एक और ‘रावण’ ने भंग की मर्यादा, ‘ब्राह्मणवादी’ पुलिस ने किया गिरफ्तार

ऐसा सुनाई पड़ रहा है कि महापण्डित रावण जी कांशीराम की जयंती के सुअवसर पर 15 मार्च को दिल्ली के जंतर-मंतर में एक रैली पहुँचाना चाहते थे, पर दुष्ट जातिवादी आदित्यनाथ ने हिन्दू युवा वाहिनी के लोगों को यूपी राजपुरुषों (पुलिस) की वर्दी में भेजकर इस रैली पर अनिश्चितता के बादल उड़ेल दिए हैं।

रावणों और मर्यादा-भंग का पुराना सम्बन्ध है- और इसी सम्बन्ध को चरितार्थ करते हुए खुद को ‘रावण’ घोषित करने वाले भीम आर्मी संस्थापक वकील चंद्रशेखर ने चुनावी आचार संहिता भंग कर देवबंद में रैली निकाली, जिसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

श्री रावण जी अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ चुनावी आचार संहिता और प्रदेश की कानून व्यवस्था को धता बताते हुए पूरे ज़ोरों-शोरों से रैली निकाल रहे थे, पर देवबंद पुलिस द्वारा आचार संहिता और 144 के उल्लंघन में गिरफ्तार करते ही इस वज्रकाय योद्धा को अचानक तबियत ख़राब हो जाने के कारण अस्पताल ले जाना पड़ा

अपने महान सेनानायक के बंदी बनाए जाने की सूचना जब रावण जी की सेना (समर्थक-मण्डली) को प्राप्त हुई तो पीठ दिखाकर कायरों की तरह तितर-बितर ही जाने की अपेक्षा इन रणबाँकुरों ने सहारनपुर-मुजफ्फरनगर स्टेट हाइवे को जाम कर दिया, और राजकाज के प्रकाण्ड पण्डित माने जाने वाले (original) भीम और भारत की शासन-विधि के लेखक-समिति के अध्यक्ष भीमराव अम्बेडकर जी का सीना गर्व से 56 इंच(?) चौड़ा किया।

15 मार्च को कांशीराम जी करते रह जाएँगे इंतज़ार

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ऐसा सुनाई पड़ रहा है कि कासमपुर में गिरफ्तार और देवबंद के किसी स्कूल में बंद महापण्डित रावण जी बसपा के संस्थापक और सुश्री मायावती के राजनीतिक गुरू कांशीराम जी (वही, जिनके बारे में यह कहा जाता है कि वह अयोध्या विवाद का हल विवादित स्थल पर शौचालय बनवाकर करना चाहते थे) की जयंती के सुअवसर पर 15 मार्च को दिल्ली के जंतर-मंतर में एक रैली पहुँचाना चाहते थे जो कि 13 मार्च को मुजफ्फरनगर से कूच करती और 14 मार्च को गाज़ियाबाद को अपनी मनमोहनी उपस्थिति से उपकृत करती हुई 15 को जंतर-मंतर पहुँचती। पर दुष्ट जातिवादी आदित्यनाथ ने हिन्दू युवा वाहिनी के लोगों को यूपी राजपुरुषों (पुलिस) की वर्दी में भेजकर इस रैली पर अनिश्चितता के बादल उड़ेल दिए हैं।

अथ नव रावण जीवन वृत्तान्त  

उस प्रथम रावण की त्रासद जीवन कथा से तो हम सभी वाकिफ़ हैं जो श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में जन्म और लालन-पालन पाकर भी anti-दलित प्रताड़ना का शिकार हुआ, और जिसे जातिवादी, मनुवादी, दबंग ठाकुर राम सिंह ने अपनी जोरू चुराने के ‘छोटे से’ आरोप में बा-खानदान मौत के घाट उतार दिया। पर इन नए रावण की कहानी भी कम रोमांचक नहीं है।

अपने पुराने हमनाम की तरह श्री चंद्रशेखर रावण भी ज्योतिष और भविष्य-वाचन विद्या के प्रखर ज्ञानी हैं- मई 2017 से सितम्बर 2018 तक रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) में जेल में रहने के बाद जब यूपी की फ़ासीवादी मनुवादी सरकार ने उन्हें रिहा कर उनका अपमान करने का दुस्साहस किया तो इस महाज्ञानी ने यह भविष्यवाणी कर दी कि अगले 10 दिनों के भीतर भाजपा सरकार उन्हें दोबारा किसी-न-किसी बहाने दोबारा कृष्ण-जन्मभूमि (कारागृह) का उनका टिकट कटा देगी।

2017 में श्री रावण जी पर रासुका लगने का किस्सा भी फ़ासिस्ट-ब्राह्मणवादी गठजोड़ और उसके सिरमौर आदित्यनाथ के निरंकुश शासन का ही उदाहरण है। जब सहारनपुर जनपद के शब्बीरपुर ग्राम के दुष्ट ठाकुरों ने महान पैगम्बर-राजा अकबर द ग्रेट के खिलाफ़ लड़ाई करने वाले शॉविनिस्ट (chauvinist) राणा प्रताप का बर्थडे मनाने की हिमाकत की तो अपनी उस समय केवल लगभग 5 साल पुरानी नवजात भीम आर्मी के साथ वीर रावण जी यह दुष्कृत्य रोकने अपनी जान हथेली पर रखकर पहुँच गए। ज़ाहिर सी बात है कि दबंग ठाकुरों ने अत्याचार-पूर्वक इस जनांदोलन को दबाने का पूर्ण प्रयास किया पर अल्लाह की मेहरबानी से दुष्ट ठाकुरों को ही अपने एक सदस्य की जान से हाथ जोना पड़ा।

इसके बाद श्री रावण जी ने सहारनपुर के रामनगर में महापंचायत बुलानी चाही, जातिवादी पुलिस ने ज़ाहिर तौर पर अनुमति नहीं दी, पर क्रांति भला कब रुकती है? मजबूरन संचार विद्या के भी महारथी रावण जी ने (जो कि original रावण की ही भांति multi-talented भी हैं) सोशल मीडिया के कबूतरों के द्वारा अपना सन्देश वाइरल कर दिया। उनकी सेना सैकड़ों की संख्या में जुट गई और जातिवादी पुलिस को जम कर रगेदा, जिसके बाद दुष्ट आदित्यनाथ ने उन्हें अन्दर कर दिया।

यह रावण जी की organizational skills नहीं तो और क्या हैं कि जिस भीम आर्मी का गठन दलित समाज की सेवा और गरीब कन्याओं के विवाह के लिए धन जुटाने जैसे बेकार के कार्यों के लिया किया गया था, उसे आज उन्होंने सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर समेत पश्चिमी यूपी का खासा ताकतवर राजनीतिक संगठन बना दिया है। यह उनके राजनीतिक प्रताप का ही सबूत है कि देश भर में दलित राजनीति का ‘आइकन’ मानी जाने वालीं सुश्री मायावती जी से वह प्रेरणा या आशीर्वाद नहीं लेते, बल्कि उन्हें अपना समर्थन देकर कृतार्थ करते हैं।

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