नरसंहार की याद दिलाता है, जब जिहादियों ने शोक मनाने वाले लोगों पर हमला करके पाँच लोगों की जान ले ली थी। ये लोग पहले मारे गए चार वीडीसी सदस्यों के शव लेकर अपने गाँव लौट रहे थे।
लश्कर ए तैयबा के टारगेट पर हिन्दू
लश्कर-ए-तैयबा के गाजियान-ए-सफ-शिकन (इस्लामी महान योद्धा और युद्धक्षेत्र) के मुहम्मद ताहिर नक्काश ने अपने 2001 के अंक में हिंदुओं के खिलाफ बेलगाम हिंसा की प्रशंसा की और उन्हें नीचा दिखाया। लाहौर के गाजी मुहम्मद शफीक अबू साद ने भी हिंदुओं पर हुए भीषण हमलों पर जश्न मनाया
ग्रामीण इलाकों में हिंदू घरों की लूट को ‘युद्ध लूट’ कहा गया। इंटरसेप्ट किए गए वायरलेस ट्रांसमिशन ने खुलासा हुआ कि 2006 के कुलहंड और थारवा हमलों से पहले भी आतंकवादी कमांडरों ने अपने कैडरों को विशेष रूप से हिंदुओं को मारने के लिए कहा था।
हिंसा की घटना में भले ही कमी आई हो, लेकिन हिंदुओं की मौत का सिलसिला जारी है। ग्राम रक्षा समितियों (वीडीजी) के सदस्य कुलदीप कुमार और नज़ीर अहमद 7 नवंबर 2024 को किश्तवाड़ में मृत पाए गए, उनकी आँखें निकाल ली गई थी।
“कश्मीर टाइगर्स” के आतंकवादियों ने इसकी ज़िम्मेदारी ली और दूसरों को वीडीजी में शामिल न होने की चेतावनी दी। चरवाहे मान सिंह गाड़ी की तार से गला घोंटकर हत्या की तस्वीरें बाद में सितंबर 2024 में बसंतगढ़ मुठभेड़ में मारे गए पाकिस्तानी आतंकवादियों के फोन पर मिलीं।
पहलगाम में हिंदू पर्यटकों को निशाना बनाकर किया गया आतंकवादी हमला और रियासी में हिंदू तीर्थयात्रियों पर हमला भी ऐसी ही कड़ी है। ये हिंदुओं के विरुद्ध की गई भयावह आतंकी हमले को दर्शाता है।
आतंकवादियों ने पूर्ववर्ती राज्य के सभी क्षेत्रों में हिंदुओं को निशाना बनाया, राजौरी से लेकर, जहाँ अक्टूबर 2005 में हिंदू पुरुषों का गला रेत दिया गया था, डोडा जिले के सुदूर इलाकों तक। गौरतलब है कि 1 और 2 जनवरी 2023 को आतंकियों ने राजौरी के डांगरी गाँव में हिंदुओं पर फिर से हमला किया, जिसमें 2 बच्चों सहित 7 लोगों की मौत हो गई और 9 घायल हो गए।
कश्मीर में हिंदू नरसंहार का मुद्दा छाया
कश्मीरी हिंदुओं का दर्द किसी से छिपा नहीं है। जहाँ जम्मू संभाग, खासकर डोडा में, हिंदुओं को गोलियों और यातनाओं का सामना करना पड़ा, वहीं घाटी में उनकी हालत बद से बदतर होती गई। 2003 का नंदीमार्ग नरसंहार इस समुदाय पर हुई हिंसा की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक माना जाता है।
23 मार्च की उस मनहूस रात को 24 हिंदुओं की हत्या कर दी गई, जिनमें उनके बच्चे भी शामिल थे। पुलवामा इलाके में हथियारबंद आतंकवादियों और कुछ स्थानीय युवकों ने हिंदू परिवारों को इकट्ठा किया और अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। पाकिस्तान समर्थित जिहादियों की “रालिव, गालिव, चालिव” योजना ने अंततः उन्हें उनके घरों से बेदखल कर दिया और उन्हें अपनी ही मातृभूमि में शरणार्थियों की जिंदगी जीने पर मजबूर कर दिया।
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इसी प्रकार, अमरनाथ यात्रा भी जिहादियों का प्राथमिक लक्ष्य रही है, जिसके परिणामस्वरूप भयावह हमलों में बड़ी संख्या में हिंदुओं की जान गई है। जैसे- 2002 में पहलगाम आधार शिविर पर हुआ हमला, जिसमें कई अन्य लोगों के अलावा 22 तीर्थयात्री मारे गए थे।
डोडा को ‘कश्मीर घाटी’ बनाना चाहते हैं आतंकी
क्षेत्र के हिंदुओं पर आतंकवाद के असर पर वैश्विक स्तर पर शायद ही कभी वह ध्यान दिया जाता है। कश्मीरी पंडितों के घाटी से निष्कासन की बात हो या डोडा से हिन्दुओं का पलायन।
आतंकवादियों का लक्ष्य डोडा को एक और कश्मीर बनाना था क्योंकि इस क्षेत्र में रक्तपात और दबाव के जरिए हिंदू आबादी को खत्म करने की साजिश चल रही थी। हालाँकि मुस्लिम कट्टरपंथी और उनके वामपंथी-उदारवादी सहयोगी इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। उनके लिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर एक खास समुदाय की ‘नाज़ुक’ भावनाओं का सम्मान करना ज्यादा जरूरी है। हिंदुओं के जीवन का इनके लिए कोई मोल नहीं है।
( मूल रूप से ये अंग्रेजी में लिखी गई लेख है। इसे यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं। )
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने नेपाल सीमा से सटे सात जिलों में अवैध मजहबी ढाँचों के खिलाफ अभियान चलाया है। बीते 60 दिनों में सरकार ने श्रावस्ती, बलरामपुर, बहराइच, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, पीलीभीत और लखीमपुर खीरी जैसे जिलों में 298 अवैध मस्जिद, मदरसे, मजार और ईदगाह चिन्हित किए।
इनमें से 223 को नोटिस जारी किए गए, 198 को सील करते हुए 130 ढाँचों को पूरी तरह समतल कर दिया गया। ये कार्रवाई सिर्फ अवैध कब्जों के खिलाफ नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग, धर्मांतरण और डेमोग्राफिक बदलाव की आशंकाओं के चलते की जा रही है।
इन इलाकों में मस्जिदों और मदरसों की संख्या में तेजी से बढ़ती जा रही है, संदिग्ध फंडिंग और जनसंख्या संतुलन में बदलाव सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन चुका है।
जिलेवार कार्रवाई और आँकड़े: कौन सा जिला सबसे आगे?
योगी सरकार की सबसे सख्त कार्रवाई श्रावस्ती जिले में हुई जहाँ 149 अवैध निर्माण चिन्हित किए गए, जिनमें से 140 को सील किया गया और 37 को गिराया गया। इसके बाद महराजगंज में 45 अवैध निर्माण पाए गए, जिनमें से 24 सील और 31 ध्वस्त किए गए।
बलरामपुर में 41 निर्माण चिन्हित हुए, जिनमें 19 को सील और 21 को ढहाया गया। सिद्धार्थनगर में 23 अवैध निर्माणों में से 21 को ध्वस्त किया गया, वहीं बहराइच में 25 चिन्हित में से 15 को गिरा दिया गया। लखीमपुर खीरी में 13 अवैध निर्माण का पता चला, जिनमें 10 को सील किया गया और 3 गिराए गए।
पीलीभीत में 2 अवैध निर्माण चिन्हित हुए और दोनों पर सीधा बुलडोजर चला। इन सात जिलों की कुल 570 किलोमीटर लंबी सीमा नेपाल से जुड़ी है, जो संवेदनशील मानी जाती है। इस कार्रवाई से पहले सभी ढाँचों को नोटिस देकर कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई थी।
विदेशी फंडिंग, डेमोग्राफिक बदलाव और राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा
आयकर विभाग और गृह मंत्रालय की रिपोर्टों ने खुलासा किया है कि नेपाल सीमा से सटे इलाकों में मजहबी ढाँचों के निर्माण के लिए दक्षिण भारत (खासकर तमिलनाडु) और खाड़ी देशों से करोड़ों रुपए की फंडिंग हुई है।
यह फंडिंग नकद और UPI जैसे डिजिटल माध्यमों से की गई, जिसमें एक मामले में एक व्यक्ति के खाते में 12 करोड़ रुपए पाए गए। रिपोर्टों में लगभग 150 करोड़ रुपए की संदिग्ध फंडिंग का पता चला है, जिसका इस्तेमाल मस्जिदों, मदरसों और मजारों के निर्माण व धर्मांतरण में किया गया।
इसके साथ ही सीमा के आसपास के गाँवों में मुस्लिम आबादी में तेजी से बढ़ोतरी और हिंदू आबादी में गिरावट देखी गई है। SSB की रिपोर्ट बताती है कि 2018 से 2021 के बीच मस्जिदों की संख्या 738 से बढ़कर 1000 और मदरसों की संख्या 500 से बढ़कर 645 हो गई।
नेपाल की ओर भी इसी तरह मुस्लिम आबादी 20 साल में दोगुनी हो चुकी है। उत्तराखंड के सीमावर्ती जिले पिथौरागढ़, चम्पावत और ऊधमसिंह नगर भी अब इस खतरे से अछूते नहीं हैं। इन सारी गतिविधियों को देखते हुए यह आशंका गहराई है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में एक ‘मुस्लिम पट्टी’ बसाने की कोशिश की जा रही है, जो बांग्लादेश से शुरू होकर पाकिस्तान तक फैले एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा हो सकती है।
भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ को लेकर चल रहा विवाद अभी थमा नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप अपनी खीझ निकालने के लिए मीडिया में कह रहे हैं कि वो भारत पर लगाए गए टैरिफ के बारे में अभी बात नहीं करेंगे। वहीं दूसरी तरफ चीन है जो इस समय सामने से भारत के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है। चीन के प्रमुख मीडिया संस्थान ग्लोबल टाइम्स ने इसे लेकर ट्वीट भी किया है।
अपने ट्वीट में ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने हिंदू कहावत का जिक्र करते हुए हिंदी-चीनी को भाई-भाई बताया। ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक्स पर पोस्ट किया- “जैसा कि हिंदू कहावत है कि अगर आप अपने बंधु की सहायता करेंगे तो आपकी मदद अपने आप हो जाएगी… एक अच्छे भारतीय-चीन संबंध क्षेत्र में और विश्व में सकारात्मक प्रभाव लाएँगे।”
आगे पोस्ट में ये भी लिखा है- “हम शुभेच्छा के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन में स्वागत करते हैं ताकि हमारे द्विपक्षीय संबंधों में सुधार हो और एक नया अध्याय शुरू हो जहाँ भारतीय और चीनी भाई-भाई बनकर साथ-साथ रहें।”
#Editorial: The recent “warming” of China-India ties clearly shows that Washington’s attempt to draw New Delhi into its so-called “Indo-Pacific strategy” to contain China does not align with India’s independent foreign policy. https://t.co/IK01CUssQBpic.twitter.com/9gDrNFx7fH
इस पोस्ट के साथ ग्लोबल टाइम्स ने एक संपादकीय शेयर किया है। जिसका शीर्षक है- आखिर क्यों पीएम मोदी की चीन आने की खबर ने खींचा वैश्विक ध्यान? इस आर्टिकल में भारत और चीन की प्राचीन सभ्यता, बढ़ती जनसंख्या, उभरती अर्थव्यवस्था की बात है। साथ ही इसमें ये भी कहा गया है कि दोनों ही देश इस समय उस पड़ाव पर हैं कि वे वैश्विक ध्यान अपनी ओर खींच सकते हैं।
संपादकीय में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर के चीन दौरे की चर्चा है। साथ ही ये भी लिखा है कि अगर मोदी इस बार चीन आते हैं तो चीन-भारत के सकारात्मक संबंधों को धार मिलेगी।
दिलचस्प बात ये है कि चीनी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स जो पिछले कुछ सालों से लगातार सिर्फ भारत विरोधी बात करने के लिए कुख्यात रहा, उसने अपने इस आर्टिकल में पश्चिमी मीडिया को भी घेरा है जो टैरिफ विरोध को अमेरिका के विरुद्ध दिखा रहे हैं। लेख में कहा गया है कि चीन और भारत के बीच सुधरते हालात अमेरिका अपनी ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ के तहत भारत को चीन के विरुद्ध करना चाहता है।
किसानों के हित से नहीं करेंगे समझौता- पीएम मोदी
बता दें कि भारत-अमेरिका के बीच व्यापार डील को लेकर हो रहे विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को साफ बताया है कि वो अपने देश के किसानों के हित विरुद्ध नहीं जाएँगे। उनके लिए देश के किसानों का हित ही सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसी भी कीमत पर भारत अपने देश के किसानों, मछुआरों और डेयर कृषकों के साथ समझौता नहीं करेगा।
पीएम मोदी ने यह भी कहा है कि वो अच्छे से जानते हैं कि इसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन वो इसके लिए तैयार हैं और कोई भी दबाव पड़ने पर पीछे नहीं हटेंगे।
जब तक नहीं सुलझेगा मामला नहीं होगी बात- डोनाल्ड ट्रंप
वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ओवल ऑफिस में पीसी के दौरान सवाल पूछे जाने पर कहा है कि वो अभी नए सिरे से बिलकुल बात नहीं करेंगे। कम से कम तब तक तो नहीं जब तक वो इस मामले को नहीं सुलझा लेते।
जानकारी के लिए बता दें कि अमेरिका ने चीन पर 30 प्रतिशत टैरिफ लगाया है। वहीं पहले भारत पर 25% टैरिफ लगाया था, जो 7 अगस्त से लागू हो गया। बाद में घोषणा की 25% अतिरिक्त टैक्स लगेगा जिसके बाद ये टोटल 50% हो गया।
ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, भारत रूस से तेल की खरीद करता है और ट्रंप के दिमाग में ये है कि इसी कमाई को रूस, यूक्रेन के विरुद्ध हथियार खरीदने में लगाता है।
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने गुरुवार (7 अगस्त) को चुनाव आयोग पर वोटर फर्जीवाड़े का आरोप लगाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें राहुल गाँधी ने सबूतों के नाम पर सिर्फ एक लोकसभा सीट के एक क्षेत्र का डेटा दिखाकर खानापूर्ति करने की कोशिश की और चुनाव आयोग के अधिकारियों को परिणाम भुगतने की धमकी दी। राहुल गाँधी फर्जी वोटरों के जैसे आरोपों के जरिए चुनाव आयोग को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, वैसे ही एक मामले में 2023 में यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं को फर्जी वोटर कार्ड के साथ गिरफ्तार किया गया था।
EC के अधिकारियों को धमकाते हुए क्या बोले राहुल गाँधी?
राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कई ऐसे दावे किए जिनका तथ्यों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। हालाँकि, चुनाव आयोग के अधिकारियों को धमकाने में राहुल गाँधी ने कोई कसर नहीं छोड़ी, उन्होंने अधिकारियों को धमकाते हुए कहा कि आयोग को अब उन्हें और देश के लोगों को जानकारी देनी ही होगी।
राहुल ने आगे कहा, “अगर वे जानकारी नहीं देते हैं तो उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। इसमें शामिल हर पोलिंग अधिकारी को परिणाम भुगतने होंगे, चाहे वो सीनियर हो या जूनियर। एक दिन विपक्ष सत्ता में आएगा और तब आप देखेंगे कि हम क्या करेंगे।”
New Delhi: Lok Sabha LoP Rahul Gandhi says, "Now, the Election Commission must provide us and the people of India with that information. Because if they don’t, there will be consequences. There will be consequences for every single polling officer involved in this, regardless of… pic.twitter.com/7QI3zXKnQl
जब फर्जी वोटर आईडी के साथ गिरफ्तार हुए यूथ कॉन्ग्रेस के नेता
राहुल गाँधी की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के केंद्र में फर्जी वोटरों से जुड़ा मुद्दा ही रहा। हालाँकि, जैसे फर्जी वोटरों के मामले में राहुल गाँधी चुनाव आयोग को अब घेरना चाहते हैं, वैसे ही एक मामले में उनकी पार्टी की युवा इकाई यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है।
नवंबर 2023 में केरल में यूथ कॉन्ग्रेस के नेता विक्रम, फैनी और बिनिल बीनू को पुलिस ने गिरफ्तार किया गया था। इन तीनों ने यूथ कॉन्ग्रेस के संगठन के चुनावों में मोबाइल ऐप की मदद से फर्जी वोटर आईडी कार्ड बनाए थे। यह ऐप यूथ कॉन्ग्रेस के नेता जैसन द्वारा बनाई गई थी और उसने भी पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया था।
इन संगठन चुनावों में यूथ कॉन्ग्रेस के नेता राहुल ममकोटातिल को राज्य इकाई का अध्यक्ष चुना गया था। बाद में पुलिस ने उससे भी पूछताछ की थी। पुलिस ने यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं के कब्जे से लैपटॉप, मोबाइल फोन और चुनाव के फर्जी आईडी कार्ड जब्त किए थे। चुनाव आयोग के एक अधिकारी की शिकायत पर यह केस दर्ज किया गया था।
पुलिस ने रेड के दौरान तब 24 फर्जी आईडी कार्ड बरामद किए थे जिनमें तमिल ऐक्टर अजित का फर्जी वोटर आईडी कार्ड भी शामिल थी। बीजेपी ने तब आरोप लगाया था कि इस मामले की जानकारी केसी वेणुगोपाल जैसे बड़े कॉन्ग्रेस नेताओं को भी थी।