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शिमला की अवैध मस्जिद को तोड़ने का काम रुका, मुस्लिम बोले- पैसे नहीं हैं: हिन्दू संगठनों ने दिया ‘कारसेवा’ का ऑफर, कहा- फ्री में कर देंगे

शिमला की अवैध संजौली मस्जिद को तोड़ने का काम फिर एक बार रुक गया है। मस्जिद कमिटी के मुखिया ने तोड़ने का काम चालू करने के बाद रोकने को लेकर पैसे की कमी का हवाला दिया है। वहीं दूसरी तरफ स्थानीय संगठनों ने बिना पैसे लिए ही अवैध ढाँचा तोड़ने के लिए कारसेवा का ऑफ़र दिया है।

संजौली की अवैध मस्जिद तोड़ने का काम सोमवार (21 अक्टूबर, 2024) से चालू हुआ था। इस दौरान मस्जिद की छत हटाई जा रही थी लेकिन यह काम अब अधर में लटक गया है। मंगलवार आते-आते यह काम ठप ही हो गया। मंगलवार को मात्र दो-तीन मजदूर ही मस्जिद तोड़ने का काम करते दिखे जो कि इसके आकार के हिसाब से पर्याप्त नहीं है।

इसके बाद मस्जिद तोड़ने का यह काम पूरी तरीके से रुक गया। मस्जिद कमिटी के मुखिया मोहम्मद लतीफ़ ने इस बारे में पूछे जाने पर मीडिया को बताया कि उन्होंने पैसे की कमी के चलते यह काम रोका है। उन्होंने कहा कि जब फिर से फंड इकट्ठा हो जाएगा तो मस्जिद को तोड़ने की कार्रवाई की जाएगी।

मोहम्मद लतीफ़ ने कहा कि जब मस्जिद का अवैध निर्माण किया जा रहा था तब सभी मुस्लिम आगे बढ़ चढ़ कर पैसा दे रहे थे लेकिन जब इस अवैध निर्माण को तोड़ने का काम चालू हुआ तो कोई भी पैसा देने को तैयार नहीं है। मोहम्मद लतीफ़ ने कहा है कि मस्जिद तोड़ने में ₹10-15 लाख का खर्च आने वाला है। उन्होंने मजदूरों की कमी भी एक कारण बताया है।

वहीं अवैध ढाँचा गिराने के लिए पैसे की कमी वाली बात पर हिमाचल के संगठन भी आगे आए हैं। हिमाचल प्रदेश में अवैध मस्जिदों को लेकर आंदोलन कर रहे संगठनों ने बिना पैसे लिए मस्जिद तोड़ने का ऑफर दिया है। देवभूमि संघर्ष समिति के लोगों ने कहा है कि मस्जिद तोड़ने के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है।

संजौली सिविल सोसायटी ने कहा है कि यदि मस्जिद कमिटी के पास पैसे की कमी है तो वह सहयोग देने को तैयार हैं। कमिटी ने कहा कि वह मस्जिद तोड़ने के लिए कारसेवा करेंगे और इसके लिए कोई पैसा भी नहीं लेंगे। उन्होंने यहाँ तक कहा कि वह इसे तोड़ने के दौरान खाना भी घर से ही लाएँगे।

स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि मस्जिद कमिटी नगर निगम कोर्ट के आदेश का सही से पालन नहीं कर रही है। उन्होंने इसको लेकर चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा है कि हाई कोर्ट ने भी मस्जिद को लेकर जल्द निर्णय की बात कही है।

हिमाचल प्रदेश सरकार में मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने भी यही ऑफर दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि मस्जिद कमिटी उनसे मिलने आती है तो वह आर्थिक सहयोग और श्रमदान दोनों ही देंगे। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस सबकी मदद करने के लिए ही जानी जाती है और वह इस मामले में भी मदद देंगे। हिमाचल सरकार में मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भी निगम से सहायता लेने की बात कही थी।

गौरतलब है कि मस्जिद तोड़ने का आदेश मस्जिद कमिटी के आवेदन पर ही दिया था। इस मस्जिद का निर्माण 2010 से हो रहा था। तब से लगातार नगर निगम शिमला इसे नोटिस भेज रहा था लेकिन इसका निर्माण नहीं रोका गया और पाँच मंजिले खड़ी कर दी गईं। सितम्बर, 2024 में मस्जिद को लेकर विवाद चालू होने से पहले तक इस मस्जिद को 38 नोटिस भेजे जा चुके थे।

जब सितम्बर, 2024 में एक स्थानीय युवक के साथ मारपीट की खबर के बाद संजौली मस्जिद के विरुद्ध प्रदर्शन चालू हुए तो सब पिटारा बाहर आया। इसके बाद मस्जिद कमिटी ने विरोध प्रदर्शन बढ़ता देख इसे गिराने की बात कह दी। इसको लेकर उन्होंने खुद ही आवेदन दिया।

संजौली मस्जिद को जल्दी गिराए जाने को लेकर मुस्लिमों में दो फाड़ भी हो चुका है। 9 अक्टूबर, 2024 को मुस्लिमों के एक संगठन ने बैठक कर मस्जिद गिराए जाने के खिलाफ हाई कोर्ट जाने की बात कही थी। हालाँकि, संजौली मस्जिद कमिटी ने ऐसी किसी बात से इनकार किया था।

डॉक्टर अंबेडकर और ‘भारत का विचार’: जानिए संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष’ शब्द शामिल करने के विरोध में क्यों थे बाबासाहेब?

राष्ट्र की पहचान और भविष्य की दिशा के बारे में गहन चर्चा और बहस भारत के संविधान के निर्माण की आधारशिला थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद कई वर्षों तक चले इस वृहत् कार्य में कुछ सबसे उल्लेखनीय प्रमुख बहसें शामिल थीं। ऐसी ही एक बहस प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को शामिल करने को लेकर थी।

प्रोफेसर केटी शाह ने 15 नवंबर 1948 को भारतीय संविधान के मसौदे में एक संशोधन का एक प्रस्ताव रखा, जिसमें भारत को ‘धर्मनिरपेक्ष, संघीय, समाजवादी राज्यों का संघ’ के रूप में लेबल करने की माँग की गई। हालाँकि, मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने इस प्रस्ताव को दृढ़ता से खारिज कर दिया।

केटी शाह द्वारा रखे गए उस स समय रखे गए प्रस्ताव पर डॉक्टर अंबेडकर को दो आपत्तियाँ थीं, जो भारत के बारे में उनकी दृष्टि की समझ का आधार बनीं। उनकी दृष्टि लोकतंत्र और देश के लोगों की इच्छा को निश्चित वैचारिक पदों से ऊपर रखती थी।

पहली आपत्ति: संविधान को कोई विचारधारा नहीं थोपनी चाहिए

डॉक्टर अंबेडकर का मुख्य तर्क लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में निहित था। उनका दृढ़ विश्वास था कि संविधान राज्य के कामकाज को विनियमित करने का एक तंत्र है। अंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि संविधान को ऐसे दस्तावेज़ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जो देश की भावी पीढ़ियों पर एक विशेष सामाजिक या आर्थिक विचारधारा थोपता हो।

केटी शाह के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए अंबेडकर ने कहा था, “राज्य की नीति क्या होनी चाहिए, समाज को उसके सामाजिक और आर्थिक पक्ष में कैसे संगठित किया जाना चाहिए, ये ऐसे मामले हैं जिनका निर्णय लोगों को समय और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं करना चाहिए।”

अंबेडकर के अनुसार, भारत के संविधान में समाजवाद जैसी विचारधारा को संहिताबद्ध करने में एक बुनियादी विरोधाभास था। उन्होंने तर्क दिया कि अगर समाजवाद को प्रस्तावना में जोड़ दिया गया तो यह भविष्य की पीढ़ियों को अपना रास्ता चुनने की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करेगा। उन्होंने कहा, “इसे संविधान में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह लोकतंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर देगा।”

उन्होंने पहले ही इस बात को समझ लिया था कि अलग-अलग कालखंड नई चुनौतियाँ आ सकती हैं। वे देश की भावी पीढ़ियों को किसी निर्दिष्ट प्रणाली से बांधने के लिए तैयार नहीं थे। इतिहास में एक समय समाजवाद लोकप्रिय था। जिस समय संविधान तैयार किया गया था, तब यह विकसित हो रहा था। इसे संविधान में जोड़ने से इनकार करना प्रासंगिक हो गया।

दूसरी आपत्ति: संविधान में पहले से ही समाजवादी सिद्धांत मौजूद

प्रस्ताव को खारिज करते हुए अंबेडकर ने दूसरा तर्क दिया कि संविधान के मसौदे में पहले से ही ऐसे प्रावधान हैं, जिन्हें राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के माध्यम से समाजवादी सिद्धांतों के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने मसौदे के अनुच्छेद 31 की ओर इशारा किया और कहा कि इसमें धन के संकेन्द्रण को रोकने और समान काम के लिए समान वेतन जैसे उपायों की रूपरेखा दी गई है, जो एक समाजवादी प्रावधान है।

उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा, “यदि ये निर्देशक सिद्धांत… अपनी दिशा और विषय-वस्तु में समाजवादी नहीं हैं तो मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि समाजवाद और क्या हो सकता है।” उन्होंने आगे तर्क दिया कि समाजवादी आदर्श पहले से ही निर्देशक सिद्धांतों में अंतर्निहित हैं, जिससे संवैधानिक रूप से भारत को अधिक समतापूर्ण समाज की ओर ले जाना संभव हो गया।

अंबेडकर के अनुसार, प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ना निरर्थक होगा, क्योंकि सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांत पहले से ही मसौदा पाठ का हिस्सा हैं। इसके अलावा, उनका मानना ​​था कि नीति निर्देशक तत्वों में शामिल समाजवादी शब्द सरकार को देश को अधिक लचीलेपन के साथ चलाने की अनुमति देंगे।

उनका मानना था कि यह सरकार को समय के साथ बदलती आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुकूल होने में सक्षम बनाएगा। इस विचार के विपरीत, यदि प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ा गया तो यह देश की भावी पीढ़ियों को अधिक कठोर वैचारिक ढाँचे में बाँध देगा, जिससे कई तरह की बाधाएँ पैदा होंगी।

धर्मनिरपेक्षता पर बहस: एक सूक्ष्म दृष्टिकोण

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर धर्म को राजनीति से दूर रखने के प्रबल समर्थक थे। सिर्फ़ वे ही नहीं, बल्कि भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी यही मानते थे। उन दोनों ने तर्क दिया कि प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का स्पष्ट रूप से उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है। अंबेडकर ने तर्क दिया कि संविधान ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि भारत एक ऐसा देश होगा, जो किसी भी धर्म को मान्यता नहीं देगा।

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का कहना था कि धर्मनिरपेक्षता के विचारों को विभिन्न अनुच्छेदों में लागू किया गया है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य के किसी विशेष धर्म के साथ गैर-संरेखण (Non-alignment) से संबंधित थे, जैसे अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 16। ये अनुच्छेद धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं।

दूसरी ओर, नेहरू का मानना ​​था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता अपने पश्चिमी समकक्षों से अलग है। पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता मुख्य रूप से चर्च और यूरोप के देशों के बीच ऐतिहासिक संघर्ष को संबोधित करती है। नेहरू का मानना था कि इसके विपरीत भारत का धार्मिक परिदृश्य राजनीति से अधिक जुड़ा हुआ है। इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता को अधिक लचीली और कार्यात्मक अवधारणा के रूप में समझा जाना चाहिए।

इंदिरा गाँधी का 42वाँ संविधान संशोधन और ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों का समावेश

आपातकाल के दौरान 1976 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संविधान में 42वें संशोधन के माध्यम से भारत की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ दिए। प्रस्तावना में इतना बड़ा बदलाव करने के लिए इंदिरा गाँधी की बार-बार आलोचना की गई। इसे गाँधी की शक्ति को मजबूत करने के उद्देश्य से एक राजनीतिक रूप में देखा गया।

किए गए बदलावों को अगर हम भीमराव अंबेडकर के दृष्टिकोण से देखें तो वे लोकतंत्र और स्वतंत्रता की उस भावना के विपरीत हैं, जिसकी वे रक्षा करना चाहते थे। अंबेडकर का मानना ​​था कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के बारे में फैसले लोगों की इच्छा को दर्शाने वाले होने चाहिए। ये किसी सत्तारूढ़ सरकार की वैचारिक प्राथमिकताएँ नहीं होनी चाहिए।

हाल में इसे भारतीय मूल्यों के प्रतिबिंब करने वाले के बजाय एक असुरक्षित सरकार का प्रतिबिंब माना गया। सितंबर 2024 में तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता एक यूरोपीय अवधारणा है, न कि भारतीय। उन्होंने कहा कि यह चर्च और यूरोप के राजा के बीच संघर्ष को समाप्त करने के लिए अस्तित्व में आया था।

भारत में ‘धर्मनिरपेक्षता’ को गैर-जरूरी बताते हुए उन्होंने बताया कि संविधान के मूल निर्माताओं ने इसे दस्तावेज़ में शामिल नहीं किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का जिक्र करते हुए आरएन रवि ने उन्हें ‘एक सुरक्षित प्रधानमंत्री’ कहा था, जिन्होंने संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा था।

अंबेडकर का दीर्घकालिक दृष्टिकोण: विचारधारा से ऊपर लोकतंत्र

संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को शामिल करने के बारे में अंबेडकर के विचार और अनिच्छा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उनका मानना ​​था कि अगर इन आदर्शों को संविधान के ज़रिए लागू किया गया तो यह लोगों की स्वतंत्रता के लिए प्रतिकूल होगा। उन्होंने तर्क दिया कि संविधान एक लचीला दस्तावेज़ होना चाहिए, जो समाज की बदलती ज़रूरतों के हिसाब से ढलने में सक्षम हो।

उनके अनुसार, एक लोकतांत्रिक देश को अपने नागरिकों को देश की परिस्थितियों के आधार पर अपनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था चुनने की स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिए। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद कठोर आदर्श हैं, जो लोगों की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं। लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की अनुकूलनशीलता के प्रति अंबेडकर की प्रतिबद्धता ने उन्हें इन शब्दों को शामिल करने का विरोध करने के लिए प्रेरित किया।

(इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। आप इस लिंक पर क्लिक करके इसे पढ़ सकते हैं।)

भगवान राम-माता सीता पर नाबालिग मुस्लिम ने की अभद्र टिप्पणी, गुजरात में सड़क पर उतरे हिंदू: बताया- 6 महीने से हो रही तनाव पैदा करने की कोशिश

गुजरात के गाँधीनगर जिले के सादरा गाँव में एक मुस्लिम नाबालिग द्वारा भगवान राम और माता सीता पर की गई अभद्र टिप्पणी से पूरे गाँव में आक्रोश फैल गया। इस घटना के विरोध में सैकड़ों ग्रामीण सड़कों पर उतर आए और पुलिस स्टेशन तक रैली निकाली। पुलिस ने भी तत्परता दिखाते हुए आरोपित नाबालिग को हिरासत में ले लिया है। इस विवाद के बाद गाँव में पूर्ण बंद की घोषणा की गई है।

बजरंग दल के प्रमुख गणपत सिंह ने ऑपइंडिया से बातचीत में पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। उन्होंने बताया, “यह घटना रविवार (22 अक्टूबर 2024) को हुई, जब सादरा गाँव के 16 वर्षीय मुस्लिम लड़के (नाबालिग की पहचान कानूनी कारणों से छिपाई गई) ने इंस्टाग्राम पर भगवान राम और माता सीता के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक और अश्लील टिप्पणी की। इसका स्क्रीनशॉट गाँव में वायरल हो गया, जिससे पूरे हिंदू समाज में गुस्सा फैल गया।” गणपत सिंह ने कहा कि बजरंग दल और अन्य संगठनों के कार्यकर्ता लोगों को शांत करने के लिए तुरंत मौके पर पहुँचे और कानूनी रास्ता अपनाने का सुझाव दिया।

आपत्तिजनक स्क्रीनशॉट

घटना के बाद गाँव के लगभग 200 से 300 लोग चिलोडा पुलिस स्टेशन पहुँचे और आरोपित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। पुलिस को स्क्रीनशॉट्स और अन्य सबूत सौंपे गए। गाँव के एक निवासी राजेश पटेल ने कहा, “इस घटना ने हमारे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। हम चाहते हैं कि दोषी के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोई इस तरह की हरकत न कर सके।”

चिलोडा पुलिस स्टेशन के निरीक्षक, PI परमार ने कहा, “हमने स्थिति को गंभीरता से लिया और तुरंत आरोपित नाबालिग को हिरासत में लिया। गाँव में स्थिति नियंत्रण में है, और हम शांति बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहे हैं।” पुलिस ने गाँव में शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए सुरक्षा बढ़ा दी है और ग्रामीणों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

गाँव में बंद और रैली का आयोजन

घटना के बाद 23 अक्टूबर को बजरंग दल के आह्वान पर सादरा गाँव में एक दिन का बंद रखा गया। गाँव के व्यापारी संघ के अध्यक्ष, रमेश चौधरी ने कहा, “हमारे धर्म का अपमान हुआ है, इसलिए हमने स्वेच्छा से अपनी दुकानें बंद रखी हैं। यह विरोध प्रदर्शन धर्म और आस्था की रक्षा के लिए है।” इसके अलावा, गाँव में हिंदू संगठनों द्वारा एक रैली भी निकाली गई, जिसमें ‘जय श्रीराम’ और ‘जय शिवाजी’ के नारे लगाए गए।

आरोपित के माता-पिता ने माँगी माफी

घटना के बाद आरोपित नाबालिग के माता-पिता ने गाँव के सरपंच और हिंदू संगठनों से माफी की अपील की। उन्होंने कहा कि उनका बेटा कम उम्र का है और यह हरकत उसने अनजाने में की है। सरपंच रमेश भाई चौहान ने बताया, “मुस्लिम नाबालिग के माता-पिता ने माफी माँगी है और आश्वासन दिया है कि ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। हम इस पर विचार कर रहे हैं।” हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच शांति बनाए रखने के लिए पुलिस की मध्यस्थता में एक शांति समिति की बैठक आयोजित की गई। बजरंग दल के गणपत सिंह ने कहा, “यदि मुस्लिम समुदाय आश्वासन देता है कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ नहीं होंगी, तो हम भी कार्रवाई को रोकने के लिए तैयार हैं। शांति बनाए रखना हमारी प्राथमिकता है।”

पिछले 6 महीनों से गाँव में बढ़ी आक्रामकता

हिंदू संगठनों ने दावा किया है कि सादरा गाँव में पिछले 6 महीनों से स्थिति तनावपूर्ण हो रही है। गणपत सिंह ने बताया, “गाँव में एक मस्जिद है जहाँ लाउडस्पीकर से अज़ान 5 बार की जाती है, जिससे पहले कभी ऐसा नहीं होता था। इससे गाँव में तनाव बढ़ा है।” उन्होंने यह भी कहा कि घटना के बाद से गाँव में तनाव की स्थिति बनी हुई है और शांति समिति की बैठक के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। बताया जा रहा है कि इस गाँव में 8000 घर हैं, लेकिन मुस्लिमों के घरों की संख्या महज 250 के आसपास ही है। इसके बावजूद ऐसी हरकतें की जा रही हैं।

PI परमार ने कहा, “हम स्थिति पर नजर रखे हुए हैं और किसी भी प्रकार की अशांति या हिंसा को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा रहे हैं। गाँव में शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है, और हम सुनिश्चित करेंगे कि किसी भी समुदाय के साथ अन्याय न हो।” फिलहाल, शांति बनाए रखने की कोशिश की जा रही है, और गाँव में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। शांति समिति की बैठक के बाद आगे की दिशा तय की जाएगी।

मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

आतंकवादी हैं अल जजीरा के 6 पत्रकार, हमास और फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद से हैं जुड़े: इजरायली सेना के हाथ लगे दस्तावेजों से खुली असली पहचान

इजरायल ने खुलासा किया है कि क़तर के पैसे से चलें वाले अल जजीरा के 6 पत्रकार असल में आतंकी हैं। इजरायल ने बताया है कि यह 6 पत्रकार इस्लामी आतंकी संगठन हमास और फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद (PIJ) के आतंकी है। इजरायल को इससे जुड़े दस्तावेज भी मिले हैं।

इजरायली सुरक्षा बल (IDF) ने बुधवार को एक्स (पहले ट्विटर) पर यह जानकारी दी है। IDF ने बताया, “IDF ने गाजा में मिली खुफिया जानकारी और अनेक दस्तावेजों का खुलासा किया है कि अल जजीरा के छह पत्रकार हमास और इस्लामिक जिहाद आतंकवादी संगठनों के साथ जुड़े हुए हैं। उनके टेबलेट्स, आतंकी ट्रेनिंग कोर्स और उनकी तनख्वाह के कागज इसकी पुष्टि करते हैं।”

IDF ने आगे बताया, “ये दस्तावेज कतरी अल जजीरा मीडिया नेटवर्क के हमास आतंकियों के साथ गठजोड़ का सबूत हैं। IDF ने हमास की हथियारबंद गतिविधियों में शामिल होने वाले कई पत्रकारों को उजागर किया है, ये लोग गाजा में हमास का प्रचार करते घूमते हैं।”

IDF ने कहा कि उसके दस्तावेज साफ तौर पर साबित करते हैं कि यह पत्रकार हमास और इस्लामिक जिहाद के संबंधित हथियारबंद विंग के सदस्य थे। इन आतंकी पत्रकारों की पहचान अनस जमाल महमूद अल-शरीफ, अला अब्दुल अजीज मुहम्मद सलामा, होसम बसल अब्दुल करीम शबात, अशरफ सामी अहसूर सराज, इस्माइल फरीद मुहम्मद अबू अमर और तलाल महमूद अब्दुल रहमान अरुकी के तौर पर हुई है।

IDF ने बताया कि अनस अल-शरीफ रॉकेट लॉन्चिंग स्क्वॉड का प्रमुख था और हमास की नुसीरत बटालियन में नुखबा फोर्स कंपनी का आतंकी था। वहीं अला सलामा इस्लामिक जिहाद की शाबूरा बटालियन की प्रोपेगेंडा इकाई का काम देखता था । शाबत हमास की बेत हनून बटालियन में स्नाइपर था और अशरफ सराज इस्लामिक जिहाद की बुरीज बटालियन का आतंकी था।

अबू अमर खान यूनिस बटालियन में ट्रेनिंग कंपनी कमांडर के तौर पर काम करता था। एक और पत्रकार अब्दुल रहमान अरुकी हमास की नुसीरत बटालियन में टीम कमांडर था। अल जजीरा का ही पत्रकार इस्माइल अबू अमर इस साल फरवरी में गाजा में इजरायली ऑपरेशन में घायल हो गया था।

इजरायल के ऑपरेशन में घायल होने पर अल जजीरा ने दावा किया था कि उसके पत्रकार का आंतकी संगठनों से कोई संबंध नहीं है। लेकिन अब IDF को इस बारे में दस्तावेज मिले हैं। अल जजीरा लगातार इजरायल को लेकर दुष्प्रचार करता रहा है।

अल जजीरा इस साल मई में बेंजामिन नेतन्याहू सरकार ने हमास का प्रोपेगेंडा चलाने के कारण इजरायल के भीतर अल जजीरा को बंद कर दिया था। सितम्बर, 2024 में इजरायल सरकार ने वेस्ट बैंक के रामल्लाह में अल जजीरा ब्यूरो को भी बंद कर दिया था।

सोना-चाँदी, जमीन-कैश सब, फिर भी 2010-11 से टैक्स नहीं भर रहे रॉबर्ट वाड्रा, प्रियंका गाँधी पर भी ₹11 लाख बकाया: वायनाड से भरा पर्चा तो खुली पोल

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने बुधवार (23 अक्टूबर, 2024) को केरल की वायनाड लोकसभा सीट उपचुनाव के लिए पर्चा दाखिल कर दिया। उनके नामांकन के दौरान भाई राहुल गाँधी भी मौजूद रहे। प्रियंका गाँधी के दाखिल किए गए चुनावी हलफनामे में उनकी करोड़ों की सम्पत्ति और उन पर इनकम टैक्स के बकाए की जानकारी सामने आई है। सामने आया है कि प्रियंका गाँधी और उनके पति रॉबर्ट वाड्रा ने लगभग ₹78.5 करोड़ का इनकम टैक्स नहीं चुकाया है। इसको लेकर मुकदमे भी चल रहे हैं।

प्रियंका गाँधी द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे के अनुसार, उन्होंने साल 2012-13 का ₹15.75 लाख का इनकम टैक्स नहीं चुकाया है और इसको लेकर इनकम टैक्स ट्रिब्यूनल मुकदमा चल रहा है। उन्होंने CBDT के पास मात्र ₹3.15 लाख जमा किए हैं। वर्तमान कार्रवाई के अनुसार, उनके ऊपर ₹11.11 लाख की रकम का इनकम टैक्स बकाया और उन्हें यह चुकाना है।

प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने इनकम टैक्स की बड़ी रकम दबा रखी है। उन्होंने 2010-11 के बाद से 2020-21 तक का इनकम टैक्स नहीं भरा है। यानि वह लगभग 12 सालों का इनकम टैक्स नहीं जमा कर रहे हैं। अब यह धनराशि लगभग ₹78.5 करोड़ पहुँच चुकी है।

हलफनामे के अनुसार, रॉबर्ट वाड्रा पर साल 2010-11 के लिए ₹7.15 करोड़, साल 2011-12 के लिए ₹3.02 करोड़, साल 2012-13 के लिए ₹3.39 करोड़, साल 2013-14 के लिए ₹11.05 करोड़, साल 2014-15 के लिए ₹10.02 करोड़ और 2015-16 का ₹8.98 करोड़ बकाया है।

इसके अलावा 2016-17 के ₹4.12 करोड़, 2017-18 के ₹3.06 करोड़, 2018 के लिए 2.39 करोड़ और 2019-20 के इए ₹24.16 करोड़ भी बकाया हैं। रॉबर्ट वाड्रा ने 2020-21 का ₹1 करोड़ का इनकम टैक्स भी नहीं जमा किया है।

इस हलफनामे में प्रियंका गाँधी और उनके पति रॉबर्ट वाड्रा की संपत्तियों की जानकारी भी सामने आई है। हलफनामे में प्रियंका गाँधी ने बताया है कि उनके पास 60 किलो से अधिक सोना चाँदी है। इसके अलावा उनके पास करोड़ों की जमीन भी है।

प्रियंका गाँधी वाड्रारॉबर्ट वाड्रा
आय साल 2023-2469,31,660₹55,58,000
आय साल 2022-23₹19,89,420 ₹11,38,710
आय साल 2021-22₹45,56,940 ₹9,03,810
आय साल 2020-21₹47,21,820 ₹9,35,530
आय साल 2019-20₹46,39,100₹15,09,220
बैंक सेविंग्स अकॉउंट₹3,67,281 ₹13,95,604
बैंक करंट अकॉउंटजीरो₹2,95,251
बैंक फिक्स्ड डिपोजिटजीरो₹35,60,245
शेयरजीरो₹65,72,012
म्यूचुअल फंड₹2,24,93,988₹32,79,998
PPF/LIC₹17,38,265₹6,00,000
विभिन्न कंपनियों को दिया गया पैसाजीरो₹35,38,89,724
सोना-चाँदी-जेवरात2.509 किलो सोना (₹1,15,79,065) 59.830 किलो चाँदी (₹29,55,581)जीरो
कुल चल संपत्ति₹4,24,78,689 ₹37,91,47,432
दिल्ली में जमीन3.78 एकड़ (₹2,10,13,598)जीरो
व्यावसायिक भवनजीरो₹27,64,38,633
आवासीय भवन₹7,74,12,598जीरो

ऊपर प्रियंका गाँधी और उनके पति की संपत्तियों का हर एक ब्योरा देखा जा सकता है। प्रियंका गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा के पास कोई नई गाड़ियाँ भी नहीं हैं। इस हलफनामे में बताया गया है कि दोनों के पास 3 कारें और 1 मोटरसाइकिल है। यह सभी गाड़ियाँ 15 वर्ष से अधिक पुरानी हैं।

यानी अगर देखा जाए तो रॉबर्ट वाड्रा- प्रियंका गाँधी पर इनकम टैक्स का बकाया उनकी कुल सम्पत्ति से भी ज्यादा है। हलफनामे के अनुसार, दोनों की कुल सम्पत्ति लगभग ₹77.5 करोड़ है जबकि उनके ऊपर ₹78 करोड़ से ज्यादा का इनकम टैक्स बकाया है। प्रियंका गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा का कुल इनकम टैक्स बकाया लगभग ₹78.5 करोड़ पहुँचता है।

प्रियंका गाँधी चुनावी राजनीति में उतरने वाली गाँधी परिवार की सबसे नई सदस्य हैं। यदि वह चुनाव जीतती हैं तो गाँधी परिवार के सभी सदस्य सांसद होंगे। उनके भाई राहुल गाँधी वर्तमान में रायबरेली जबकि माँ सोनिया गाँधी राज्यसभा की सांसद हैं।

जिस देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम, उसने अपनी जमीन पर रोहिंग्या मुस्लिमों को उतरने नहीं दिया: लकड़ी की नाव में 140 थे सवार, बोले स्थानीय- ये जहाँ भी गए, वहाँ फैलाई अशांति

इंडोनेशिया के आचे प्रांत के तट पर 140 रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों का एक समूह पहुँचा, लेकिन स्थानीय मछुआरा समुदाय के लोगों ने उन्हें जमीन पर कदम रखने ही नहीं दिया। इस घटना की वजह से तनाव की स्थिति बनी, रोहिंग्या मुस्लिमों का यह समूह, जिनमें ज्यादातर महिलाएँ और बच्चे शामिल थे, मलेशिया की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा था। स्थानीय समुदाय ने सुरक्षा और शांति के नाम पर उनका विरोध किया और उन्हें नाव से उतरने नहीं दिया।

एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना इंडोनेशिया के उत्तरी प्रांत आचे के दक्षिणी हिस्से में लाबुहान हाजी के पास की है। 140 भूखे और थके हुए रोहिंग्या मुस्लिमों ने लकड़ी की नाव में सवार होकर बांग्लादेश के कॉक्स बाजार से लगभग दो हफ्ते की समुद्री यात्रा की थी। इस दौरान तीन लोगों की मौत हो गई थी। जब यह नाव आचे के तट से लगभग 0.60 किलोमीटर दूर पहुँची, तो स्थानीय मछुआरों और निवासियों ने उनका विरोध किया।

स्थानीय मछुआरा समुदाय के मुखिया मोहम्मद जबल ने साफ तौर पर कहा कि उनका समुदाय इन्हें उतरने की अनुमति इसलिए नहीं देगा क्योंकि पहले के अनुभवों के अनुसार, रोहिंग्या मुस्लिम जहाँ भी गए हैं, वहाँ स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष और अशांति फैलाने की स्थिति उत्पन्न हुई है। जबल ने कहा, “हमने उन्हें खाना दिया, लेकिन हम यह नहीं चाहते कि यहाँ वही समस्या हो, जो अन्य स्थानों पर हुई है।”

अपने विरोध को जताने के लिए मछुआरों ने समुद्र के किनारे बड़ा बैनर लगाया है, जिसमें लिखा है, “साउथ आचे रीजेंसी के लोग इस क्षेत्र में रोहिंग्या शरणार्थियों के आगमन को अस्वीकार करते हैं।” स्थानीय लोगों का विरोध इसलिए भी है कि जहाँ-जहाँ रोहिंग्या मुस्लिम पहुँचे हैं, वहाँ संघर्ष और अशांति फैली है।

आचे पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, रोहिंग्या मुस्लिमों का यह समूह 9 अक्टूबर को बांग्लादेश के कॉक्स बाजार से रवाना हुआ था और उनका मूल लक्ष्य मलेशिया पहुँचना था। इस यात्रा के दौरान, नाव पर सवार कुछ यात्रियों ने कथित तौर पर दूसरे देशों में पहुँचने के लिए पैसे भी दिए थे। हालाँकि, जब नाव इंडोनेशिया पहुंची, तब तक नाव पर कुल 216 लोग सवार थे, जिनमें से 50 लोग इंडोनेशिया के रियाउ प्रांत में उतर चुके थे। स्थानीय निवासियों ने हालाँकि घुसपैठियों को खाना दिया और संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों के उच्चायुक्त ने भी भोजन सामग्री प्रदान की, लेकिन उन्हें जमीन पर कदम रखने की अनुमति नहीं दी गई।

सरकारी अधिकारियों द्वारा 11 रोहिंग्या मुस्लिमों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, क्योंकि उनकी तबियत बिगड़ चुकी थी। ये लोग लम्बी यात्रा के कारण कमजोर हो चुके थे, जिसमें अधिकतर महिलाएँ और बच्चे शामिल थे। हालाँकि, स्थानीय मछुआरों और पुलिस के विरोध के कारण बाकी घुसपैठियों को वापस नाव पर ही रहना पड़ा। आचे पुलिस ने मानव तस्करी के संदेह में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि इन तीनों ने रोहिंग्या मुस्लिमों से पैसा लेकर उन्हें दूसरे देशों में पहुँचाने का वादा किया था।

रोहिंग्या मुस्लिमों का म्यांमार से पलायन पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। म्यांमार के सुरक्षा बलों द्वारा 2017 में किए गए क्रूर आतंकवाद विरोधी अभियानों के बाद, करीब 740,000 रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार से भागकर बांग्लादेश में शरण लिए हुए हैं। म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों को लंबे समय से व्यापक भेदभाव और अत्याचार का सामना करना पड़ा है, और वहाँ की सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से भी इनकार कर दिया है।

बता दें कि इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया जैसे अन्य देशों की तरह संयुक्त राष्ट्र के 1951 शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए इन्हें शरणार्थियों को स्वीकार करने की बाध्यता नहीं है। इंडोनेशिया की आबादी में 87% लोग मुस्लिम मजहब से हैं, लेकिन वो लगातार रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस भेजता रहा है।

बीते साल नवंबर 2023 में 250 लोगों से भरी नाव को भी वापस समंदर में लौटा दिया गया था, जिसके बारे में बात में आशंकाएँ जताई कि गई वो नाव दुर्घटना का शिकार हो गई। वहीं, मार्च 2024 में भी इंडोनेशिया के अधिकारियों और स्थानीय मछुआरों ने आचे के तट पर एक नाव से 75 लोगों को बचाया था, क्योंकि वो विरोध प्रदर्शन की वजह से वो नाव तट पर नहीं आ सकी थी और दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, उस घटना में नाव पलटने से 67 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें से कई महिलाएँ और बच्चे थे।

अब्दुल हमीद का पड़ोसी, मस्जिद के सामने घर, फिर भी ‘नारा ए तकबीर’ चिल्लाती भीड़ ने संतोष तिवारी को नहीं छोड़ा: बताया- दुर्गा विसर्जन जुलूस में प्रसाद बाँट रहा था, धारदार हथियारों से हुआ हमला

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के महराजगंज में 13 अक्टूबर 2024 को माँ दुर्गा की विसर्जन यात्रा पर मुस्लिम भीड़ द्वारा हमले में राम गोपाल मिश्रा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। कई लोग घायल भी हुए थे। घायलों में संतोष तिवारी भी हैं। वे हमले के मास्टरमाइंड अब्दुल हमीद के पड़ोसी हैं। उन्हें इतना मारा गया कि इलाज के लिए लखनऊ जाना पड़ा। हिंसक भीड़ ने उनकी बाइक को भी आग लगा दी थी।

इस घटना को लेकर संतोष तिवारी ने ऑपइंडिया से बातचीत की। संतोष तिवारी और हमलावर अब्दुल हमीद की छत आपस में सटी हुई है। उनका त्रिपाठी डिजिटल सेवा केंद्र नाम से ऑनलाइन सर्विसेज की एक दुकान है। यहाँ वो खसरा-खतौनी आदि के प्रिंटआउट और टाइपिंग आदि करके अपने परिवार का गुजारा करते हैं। घर में पत्नी और एक नाबालिग बेटी है। संतोष ने अपने घर की छत पर भगवा ध्वज लगा रखा है।

बाँट रहे थे प्रसाद, फूँक दी गई बाइक

लगभग 45 साल के संतोष ने बताया कि उनका पूरा परिवार 9 दिनों तक नवरात्रि का व्रत रखता है। घटना के दिन माँ दुर्गा की विसर्जन यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं को वो प्रसाद बाँट रहे थे। उन्होंने बताया कि उसी दौरान शोरगुल हुआ और मारपीट होने लगी। मारपीट होता देखकर वे अपने घर में घुस गए और अंदर से गेट बंद कर दिया। तभी किसी ने चिल्लाकर बताया कि उनकी बाइक को आग लगा दी गई है।

संतोष बताते हैं कि इस बात की जाँच करने के लिए वे घर से बाहर निकले तो देखा कि उनकी बाइक धू-धू करके जल रही है। अपनी जलती बाइक को बचाने के लिए वे जैसे आगे बढ़े, मुस्लिम भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उन पर हमला शुरू कर दिया गया। हमलावरों के हाथों में लाठी-डंडे और धारदार हथियार थे। वो अपने घर की तरफ भागे, लेकिन हिंसक भीड़ ने उनको घसीट लिया और बेरहमी से पीटने लगी।

नारा ए तकबीर चिल्ला रही थी भीड़

संतोष तिवारी आगे बताते हैं कि उन्हें पीट रही भीड़ में शामिल किसी भी व्यक्ति से उनकी ना ही कोई दुश्मनी थी और ना ही जान-पहचान। बकौल संतोष, उन्हें पीटने वाली भीड़ ‘नारा ए तकबीर…’ के नारे लगा रही थी। इस दौरान छतों से पथराव भी हो रहा था। संतोष ने बताया कि पिटाई के बाद वे बेहोश हो गए। संतोष तिवारी का मानना है कि मुस्लिमों की भीड़ ने उन्हें मरा समझकर छोड़ दिया था।

आखिरकार संतोष के परिजनों ने उन्हें घर के अंदर खींच लिया। थोड़ी देर बाद घटनास्थल पर अतिरिक्त पुलिस बल पहुँचा। इसके बाद एम्बुलेंस को बुलाया गया। उनके सिर सहित कई जगह पर चोट लगी थी। घायल अवस्था में हिन्दू उन्हें स्थानीय अस्पताल ले गया, जहाँ से जिले के मेडिकल कॉलेज में भेज दिया गया। यहाँ के डॉक्टरों ने भी उनकी हालत को देखते हुए लखनऊ मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया।

घायल संतोष तिवारी को अस्पताल ले जाती एम्बुलेंस

मस्जिद के सामने ही है संतोष तिवारी का घर

संतोष तिवारी हमें बताते हैं कि अगर लखनऊ पहुँचने में देर हो जाती तो उनकी जान चली जाती। इलाज के दौरान यह भी पता चला कि उन्हें सिर में चोट है। संतोष तिवारी ने इलाज के दौरान उनकी खींचीं गई कई तस्वीरों को ऑपइंडिया के साथ साझा किया। इनमें से एक तस्वीर में संतोष तिवारी के मुँह पर ऑक्सीजन मास्क लगा हुआ है। इलाज के बाद संतोष फिलहाल घर वापस लौट आए हैं।

संतोष तिवारी घर तो लौट आए हैं, लेकिन अब भी काफी डरे-सहमे हैं। वे अपने परिवार के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। संतोष का घर उस मस्जिद के ठीक सामने है, जहाँ से मुस्लिमों को उकसाने का आरोप कई पीड़ित हिन्दू लगा चुके हैं। वायरल हो रहे एक वीडियो में मस्जिद के आगे कुछ जलता हुआ दिख रहा है। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों का दावा है कि यह संतोष तिवारी की बाइक हो सकती है।

जामिया में दीवाली मनाने जुटे हिंदू छात्रों को अब पुलिस ने लिया हिरासत में, बल का प्रयोग भी हुआ: पहले इस्लामी कट्टरपंथियों ने काटा था बवाल, दीप तोड़ लगाए थे अल्लाह-हू-अकबर के नारे

जामिया मिलिया इस्लामिया में दीवाली मनाने इकट्ठा हुए हिंदू छात्रों पर कार्रवाई की गई है। बताया जा रहा है कि बुधवार (23 अक्टूबर 2024) को करीबन आधा दर्ज छात्रों को हिरासत में लिया। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उन्होंने छात्रों को इसलिए पकड़ा है क्योंकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने दीवाली कार्यक्रम मनाने की अनुमति नहीं दी थी।

जानकारी के मुताबिक, जामिया, जवाहरलाल नेहरू, दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के 30-40 छात्र बुधवार को दीपोत्सव के लिए एकत्रित हुए थे। हालाँकि गेट पर तैनात पुलिसकर्मियों ने उन्हें त्योहार मनाने देने की बजाय, सबको वहाँ से वापस जाने को कहा और जब छात्रों ने उनकी नहीं सुनी तो पुलिस ने बल का प्रयोग किया और फिर छात्रों को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई और ये भी कहा गया कि पूरी गहमागहमी के बाद सिर्फ 10 मिनट के लिए दीए जलाने की अनुमति दी गई।

बता दें कि इस घटना से पहले मंगलवार (22 अक्टूबर 2024) की रात को जामिया में दीपोत्सव मनाते टाइम जमकर बवाल हुआ था। पता चला था कि जामिया में हर साल की तरह हिंदू छात्र दीवाली मनाने जब जुटे तभी कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने अल्लाह-हू-अकबर और नारा-ए-तकबीर के नारे लगाकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की थी और पैरों से दीए तोड़ रंगोलियाँ बर्बाद की। बाद में दोनों गुटों में झड़प की खबर भी आई थी और कई घायल छात्रों को अस्पताल भी ले जाया गया था।

इस घटना के बाद ही हिंदू छात्र बुधवार को दोबारा से दीवाली मनाने के लिए इकट्ठा हुए, मगर पुलिस ने उन्हें एंट्री ही नहीं दी। रिपोर्ट्स के अनुसार, एक अधिकारी ने घटना के संबंध में बताया कि विश्वविद्यालय के अंदर तनाव की सूचना मिलने के बाद एहतियात के तौर पर गेट के बाहर और परिसर के आसपास पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है। एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि स्थानीय पुलिस को परिसर के आसपास निगरानी बढ़ाने को कहा गया है।

5 साल बाद मिले मोदी-जिनपिंग, भारत-चीन के बीच द्विपक्षीय बात: BRICS से ‘शांति का संदेश’ दे बोले PM- आतंक पर ना हो दोहरा रवैया, मिलकर लड़ें

प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के कजान शहर में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन को संबोधित किया है। पीएम मोदी ने रूस में BRICS के मंच से आतंक और यूक्रेन-रूस युद्ध पर भी बात की। पीएम मोदी ने BRICS के मंच से कहा है कि आतंक पर दोहरे मानक नहीं रखे जाने चाहिए। पीएम मोदी ने यहाँ UN जैसे संस्थानों में बदलाव की बात भी उठाई। पीएम मोदी ने BRICS बैठक को संबोधित करने के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता में हिस्सा लिया।

पीएम मोदी ने कहा, “आतंकवाद और टेरर फंडिंग से निपटने के लिए हम सभी को एक मत हो कर दृढ़ता से सहयोग देना होगा। ऐसे गंभीर विषय पर दोहरे मापदंड के लिए कोई स्थान नहीं है। हमारे देशों के युवाओं में कट्टरपंथ को रोकने के लिए हमें सक्रिय रूप से कदम उठाने चाहिए।”

पीएम मोदी ने इस दौरान यूक्रेन-रूस संघर्ष को लेकर कहा, “हम युद्ध नहीं, डायलॉग और डिप्लोमेसी का समर्थन करते हैं। और, जिस तरह हमने मिलकर कोविड जैसी चुनौती को परास्त किया, उसी तरह हम भावी पीढ़ी के सुरक्षित, सशक्त और समृद्ध भविष्य के लिए नए अवसर पैदा करने में पूरी तरह सक्षम हैं।”

BRICS में पीएम मोदी ने UN में बदलाव को लेकर कहा “हमें UNSC, WTO जैसे वैश्विक संस्थानों में सुधारों के आगे बढ़ना चाहिए। हमें ध्यान रखना चाहिए कि इस संगठन की छवि ऐसी न बने कि हम वैश्विक संस्थानों में सुधार नहीं करना चाहते बल्कि उन्हें बदलना चाहते हैं।”

पीएम मोदी ने BRICS में नए सदस्यों को शामिल करने को लेकर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि BRICS में सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए और इसके संस्थापक सदस्यों की राय का भी इन निर्णयों में ध्यान रखा जाना चाहिए।

BRICS में पीएम मोदी ने इस दौरान वैश्विक चुनौतियों को लेकर कहा, “हमारी बैठक एक ऐसे समय में हो रही है जब विश्व युद्धों, संघर्षों, आर्थिक अनिश्चितता, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद जैसी अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है। विश्व में नार्थ-साउथ और पूर्व-पश्चिम विभाजन की बात हो रही है।”

पीएम मोदी ने कजान में साइबर सुरक्षा और AI को लेकर आने वाली चुनौतियों और उन पर काम करने की बात भी की। पीएम मोदी ने कहा कि BRICS में मुद्दे लोगों के हितों के होने चाहिए और यह संगठन विभाजनकारी नहीं बल्कि जनहितकारी है।

पीएम मोदी ने BRICS की शिखर सम्मेलन बैठक को संबोधित करने के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात भी की। यह चीन और भारत के शीर्ष नेताओं के बीच 5 साल के बाद पहली मुलाक़ात है। दोनों देशों के रिश्ते जून, 2020 में चीन के सैनिकों के गलवान पर हमले के बाद खराब हो गए थे। हाल ही में दोनों देशों में सीमा विवाद को लेकर समझौता हुआ है।

मस्जिद से उकसाने के दावे को ‘भ्रामक’ बताने का क्या आधार, नहीं बता पाई बहराइच पुलिस: जानिए चश्मदीदों के बयान और उसकी मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर क्या कहता है कानून

बहराइच के महाराजगंज में 13 अक्टूबर 2024 को दुर्गा विसर्जन जुलूस पर हमला हुआ था। इसमें राम गोपाल मिश्रा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। कई अन्य हिंदू भी घायल हुए थे। इन पीड़ित हिंदुओं का दावा है कि मस्जिद से उकसाए जाने के बाद मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था। लेकिन बहराइच पुलिस सोशल मीडिया पर इन दावों को ‘भ्रामक’ बता चुकी है। जब इस निष्कर्ष का आधार जानने के लिए हमने बहराइच पुलिस से संपर्क किया तो वे इसका ठोस उत्तर नहीं दे पाए।

70 साल के विनोद मिश्रा इस हमले में घायल हुए हिंदुओं में से एक हैं। उन्होंने कई मीडिया संस्थानों से बातचीत में मस्जिद से उकसाए जाने का दावा किया है। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया था, “पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो हिंदू तितर-बितर हो गए। तब, मस्जिद से अल्लाह-हू-अकबर बोला गया और उसके बाद आवाज आई कि जो जहाँ मिले उसे मार दो काट दो।”

विनोद मिश्रा के इस बयान का ऑपइंडिया ने वीडियो भी जारी किया था। इसमें आप साफ तौर पर सुन सकते हैं कि इस दावे को लेकर हमारे रिपोर्टर राहुल पाण्डेय ने उनसे पूछा- क्या आपने ये खुद सुना? जवाब में भी विनोद मिश्रा कहते हैं, “हाँ, बिल्कुल सुना।”

ऑपइंडिया की X पोस्ट पर जवाब देते हुए बहराइच पुलिस ने लिखा, “ऐसे भ्रामक तथ्य जिनके सम्बन्ध में अभी कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं हुआ है, उन्हें बिना जानकारी के प्रसारित न करें। इससे जनपद की कानून व्यवस्था बिगड़ने की प्रबल सम्भावना है जिस पर विधिक कार्यवाही अमल पर लायी जाएगी।”

विनोद मिश्रा के बाद कुछ अन्य हिंदू पीड़ितों ने भी मस्जिद से उकसाए जाने का दावा किया है। इनमें दिव्यांग सत्यवान मिश्रा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि उस दिन मस्जिद से ऐलान हुआ था, “जो हिन्दू जहाँ मिले, उसको काट दो।” उन्होंने बताया है कि इसी ऐलान के बाद मुस्लिमों की भीड़ ने अब्दुल हमीद के घर के आगे मौजूद हिंदू श्रद्धालुओं पर हमला किया था। कट्टरपंथी भीड़ कह रही थी, “ऐ हिन्दुओं, यहाँ से भाग जाओ वरना गोलियों से भून दूँगा।”

इतना ही नहीं, पद्माकर दीक्षित नाम के एक अन्य पीड़ित ने भी इसी तरह का दावा किया है। ऑपइंडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे लोग मूर्ति के साथ आगे बढ़ रहे थे, तभी एक पत्थर आकर लगा। इससे माँ दुर्गा की प्रतिमा का हाथ टूट गया। इस बीच मस्जिद से ऐलान हुआ, “अल्लाह हु अकबर। जो मिले उनको काट दो।” पद्माकर के अनुसार, मुस्लिम भीड़ कह रही थी कि जितना हिंदू मारेंगे, उतना सवाब मिलेगा।

विनोद मिश्रा के जिस दावे को बहराइच पुलिस ने भ्रामक और तथ्यहीन बता रही, उसे कई मीडिया संस्थानों ने छापा है। दैनिक जागरण की इस खबर पर बहराइच पुलिस ने कानूनी कार्रवाई की धमकी भी दी।

ऑपइंडिया ने पूछे 3 सवाल, बहराइच पुलिस का गोलमोल जवाब

हिंदू पीड़ितों के दावों को भ्रामक बताने की वजह जानने के लिए ऑपइंडिया ने बहराइच पुलिस से संपर्क किया। उनसे क्या सवाल किए और उन्होंने किस तरह गोलमोल जवाब दिए यह आप नीचे पढ़ सकते हैं;

प्रश्न 1. क्या विनोद मिश्रा हिंसा के पीड़ित, चश्मदीद हैं? क्या पुलिस ने उनका बयान दर्ज किया है?
उत्तर: बहराइच (महसी) के डिप्टी एसपी रवि खोखर ने बताया कि विनोद मिश्रा ने अभी तक पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई है। जब वो शिकायत दर्ज करवाएँगे, उसके बाद उस पर जाँच होगी।

प्रश्न 2. क्या मस्जिद से उकसाने को लेकर उन्होंने जो दावे किए हैं, उसकी पुलिस ने जाँच की है? यदि की है तो उसका निष्कर्ष क्या निकला है? नहीं की है तो क्या उनके दावों को जाँच में शामिल किया है?
उत्तर: बहराइच की एसपी वृंदा शुक्ला के आधिकारिक फोन नंबर पर ऑपइंडिया ने कॉल किया तो फोन उठाने वाले PRO ने कहा कि मस्जिद से हमले वाली बात गलत है। यह आरोप भ्रमित करने वाला है।

प्रश्न 3. मस्जिद से हमले वाली मीडिया रिपोर्ट्स को बहराइच पुलिस सोशल मीडिया पर भ्रामक बता रही है, इसका आधार क्या है?
उत्तर: बहराइच की एसपी वृंदा शुक्ला के आधिकारिक नंबर पर की गई कॉल को उठाने वाले PRO ने कहा कि इस मामले को लेकर उनका स्टैंड पहले जैसा है।

चश्मदीद के बयान को लेकर क्या कहता है कानून

किसी घटना के पीड़ित/चश्मदीद के बयान पर मीडिया रिपोर्टिंग की जा सकती है या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह का कहना है कि मीडिया किसी भी पीड़ित या चश्मदीद का बयान ले सकती है जब तक कि कानूनी या प्रशासनिक रूप से किसी आदेश के अंतर्गत ऐसे बयान या मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक ना लगी हो।

चश्मदीद को लेकर भारत में कानून भी है। इसको लेकर हमारा कानून क्या कहता है, इस पर रीना सिंह कहती हैं कि मीडिया में दिए गए बयान की कानूनी अहमियत सीमित होती है और अदालत में दिए गए शपथ-पत्रीय बयान को ही मुख्य साक्ष्य माना जाता है। गवाहों की सुरक्षा के लिए गवाह संरक्षण योजना और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश भी गवाहों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।

रीना सिंह कहती हैं कि संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को साक्ष्य प्रदान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसका मतलब ये है कि किसी आरोपित के ख़िलाफ़ गवाह बनने के लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उसे दोषी ठहरा सके। भारतीय कानूनों में चश्मदीद गवाह का बयान बहुत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन उसकी वैधता और विश्वसनीयता अदालत में दी गई गवाही और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ी होती है।

इस अधिनियम के अनुसार, गवाह का बयान महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है। यदि गवाह का बयान सुसंगत और विश्वसनीय है तो उसे निर्णायक साक्ष्य माना जा सकता है। अदालत गवाह से उसकी गवाही लेने के लिए उसे समन भेज सकती है। गवाह के बयान को दोनों पक्षों द्वारा जाँचा और परखा जाता है। यह प्रक्रिया गवाह की विश्वसनीयता की पुष्टि करती है और यदि बयान में विरोधाभास है तो उसका खुलासा करती है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 186 (गवाहों के बयान) के अनुसार, पुलिस जाँच के दौरान गवाहों का बयान दर्ज कर सकती है। पुलिस गवाह को उसके निवास स्थान पर जाकर भी बयान दर्ज कर सकती है और ये जरूरी नहीं है कि गवाह थाने आकर ही बयान दे। दरअसल, BNSS (भारतीय न्याय संहिता) में गवाहों की सुरक्षा, गवाही देने की प्रक्रिया हैं।

वहीं, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 179 (गवाह को समन) में कहा गया है कि पुलिस गवाह को नोटिस या समन देकर थाने बुला सकती है। हालाँकि, महिला गवाहों के लिए विशेष प्रावधान है कि उन्हें उनके निवास स्थान पर ही बयान देने की अनुमति होती है और उन्हें थाने आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

इसी तरह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 183 (न्यायिक बयान) के अनुसार, मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान को न्यायिक बयान के रूप में दर्ज किया जाता है। यह बयान बाद में जाँच के दौरान और अदालती कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह विशेषकर तब आवश्यक होता है जब बयान के बाद गवाह की जान को खतरा हो या गवाह पर दबाव हो।

रीना सिंह कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में गवाहों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया है। कोर्ट ने गवाहों को धमकाने या प्रभावित करने के मामलों में सख्त कार्रवाई का आदेश दिया है, ताकि गवाह बिना किसी डर के न्यायालय में बयान दे सकें। भारतीय कानून गवाहों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा पर जोर देता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम और बीएनएसएस जैसे कानूनों के तहत गवाहों के कुछ अधिकार हैं।

गोपनीयता का अधिकार: गवाह को धमकी मिलने पर उसकी पहचान को गुप्त रखा जा सकता है।
सुरक्षा का अधिकार: अगर गवाह को बयान देने के बाद खतरा हो तो उसे पुलिस या राज्य द्वारा सुरक्षा प्रदान की जा सकती है।
स्वतंत्र बयान देने का अधिकार: गवाह को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से बयान देने का अधिकार है और उसे किसी भी प्रकार के दबाव या धमकी से बचाने का प्रावधान है।

अब जबकि, बहराइच पुलिस ने ऑपइंडिया की खबर को भ्रामक बता दिया तो हमने रीना सिंह से चश्मदीद के मीडिया में दिए गए बयान के बारे में भी उनसे जानना चाहा। उन्होंने कहा कि चश्मदीद का पुलिस के समक्ष दिया गया बयान जाँच का विषय है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 398 में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य सरकार गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दृष्टि से राज्य के लिए एक गवाह संरक्षण योजना/डब्ल्यूपीएस तैयार और अधिसूचित करेगी। कानून की नजर में चश्मदीद (Eyewitness) के मीडिया में दिए गए बयान की बहुत सीमित और अक्सर अप्रत्यक्ष अहमियत होती है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (बीएनएसएस) के अनुसार, मीडिया में दिया गया बयान कुछ स्थितियों में संदर्भ या संकेत के रूप में उपयोग किया जा सकता है, लेकिन यह न्यायालय के लिए स्वीकार्य साक्ष्य (admissible evidence) नहीं माना जाता। यह न्यायालय में मान्य साक्ष्य के रूप में तब तक स्वीकार्य नहीं होता, जब तक कि उसे पुलिस द्वारा या अदालत के समक्ष विधिवत दर्ज नहीं किया जाता।

रीना सिंह कहती हैं कि मीडिया में दिया गया बयान बाहरी प्रभाव में हो सकता है, इसलिए उसे न्यायालय की निष्पक्ष प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जाता। गवाह पर दबाव, डर या पक्षपात के चलते ऐसे बयान दिए जा सकते हैं। मीडिया में दिया गया बयान संकेतक (indicator) या प्राथमिक जानकारी के रूप में पुलिस या अदालत के ध्यान में लाया जा सकता है।

बकौल रीना सिंह, “अगर यह बयान मामले की जाँच या अदालत में महत्वपूर्ण हो सकता है तो पुलिस या अदालत उस गवाह को समन भेजकर उसका बयान दर्ज कर सकती है। अदालत में दिए गए बयान के दौरान गवाह के बयान को प्रतिपरीक्षण के माध्यम से सत्यापित किया जा सकता है। मीडिया में दिए गए बयानों को प्रतिपरीक्षण का मौका नहीं मिलता, इसलिए इसे पूर्ण रूप से सत्य नहीं माना जा सकता।”

मीडिया में दिए गए बयान को अक्सर गैर-स्वीकृत साक्ष्य (hearsay evidence) के रूप में माना जाता है, क्योंकि यह अदालत में दिए गए साक्ष्य से प्रमाणित नहीं होता है। न्यायालय में मान्य गवाही वही होती है जो अदालत के सामने, शपथ के तहत दी गई हो और जिसका प्रतिपरीक्षण (cross-examination) किया जा सके।

अगर कोई पीड़ित या चश्मदीद मीडिया में इस तरह का बयान देता है तो पुलिस को खुद उस तक पहुँचना चाहिए या फिर उसके थाने आने का इंतजार करना चाहिए? इस सवाल पर रीना सिंह कहती हैं, “भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 181 के तहत पुलिस गवाहों का बयान दर्ज कर सकती है। इस प्रक्रिया में पुलिस गवाह से मिलने उसके निवास स्थान पर जा सकती है और वहीं पर उसका बयान दर्ज कर सकती है।”

रीना सिंह कहती हैं कि गवाह को थाने आने की आवश्यकता नहीं होती है, जब तक कि पुलिस द्वारा उसे समन या नोटिस न भेजा गया हो। पुलिस गवाह को जाँच में सहयोग देने के लिए थाने आने का नोटिस या समन भेज सकती है। यह केवल तब किया जाता है जब पुलिस को उसकी मौजूदगी आवश्यक लगे। वर्तमान में भारतीय कानून के तहत पुलिस का यह उत्तरदायित्व है कि वह गवाह तक पहुँचे और उसका बयान ले, न कि थाने आने का इंतजार करे।