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संभल में मिले पाकिस्तान-अमेरिका में बने कारतूस, विदेशी फंडिंग का भी शक: मस्जिद सर्वे को रोकने के लिए क्या विदेशों से आए थे हथियार?

उत्तर प्रदेश के संभल में पुलिस को मस्जिद सर्वे के दौरान हुई हिंसा की जाँच में पाकिस्तान और अमेरिका में बनी हुई कारतूस मिली हैं। इन्हें एक जगह नाली के पास से बरामद किया गया है। पुलिस को आशंका है कि इस पूरी हिंसा में विदेशी फंडिंग का लिंक भी हो सकता है। मामले में अब NIA की भी मदद लिए जाने के कयास लगाए गए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मंगलवार (3 दिसम्बर, 2024) को संभल में जाँच करने पहुँची पुलिस की SIT और फॉरेंसिक की टीम को कुल 6 कारतूसों के खोखे मिले हैं। इनमें से 5 फायर हो चुके थे जबकि एक फायर नहीं हो पाया था। इनमें से एक पर ‘POF’ यानि पाकिस्तान ऑर्डिनेंस फैक्ट्री लिखा हुआ था।

यह कारतूस 9 MM का था। वहीं एक कारतूस पर मेड इन USA लिखा हुआ था। यह कारतूस .32 कैलिबर का था। एक और कारतूस पर ‘FN-STAR’ लिखा हुआ था। यह सारे कारतूस फॉरेंसिक की टीम को एक नाली के पास मिट्टी में दबे हुए मिले। यहाँ फॉरेंसिक टीम 24 नवंबर को हुई हिंसा की जाँच के लिए मेटल डिटेक्टर समेत तमाम साजोसामान के साथ पहुँची थी।

विदेशी कारतूसों के अलावा बाक़ी तीन कारतूस में से दो 12 बोर जबकि एक .32 कैलिबर है। इनके विषय में पुलिस ने बताया है कि इनमें से किसी भी कारतूस का इस्तेमाल पुलिस नहीं करती। संभल के एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई ने इसे गंभीर करार दिया है। उन्होंने कहा है कि इस पूरे मामले की जाँच में अब यह एंगल भी जोड़ा जाएगा।

कृष्ण कुमार विश्नोई ने बताया है कि जहाँ पर 24 नवम्बर, 2024 को हिंसा हुई थी, उस इलाके के कई CCTV कैमरा को भी तोड़ दिया गया है। उन्होंने कहा है कि जो भी कैमरे और DVR बचे हैं उनकी जाँच कर सबूत जुटाए जाएँगे। उन्होंने विदेशी खोखे मिलने के बाद कहा है कि अब दूसरी एजेंसियों की मदद भी ली जाएगी।

NIA की मदद भी इस मामले में विदेशी लिंक खोजने के लिए ली जा सकती है। कृष्ण कुमार विश्नोई ने बताया है कि विदेशी खोखों की जाँच करने के लिए उन्हें फॉरेंसिक एजेंसी के पास भेजा जाएगा और मामले में बैलिस्टिक एक्सपर्ट की राय माँगी जाएगी।

गौरतलब है कि 19 नवम्बर, 2024 को संभल में कोर्ट जिला अदालत ने जामा मस्जिद में सर्वे का आदेश दिया था। यह आदेश हिन्दू पक्ष की याचिका के बाद दिया गया था। हिन्दू पक्ष ने कहा था कि जहाँ आज जामा मस्जिद है, वहाँ पर कभी हरिहर मंदिर हुआ करता था, जिसे मुग़ल आक्रान्ताओं ने तोड़ दिया था।

19 नवम्बर को यह सर्वे पूरा नहीं हो पाया था, इसमें मुस्लिम भीड़ ने व्यवधान डाल दिया था। इसके बाद 24 नवम्बर को सर्वे के लिए टीम दोबारा पहुँची थी। इसी दौरान जामा मस्जिद के आसपास इलाकों में इकट्ठा हुई मुस्लिम भीड़ ने हिंसा चालू कर दी। इसमें कई पुलिस वाले घायल हुए और एक पुलिस अफसर अनुज चौधरी के गोली भी लगी।

हिंसा के दौरान हुई फायरिंग में 5 मुस्लिम मारे गए। शुरूआती जाँच में बताया गया है कि उसकी फायरिंग में कोई मौत नहीं हुई बल्कि यह आपसी लड़ाई का मसला हो सकता है। इस हिंसा की जाँच 2 SIT टीम कर रही हैं। पूरी घटना की जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग भी गठित किया गया है।

अयोध्या जीता, मथुरा-काशी शेष… संभल-बदायूँ या अजमेर में ही हिंदू मंदिरों पर ढाँचा बना देने का नहीं है दावा, जानिए कोर्ट में किन-किन विवादित मस्जिदों का मामला चल रहा

9 नवम्बर, 2019, दिल्ली में स्थित सुप्रीम कोर्ट का खचाखच भरा हुआ एक कमरा। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई समेत 5 जज हिन्दुओं के 500 वर्षों के संघर्ष की परिणिति तय कर देते हैं। अयोध्या में जहाँ पर हिन्दुओं के आराध्य रामलला का मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई गई थी, वह जगह वापस हिन्दुओं को मिलती है। हिन्दू भव्य मंदिर का निर्माण करते हैं। लेकिन यह सिर्फ एक धार्मिक स्थल की बात है। कर्नाटक में भाजपा सरकार में गृह मंत्री रहे KS ईश्वरप्पा ने 2022 में कहा था कि देश में कम से कम 36000 जगह पर मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई गई है।

ऐसी 1800 जगह की सूची ऑपइंडिया ने भी प्रकाशित की थी। अयोध्या के साथ ही काशी और मथुरा में भी मंदिरों पर इस्लामी आक्रमण में की किए गए अत्याचार के खिलाफ लड़ाई आजादी के बाद ही चालू हुई थी। लेकिन अभी यहाँ परिणाम नहीं आ सका है। संभल-बदायूँ पर हाल में हुए हल्ले के बाद ऐसे कई स्थल चर्चा में हैं जहाँ संघर्ष जारी है। ऐसे ही 10 मामलों पर एक नजर डाली जानी चाहिए जिनके लिए अब भी कोर्ट में लड़ाई जारी है।

कमाल मौला मजार बनाम भोजशाला

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला विवाद बहुत पुराना विवाद है। हिंदू पक्ष का मत है कि ये माता सरस्वती का मंदिर है जहाँ देवी-देवताओं के चित्र और संस्कृत में श्लोक आज भी लिखे हुए हैं। सदियों पहले मुसलमानों ने इसकी पवित्रता भंग करते हुए यहाँ मौलाना कमालुद्दीन की मजार बना दी थी जिसके बाद यहाँ मुस्लिमों का आना जाना शुरू हो गया और अब इसे नमाज के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इस मामले में हिन्दू कोर्ट पहुँचे थे। हिन्दू पक्ष की याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मार्च, 2024 में ASI सर्वे का आदेश दिया था।

ASI यहाँ सर्वे कर चुकी है। रिपोर्ट में ASI ने कहा है कि भोजशाला का वर्तमान परिसर यहाँ पहले मौजूद मंदिर के अवशेषों से बनाया गया था। ASI ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में बताया था, “खंभों और की सजावट और उन पर बने भित्तिचित्रों की वास्तुकला से यह कहा जा सकता है कि वह पहले मंदिर का हिस्सा थे। बेसाल्ट के ऊँचे परिसर पर मस्जिद के स्तम्भ बनाते समय इनका दोबारा इस्तेमाल हुआ है। एक स्तम्भ, जिसमे चारों दिशाओं में खाने बने हुए हैं, उसमे देवताओं की नष्ट की हुईं छवियाँ भी हैं।”

अटाला मस्जिद बनाम अटाला देवी

उत्तर प्रदेश के जौनपुर में बनी अटाला मस्जिद को लेकर भी हिन्दू कोर्ट पहुँचे हैं। मई 2024 में इस संबंध में एक वकील अजय प्रताप सिंह ने याचिका दायर की थी। उन्होंने अपने दावे में कई पुस्तकों में उल्लेखित संदर्भों का हवाला दिया है। साथ ही पुरातत्व विभाग के निदेशक की रिपोर्ट का भी जिक्र किया है।

माना जाता है कि अटाला माता मंदिर का निर्माण कन्नौज के राजा जयचंद्र राठौर ने करवाया था। अजय प्रताप सिंह ने कहा है कि इस मंदिर को तोड़ने का पहला हुक्म फिरोज शाह ने दिया था। बाद में इब्राहिम शाह ने इस पर कब्जा कर मस्जिद बना दिया। वकील अजय प्रताप सिंह की यह याचिका अभी कोर्ट में लंबित है।

टीले वाली मस्जिद बनाम शेषनाग मंदिर

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में टीले वाली मस्जिद के खिलाफ भी हिन्दू कोर्ट पहुँचे हैं। साल 2013 में लखनऊ स्थित भगवान शेषनाग टीलेश्वर महादेव विराजमान, लक्ष्मण टीला शेषनाग तीर्थ भूमि और अन्य ने निचली दीवानी कोर्ट में एक सिविल क्लेम किया था, जिसमें कहा गया था कि मुगल आक्रान्ता औरंगजेब के शासनकाल में मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को तोड़ दिया गया था।

हिंदू याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि संपत्ति के एक हिस्से पर जहाँ मस्जिद है, यह उनका है और इसे उन्हें सौंपा जाना चाहिए। इस मामले में मुस्लिम पक्ष ने हिन्दू पक्ष की याचिका के खिलाफ कोर्ट में अपील भी डाली थी लेकिन उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था। वर्तमान में यह मामला कोर्ट के सामने लंबित है।

अजमेर दरगाह बनाम शिव मंदिर

हिन्दू पक्ष की याचिका में यह भी कहा गया है कि यहाँ भगवान शिव की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक भी होता था। हिन्दू पक्ष ने अपनी माँग के समर्थन में 1911 में लिखी एक किताब का जिक्र किया है। साथ ही उन्होंने दरगाह में मौजूद ढांचों को भी पुराने मंदिर का हिस्सा बताया है।

हिन्दू पक्ष ने कहा है कि अजमेर के तहखाने में गर्भगृह है। याचिका विष्णु गुप्ता ने दायर की है। विष्णु गुप्ता ने अब इस जगह की सही स्थिति जानने के लिए एक सर्वे की माँग की है। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि इसके साथ ही दरगाह के ही निकट अढ़ाई दिन का झोपड़ा मस्जिद को भी मंदिर तोड़ कर बनाया गया है।

संभल जामा मस्जिद बनाम हरि हर मंदिर

संभल के जिला न्यायालय में एक याचिका लगाई गई है। याचिका में कहा गया है कि संभल में स्थित जामा मस्जिद का निर्माण सदियों पुराने श्री हरि हर मंदिर पर किया गया था, जो भगवान कल्कि को समर्पित था और जिसे बाबर ने नष्ट कर दिया था।

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि यह स्थल हिंदुओं के लिए धार्मिक महत्व रखता है और इसे मुगल काल के दौरान इसे जबरन मस्जिद में बदल दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि वर्तमान में यह संरक्षित स्मारक है। इसको लेकर कोर्ट ने 19 नवम्बर को सर्वे का आदेश दिया था। इसके बाद 24 नवम्बर को भी सर्वे होना था लेकिन इस दिन मुस्लिम भीड़ ने दंगा कर दिया।

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील और एडवोकेट विष्णु शंकर जैन के पिता हरि शंकर जैन, नोएडा के पार्थ यादव साथ अन्य याचिकार्ताओं ने लगाई है। याचिका लगाने वालों में और भी लोग शामिल हैं। उन्होंने कोर्ट से कहा है कि भगवान विष्णु और भगवान शिव के भक्त होने के नाते, उन्हें पूजा-अर्चना के लिए मंदिर में जाने का अधिकार है।

बदायूँ जामा मस्जिद बनाम नीलकंठ महादेव

यूपी के बदायूँ में स्थित शाही जामा मस्जिद पर हिंदू पक्ष ने दावा किया है। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि बदायूँ की जामा मस्जिद असल में पौराणिक नीलकंठ महादेव मंदिर है। इसको लेकर हिंदू पक्ष ने जिला अदालत में याचिका दायर की है। इस मामले की अगली सुनवाई 10 दिसम्बर, 2024 को है।

हिंदू पक्ष की तरफ से वादी मुकेश पटेल ने साल 2022 में अदालत में सबूत पेश करते हुए दावा किया था कि यह मस्जिद पहले नीलकंठ महादेव मंदिर थी। उनकी याचिका में जामा मस्जिद के अंदर हिंदुओं को पूजा का अधिकार देने की माँग की गई है। मुस्लिम इस याचिका को खारिज करने की माँग कर रहे हैं।

फतेहपुर की जामा मस्जिद बनाम कामाख्या मंदिर

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर सीकरी में स्थित सलीम चिश्ती की दरगाह के खिलाफ भी हिन्दुओं ने कोर्ट में याचिका दायर की है। हिन्दुओं ने कहा है कि जहाँ आज फतेहपुर में जामा मस्जिद बनी हुई है, वहाँ कभी माँ कामाख्या का मंदिर हुआ करता था। हिन्दू पक्ष यहाँ बनी जामा मस्जिद के भी हिन्दू मंदिर के परिसर में होने की बात कही है।

हिन्दू पक्ष की तरफ से यह याचिका वकील अजय प्रताप सिंह ने दायर की है। उन्होंने ASI के एक अधिकारी की एक पुस्तक का भी जिक्र अपनी याचिका में किया है। उन्होंने कहा है कि इस पुस्तक के अनुसार, यहाँ मस्जिद में हिन्दू और जैन मंदिर के अवशेष से निर्माण किया गया है।

शाही ईदगाह बनाम कृष्ण जन्मस्थान

मथुरा में स्थित शाही ईदगाह वर्तमान में विवादित है और इसको लेकर न्यायालयों में कई याचिकाएँ पड़ी हुई हैं। हिन्दू पक्ष का कहना है कि मथुरा में स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के बराबर में बनी शाही ईदगाह वाला ढाँचा जबरन वही बना दिया गया जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। इस जगह पर कब्जा करके ढाँचा बनाया गया है। यहाँ अभी भी कई ऐसे सबूत हैं जो कि यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ पहले एक मंदिर हुआ करता था।

हिन्दू पक्ष का दावा है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म राजा कंस के कारागार में हुआ था और यह जन्मस्थान शाही ईदगाह के वर्तमान ढाँचे के ठीक नीचे है। सन् 1670 में मुगल आक्रांता औरंगज़ेब ने मथुरा पर हमला कर दिया था और केशवदेव मंदिर को ध्वस्त करके उसके ऊपर शाही ईदगाह ढाँचा बनवा दिया था और इसे मस्जिद कहने लगे। 13.37 एकड़ जमीन पर दावा करते हुए हिन्दू यहाँ से शाही ईदगाह ढाँचे को हटाने की माँग करते रहे हैं। इस मामले में सर्वे का आदेश निचली अदालत द्वारा दिया गया था लेकिन उस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है।

ज्ञानवापी मस्जिद बनाम काशी विश्वनाथ

वाराणसी में काशी विश्वनाथ के बराबर में स्थित विवादित ज्ञानवापी मस्जिद में हिन्दू पक्ष को शुरूआती सफलता भी मिली है। इस मामले में हिन्दू पक्ष ने ASI सर्वे की माँग की थी। कोर्ट ने यहन ASI को सर्वे का आदेश भी दिया था। ASI की रिपोर्ट में बताया गया है कि ढाँचे के भीतर मंदिर का अस्तित्व प्रमाणित करने वाली कई कृतियों को जानबूझकर छुपाकर रखा गया था। ये सभी कृतियाँ (मूर्तियाँ, शिलाएँ, शिलालेख) उन तहखानों की जाँच में मिले हैं, जिन्हें जानबूझकर दीवालों और मलबों के सहारे बंद कर दिया गया था।

31 जनवरी, 2024 को एक आदेश में कहा गया था कि ज्ञानवापी परिसर के भीतर व्यास जी के तहखाने में हिन्दू पूजा अर्चना कर सकते हैं, उन्हें झरोखा दर्शन की अनुमति भी दी गई थी। यह निर्णय आने के बाद प्रशासन ने रात में ही पूजा और आरती चालू करवा दी थी। मस्जिद कमिटी इसके खिलाफ पहले सुप्रीम कोर्ट भी गई थी जहाँ कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया था।

कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद बनाम हिन्दू-जैन मंदिर

2020 में दिल्ली की एक अदालत में क़ुतुब मीनार के भीतर मंदिर होने की बात कहते हुए वहाँ हिन्दुओं को पूजा का अधिकार दिलाने हेतु याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में दावा किया गया है कि क़ुतुब मीनार के भीतर ही हिन्दू और जैन मंदिर परिसर स्थित है।

याचिका में कहा गया है कि अंदर 27 मंदिर हुआ करते थे, जिनमें मुख्य रूप से जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के अलावा भगवान विष्णु प्रमुख रूप से स्थापित हैं। और इन्हीं मंदिरों को तोड़ कर ही मस्जिद का निर्माण किया गया। इस मामले में को निचली अदालत ने खारिज कर दिया था, जिसे ऊपरी अदालत में चुनौती दी गई है।

पैर पर प्लास्टर, गले में तख्ती, हाथ में भाला… व्हील चेयर पर बैठ ‘पहरेदार’ बने सुखबीर सिंह बादल: जानिए किन गलतियों की मिली है सजा, क्यों शौचालय की सफाई से मिली माफी

पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री और अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर यानी श्री हरमंदिर साहिब में सजा के तौर पर सेवा की। मंगलवार (3 दिसंबर 2024) को सुखबीर बादल व्हीलचेयर पर गुरुद्वारे पहुँचे। उनके गले में ‘दोषी’ लिखी तख्ती लटकी हुई थी और उन्होंने सेवादार की पोशाक पहनी हुई थी। हाथ में भाला लिए सुखबीर ने गुरुद्वारे के मुख्य द्वार पर पहरेदारी की सेवा निभाई।

सुखबीर सिंह बादल के साथ अकाली दल के अन्य नेता भी धार्मिक सजा का पालन करते नजर आए। सुखबीर सिंह के पैर में प्लास्टर लगा होने के कारण उन्हें शौचालय की सफाई से छूट दी गई, लेकिन उन्होंने सामुदायिक रसोई में बर्तन साफ किए और पहरेदारी की।

बादल और उनकी कैबिनेट को क्यों सुनाई गई सजा?

सिख समुदाय के सर्वोच्च धार्मिक संस्था, श्री अकाल तख्त साहिब, ने सुखबीर बादल और उनकी सरकार के कई नेताओं को 2007 से 2017 तक धार्मिक गलतियों के लिए दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। इसमें प्रमुख आरोप हैं:

डेरा सच्चा सौदा मामले में माफी दिलवाना: साल 2007 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम पर सिख धर्म के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी की परंपरा का अपमान करने का आरोप था। इस पर पुलिस में मामला दर्ज किया गया, लेकिन सुखबीर बादल ने डेरा प्रमुख को माफी दिलाने में अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल किया।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर कार्रवाई न करना: 2015 में फरीदकोट के बरगाड़ी और बुर्ज जवाहर सिंह वाला में गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्र बीड़ चोरी और अंग फाड़ने की घटनाएं हुईं। इसके बाद बड़े विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन सुखबीर बादल की सरकार दोषियों को सजा दिलाने में नाकाम रही।

राजनीतिक विज्ञापन के लिए संगत के धन का इस्तेमाल: अकाल तख्त ने आरोप लगाया कि बादल सरकार ने गुरुद्वारों की संगत के पैसे का उपयोग राजनीतिक प्रचार के लिए किया।

डीजीपी सुमेध सैनी की नियुक्ति: बादल सरकार ने एक विवादित अधिकारी सुमेध सैनी को पंजाब पुलिस का डीजीपी नियुक्त किया, जिन्हें कथित तौर पर सिख युवाओं के फर्जी एनकाउंटर के लिए जाना जाता है। इसके अलावा साल 2012 के चुनाव में पंजाब के विवादित डीजीपी रहे इजहार आलम की बीवी को अकाली दल से टिकट देकर विधायक बनाया था। इजहार ने खालिस्तानी आतंकवाद को खत्म करने के लिए कथित तौर पर प्राइवेट मिलिशिया ‘आलम सेना’ का गठन किया था।

धर्म विरुद्ध आचरण: धार्मिक गलतियों के चलते सुखबीर बादल और उनके पिता प्रकाश सिंह बादल को “फख्र-ए-कौम” का खिताब भी वापस ले लिया गया।

कौन-कौन सजा भुगत रहे हैं?

सुखबीर बादल के साथ अन्य अकाली नेताओं को भी धार्मिक दंड दिया गया। इन नेताओं में सुखदेव सिंह ढींडसा, बिक्रम सिंह मजीठिया, दलजीत सिंह चीमा, बीबी जागीर कौर और महेशिंदर सिंह ग्रेवाल शामिल हैं।

सुखबीर बादल: व्हीलचेयर पर गले में पट्टिका लटकाए और भाला लेकर पहरेदारी की। उन्हें टॉयलेट साफ करने से छूट दी गई।

सुखदेव सिंह ढींडसा: गुरुद्वारे के मुख्य द्वार पर पहरेदारी की और सामुदायिक रसोई में बर्तन साफ किए।

बिक्रम मजीठिया और अन्य नेता: सामुदायिक शौचालय साफ किए और लंगर हॉल में सेवा की।

अकाल तख्त द्वारा घोषित सजा के मुताबिक, नेताओं ने किए ये काम..

  • एक घंटे तक बाथरूम की सफाई
  • सामुदायिक रसोई में बर्तन धोने और जूते साफ करने की सेवा
  • श्री सुखमनी साहिब का पाठ और कीर्तन सुनने का आदेश
  • सार्वजनिक मंच पर बोलने की मनाही

यह धार्मिक सजा सिख धर्म में ‘तनखैया’ घोषित व्यक्तियों को सुधारने का तरीका है। सुखबीर बादल और अन्य अकाली नेताओं ने अपने कृत्यों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी माँगते हुए सेवा करना स्वीकार किया। यह कदम धार्मिक और राजनीतिक दोनों नजरिए से ऐतिहासिक है।

पत्नी के साथ खेत जा रहे थे हरिराम, मुस्लिमों ने धारदार हथियारों से काट डाला: मालपुरा दंगा में कोर्ट ने 8 को सुनाई उम्र कैद की सजा

किसान हरिराम की हत्या के मामले में अदालत ने 8 मुस्लिम दंगाइयों को उम्र कैद की सजा सुनाई है। उनकी हत्या साल 2000 में राजस्थान के टोंक जिले के मालपुरा में दंगों के दौरान की गई थी। इस दंगे में कुल 6 लोगों की मौत हुई थी। इनमें कैलाश माली भी शामिल थे। उनकी हत्या के मामले में अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए 5 आरोपितों को बरी कर दिया गया है। जयपुर की विशेष अदालत ने दोनों मामलों में 2 दिसंबर 2024 को फैसला सुनाया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हरिराम हत्याकांड में उम्रकैद की सजा पाए दंगाइयों के नाम इस्लाम, मोहम्मद इशाक, अब्दुल रज्जाक, इरशाद, मोहम्मद जफर, साजिद अली, बिलाल अहमद और मोहम्मद हबीब हैं। बचाव व अभियोजन पक्ष की तमाम दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि धारदार हथियारों से निर्मम हत्या करने वालों के खिलाफ कोई नरमी नहीं बरती जा सकती है। हालाँकि कैलाश माली केस में कोई चश्मदीद गवाह न होने की बुनियाद पर अदालत ने 5 आरोपितों को बरी कर दिया है।

हरिराम की हत्या के मामले में उनकी विधवा धन्नी देवी ने 10 जुलाई 2000 को मालपुरा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसमें कहा गया कि था कि वह अपने पति के साथ खेत पर जा रही थी। इस दौरान दंगाइयों ने धारदार हथियार से उसके पति पर हमला कर दिया। उनके शरीर पर कई जगह वार किए। इसके चलते उनकी मौत हो गई।

कैलाश माली की हत्या केस में उनके बेटे ने FIR दर्ज करवाई थी। उस FIR में शिकायतकर्ता ने बताया था कि गाँव के कुछ लोगों ने उन्हें उनके पिता पर हमले के बारे में बताया था। इस सूचना पर जब वो घटनास्थल पर गए तो उनके पिता की मौत हो चुकी थी। इस मामले में कुल 5 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। बचाव पक्ष ने इस केस में कोई चश्मदीद गवाह न होने की दलील दी। अदालत ने इस दलील को माना और आरोपितों को बरी कर दिया।

क्यों हुआ था दंगा

10 जुलाई 2020 को टोंक जिले के मालपुरा में भारतीय जनता पार्टी के नेता कैलाश माली की हत्या कर दी गई थी। कैलाश माली को चलती बाइक से धक्का दिया गया था और चाकुओं से वार किए गए थे। जयपुर ले जाते समय रास्ते में उनकी मौत हो गई थी। कैलाश माली की हत्या की खबर टोंक के शहरी और ग्रामीण इलाकों में फ़ैल गई। भारी तनाव के बीच मुस्लिम भीड़ ने कई जगहों पर हिन्दुओं को निशाना बनाया।

इस दौरान दोनों पक्षों से लोगों की मौतें हुईं थी। इस हिंसा में अभी 17 अन्य लोगों पर कोर्ट में केस विचाराधीन है। कैलाश माली को पुलिस ने बाबरी ध्वंस के बाद टोंक जिले में हुए साल 1992 के दंगों का मुख्य आरोपित बनाया था। इसी वजह से वो कट्टरपंथियों के निशाने पर थे। हालाँकि उनकी पत्नी का कहना है कि उनके पति को झूठा फँसाया गया था।

संभल के मुस्लिम पत्थरबाजों को बचाने में जुटा विकिपीडिया, ‘जय श्रीराम’ के नारों को हिंसा के लिए ठहराया जिम्मेदार: ‘द वायर’ का दिया रेफरेंस, सवाल उठने पर हटाया लिंक

संभल हिंसा पर विकिपीडिया का रुख हमेशा की तरह संदिग्ध और सवालों के घेरे में है। दरअसल, खुद को ‘विश्वकोश’ कहने वाले विकिपीडिया ने 24 नवंबर 2024 कोर्ट के आदेश से हो रहे सर्वे के दौरान हुई हिंसा को लेकर एक अलग पेज बनाया। विकिपीडिया के इस पेज में दावा किया गया कि ‘कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायिक आयोग के सामने मुस्लिमों को भड़काने के लिए ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया गया’, इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। विकिपीडिया पर ऐसे दावे विपक्षी सांसदों के हवाले से किए गए।

विकिपीडिया के पेज पर लिखा है, “विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया है कि मस्जिद में अदालत द्वारा नियुक्त सर्वे टीम के सामने आए लोगों ने वरिष्ठ पुलिस और जिला अधिकारियों की मौजूदगी में मुसलमानों को भड़काने के लिए ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया, इस घटना का वीडियो वायरल हो रहा है।”

स्रोत:विकिपीडिया

दिलचस्प बात यह है कि विकिपीडिया ने शुरू में वामपंथी प्रोपेगेंडा आउटलेट ‘द वायर’ के लिए विवादास्पद स्तंभकार अपूर्वानंद झा द्वारा लिखे गए एक लेख का इस्तेमाल किया था, जिसमें दावा किया गया था कि ‘जय श्री राम’ के नारे से मुसलमान भड़क गए थे। हालाँकि, बाद में लिंक हटा दिया गया और द टेलीग्राफ का एक अन्य लिंक उसी दावे का मुख्य स्रोत बन गया।

इस पेज के पुराने संस्करण (एडिटिंग से पहले) में पहले पैराग्राफ में “जय श्री राम” नारे का उल्लेख किया गया था, जिसे अपूर्वानंद के लेख से जोड़ा गया था।

स्रोत: विकिपीडिया

बाद में द वायर के ओपिनियन आर्टिकल के रेफरेंस लिंक को हटा दिया गया।

स्रोत: विकिपीडिया

यही नहीं, अपडेट के बाद अब लेख के पहले पैराग्राफ से ‘जय श्री राम’ नारे का उल्लेख हटा दिया गया।

स्रोत: विकिपीडिया

‘द वायर’ पर लिखे अपने लेख में अपूर्वानंद ने कई निराधार दावे किए थे। सबसे पहले झा ने दावा किया कि दूसरा सर्वे 19 नवंबर की रात को हुए शुरुआती सर्वे के ‘दो दिन बाद’ किया गया था। यह तथ्यात्मक रूप से गलत है, साथ ही द वायर की संपादकीय टीम की भी चूक है। सच ये है कि दूसरा सर्वे पाँच दिन बाद 24 नवंबर 2024 को किया गया था।

फोटो साभार: द वायर

अपूर्वानंद ने यह भी दावा किया कि सर्वे बिना किसी पूर्व सूचना के किया गया था। यह फिर से गलत है। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने एक्स पर साझा किया कि मस्जिद समिति को सर्वे के दूसरे दौर के बारे में एक दिन पहले 23 नवंबर 2024 को उचित दस्तावेज़ों के साथ सूचित किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि यह लेख 26 नवंबर 2024 को प्रकाशित हुआ था, जबकि वकील विष्णु शंकर जैन ने 25 नवंबर 2024 को ही यह जानकारी सार्वजनिक कर दी थी कि मस्जिद समिति को इस सर्वे के बारे में 23 नवंबर 2024 को ही सूचित किया गया था।

टेलीग्राफ की रिपोर्ट में समाजवादी पार्टी के नेता और संभल के सांसद जियाउर रहमान बर्क के हवाले से कहा गया है, “आयोग के साथ मौजूद कुछ लोग ‘जय श्री राम’ के नारे लगा रहे थे। जब स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया, तो पुलिस ने गोलियाँ चलाईं और चार लोगों की मौत हो गई।” बर्क ने आगे माँग की कि पुलिस अधिकारियों की पहचान की जाए और घटना के लिए उन पर मामला दर्ज किया जाए।

फोटो साभार: टेलीग्राफ

गौरतलब है कि बर्क को संभल हिंसा मामले में दर्ज सात एफआईआर में से एक में मुख्य आरोपित के तौर पर नामित किया गया है। बर्क पर घटना से दो दिन पहले अपने दौरे के दौरान इलाके में रहने वाले मुसलमानों को भड़काने का आरोप है। दिलचस्प बात यह है कि विकिपीडिया ने यह नहीं बताया कि किस ‘विपक्षी नेता’ ने दावा किया कि हिंसा ‘जय श्री राम’ के नारे के बाद हुई, जबकि पेज पर इसका उल्लेख किया गया था। इसके अलावा, बर्क पर मामला दर्ज होने की जानकारी केवल एक अलग सेक्शन में शामिल की गई थी।

दिलचस्प बात यह है कि बातचीत के दौरान दो संपादकों, Xoocit और Cerium4B के बीच चर्चा हुई, जिसमें बाद वाले ने जोर देकर कहा कि ‘जय श्री राम’ के नारे के कारण हिंसा हुई, इस दावे को बरकरार रखा जाना चाहिए। नारे लगाने की बात ‘दावों’ के तौर पर बरकरार रखी गई, जबकि इस बात के पर्याप्त सबूत थे कि ये नारे सुबह 11 बजे के बाद लगाए गए थे, जबकि हिंसा सुबह 9:30 बजे से पहले भड़की थी।

तस्वीर स्रोत: विकिपीडिया

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने वकील विष्णु शंकर जैन और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा विवादित स्थल पर सर्वे के लिए अंदर जाने का वीडियो भी शेयर किया है। करीब 3 मिनट के इस वीडियो में ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने का कोई संकेत नहीं था।

पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने भी सबूत शेयर करते हुए कहा कि नारे उस समय नहीं लगाए गए जब टीम विवादित स्थल में प्रवेश कर रही थी, बल्कि नारे सुबह 11 बजे के बाद लगाए गए। उस समय तक वकील विष्णु शंकर जैन वहाँ से निकल चुके थे।

इसके अलावा, उन्होंने संभल पुलिस द्वारा बरामद सीसीटीवी फुटेज भी साझा की, जिसमें नारे लगने से काफी पहले सुबह करीब साढ़े नौ बजे उपद्रवियों द्वारा सीसीटीवी कैमरा तोड़ते हुए देखा जा सकता है।

AMASR अधिनियम और पूजा स्थल अधिनियम के बारे में गलत फैक्ट चेक

संभल हिंसा पर विकिपीडिया पेज पर गौर करने वाली एक अहम बात ये है कि इस लेख में AMASR अधिनियम और पूजा स्थल अधिनियम के बारे में जिस फैक्ट चेक का लिंक को लगाया है, वो अपेक्षाकृत अज्ञात संस्थान/वेबसाइट का लिंक है। उस संस्थान का नाम टाइमलाइन डेली है। इस फैक्ट चेक वाले लेख में भी गलत फैक्ट्स दिए गए थे।

ऑपइंडिया ने डोजियर में निकाली थी विकिपीडिया के फर्जीवाड़े की हवा

बता दें कि ऑपइंडिया ने कुछ समय पहले विकिपीडिया द्वारा गलत सूचना परोसने और भारत के खिलाफ राजनीतिक रूप से प्रेरित पूर्वाग्रह पर एक विस्तृत डोजियर जारी किया था। उस डोजियर को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है। ऑपइंडिया के शोध में पता चला है कि विकिपीडिया ने मुट्ठी भर लोगों को असीमित शक्तियाँ दे रखी हैं, जिन्हें ‘प्रशासक’ कहा जाता है।

ऑपइंडिया द्वारा डोजियर जारी करने के तुरंत बाद एक अन्य वामपंथी प्लेटफॉर्म फेसबुक ने डोजियर को बैन कर दिया, ताकि इसके दर्शकों की संख्या सीमित हो सके। फेसबुक पर अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप करने और एक खास विचारधारा के राजनीतिक हित को आगे बढ़ाने के कई आरोप हैं।

अडानी के खिलाफ कैंपेन चलाने वाला OCCRP उस अमेरिकी एजेंसी USAID से लेती है पैसा जो भारत को निशाना बनाने के लिए कुख्यात, फ्रांस के अखबार ने किया खुलासा

भारत के बड़े कारोबारी समूह अडानी ग्रुप को निशाना बनाने वाला ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) अमेरिका से भारी फंडिंग लेता है। वही अमेरिकी एजेंसियाँ उसे पैसा देती हैं, जो भारत विरोधी कामों में लिप्त रही हैं। यह सारा खुलासा एक फ्रांसीसी अखबार ने अपनी रिपोर्ट में किया है।

OCCRP को 2007 में स्थापित किया गया था। यह दावा करता है कि विश्व के 6 महाद्वीपों में पत्रकारों का एक नेटवर्क है, जो इस अपराध और भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग में एक्सपर्ट हैं। OCCRP का दावा है कि वह पूरी तरह स्वतंत्र संस्थान है लेकिन अब फ्रांसीसी अखबार मीडियापार्ट ने खुलासा किया है कि यह अमेरिका के विदेश विभाग और एजेंसी USAID से पैसा लेते हैं।

मीडियापार्ट ने 2 दिसम्बर, 2024 को इस संबंध में एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की है। ‘द हिडेन लिंक्स बिटवीन जायंट ऑफ़ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म एंड यूएस गवर्मेंट’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में मीडियापार्ट ने बताया है कि कैसे OCCRP पर अमेरिका की सरकार का बड़ा प्रभाव है।

मीडियापार्ट ने बताया, “जहाँ OCCRP खुद को पूरी तरह से स्वतंत्र बताता है, इसके मैनेजमेंट ने अमेरिका पर पूरी तरह से निर्भर कर दिया है। यह जानकारी इस जाँच में पता चली है।” मीडियापार्ट ने बताया है कि OCCRP का गठन ही अमेरिकी सरकार के पैसे से हुई थी।

किस तरह अमेरिकी पैसे पर जिंदा है OCCRP

मीडियापार्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अभी भी OCCRP की फंडिंग का लगभग 50% से अधिक अमेरिकी एजेंसियाँ देती हैं। यह एजेंसियाँ OCCRP में अपने लोगों को नियुक्त करती हैं। ड्रियू सुलिवान इनमें से एक हैं। मीडियापार्ट ने यह भी बताया कि OCCRP जहाँ अमेरिकी एजेंसियों से फंडिंग लेने की बात स्वीकारती है, वहीं यह नहीं बताती कि इसको कितनी फंडिंग मिलती है।

मीडियापार्ट ने यह भी बताया कि OCCRP अपने लेखों में भी कभी यह जानकारी नहीं दी कि उन्हें अमेरिका से फंडिंग मिलती है। USAID का OCCRP दखल कितना अधिक है, इसका अंदाजा USAID के एक अधिकारी की एक बात से लगाया जा सकता है।

USAID के यूरोप और यूरेशिया के सीनियर एडवाइजर माइक हेनिंग ने OCCRP को USAID की सबसे बड़ी उपलब्धि में से एक बताया था। OCCRP ने अपने रिकॉर्ड से भी यह बात हटा दी है कि अमेरिकी सरकार ने उसकी स्थापना में क्या रोल निभाया था।

इस रिपोर्ट में केवल यूनाइटेड नेशन द्वारा पैसे दिए जाने का उल्लेख किया है। ड्रयू सुलिवन ने दावा किया है कि यूनाइटेड नेशंस से मिला पैसा असल में OCCRP को मिला पहला फंड था। OCCRP को स्थापना के बाद से अब तक अमेरिकी सरकार से कम से कम 47 मिलियन डॉलर, यूरोपियन देशों (ब्रिटेन, स्वीडन, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, स्लोवाकिया और फ्रांस) से 14 मिलियन डॉलर तथा यूरोपियन यूनियन से 1.1 मिलियन डॉलर मिल चुके हैं। यह धनराशि OCCRP ने अपनी वेबसाइट पर नहीं बताई है।

OCCRP की रिपोर्टिंग पर अमेरिकी सरकार का प्रभाव

मीडियापार्ट के अनुसार, OCCRP ने एक और प्रोजेक्ट को भी चलाया है जिसके अंतर्गत यह उन रिपोर्ट के आधार पर कानूनी कार्रवाई करता है जिनकी इसने जाँच की है। दिलचस्प बात यह है कि तथाकथित ‘स्वतंत्र संगठन’ अमेरिकी सरकार की कभी आलोचना नहीं करता है।

इसकी अधिकांश रिपोर्ट रूस, माल्टा, साइप्रस और वेनेजुएला जैसे देशों के बारे में खूब एक्टिविज्म करता है। मीडियापार्ट ने खुलासा किया है कि अमेरिका के विदेश विभाग ने वेनेजुएला के भ्रष्टाचार को उजागर करने और उसका मुकाबला करने के मिशन के लिए OCCRP को 173,324 डॉलर भी दिए है।

वेनेजुएला पर अमेरिका ने सैंक्शन लाद रखे हैं। मीडियापार्ट ने कहा, “एक पत्रकार संगठन द्वारा अमेरिका की पहल पर और उससे पैसे लेकर ऐसी गतिविधियों का नेतृत्व करना, यहाँ तक ​​कि एक उचित कारण के लिए भी, महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न उठाता है।”

अडानी पर हमले का OCCRP का है इतिहास

अगस्त 2023 में, ऑपइंडिया ने भविष्यवाणी की थी कि OCCRP अमेरिका स्थित शॉर्ट सेलर ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ के नक्शेकदम पर चलते हुए भारतीय बाजार में उथल-पुथल मचाने की योजना बना रहा है।हमने खुलासा किया था कि OCCRP को जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF), फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर ब्रदर्स फाउंडेशन जैसी संस्थाओं से फंड मिलता है।

OSF ने संगठन की क्रॉस-बॉर्डर रिपोर्टिंग को ‘मजबूत’ करने और प्रभाव बढ़ाने के लिए संगठित OCCRP को $8,00,000 (₹6.61 करोड़) का अनुदान भी दिया। ‘पत्रकारों के नेटवर्क’ ने अब तक दो हिट लेख प्रकाशित किए हैं। एक अगस्त 2023 में और दूसरा मई 2024 में। अडानी समूह और मॉरीशस स्थित फंड ‘360 वन’ द्वारा OCCRP के इन दावों को खारिज कर दिया गया।

यहाँ तक ​​कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी फैसला सुनाया था कि OCCRP की रिपोर्ट का इस्तेमाल सेबी द्वारा चल रही जाँच पर संदेह जताने के लिए नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना किसी सत्यापन के किसी संगठन की रिपोर्ट पर सबूत के तौर पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

मीडियापार्ट के खुलासे ऐसे समय में हुए हैं जब गौतम अडानी को रिश्वतखोरी के कथित आरोपों को लेकर अमेरिका में परेशान किया जा रहा है। गौरतलब है कि जिस USAID से OCCRP पैसा लेता है, वह कई देशों में सरकारें बदलने के लिए ज़िम्मेदार रहा है।

USAID का है सरकारें बदलने में इतिहास

USAID हाल ही में बांग्लादेश भी सत्ता परिवर्तन के खेल में शामिल था। USAID ने यहाँ ऐसी एजेंसियों को मदद दी थी जो शेख हसीना की सत्ता को अस्थिर करने के लिए लगी हुई थीं।बांग्लादेश में यह योजना अमेरिका ने 2019 से ही चालू कर दी थी। USAID ने यहाँ IRI नाम की एक संस्था को पैसा दिया था।

IRI ने इसके लिए एक कार्यक्रम चलाया और यह जनवरी 2021 तक चला । IRI ने कहा इस कायर्क्रम का उद्देश्य बांग्लादेश के भीतर उन लोगों को आवाज देना है, जो हसीना की दमनकारी सत्ता के विरुद्ध खड़े हो सकें। IRI ने अपने इस कार्यक्रम में LGBT, बिहारी और बाकी समुदायों के लोगों के समूहों को समर्थन दिया।

इसके तहत 77 ‘एक्टिविस्ट’ को ट्रेनिंग भी दी गई। इन लोगों को बड़ी धनराशि भी दी गई। इसका अर्थ यह लगाया जा सकता है कि अमेरिका उन लोगों को अपने पक्ष में बोलने के लिए तैयार कर रहा था जो हसीना का विरोध कर सकें। IRI ने 2021 में एक और प्रोग्राम चलाया था। इसके लिए उसे अमेरिकी एजेंसी NED से 9 लाख डॉलर की मदद मिली थी। इस कार्यक्रम के तहत IRI ने उन नेताओं को तैयार करने का लक्ष्य रखा था जो आगे जाकर बड़ी आवाज बन सकें। 

ईसाई बनने से किया इनकार तो जंजीरों से बाँधा, 1 महीने के बेटे से अलग कर इतना किया टॉर्चर कि मानसिक स्थिति हुई खराब: चल-फिर भी नहीं सकती

राजस्थान के सिरोही में धर्म परिवर्तन से इनकार कर पर एक महिला को बुरी तरह प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। महिला पर उसके ससुराल के लोग ही ईसाई बनने का दबाव डाल रहे थे। 2 दिसंबर 2024 को इस संबंध में शिकायत मिलने के बाद पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

रिपोर्टों के अनुसार धर्मांतरण से इनकार करने पर महिला को जंजीरों से बाँध कर रखा गया था। उसके साथ मारपीट की गई। उसे उसके एक महीने के बेटे से अलग कर दिया गया। इतना टॉर्चर किया गया कि उसकी मानसिक स्थिति खराब हो गई है। अब वह चल-फिर भी नहीं सकती है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला सिरोही जिले में आने वाले अनादरा थाना क्षेत्र के गाँव धानेरा का है। जगसी राम ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में बताया है कि करीब 1 साल पहले उनकी बेटी की शादी दीपाराम से हुई थी। कुछ दिनों तक ससुराल में सब सही रहा, लेकिन बाद में उनकी बेटी के साथ मारपीट की जाने लगी। करीब 1 माह पहले उनकी बेटी एक बच्चे की माँ बनी।

शादी के कुछ दिनों बाद उनकी बेटी को पता चला कि उसका पति दीपाराम सोशल मीडिया पर ईसाई मत का प्रचार करता है। वह फोटो और वीडियो शेयर कर अन्य लोगों को भी ईसाई बनने के लिए उकसाया करता था। पोल खुलने के बाद दीपाराम अपनी पत्नी पर भी ईसाई बनने का दबाव बनाने लगा। उससे ईसाईयों के आयोजनों में जाने के लिए कहने लगा। जब पत्नी ने खुद को हिंदू बताते हुए ईसाई बनने से इनकार कर दिया। इसके बाद दीपाराम उसे बुरी तरह से टॉर्चर करने लगा।

दीपाराम के अलावा जेठ शंकर, उमाराम, जेठानी फूली देवी, मंजू और परिवार के अन्य सदस्य भी महिला को प्रताड़ित करने लगे। कथित तौर पर ये सभी लोग ईसाई बन चुके हैं और प्रार्थनाओं में भी शामिल होते थे। प्रताड़ना के बाद भी जब महिला धर्मांतरण को तैयार नहीं हुई तो ससुराल के लोगों ने उसे जंजीरों से बाँध दिया। उसे उसके बच्चे से अलग कर दिया।

महिला को टॉर्चर किए जाने की जानकारी मिलने पर उसके मायके वाले ससुराल पहुँचे। महिला को जंजीरों से मुक्त करवाया और मायके ले आए। इसके बाद पुलिस को शिकायत दी गई। शिकायत में बताया गया है कि अत्याचार से पीड़िता की मानसिक हालत खराब हो गई है। पीड़िता ठीक से चल-फिर भी नहीं पा रही है। पुलिस ने मामले का संज्ञान ले कर जाँच शुरू कर दी है। पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार बेनीवाल के मुताबिक जाँच से निकले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

अपने ही पिता की चिता को जलते देख रहे इन दो बच्चों का दर्द बताने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं, खुद पढ़िए कैसे एक मुस्लिम परिवार ने इन्हें कर दिया अनाथ

दिल्ली के नारायणा इलाके में शनिवार (30 नवंबर 2024) को 36 वर्षीय मनोज की चाकू घोंप कर हत्या कर दी गई। पुलिस ने इस मामले में अब तक कुल 7 आरोपितों को गिरफ्तार किया है, जिनमें 2 मुस्लिम महिलाएँ, 3 नाबालिग, मकसूद और मोहम्मद अख्तर नाम के दो आरोपित शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, छह महीने पहले आरोपितों के परिवार ने मनोज के बड़े भाई प्रदीप को भी हत्या कर दी थी। दोनों हत्याओं की वजह प्रदीप द्वारा एक हिंदू लड़की के परिजनों को यह बताने की थी कि उनकी बेटी का अफेयर एक मुस्लिम लड़के से चल रहा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शनिवार की रात मनोज अकेले कहीं जा रहे थे। इस दौरान मकसूद, मोहम्मद अख्तर, अंगूरी और जूही खातून ने अपने 3 नाबालिग परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर मनोज को घेर लिया और उसकी पिटाई शुरू कर दी। जब मनोज ने बचने की कोशिश की, तो आरोपितों ने उन पर चाकुओं के कई वार किए। गंभीर रूप से घायल मनोज को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया।

मनोज की हत्या के बाद उनके पिता ने अपनी बेबसी बयाँ की। उन्होंने बताया, “प्रदीप के तीन बच्चे हैं, छोटे वाले बेटे के 2 बच्चे हैं। मेरे छोटे बेटे का मर्डर इसलिए किया गया था, क्योंकि मुस्लिम लड़के का हिंदू लड़की से अफेयर था। उसने लड़की के पिता को समझाया था, लेकिन इसके बाद वो लोग रंजिश रखने लगे।” इस बीच, मनोज के दोनों बच्चों की एक तस्वीर सामने आई है, जहाँ दोनों मासूम अपने पिता की चिता को मुरझाई आँखों से जलता देख रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि वो अब अपने पिता को कभी नहीं देख पाएँगे।

यह मामला साल 2024 के मई महीने से जुड़ा हुआ है, जब मनोज के भाई प्रदीप की भी चाकुओं से हत्या कर दी गई थी। पुलिस के मुताबिक, प्रदीप के हत्यारों में से एक नाबालिग लड़के का इलाके की एक हिंदू लड़की से प्रेम संबंध था। यह बात जब प्रदीप को पता चली, तो उसने लड़की के परिवार को यह बात बता दी, जिसके बाद लड़की के परिजनों ने उस पर कड़ी पाबंदियाँ लगा दीं। इसके बाद लड़के ने गुस्से में आकर, अपने एक अन्य नाबालिग साथी के साथ मिलकर प्रदीप की हत्या कर दी।

इस हत्या के बाद पुलिस ने दोनों नाबालिगों को गिरफ्तार कर बाल सुधार गृह भेज दिया। इनमें से एक की जमानत जुलाई में और दूसरे की सितंबर में हो गई थी। इसके बाद आरोपितों का परिवार मनोज से भी रंजिश रखने लगा और उसे मारने की योजना बना रहा था।

शनिवार को पुलिस ने मकसूद, मोहम्मद अख्तर, अँगूरी, जूही खातून और 3 नाबालिगों को गिरफ्तार कर लिया। मामले की जाँच जारी है और अन्य कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इस घटना के बाद नाराज हिंदू समुदाय ने मनोज की शव यात्रा के दौरान विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, और मृतक के परिवार का आरोप है कि पुलिस ने उनके घर की महिलाओं तक को पीटा।

प्रेमी अब्दुल्ला के साथ मिलकर विजय को उसकी बीवी ने ही मार डाला, सुलभ शौचालय के पास मिली थी लाश: 9 साल की बेटी ने खोला हत्या का राज

हरियाणा के फरीदाबाद में 2 दिसंबर 2024 को विजय कुमार नाम के एक युवक की लाश सुलभ शौचालय के पास मिली थी। पुलिस जाँच से पता चला है कि उसकी हत्या उसकी ही बीवी रेखा ने अपने प्रेमी अब्दुल्ला के साथ मिलकर की थी। पुलिस दोनों की तलाश कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना फरीदाबाद के एनआईटी नंबर 2 पुलिस चौकी क्षेत्र की है। यहाँ के शिवाजी पार्क इलाके में विजय कुमार अपनी पत्नी रेखा और 3 बेटियों के साथ रहता था। उसके घर में अब्दुल्ला का आना-जाना था। इसी दौरान अब्दुल्ला और रेखा के बीच नजदीकी बढ़ गई। दोनों को विजय ने भी आपत्तिजनक हालत में देखा था।

विजय ने रेखा को कई बार समझाया। उसे अब्दुल्ला से दूर रहने को कहता था। रेखा हर बार अपनी गलती मान लेती थी। लेकिन विजय के पीठ पीछे अब्दुल्ला से मिलना बंद नहीं किया। कुछ ही दिन पहले अचानक घर पहुँचे विजय ने दोनों को आपत्तिजनक हालत में पकड़ लिया था। इसको ले कर विजय और रेखा के बीच झगड़ा भी हुआ था।

इसके बाद 2 नवंबर को अचानक से विजय की लाश एक सुलभ शौचालय के बाहर मिली। घर में विजय की तीनों बेटियाँ थी, लेकिन रेखा फरार थी। पुलिस ने विजय की 9 साल की बेटी सोनम से बात की तो मामले का खुलासा हो गया। सोनम ने बताया कि 1 नवंबर को उसकी मम्मी (रेखा) और अब्दुल्ला ने मिल कर विजय को खूब पीटा था। इसी दौरान रेखा और अब्दुल्ला ने विजय के मुँह पर तकिया रखकर उसका दम घोंट दिया।

सोनम को यह सब देखते हुए रेखा ने पकड़ लिया था। इसके बाद उसे दूसरे कमरे में भेज दिया था। हत्या के बाद रेखा और अब्दुल्ला ने विजय के शव को पास के ही एक सुलभ शौचालय के पास फेंक दिया और फरार हो गए। पुलिस ने मृतक के भाई बलवीर की तहरीर पर रेखा और अब्दुल्ला के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज कर लिया है।

मृतक के भाई बलवीर ने बताया कि विजय ने अपनी 25 लाख रुपयों की बीमा करवा रखी थी। बकौल बलवीर उसकी भाभी लालची थी और बीमा के इसी पैसे को हड़पने के लिए विजय की हत्या कर दी। विजय की तीनों बेटियों की देखभाल में खुद को असमर्थ बताते हुए बलवीर ने उन्हें बाल कल्याण समिति को सौंपने की माँग की है। विजय के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। रेखा और अब्दुल्ला की तलाश में पुलिस टीमें संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही है।

मोहम्मद युनुस के इशारे पर बांग्लादेश में हो रहा है हिंदुओं का कत्लेआम: शेख हसीना, खूनखराबे की उस साजिश का भी किया खुलासा जिसके कारण छोड़ना पड़ा देश

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मौजूदा अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनुस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि देश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के पीछे मोहम्मद युनुस का हाथ है। शेख हसीना ने युनुस को इन हमलों का ‘मास्टरमाइंड’ बताते हुए कहा कि उनकी साजिश के तहत ही यह हिंसा हो रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शेख हसीना जो 5 अगस्त के तख्तापलट के बाद भारत में हैं, ने कहा कि सत्ता में बने रहकर वह नरसंहार का हिस्सा नहीं बनना चाहती थीं। उन्होंने कहा, “मुझे सत्ता का लालच नहीं। मैं खूनखराबा रोकना चाहती थी, इसलिए देश छोड़ने का फैसला लिया। हथियारबंद लोग मेरी हत्या की योजना बना रहे थे। अगर मैं रुकती, तो नरसंहार होता।”

न्यूयॉर्क में अवामी लीग के कार्यकर्ताओं के कार्यक्रम को वर्चुअली संबोधित करते हुए शेख हसीना ने यह भी कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों को निशाना बनाया जा रहा है। 11 चर्च, कई मंदिर और यहाँ तक कि इस्कॉन पर भी हमले हुए हैं। उनके अनुसार, मोहम्मद युनुस एक तय योजना के तहत देश को अस्थिर कर रहे हैं।

इस्कॉन चटगांव के प्रमुख चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी ने हिंसा को और भड़काया है। इस गिरफ्तारी के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हिंदुओं पर जमात और बीएनपी के कार्यकर्ताओं ने हमले किए। इन हमलों में 50 से ज्यादा लोग घायल हो गए। कई हिंदू संगठनों ने इन घटनाओं के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा कि इन हमलों का मकसद अल्पसंख्यक समुदाय को डराना और उन्हें देश से बाहर करना है। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) के नेता तारिक रहमान ने खुद कहा था कि अगर हत्याएं जारी रहीं तो सरकार नहीं टिकेगी।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अंतरिम युनुस सरकार के पाकिस्तान की ओर झुकाव के चलते बांग्लादेश के ऐतिहासिक नेताओं और स्थलों को अपमानित किया जा रहा है। बंगबंधु शेख मजीबुर रहमान की प्रतिमा तोड़ी गई, और उनकी तस्वीरें सरकारी दफ्तरों से हटा दी गईं। यहाँ तक कि उनके योगदान से जुड़े राष्ट्रीय अवकाश भी रद्द कर दिए गए हैं।