फैक्ट चेक: गोरखनाथ मंदिर के बारे में ‘द वायर’ की पत्रकार ने फैलाया फेक न्यूज़, ट्विटर पर छिड़ा घमासान

आरफ़ा खानम शेरवानी ने ट्वीट कर बताया कि वह गोरखपुर में हैं- इमामबाड़े में। साथ में उन्होंने यह बताया कि योगी आदित्यनाथ का मठ, जिसके वह मठाधीश हैं, एक मुसलमान नवाब आसिफ़-उद्-दौला के ‘अहसान’ से बना है। यानि एक तरह से, अव्यक्त तौर पर, हिन्दुओं को उनके ‘शासित’ स्टेटस की याद दिला दी।

यह तो सर्वविदित है कि वामपंथियों, इस्लामियों और पत्रकारिता के समुदाय विशेष के लोगों को हिन्दू धर्म से सख्त नफ़रत है। अब ऐसे में अगर कोई इन तीनों विशेषताओं से लैस हो, जैसे ‘द वायर’ की आरफ़ा खानम शेरवानी, तो ज़ाहिर है हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक खुद नीचे जाया जा सकता है- फ़ेक न्यूज़ भी फैलाई जा सकती है। शेरवानी जी ने भी यही किया- यह बात और है कि सोशल मीडिया पर पकड़ीं गईं।

हिन्दू मंदिर को बताया मुसलमान शासक के ‘अहसानों’ की ज़मीं पर बना

आरफ़ा खानम शेरवानी ने ट्वीट कर बताया कि वह गोरखपुर में हैं- इमामबाड़े में। साथ में उन्होंने यह बताया कि योगी आदित्यनाथ का मठ, जिसके वह मठाधीश हैं, एक मुसलमान नवाब आसिफ़-उद्-दौला के ‘अहसान’ से उनके द्वारा दान की गई जमीन पर बना है। यानि एक तरह से, अव्यक्त तौर पर, हिन्दुओं को उनके ‘शासित’ स्टेटस की याद दिला दी।

ट्रू इंडोलॉजी ने दिखाया आईना

भारत के इतिहास के बारे में वामपंथी इतिहासकारों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने के लिए जाने जाने वाले ट्विटर हैंडल ट्रू इंडोलॉजी ने आरफ़ा खानम के ट्वीट पर एक के बाद एक ट्वीट कर फैक्ट-चेक करना शुरू किया। उन्होंने यह दिखाया कि कैसे यह मंदिर कम-से-कम 800 साल पुराना है, जबकि शेरवानी जी के प्रिय नवाब आसिफ़-उद्-दौला केवल सवा दो सौ साल पहले के।

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उन्होंने अलग-अलग किताबी और आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया आदि का सन्दर्भ देकर आरफा खानम के झूठ के गुब्बारे को पंचर कर दिया। साथ ही यह भी बताया कि इस अफ़वाह की शुरुआत कहाँ से हुई।

हिन्दूफोबिया से निकला है यह झूठ  

सवाल केवल एक ऐतिहासिक तथ्य का नहीं है- उसमें गलती किसी से भी हो सकती है। पर आरफ़ा खानम के ट्वीट एक नैरेटिव बुनने के लिए था- हिन्दुओं को मानसिक रूप से दबाने और इस्लामी संप्रभुता को अपने ऊपर स्वीकार कर लेने का नैरेटिव। यह एक अकेली या विशेष घटना नहीं, एक श्रृंखला का हिस्सा है, जिसका अंतिम ध्येय पिछले हज़ार वर्षों से अधिक समय से यही रहा है कि किसी तरह हिन्दू अपनी संस्कृति, सभ्यता, अपने धर्म को आक्रान्ताओं से निम्न कोटि का मान लें, जिससे उन्हें ‘इकलौते सच’ का मुरीद बनाया जा सके। और पत्रकारिता का समुदाय विशेष इस पाक जंग की पहली पंक्ति की टुकड़ी है।

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