गुजरात के अहमदाबाद में पुलिस ने हिन्दू और जैन मंदिर से मूर्तियाँ चोरी करने वाला एक गैंग पकड़ा है। पुलिस ने इस गैंग के 2 चोर को गिरफ्तार किया है। इनमें से एक 32 साल का यासीन शेख जबकि दूसरा 30 वर्ष का अमीन उर पठान है। इसी गैंग के तीसरे चोर को भी बंगाल में पकड़ा गया है। इसका नाम अहसामुद्दीन है।
इन चोरों ने जैन और हिन्दू मंदिरों को निशाना बना कर कई जगह मूर्तियाँ चोरी की थीं। पुलिस ने बताया है कि इनके खिलाफ पहले से ही डेढ़ दर्जन मामले दर्ज हैं। यह पूरा खुलासा गुजरात के ही नवसारी के एक जैन मंदिर में हुई चोरी के बाद खुला। यहाँ बिलिमोरा इलाके में स्थित एक मंदिर में पुलिस को चोरी की शिकायत मिली थी।
चोरों ने यहाँ से मूर्तियों समेत कई अन्य कीमती सामान चुरा लिए थे। इसके अलावा गाँधीनगर के अदालज थानाक्षेत्र में भी एक मंदिर को निशाना बना कर मूर्तियों के साथ अन्य महँगी वस्तुएँ चोरी कर ली गईं थीं। इन चोरियों का खुलासा करने के लिए अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की टीम को लगाया गया था।
पुलिस ने मामले की जाँच के बाद अमीन उर पठान और यासीन शेख नाम को चिन्हित किया। ये दोनों मूल रूप से पश्चिम बंगाल के निवासी निकले। अभी यह अहमदाबाद की चंदोला झील के पास बंगाली कॉलोनी में रह रहे थे। इन दोनों से जब पूछताछ की गई तो इन्होनें अपने गिरोह के तीसरे साथी के तौर पर अहसामुद्दीन शेख का नाम बताया।
पूछताछ में पता चला कि अहसामुद्दीन शेख गुजरात से ट्रेन पकड़ कर कोलकाता भाग रहा है। अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने पश्चिम बंगाल रेलवे पुलिस से सम्पर्क किया और अहसामुद्दीन को ट्रेन में ही गिरफ्तार कर लिया गया। अहसामुद्दीन भी मूलतः पश्चिम बंगाल का ही निवासी है।
गिरफ्तार किए गए अमीन उर पठान और यासीन शेख के पास से लगभग ₹7 लाख के सामान बरामद किए गए हैं। ये सामान मंदिरों से चोरी कर के जुटाए गए थे। दोनों चोरों से हुई पुलिस की पूछताछ में 5 ऐसे पुराने मामलों से भी पर्दा उठ गया जिसका अब तक खुलासा नहीं हो पाया था।
इसमें गुजरात के अलग-अलग जगहों में घरों व मंदिरों में की गई चोरी शामिल है। पुलिस को यह भी पता चला कि यासीन और अमीन उर के खिलाफ साल 2013 से 2018 के बीच लगभग 16 केस दर्ज किए गए हैं। इसमें से 10 मुकदमे अमीन उर पठान जबकि 6 केस यासीन शेख पर दर्ज हैं।
क्राइम ब्रांच की पूछताछ में यह भी सामने आया है कि अमीन उर पठान का गिरोह पहले घरों व मंदिरों की रेकी कर के अपने टारगेट सेट करता था। बाद में मौका देख कर यहाँ हाथ साफ कर दिया जाता था। यह भी सामने आया है कि इन्होने कई और जगहों को निशाने पर लिया था लेकिन उससे पहले ही इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
राजस्थान के अजमेर में स्थित अढाई दिन का झोपड़ा मस्जिद के सर्वे की माँग उठी है। यह माँग अजमेर दरगाह के सर्वे की याचिका स्वीकार किए जाने के बाद उठाई गई है। यह दोनों पास में ही स्थित हैं। अजमेर के डिप्टी मेयर नीरज जैन ने कहा है कि पहले यह संस्कृत विश्वविद्यालय और मंदिर था। नीरज जैन ने ASI से इसका सर्वे और संरक्षण करने की माँग की है।
नीरज जैन ने कहा, “यह पाठशाला करीब 1000 साल पुरानी है और यहाँ स्वास्तिक के निशान, घंटियाँ और संस्कृत में लिखे शिलालेख पाए गए हैं। इसके बाद भी इस जगह पर अवैध कब्जा किया गया है। हम पहले माँग कर चुके हैं कि इस संस्कृत पाठशाला से अवैध कब्जा हटाया जाए और जो अनैतिक गतिविधियाँ हो रही हैं उन्हें रोका जाए। हम चाहते हैं कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इसे अपने कब्जे में लेकर संरक्षित और संवर्धित करें, जैसे नालंदा विश्वविद्यालय का पुनर्निर्माण किया गया है।”
नीरज जैन ने कहा, “हाल ही में जैन संतों ने भी इस जगह का दौरा किया था और महसूस किया कि यहाँ एक जैन मंदिर भी था, क्योंकि यहाँ जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ मिली हैं। उनका मानना है कि यह स्थान ना केवल धार्मिक आस्था का केंद्र था, बल्कि यहाँ संस्कृत की शिक्षा भी दी जाती थी। इस जगह का जिक्र कई ऐतिहासिक किताबों में भी मिलता है। मैं केंद्र और राज्य सरकारों से अनुरोध करता हूँ कि वह इस स्थान को संरक्षित करने और इसके गौरव को वापस लाने के लिए कदम उठाएँ।”
अढाई दिन का झोपड़ा का इतिहास
आज जिसे ‘अढाई दिन का झोंपड़ा‘ कहा जाता है, वो मूल रूप से विशालकाय संस्कृत महाविद्यालय (सरस्वती कंठभरन महाविद्यालय) हुआ करता था, जहाँ संस्कृत में ही विषय पढ़ाए जाते थे। यह ज्ञान और बुद्धि की हिंदू देवी माता सरस्वती को समर्पित मंदिर था। इस भवन को महाराजा विग्रहराज चतुर्थ ने अधिकृत किया था। वह शाकंभरी चाहमना या चौहान वंश के राजा थे। कई दस्तावेजों के अनुसार, मूल इमारत चौकोर आकार की थी। इसके हर कोने पर एक मीनार थी।
भवन के पश्चिम दिशा में माता सरस्वती का मंदिर था। 19वीं शताब्दी में, उस स्थान पर एक शिलालेख (स्टोन स्लैब) मिली थी जो 1153 ई. पूर्व की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि शिलालेख के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मूल भवन का निर्माण 1153 के आसपास हुआ था। हालाँकि, कुछ स्थानीय जैन किंवदंतियों का कहना है कि इमारत सेठ वीरमदेव कला द्वारा 660 ई में अधिकृत किया गया था। यह एक जैन तीर्थ के रूप में बनाया गया था और पंच कल्याणक माना जाता था।
मस्जिद में परिवर्तन
कहानी के अनुसार, 1192 ई. में, मुहम्मद गोरी ने महाराजा पृथ्वीराज चौहान को हराकर अजमेर पर अधिकार कर लिया। उसने अपने गुलाम सेनापति कुतुब-उद-दीन-ऐबक को शहर में मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया। ऐसा कहा जाता है कि उसने ऐबक को 60 घंटे के भीतर मंदिर स्थल पर मस्जिद के एक नमाज सेक्शन का निर्माण करने का आदेश दिया था ताकि वह नमाज अदा कर सके। चूँकि, इसका निर्माण ढाई दिन में हुआ था, इसीलिए इसे ‘अढाई दिन का झोंपड़ा’ नाम दिया गया।
हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक किंवदंती है। मस्जिद के निर्माण को पूरा करने में कई साल लग गए। उनके अनुसार, इसका नाम ढाई दिन के मेले से पड़ा है, जो हर साल मस्जिद में लगता है। मस्जिद के केंद्रीय मीनार में एक शिलालेख है जिसमें इसके पूरा होने की तारीख जुमादा II 595 AH के रूप में उल्लेखित है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तारीख अप्रैल 1199 ई है। बाद में, कुतुब-उद-दीन-ऐबक के उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने 1213 ई में मस्जिद में और निर्माण करवाया था।
मस्जिद पर सीता राम गोयल की रिपोर्ट
प्रसिद्ध इतिहासकार सीता राम गोयल ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेंपल: व्हाट हैपन्ड टू देम’ (‘Hindu Temples: What Happened To Them’) में मस्जिद का उल्लेख किया है। उन्होंने लेखक सैयद अहमद खान की पुस्तक ‘असर-उस-सनदीद’ का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया था कि अजमेर की मस्जिद, यानी अढाई दिन का झोंपड़ा, हिंदू मंदिरों की सामग्री का उपयोग करके बनाई गई थी।
मस्जिद पर अलेक्जेंडर कनिंघम की रिपोर्ट
अलेक्जेंडर कनिंघम को 1871 में ASI के महानिदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने ‘चार रिपोर्ट्स मेड ड्यूरिंग द इयर्स, 1862-63-64-65’ में मस्जिद का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। कनिंघम ने उल्लेख किया कि स्थल का निरीक्षण करने पर, उन्होंने पाया कि यह कई हिंदू मंदिरों के खंडहरों से बनाया गया था। उन्होंने कहा, “इसका नाम ‘अढाई दिन का झोंपड़ा’ इसके निर्माण की तेज गति को दिखाता है और यह केवल हिंदू मंदिरों के तैयार मुफ्त सामग्री के इस्तेमाल से ही संभव था।”
कनिंघम ने आगे रिपोर्ट में मस्जिद का दौरा करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य के लेफ्टिनेंट-कर्नल जेम्स टॉड का हवाला दिया। टॉड ने कहा था कि पूरी इमारत मूल रूप से एक जैन मंदिर हो सकती है। हालाँकि, उन्होंने उन पर चार-हाथ वाले कई स्तंभ भी पाए जो स्वभाविक रूप से जैन के नहीं हो सकते थे। उन मूर्तियों के अलावा, देवी काली की एक आकृति थी।
उन्होंने आगे कहा, “कुल मिलाकर, 344 स्तंभ थे, लेकिन इनमें से दो ही मूल स्तंभ थे। हिंदू स्तंभों की वास्तविक संख्या 700 से कम नहीं हो सकती थी, जो 20 से 30 मंदिरों के खंडहर के बराबर है। रिपोर्टों के अनुसार, 1990 के दशक तक, मस्जिद के अंदर कई प्राचीन हिंदू मूर्तियाँ बिखरी हुई थीं। 90 के दशक में, एएसआई ने उन्हें संरक्षित करने के लिए एक सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया था। अब यह पूरा मामला भी कोर्ट में ले जाए जाने की माँग हो रही है।
बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों के हिन्दुओं पर अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। उन्होंने बीते दिनों में विशेष कर ISKCON को निशाना बनाया है। अब ISKCON कोलकाता ने अपने अनुयायियों की सुरक्षा को देखते हुए कहा है कि वह बांग्लादेश में ना ही तिलक लगाएँ और ना ही भगवा वस्त्र पहनें। ISKCON ने साधुओं को सलाह दी है कि वह अपने इष्ट की पूजा छुप-छुप कर करें। इस बीच इस्लामी कट्टरपंथियों ने गिरफ्तार किए गए हिन्दू संत चिन्मय दास के वकील रामेन रॉय पर जानलेवा हमला किया। उनका अब ICU में इलाज चल रहा है।
ISKCON कोलकाता के प्रवक्ता और उपाध्यक्ष राधारमण दास ने बांग्लादेश में मौजूद ISKCON अनुयायियों और साधुओं को अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता बनाने को कहा है। उन्होंने कहा, “मैं सभी साधुओं और सदस्यों को सलाह दे रहा हूँ कि संकट की इस घड़ी में उन्हें खुद को बचाने और संघर्ष से बचने के लिए काफी सावधान रहना चाहिए। मैंने उन्हें भगवा कपड़े पहनने और माथे पर तिलक लगाने से बचने का सुझाव दिया है।”
राधारमण दास ने आगे कहा, “अगर उन्हें भगवा वस्त्र और तुलसी माला पहनने की ज़रूरत महसूस होती है, तो उन्हें इसे बाकी कपड़ों के अंदर छिपाकर रखना चाहिए और यह गर्दन के आसपास दिखाई नहीं देना चाहिए। अगर संभव हो तो उन्हें अपने सिर को भी ढकना चाहिए। कुल मिलाकर, उन्हें वह हर संभव उपाय करना चाहिए जिससे वे साधुओं की तरह न दिखें।”
राधारमण दास ने कहा कि बीते एक सप्ताह में बांग्लादेश के भीतर ISKCON के अनगिनत साधुओं और अनुयायियों को धमकियाँ मिल चुकी हैं। उन्होंने कहा है कि ऐसे समय में जो भी उपाय सुरक्षा के लिए जरूरी हो, वह करना चाहिए। उन्होंने बांग्लादेश में गिरफ्तार किए गए साधु चिन्मय कृष्ण दास पर भी चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि कुछ दिन पहले तक उनके सचिव से बात हो जाती थी, लेकिन बीते कुछ दिनों से यह भी संभव नहीं हो पा रहा है।
बांग्लादेश में कथित देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार चिन्मय कृष्ण दास का मुकदमा लड़ना भी एक हिन्दू वकील के लिए भारी पड़ा है। इस्लामी कट्टरपंथियों ने चिन्मय कृष्ण दास के वकील रामेन रॉय पर जानलेवा हमला किया है। इस हमले में वह गंभीर रूप से घायल हैं। उनका बांग्लादेश में ICU में इलाज चल रहा है। उनके इस हमले की जानकारी राधारमण दास ने दी है। उन्होंने रामेन रॉय के जल्द स्वस्थ होने की कामना की है। रामेन रॉय पर हमले को लेकर लोगों ने गुस्सा जताया है।
Please pray for Advocate Ramen Roy. His only 'fault' was defending Chinmoy Krishna Prabhu in court.
गौरतलब है कि बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार के अंतर्गत लगातार हिन्दू निशाने पर हैं। कई जगह इस्लामी कट्टरपंथी हिन्दू मंदिरों पर हमला कर रहे हैं, वह ISKCON की कई शाखाओं को भी बंद करवा चुके हैं। इस्लामी कट्टरपंथी लगातार ISKCON के लोगों को निशाना बना रहे हैं। हाल ही में यूनुस सरकार ने सारे कागज होने के बावजूद 63 साधुओं को बांग्लादेश से भारत नहीं आने दिया था। इससे पहले चिन्मय कृष्ण दास को जमानत नहीं दी गई थी। इसका विरोध करने पर हिन्दुओं को भी निशाना बनाया गया था।
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल को सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त ने 2015 के गुरु ग्रंथ साहिब बेअदबी मामले में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को कथित समर्थन देने के लिए सजा सुनाई है। इस फैसले के तहत सुखबीर बादल और उनके सहयोगियों को गुरुद्वारे के किचन और बाथरूम साफ करने का दायित्व सौंपा गया है। यही नहीं, अकाल तख्त ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से फक्र-ए-कौन सम्मान भी वापस ले लिया है।
अकाल तख्त के फैसले के मुताबिक, सुखबीर बादल वर्तमान में व्हीलचेयर पर हैं। सुखबीर सिंह बादल और साल 2015 में उनके कैबिनेट के साथियों को 3 दिसंबर को दोपहर 12 से 1 बजे तक गुरुद्वारे के बाथरूम-टॉयलेट साफ करने होंगे। इसके बाद उन्हें स्नान करना होगा और फिर लंगर सेवा में हाथ बंटाना होगा।
यह सजा सुखबीर बादल द्वारा अकाल तख्त के सामने बिना शर्त माफी माँगने के बाद दी गई है। उन्होंने अपने पुराने फैसलों में हुई गलतियों को स्वीकार किया है। उनका एक वीडियो भी सामने आया है। इसमें दिखता है कि ग्यानीजी उनकी गलतियाँ बताते हैं और सुखबीर बादल इसे स्वीकार करते हैं।
ग्यानी रघबीर सिंह जी उनसे पूछते हैं कि बेअदबी के विरोध में किए गए प्रदर्शन पर गोलियाँ चलाने वाले पुलिसवालों को तरक्की दी या नहीं, जिसका जवाब वह हाँ में देते हैं। इसके बाद वह कुछ केस वापस कराने सम्बन्धी प्रश्न पूछते हैं, इसका भी जवाब वह हाँ में देते हैं। इसके अलावा उनसे और भी कई प्रश्न पूछे गए। यह सभी गुनाह उन्होंने स्वीकार किए। जिसके बाद यह सजा सुनाई गई।
Big Breaking: Sukhbir Singh Badal admits his mistakes before Akal Takht Sahib. He acknowledged granting pardon to Sirsa Dera head Gurmeet Ram Rahim Singh in the blasphemy incident. He also admitted to promoting police officers who were involved in the killing of innocent Sikhs.… pic.twitter.com/8noNmnjgJa
शिरोमणि अकाली दल में उथल-पुथल के बीच दिया था इस्तीफा
इससे पहले सुखबीर सिंह बादल ने 16 नवंबर 2024 को शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने यह कदम पार्टी में चल रही उथल-पुथल और अकाल तख्त द्वारा उन्हें ‘तनखैया’ घोषित किए जाने के बाद उठाया।
‘तनखैया’ का मतलब है वह व्यक्ति जो धार्मिक भावनाओं का अपमान करता है। पार्टी के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने उनके इस्तीफे की पुष्टि करते हुए कहा था कि नए अध्यक्ष के चुनाव जल्द ही होंगे।
पार्टी की स्थिति और नया नेतृत्व
अकाली दल जो कभी पंजाब की राजनीति में मजबूत पकड़ रखता था, हालिया समय में मुश्किल दौर से गुजर रहा है। लोकसभा चुनावों में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी। सुखबीर बादल के इस्तीफे के बाद, पार्टी के कामकाज को संभालने के लिए बलविंदर सिंह भुंदर को पहले ही कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। अब पार्टी का कामकाज वही देखेंगे, जब तक कि नया अध्यक्ष नहीं चुना जाता।
प्रकाश सिंह बादल से वापस लिया फख्र-ए-कौम सम्मान
अकाल तख्त ने सुखबीर बादल के दिवंगत पिता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से ‘फ़ख्र-ए-कौम’ का सम्मान भी वापस ले लिया है। यह फैसला भी 2015 के बेअदबी मामले को लेकर लिया गया है।
बता दें कि साल 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामले ने पंजाब की राजनीति और धार्मिक भावनाओं को झकझोर कर रख दिया था। अकाली दल, जो खुद को सिख समुदाय का प्रतिनिधि मानता है, पर इस घटना को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को लेकर सुखबीर बादल और उनकी सरकार की भूमिका ने पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुँचाया।
भारत वर्तमान में विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन चुका है। बीते कई दशकों से यह बहस होती आई है कि देश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई कानून बनाया जाना चाहिए। कई जगह अधिक बच्चे वाले परिवारों को सरकारी योजनाओं से वंचित करने सम्बन्धी कदम उठाने की भी बात हुई है। इन सबके बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि देश में दम्पत्तियों को 3 बच्चे पैदा करने की जरूरत है। उन्होंने इसके लिए टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) के संबंध में बात की है।
RSS प्रमुख ने क्या कहा?
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने यह बयान रविवार (1 दिसम्बर, 2024) को नागपुर में एक सार्वजनिक कायर्क्रम में दिया। उन्होंने कहा, “जनसंख्या में गिरावट चिंता का विषय है। आधुनिक जनसंख्या शास्त्र कहता है कि जब किसी समाज की जनसंख्या का टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 से नीचे चला जाता है तो वह समाज पृथ्वी से खत्म हो जाता है, उसे कोई नहीं मारेगा। कोई संकट न होने पर भी वह समाज नष्ट हो जाता है। उस प्रकार अनेक भाषाएँ और समाज नष्ट हो गये।”
Nagpur, Maharashtra | RSS chief Mohan Bhagwat says, "The decline in population is a matter of concern. Modern population science says that when the population (fertility rate) of a society goes below 2.1, that society vanishes from the earth. That society gets destroyed even when… pic.twitter.com/05fuy2dVKs
उन्होंने आगे कहा, “TFR 2.1 से नीचे नहीं जाना चाहिए, हमारे देश की जनसंख्या नीति 1998 या 2002 में तय की गई थी। लेकिन इसमें यह भी कहा गया है कि किसी समाज का TFR 2.1 से कम नहीं होनी चाहिए। अब पाॅइंट वन तो इन्सान जन्म नही ले सकता, इसलिये हमे दो से ज्यादा तीन की जरुरत है यही जनसंख्या विज्ञान कहता है।”
उनके इस बयान को लकर असदुद्दीन ओवैसी, कॉन्ग्रेस और सपा ने विरोध जताया। हालाँकि, उनका यह बयान किसी राजनीतिक मुद्दे को लेकर नहीं था। RSS मुखिया मोहन भागवत ने इस बयान में जो चिंता जताई है, वह जायज भी है और उसकी पुष्टि खुद भारत सरकार के आँकड़े करते हैं।
भारत की वर्तमान में जनसँख्या 140 करोड़ से अधिक है। ऐसे में यदि को अधिक बच्चे पैदा करने सम्बन्धी बात करे तो यह काफी अटपटा लगता है। लेकिन यह तर्क पर 100% खरा है और जिन देशों ने समय रहते इस पर एक्शन नहीं लिया, वह आज बड़ी समस्याओं में घिर चुके हैं। भारत में यह समस्या समझने के लिए पहला डाटा समझते हैं।
क्या कहते हैं आँकड़े?
दरअसल, जिस टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) की बात RSS प्रमुख ने की वह जनसंख्या वृद्धि का एक प्रमुख संकेतक है। 15 से 49 वर्ष की कोई महिला इन वर्षों में कितने बच्चों को जन्म देगी, वह TFR कहलाता है। देश भर की इस आयु की महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए बच्चों की संख्या का औसत निकाला जाए तो राष्ट्रीय TFR मिलता है।
इससे यह भी पता चलता है कि भविष्य में सामाजिक और आर्थिक रूप से देश की क्या स्थिति होगी और उसकी जरूरतें क्या होगीं। भारत में टोटल फर्टिलिटी रेट जानने के लिए सरकार एक सर्वे करवाती है। यह सर्वे 1990 के दशक से हो रहे हैं। यह नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के नाम से जाना जाता है।
अब तक इसके 5 सर्वे हो चुके हैं। सबसे नया सर्वे 2019-20 के बीच किया गया था। इस सर्वे के अनुसार, वर्तमान में देश का TFR 1.99 है। यह आँकड़ा चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि यह उस स्तर से कम है, जितना यह होना चाहिए। जनसंख्या विज्ञानियों के अनुसार, किसी भी समाज का औसत TFR 2.1 होना चाहिए।
यदि किसी समाज का TFR 2.1 होगा तभी वह अपनी वर्तमान जनसंख्या बरकरार रख पाएगा। इस रिप्लेसमेंट लेवल TFR कहते हैं। यदि यह आँकड़ा इससे नीचे जाता है तो जनसंख्या आगामी समय में घटती जाएगी। भारत में यह आँकड़ा 2.1 से नीचे आ चुका है। ऐसे में यह चिंता का विषय होना चाहिए।
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भी यही चिंता जताई। भारत से संबंधित आँकड़ों के भीतर जाया जाए, तो और भी चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। आँकड़े दिखाते हैं कि मुस्लिमों को छोड़ कर देश के किसी भी धर्म की महिलाओं का रिप्लेसमेंट लेवल TFR 2.1 नहीं है।
इस ग्राफ से यह समस्या समझी जा सकती है। 1990 के दशक में उदारीकरण और शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ने के कारण लगातार देश में सभी समाज में तेजी से TFR में गिरावट आई है। इसका असर यह है कि हिन्दू, सिख और जैन धर्म 2 से नीचे आ चुके हैं।
ग्राफ में दिखता है कि देश के TFR में 1992-93 से अब तक 41% की कमी आ चुकी है। वर्तमान में मुस्लिमों का ही देश में TFR 2.1 के स्तर से ऊपर है। उनका TFR वर्तमान में 2.36 है।
घटता TFR समस्या क्यों?
घटता TFR वर्तमान में जापान, कोरिया, चीन समेत तमाम पश्चिमी देशों की समस्या है। जापान और कोरिया में यह समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। कोरिया में वर्तमान में TFR 0.7 है। यानी औसतन एक महिला एक भी बच्चे को जन्म नहीं दे रही है। यह विश्व में सबसे कम है। कोरिया ने इस समस्या से लड़ने के लिए पुरुषों की पेड छुट्टियों में तक बढ़ोतरी की है।
इसके अलावा इस छुट्टी की अवधि 90 दिन से 120 दिन कर दी है। सरकार ने यह भी फैसला लिया है कि जिन भी घरों में 1 वर्ष के कम की आयु के बच्चे हैं, उन्हें ₹63,500/माह देगी। वहीं 2 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों के घरों को सरकार ने ₹42000 से अधिक देने की घोषणा भी की है।
कम TFR के चलते कोरिया की जनसंख्या भी घटने लगी है। उसकी जनसंख्या 2018 में 5.18 करोड़ थी जो कि अब घट कर लगभग 5.16 करोड़ हो गई है। कोरिया को चिंता है कि यदि उसकी इसी तरह जनसंख्या घटती रही तो उसे राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर काम करने वाले लोगों तक की समस्या झेलनी पड़ेगी। कोरिया के जैसे ही हाल जापान का है।
जापान के पूर्व प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के एक वरिष्ठ सलाहकार ने हाल ही में कहा था कि यदि जापान में जन्म दर नहीं सुधरी तो देश एक दिन गायब हो जाएगा। जापान का TFR 1.26 है। यह लगातार घटता जा रहा है। इस घटते TFR के चलते जापान की लगभग 33% जनसंख्या अब 65 वर्ष या उससे अधिक है। जापान को इसके चलते श्रमिक समस्या से भी जूझना पड़ रहा है।
जापान की सरकार ने भी इसको लेकर कई कदम उठाए हैं। चीन का भी यही हाल है। चीन ने समस्या को भांपते हुए 1979 में लगाया गया एक बच्चा नियम 2016 में हटा दिया था। हालाँकि, इसके बाद भी चीन की जनसंख्या पिछले 2 साल से घट रही है।
यदि इन सब देशों के उदारहण को देखा जाए तो RSS प्रमुख की बात समय से पहले दी गई चेतावनी लगती है। RSS प्रमुख के बयान को खारिज करने वालों को भी यह उदाहरण देखने चाहिए। भारत भी समस्या रहते अगर चेत जाता है तो उसे ना आगे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता करनी होगी और ना ही उसे बूढ़ी होती जनसंख्या का दंश झेलना पड़ेगा।
पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर राशिद लतीफ ने एक यूट्यूब शो ‘Caught Behind’ में भारत के मोस्ट वांटेड अपराधी दाऊद इब्राहिम से अपनी नजदीकी का दावा किया। दाऊद इब्राहिम 1993 मुंबई बम धमाकों का मास्टरमाइंड है, जिनमें 257 लोग मारे गए थे और 1,400 से ज्यादा घायल हुए थे।
होस्ट डॉ. नौमान नियाज़ से बात करते हुए लतीफ ने कहा, “तुम्हें क्या लगता है, तुम किससे पंगा ले रहे हो? हम भाई के घर के पास रहते हैं।” लतीफ कराची में रहते हैं, वही शहर जहाँ दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की सुरक्षा में रह रहा है।
Pakistan ex-cricketer Rashid Latif bragging about his connections with most wanted terrorist Dawood Ibrahim:
Says "whom are you messing with?" I stay near Bhai's house (ref to Dawood staying in Karachi)
यह चर्चा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के बीच 2025 चैंपियंस ट्रॉफी को लेकर चल रहे विवाद पर हो रही थी। BCCI ने पाकिस्तान में खेलने से इनकार कर दिया था और माँग की थी कि भारत के मैच न्यूट्रल वेन्यू (जैसे दुबई) पर खेले जाएँ। दूसरी ओर, PCB पूरे टूर्नामेंट को पाकिस्तान में ही आयोजित करने पर अड़ा था।
जय शाह के ICC में प्रभावी भूमिका निभाने और PCB द्वारा हाइब्रिड मॉडल पर विचार करने की खबरों के बीच लतीफ ने अपनी कथित नजदीकी दिखाकर भारत को धमकी देने की कोशिश की।
यह पहली बार नहीं है जब राशिद लतीफ ने विवादित बयान दिया है। सोशल मीडिया पर उनके कई वीडियो वायरल हुए हैं, जिनमें उसका कट्टरपंथी इस्लामी पक्ष नजर आता है। एक वीडियो में लतीफ ने दावा किया था कि भारत के ज्यादातर ऐतिहासिक स्मारक उनके पूर्वजों ने बनाए हैं। उसने यह भी कहा था कि भारत में 14 डॉन हैं और वे सभी उनकी कौम से ताल्लुक रखते हैं। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी थी कि उन्हें मजबूर न किया जाए वरना वे भी डॉन बन सकते हैं।
Rashid latif said bhadwara giri exposed. He said "Jitni bhi badi badi imarate h India mai sab hamare purkho ne banai thi jo ham india ko khairat mai deke aaye hai "
राशिद लतीफ का यह नया बयान BCCI और PCB के बीच 2025 चैंपियंस ट्रॉफी को लेकर चल रहे गतिरोध के बीच आया है।
बता दें कि नवंबर के पहले हफ्ते में BCCI ने आधिकारिक रूप से PCB को सूचित किया था कि भारतीय क्रिकेट टीम सुरक्षा चिंताओं के कारण पाकिस्तान यात्रा नहीं करेगी। BCCI ने भारत के मैच न्यूट्रल वेन्यू (जैसे दुबई) में कराने की इच्छा जताई थी। ICC ने 2025 चैंपियंस ट्रॉफी की मेजबानी के लिए पाकिस्तान को चुना था, लेकिन भारत-पाक के कूटनीतिक तनाव के चलते भारतीय टीम की भागीदारी पर सवाल उठने लगे। अब खबरें हैं कि PCB कुछ शर्तों के साथ हाइब्रिड मॉडल को मंजूरी देने के करीब है।
उत्तर प्रदेश का संभल इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के कारण लगातार चर्चा में है। ऐसे में हर मीडियाकर्मी ग्राउंड पर जाकर अपनी पड़ताल को साझा कर रहा है। हाल में स्वराज्य पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा भी स्थिति जानने वहाँ पहुँचीं और एक्स अकाउंट (पूर्व में ट्विटर) पर बताया कि इलाके के बुजुर्ग हिंदू और उनके पूर्वज विवादित स्थल को लेकर क्या बताते आए हैं।
स्वाति गोयल के ट्वीट के अनुसार, ये शाही जामा मस्जिद संभल के कोट इलाके में है। ये जगह दो भागों में बँटा हुआ है, एक कोट पूर्वी और दूसरा कोट गर्भी। मुख्य द्वार के सामने ज्यादातर हिंदू रहते हैं। पत्रकार ने इन्हीं कुछ हिंदुओं से मुलाकात की।
इनमें एक 66 साल के अनिल टंडन भी हैं। अनिल टंडन बताते हैं कि वो कोट पूर्वी इलाके में रहते हैं और उनके परिवार ने हमेशा उस इमारत को हरिहर मंदिर ही माना है।
Anil Tandon, aged 66 and a lifelong resident of Kot Purvi, said his family always referred to the property as Hari Har Temple
Jama Masjid was a recent construction and it used to be Hari Har temple temple before, his family would say
टंडन ने बताया कि पहले यहाँ हरिहर मंदिर ही था। 8 साल की उम्र में वो अपने परिजनों के साथ मंदिर जाया करते थे जोकि मस्जिद के भीतर है। मगर, बाद में हिंदुओं की एंट्री परिसर में रोक दी गई। यहाँ दीवारें बना दी गई और कमरे को बंद करके ताला लटका दिया गया। अंदर एक कुंड भी है।
Arvind Arora, 75, whose father migrated from Lahore in 1947, said his family learnt to call the site as ‘Hari Har Mandir’ when they arrived here
I disocbvered that the area is home to many Punjabi families displaced by partition. Arvind Ji said they are fast leaving the area as… pic.twitter.com/prXndgUYSu
इसी प्रकार 75 साल के अरविंद अरोड़ा ने बताया कि उनका परिवार 1947 में लाहौर से आया था। परिवार को पता चला कि ये जगह हरिहर मंदिर है और यहाँ ज्यादातर विस्थापित पंजाबी रहते थे लेकिन बाद में माहौल बिगड़ने के बाद वो इलाके को छोड़ने लगे।
Muni Devi, 90, recalls using a well just outside the mosque’s front gate for rituals like Kuan Pujan (ceremony for newborns). Kuan Pujan for all her children was conducted at the well
Later, the mosque managers covered the well and built a wall over it, taking half of it inside… pic.twitter.com/LlxiTUMhZp
इसके बाद 90 साल की मुन्नी देवी ने बताया- “पहले अंदर कुआँ था जो खुला हुआ था, फिर आधा हिस्सा भीतर ले लिया गया और आधा बाहर रह गया। हम लोग वहाँ कुआँ पूजने जाते थे। उन्होंने कहा, “मेरे जितने बच्चे हुए सबका कुआँ वहीं पूजा गया। बाकी फिर इन्होंने कुआँ पूजना बंद करवा दिया।” मुन्नी देवी ने कहा- “हमें ये लगता नहीं है ये हरिहर मंदिर ही है। इन लोगों ने कभी अंदर जाने नहीं दिया। मगर हमारे घर में पानी उसी कुएँ से आता था।”
गौरतलब है कि स्थानीय बुजुर्गों की बातचीत से यही पता चलता है कि शाही जामा मस्जिद में पहले लोगों का आना-जान था, मगर बाद में हर चीज बंद करवा दी गई। इलाके के बुजुर्ग अब भी याद करते हैं कि कैसे अपने बचपन या युवावस्था में वो मंदिर जाते थे। उनके पुरखे उन्हें साफ कहते थे कि ये मस्जिद नहीं मंदिर है। बातचीत के दौरान कोई भीतर बने कुंड की बात बताता है तो कोई साफ कहता है कि यहाँ मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाया गया है।
इससे पहले बता दें कि इस स्थल को लेकर भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने भी टिप्पणी की थी। उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा था कि संभल में जामा मस्जिद हरि मंदिर था। जिसे समाजवादी पार्टी की सरकार ने 2012 में जामा मस्जिद में तब्दील करा दिया था। इसके अलावा ये भी कहा जा रहा है कि साल 2012 से पहले इस जगह पर हिंदू माताएँ पूजा-पाठ करने जाती थीं। इसके अलावा यहाँ शादी ब्याह के कार्यक्रम भी कराए जाते थे। बच्चा बच्चा इसे हरि मंदिर के नाम से जानता था। बाद में सपा के शफीकुर्रहमान बर्क के दबाव में उनकी पार्टी की सरकार ने यहाँ पूजा बंद करवा दी और हिंदुओं को वहाँ जाने से रोक दिया गया।
मध्य प्रदेश के इंदौर की बगीचे कॉलोनी में रहने वाले एक दलित परिवार ने आरोप लगाया है कि मुस्लिम समुदाय के शादाब और कुछ लोग उन्हें लगातार धमका रहे हैं और उनकी जान को खतरा है। इस परिवार ने रविवार (17 नवंबर 2024) को अपने घर के बाहर पलायन का पोस्टर लगा दिया था। पहले पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए आरोपितों को जेल भेजा था, लेकिन अब उनकी जमानत के बाद पीड़ित परिवार बेहद डरा हुआ है। हालाँकि पुलिस ने राजेश और उनके परिवार को सुरक्षित बताया है।
दैनिक भास्कर के मुताबिक, पीड़ित परिवार के मुखिया राजेश कलमोइया ने बताया कि जमानत पर रिहा हुए आरोपित शादाब के परिवार के लोग उनके परिवार वालों को घूर-घूरकर देख रहे हैं। उन्होंने कहा, “जब से ये लोग जेल से बाहर आए हैं, हमें लग रहा है कि हमारे साथ कुछ भी अनहोनी हो सकती है। पुलिस ने पहले भरोसा दिया था कि आरोपितों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।”
परिवार ने दावा किया है कि उन्हें लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। राजेश ने बताया कि पहले पुलिस उनके घर पर लगातार आती थी, लेकिन अब कई दिनों से उनकी गली में भी नजर नहीं आई। परिवार का कहना है कि ऐसे हालातों में उनके पास केवल दो विकल्प बचे हैं- या तो पलायन करें या आत्महत्या। हालाँकि पुलिस ने राजेश को सुरक्षित बताया है। स्थानीय SHO के मुताबिक राजेश की तरफ से अपनी नई शिकायतों के बारे में कोई तहरीर नहीं दी गई है।
17 नवंबर को लगाए थे पलायन के पोस्टर
राजेश ने 17 नवंबर को अपने घर के बाहर पलायन के पोस्टर लगाए थे। उनका आरोप था कि शादाब और अन्य आरोपितों ने उन्हें और उनके परिवार को परेशान किया। मामला तब बढ़ा, जब हिंदू संगठनों ने कार्रवाई की माँग की। इसके बाद पुलिस ने SC/ST एक्ट और अन्य धाराओं के तहत मुख्य आरोपित शादाब समेत 7 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।
केस वापसी का दबाव बनाया और घर के बाहर किया धमाका
राजेश ने बताया कि शादाब और अन्य आरोपित लगातार उन पर केस वापसी का दबाव बना रहे थे। इसमें शादाब के परिवार की महिलाएँ भी शामिल थीं। राजेश के अनुसार, जब उन्होंने केस वापस लेने से मना कर दिया, तो उनके घर के बाहर विस्फोटक से धमाका किया गया। इस मामले में रईस नाम के एक अन्य व्यक्ति को भी नामजद किया गया था।
पुलिस की भूमिका पर उठ रहे सवाल
पीड़ित परिवार ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले तो पुलिस ने आश्वासन दिया था कि सख्त कदम उठाए जाएँगे, लेकिन अब पुलिस गायब है। परिवार ने पलायन को मजबूरी बताया और कहा कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई तो उन्हें आत्महत्या का कदम उठाना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (2 दिसंबर 2024) को पंजाब के किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल से कहा कि किसान प्रदर्शन शांतिपूर्ण और जिम्मेदारी से किए जाएँ। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रदर्शनकारी हाईवे जाम न करें और न ही आम जनता को परेशान करें।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने जगजीत सिंह डल्लेवाल की ओर से दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई की। याचिका में दावा किया गया था कि डल्लेवाल को खनौरी बॉर्डर से जबरन हटाकर लुधियाना के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि डल्लेवाल को अब रिहा कर दिया गया है और वे दोबारा आंदोलन में शामिल हो चुके हैं।
इस बीच, नोएडा की तरफ से किसानों ने दिल्ली कूच किया है। किसान संगठनों में शामिल प्रदर्शनकारियों ने महामाया फ्लाईओवर के पास लगाई गई यूपी पुलिस की बैरिकेडिंग को उखाड़ फेंका और आगे बढ़ गए। हालाँकि पुलिस ने उन्हें दलित प्रेरणा स्थल के सामने ही रोक लिया है।
#WATCH | Noida, UP | Protesting farmers climb over police barricades at Dalit Prerna Sthal as they march towards Delhi over their various demands pic.twitter.com/39xs9Zx5mn
जगजीत सिंह डल्लेवाल ने अपनी हिरासत को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि उन्हें जबरन अस्पताल में रखा गया और न तो मीडिया से मिलने दिया गया, न ही फोन तक पहुँचने दिया गया। उनका कहना था, “अगर मुझे जाँच के लिए भर्ती किया गया होता, तो मीडिया से मिलने की अनुमति होती। लेकिन यह असल में पुलिस हिरासत थी।”
डल्लेवाल को शुक्रवार (29 नवंबर 2024) को अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया, जिसके बाद खनौरी बॉर्डर पर उनका जोरदार स्वागत किया गया। संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) के वरिष्ठ नेता सरवन सिंह पंधेर ने डल्लेवाल को समर्थन देते हुए आंदोलन जारी रखने की बात कही।
प्रदर्शनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दी सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने किसानों से अपील की कि वे प्रदर्शन जरूर करें, लेकिन कानून के दायरे में रहते हुए। कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सबको है, लेकिन इसे जिम्मेदारी से करना चाहिए ताकि जनता को कोई असुविधा न हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि खनौरी बॉर्डर पंजाब की ‘लाइफलाइन’ है और इसे बाधित करना सही नहीं है।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने डल्लेवाल से उम्मीद जताई कि वे अपने प्रदर्शनकारी साथियों को कानून का पालन करने और प्रदर्शन को व्यवस्थित तरीके से करने के लिए प्रेरित करेंगे।
बता दें कि 13 फरवरी 2024 से शुरू हुए इस आंदोलन में किसान दिल्ली की ओर मार्च कर रहे थे, लेकिन उन्हें शंभू और खनौरी बॉर्डर पर रोक दिया गया। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार पर उनकी माँगों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। उनकी मुख्य माँगें हैं:
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी दर्जा दिया जाए।
स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की जाएँ।
किसानों और कृषि मजदूरों के लिए पेंशन योजना शुरू की जाए।
किसानों का कर्ज माफ किया जाए।
भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 को फिर से लागू किया जाए।
2020-21 के किसान आंदोलन में जान गँवाने वाले किसानों के परिवारों को मुआवजा दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह स्पष्ट किया कि विरोध शांतिपूर्ण और व्यवस्थित होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर भविष्य में किसी कानूनी मदद की जरूरत होगी, तो उसके लिए उचित प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद कल्याण बनर्जी ने हर उस जगह को वक्फ घोषित करने को कहा है जहाँ पर मुस्लिम इकट्ठा होकर नमाज पढ़ते हों। उन्होंने यह बयान हजारों मुस्लिमों की भीड़ के बीच दिया है। बनर्जी खुद भी वक्फ बोर्ड पर लाए गए बिल पर बनी संयुक्त संसदीय समिति में शामिल हैं।
कल्याण बनर्जी का यह वीडियो भाजपा आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने एक्स (पहले ट्विटर) पर साझा किया है। इस वीडियो में कल्याण बनर्जी कहते हुए दिखते हैं, “जहाँ पर भी आप नमाज पढ़ते हैं, उसको वक्फ प्रॉपर्टी की तरह लिया जाना चाहिए। अगर एक जगह पर 20-25 लोग लगातार नमाज पढ़ते हैं, तो उसे भी वक्फ सम्पत्ति माना जाए।”
These remarks were made by TMC MP Kalyan Banerjee, who is also a member of the Standing Committee on WAQF. According to him, any location where Muslims offer Namaz would automatically be considered a WAQF property. This suggests that public spaces, such as roads, railway tracks,… pic.twitter.com/hrzFgvfsYp
कल्याण बनर्जी ने नमाज वाली हर जगह को वक्फ घोषित करने की यह बात कोलकाता में आयोजित एक रैली में की, इस रैली में माँग की गई कि केंद्र सरकार वक्फ संशोधन बिल वापस करे। इस रैली की तस्वीरों में हजारों मुस्लिम दिखाई पड़ रहे हैं।
A massive protest rally was organized at Rani Rasmani Road in Kolkata under the leadership of Hon'ble Chief Minister Mamata Banerjee, led by the West Bengal Minority Trinamool Congress. The protest called for the repeal of the controversial Waqf Amendment Bill, introduced by the… pic.twitter.com/E0D9eMaOsB
कल्याण बनर्जी के इस बयान को आधार माना जाए तो इस देश में सड़क, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और फुटपाथ समेत तमाम उन जगह को वक्फ सम्पत्ति घोषित करने की माँग की जा सकती है, जहाँ मुस्लिम नमाज पढ़ते हों। कई ऐसे सार्वजनिक मैदान भी हैं, जहाँ मुस्लिम लगातार नमाज पढ़ते हैं, कल्याण बनर्जी के बयान को आधार माना जाए तो यह भी वक्फ हो जाएँगे।
अमित मालवीय ने उनके इस बयान की आलोचना की है। अमित मालवीय ने कहा,”अगर चुनावी फायदे के लिए इस तरह के विचारों को बढ़ावा दिया जाता है, तो बंगाली हिंदू समुदाय को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यहाँ तक कि उन्हें अपनी मातृभूमि पश्चिम बंगाल से विस्थापित होने का खतरा हो सकता है। ममता बनर्जी और TMC बंगाल में हिंदुओं का पूरी तरह सफाया सुनिश्चित करेंगी, ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में हुआ है।”
पश्चिम बंगाल के सीरमपुर से सांसद कल्याण बनर्जी वक्फ संशोधन को लेकर बनाई गई JPC में शामिल हैं, उन पर इसकी बैठकों में हंगामा करने का आरोप भी लगा है। इससे पहले उन्होंने एक बैठक में कांच के गिलास से अपना हाथ चोटिल कर लिया था। उन्होंने ऐसा वक्फ बिल का विरोध करते हुए किया था।