इस वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर एबीवीपी की ओर से हमले में घायल हुए शिवम की कुछ तस्वीरें भी शेयर की गईं। इनमें दावा किया गया कि वामपंथी गुंडों द्वारा किए गए हमले में शिवम के सिर पर, गले पर चोटें आई हैं।
“प्रधानमंत्री मोदी कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाते हैं कि हम पाकिस्तान की भाषा में बात कर रहे हैं, लेकिन यही वो शख्स हैं जिन्होंने खुद को पड़ोसी देश के स्तर तक गिरा लिया है। वह मोहम्मद अली जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत का पालन कर रहे है और भारत के हिंदू जिन्ना के रूप में उभरे हैं।”
दिल्ली पुलिस ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से शिकायत मिलने के बाद 2 एफआईआर दर्ज की हैं। इन एफआईआर में जेएनयू छात्र संघ प्रेसिडेंट आइशी घोष के साथ ही 19 अन्य छात्रों के नाम शामिल हैं। पुलिस जल्द ही इन छात्रों को पूछताछ के लिए बुलाएगी।
"प्रदर्शनकारियों की वजह से सड़कें अवरुद्ध हो रही थीं और आम लोगों एवं पर्यटकों को परेशानी हो रही थी। हमने प्रदर्शनकारियों से बाहर निकलने के लिए कई बार अपील की थी। अब उन्हें आजाद मैदान में स्थानांतरित कर दिया है।"
FREE KASHMIR बैनर को लेकर उठे बवाल पर मुख्यमंत्री भले अब तक शांत हैं लेकिन उनके 'संजय' ने मुँह खोल दिया है। संजय राउत की सफाई यह है - "जिन्होंने यह बैनर थामा था, उनका मकसद कश्मीर में फ्री इंटरनेट, फ्री मोबाइल सर्विसेज और अन्य प्रतिबंधों से है।"
न्यूज़लांड्री ने जिस डॉक्टर के बयान के आधार पर दावा किया कि एबीवीपी वालों के चोट फ़र्ज़ी हैं, वो 'रावण' का डॉक्टर निकला। वो कॉन्ग्रेस का पदाधिकारी भी है। मोदी-शाह के ख़िलाफ़ ज़हर उगलता रहता है। उसके बयान को 'मेडिकल एक्सपर्ट' का बयान बना कर पेश किया गया।
गीता कुमारी और आइशी घोष- इन दो नामों को याद रखिए। महिला होकर इन दोनों के नकाबपोश गुंडों ने महिलाओं के साथ बदतमीजी की। यही वामपंथी महिलाधिकार का झंडा लेकर कैंडल मार्च निकालते हैं। जेएनयू हिंसा में दोनों वामपंथियों का अहम रोल दिख रहा है।
कॉन्ग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान दोनों एक दूसरे की मदद कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी और इमरान खान एक साथ हैं और यही कारण है कि यह सब हो रहा है।"
NDTV अब भले ही वामपंथियों को ख़ुश करने के लिए भाजपा व एबीवीपी को इस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए 1000 लेख लिखे, डैमेज हो चुका है। वो कहते हैं न, सच छिपाए नहीं छिपता। शायद एनडीटीवी पर यही कहावत फिट बैठती है। वामपंथी 'अपने' ही चैनल से निराश हैं।
सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्टिंग की आलोचना की है और इस तरह के लेखों को बरगलाने वाला बताया है। लोगों का कहना है कि फाइनेंशियल टाइम्स जैसे मीडिया सिर्फ़ आग में घी डालने का काम करते हैं, आखिर उन्हें कैसे पता कि नकाबपोश राष्ट्रवादी थे? ऐसे संस्थानों के ख़िलाफ़ एक्शन लिया जाना चाहिए।