Thursday, October 29, 2020
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1000 सालों हिन्दू सहिष्णुता ही तो दिखा रहा है लेकिन इस चक्कर में नुकसान भी उनका ही हुआ

यह स्थिति गंभीर है। यह बहुत बुरा है कि खुद को पवित्र समझने वाले ईसाई हिन्दुओं को नीची दृष्टि से देखते हैं। यह और भी बुरा है कि 'पवित्र मजहबी' दूसरों को हेय दृष्टि से देखें, हमसे सफेद झूठ (तक़ैय्या) बोलें और हमें नुकसान पहुँचाएँ और मार भी दें, और उनका जमीर भी इसको बुरा न माने।

“पिछले 1000 वर्षों में आखिर क्यों भारतीयों को इतने कष्टों का सामना करना पड़ा, जबकि भारतीय सामान्यतः सरल स्वभाव के होते हैं और न ही इन्होंने कभी किसी पर आक्रमण किया।” किसी ने यह प्रश्न सद्गुरु श्री जग्गी वासुदेव से किया। इस प्रश्न ने मुझे भी परेशान किया। सद्गुरु ने इस दिशा में जवाब दिया कि भारतियों ने कभी शत्रु को समझने का काम नहीं किया। 

उदाहरण स्वरूप आखिर क्यों पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को जिन्दा छोड़ दिया यह जानने के बावजूद कि उसने कभी युद्ध के किसी नियम का पालन नहीं किया। युवा राजा ने निश्चित ही इस बात विश्लेषण नहीं किया कि, कैसे वह आक्रमण कारी इतना अनैतिक बना। राजा को शायद इस्लाम की कोई जानकारी ही नहीं थी जो कि उनके अपने हिन्दू धर्म से एकदम अलग था। 

आज भी स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। आज भी शत्रु के बारे में स्पष्टता बहुत कम ही है जबकि स्वामी विवेकानंद और श्री अरोबिन्दो यह देख चुके थे की खतरा कहाँ से आता है। विवेकानंद ने तो कहा भी था कि किसी के हिन्दू धर्म छोड़ने का सिर्फ यह मतलब नहीं कि एक हिन्दू कम हुआ बल्कि यह है कि एक शत्रु बढ़ गया। कैसे? क्या यह संभव है कि धर्म इंसानों को शत्रु बना देता है? इस पर जरूर गहन विचार की आवश्यकता है। 

बहुत बड़ा अंतर है एक ओर हिन्दू धर्म में और दूसरी ओर इस्लाम और ईसाई धर्म में, जिसका हमें सामान्यतः पता ही नहीं। हमें इनके बारे में पता होना चाहिये और इन पर उंगली उठाने का साहस होना चाहिए, ऐसा मानवता की भलाई के लिए आवश्यक है। 

पहला बड़ा अंतर यह है: जहाँ सनातन धर्म और वेद सबसे प्राचीन हैं और भारत की महान और भद्र सभ्यता का आधार हैं, वहां ईसाई धर्म और इस्लाम नए नवेले हैं जिन्होंने प्रचलित संस्कृतियों को नष्ट कर उनके स्थान पर कट्टरआस्था पर आधारित व्यवस्था थोप दी।

बहुत सारी सभ्यताएँ जैसे इंका, माया, एज़टेक्, बेबीलोन, ग्रीस, पर्शिया, अफगानिस्तान समाप्त हो गयीं और इनके इतिहास को झुठला दिया गया। पाकिस्तान और बांग्लादेश में ही देखो, प्राचीन हिन्दू संस्कृति गायब हो चुकी है। भारत भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है, लाखों लोग मारे गए और ज्ञान का खजाना आग की लपटों के भेंट चढ़ गया जब अनगिनत ग्रंथों से भरे पुस्तकालय जला दिए गए।

पर क्या धर्म का ध्येय लाभप्रद नहीं होना चाहिए? क्या धर्म भगवान के बारे में नहीं है, हमारे अस्तित्व के कारण के बारे में नहीं है, और मानव का उस महान शक्ति के साथ सम्बन्ध के बारे में नहीं है? और उस दैविक शक्ति की पूजा और उसके प्रति समर्पण के बारे में नहीं है? क्या दुनिया के संविधानों में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार नहीं है जिसे संयुक्त राष्ट्र का समर्थन प्राप्त है। फिर क्यों इतनी बर्बरता? आखिर कहाँ गलती हुई?

इसे आसानी से देखा जा सकता है परन्तु कोई इस तरह देखना नहीं चाहता। इसका कारण यह है कि ‘ईश्वर की आज्ञा’ जैसे असंभव दावे बलात लागू किये गए, पहले हिंसा के साथ और बाद में बच्चों को सिखा कर और धर्म छोड़ने वालों पर कठोर सजा लगा कर। इस तरह समय के साथ इनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गयी। क्या गलत था बहुत ही कम लोग कह पाए क्योंकि कोई अपने जीवन को खतरे में नहीं डालना चाहता। इन धर्मों ने असहमति को वस्तुतः ख़त्म कर दिया। 

क्या गलत था इसे और ढंग से समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा 

वेद जो कि हमारे ब्रम्हांड की उत्पत्ति और हमारे अस्तित्व का सबसे प्राचीन ज्ञान है एक महान हस्ती ( अक्सर जिसे ब्रह्म कहा जाता है ) की अवधारणा करते है, जिससे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई जो हर जगह व्याप्त है। इसका मतलब है कि ब्रह्म हमारे अंदर भी है और माया शक्ति के बल से हमारे विचारों और चित्त में समाया है। प्राचीन ऋषियों ने इसकी उत्पत्ति का विश्लेषण किया और हमारे अस्तित्व के लिए जिम्मेदार शक्तियों को खोजा जिन्हें हम देव कहते हैं। वो देख पाए कि सूक्ष्म अंतरिक्ष भी स्थूल अंतरिक्ष की तरह ही है और इस तरह अपने अंदर की गहराईयों में जाकर वो अंतरिक्ष में पहुँच पाए, आकाश का मानचित्र बनाया और भावी पीढ़ी के लिए मानव पहुँच के सभी क्षेत्रों में अथाह ज्ञान का सृजन किया। अथाह ज्ञान जो कि विराट चेतन में शुरू से मौजूद था ऋषियों ने पाया अपनी गहन तपस के श्रम से।  

इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि प्राचीन समय में भारतीय सभ्यता ने विश्व के कई भागों पर अपना प्रभाव छोड़ा है। लाखों वर्षों के लम्बे इतिहास में (भारतीय ग्रंथों के अनुसार जिन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए), बहुत सारे देवी-देवताओं की अलग-अलग प्रकार की पूजा विकसित हुई, जो कि एक ही ब्रह्म का प्रतिरूप थे, परन्तु भिन्न-भिन्न वर्गों में कोई वैमनस्य नहीं था। उनका सह अस्तित्व था। किसी ने भी एक मार्ग को थोपने की वकालत नहीं की।

यह बदल गया जब सम्राट अशोक ने अपने राज्य के सभी लोगों को लिए एक ही ऋषि गौतम बुद्ध के मार्ग को अपनाने पर जोर दिया। बुद्ध तो अशोक के पैदा होने से पहले ही मर चुके थे परन्तु कई सभाओं में बुद्ध के प्रवचनों को संकलित करके नियम बनाये गए जो कि अशोक की प्रजा को मानने होते थे। उसने दूसरे देशों में धर्म प्रचारक भी भेजे।

इस तरह अशोक ने उस परंपरा को तोड़ दिया जिसमें हर कोई अपने अंदर मौजूद ब्रह्म को अपने मूल में जानने का मार्ग चुने और स्थापित किया जिसे ब्रिटिश लोगों ने बाद में सर्वोपरि भारतीय मार्ग कहा। हर वो जो अलग होकर अपने अनुयायी चाहता है स्वाभाविक रूप से इस बात पर जोर देगा की उसका पंथ सबसे अच्छा है। और अगर लोग इससे सहमत नहीं हुए तो इसे एक दबाव बना कर फैलाया जा सकता है अगर सत्ता हाथ में है तो। बाद में आदि शंकराचार्य ने बुद्धों को शास्त्रार्थ में चुनौती दी और अधिकतः भारतीय पुनः अपने कम सख्त धर्म में वापस आ गए। 

उसी दौरान, भारत से बहुत दूर सिर्फ 1700 साल पहले रोमन सम्राट ने एक ईसाई धर्म के एक छोटे पंथ को राज्य का धर्म बना दिया। उसने सोचा होगा कि उसकी सारी प्रजा अगर एक ही धर्म को माने तो इसमें फायदा होगा। संक्षेप में वह मसीहा जिसका यहूदी इंतजार कर रहे थे जीसस क्राइस्ट के रूप में आ चुका था नहीं पहचाना जा सका और यहूदियों द्वारा ही मारा गया। 

हालाँकि, राज्य का शह पाते ही इस पंथ ने एक सत्तावादी और हिंसक दौर दिखाया। इसने मौजूदा मंदिरों को ढहा दिया, ग्रंथों को जलाया और मिश्र की एक महिला दार्शनिक हिपटीया की भी हत्या कर दी। और जल्दी ही ईसाई मध्य-पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप को कुचलने लगे और एक नए आस्थावादी पंथ को लोगों पर थोपने लगे।

वो इतने असहिष्णु कैसे बने? उसका कारण उनका वह दावा था जिसमें एक महान सच्चा ईश्वर, जो कि ब्रह्माण्ड का निर्माता था और पिता था जो स्वर्ग में रहता था ने अपने एकलौते पुत्र जीसस क्राइस्ट को पृथ्वी पर भेजा मानवों को अपने मूल पाप से बचाने के लिए, और कहा कि सभी को जीसस का कहा मानना चाहिए। और जीसस ने क्या कहा? ऐसा कहते हैं कि उन्होंने कहा कि बिना जीसस के कोई भी पिता (ईश्वर) तक नहीं पॅंहुच सकता। इस तरह चर्च यह दावा करता है कि जीसस में विश्वास सर्वथा जरूरी है नरक की अनंत आग से बचने के लिए।

कुछ शताब्दियों बाद वही कहानी दोहराई गयी: सातवीं शताब्दी के मोहम्मद ने ऐलान किया कि एक सच्चे अल्लाह ने उससे एक देवदूत गेब्रियल के जरिये बात की है और उसने जो कहा है वही सारी मानव जाति को मानना होगा। और अल्लाह मनुष्य से क्या चाहता है? वह चाहता है कि सब लोग मोहम्मद को अंतिम पैगम्बर के रूप में कबूल करें जिसे उसने (अल्लाह ने) अपना सारा ज्ञान दे दिया है। और उनकी सबसे बड़ी इच्छा यह है कि अल्लाह में और उस पैगम्बर में आँख बंद कर भरोसा करें: वह चाहता है कि उसके मानने वाले तब तक युद्ध (जिहाद) करें जब तक कि सारे लोग अल्लाह को न मानने लगें। जो विरोध करेंगे वो लोग हमेशा के लिए जहन्नुम (नरक) में अत्यधिक कष्ट भोगेंगे।

मोहम्मद ने खुद दिखाया कि जिहाद कैसे की जाती है। उदाहरण के लिए उसने यहूदी टोलियों पर हमला किया, आदमियों को समर्पण के बावजूद काट डाला, उनकी महिलाओं को रखैल बना लिया और उनकी संपत्ति को लूट लिया। उसकी मृत्यु के बाद उसके अनुयायिओं ने मध्य-पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप के भागों को कुचलना शुरू कर दिया और जो लोग पहले बलात ईसाई बना दिए गए थे उनसे जबरन इस्लाम कबूल करवा दिया गया। यह एक ख़ूनी मुहिम थी और भयानक बर्बरता की वजह से अत्यधिक सफल थी। 

इस्लामी आततायी भारत में भी घुसे और खून की नदियाँ बहा दीं। फिर भी प्राचीन भारतीय संस्कृति को पूरी तरह नहीं उखाड़ पाए क्योंकि नया धर्म इस सभ्यता के आगे बहुत गौण था। फिर भी भयानक बर्बरता के बूते इस्लामी आक्रांताओं ने भारतीय समाज में बड़ी घुसपैठ कर ली और बहुत सारे हिन्दुओं का धर्म बदल कर इस्लाम हो गया और बाद में पुर्तगाली और ब्रिटिश राज्य में ईसाई धर्म हो गया।  

भारत के स्वतन्त्र होने के बाद भी ईसाई धर्म और इस्लाम ने हिन्दू संस्कृति को ख़त्म करने का प्रयास नहीं छोड़ा है। सभी प्रकार के चर्च इस काम को गर्मजोशी और बहुत सारे धन के साथ कर रहे हैं और दुर्भाग्यवश उन्हें इसमें विभिन्न ‘योजनाओं’ जैसे कि जोशुआ योजना, के माध्यम से सफलता भी मिल रही है। इस्लाम इस काम को बहुत सारे बच्चे पैदा करके और लव जिहाद के द्वारा कर रहा है और हिन्दुओं और ईसाइयों को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि इस्लाम बेहतर है उस धर्म से जो बंदरों और चूहों की पूजा करता है। जो कोई भी इस दबाव डाल कर धर्म परिवर्तन करने के तरीके पर एतराज करता है वह बेरहमी से मारे जाने का खतरा उठाता है।

इतनी शताब्दियों में एक बात तो साफ़ हो चुकी है कि ईसाई धर्म और इस्लाम दूसरों के लिए खतरनाक हैं और उन अपने ही धर्म वालों जो पूरी तरह से उनके मत में विश्वास नहीं रखते और ‘सिर्फ एक सत्य की अवधारणा’ पर संदेह प्रकट करते हैं के लिए भी खतरनाक है। इस्लाम और ईसाई धर्म ने करोड़ों समान्य लोगों को मार डाला, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने इन धर्मों से निष्ठा नहीं रखी या दूसरे धर्म के साथ जुड़े रहे।

आज भारत में 20 करोड़ मजहब विशेष के लोग हैं और शायद 4 करोड़ से ज्यादा ईसाई है, क्योंकि बहुत से ईसाई जातिगत फायदे के लिए अपने हिन्दू नाम को बरक़रार रखते है। क्या वे भारत के शत्रु हैं, जैसा स्वामी विवेकानन्द ने बताया था?

दुश्मन एक कटु शब्द है। फिर भी जिन लोगों का धर्मपरिवर्तन हुआ है अगर वो उस पर भरोसा करने जो उन्हें सिखाया गया है तो वो निश्चय ही हिन्दुओं को हेय दृष्टि से देखेंगे। उनके मन में ये बात बैठ जाती है कि वे (हिन्दू) सच्चे ईश्वर को स्वीकार नहीं करते। जब मैं छोटी थी तब हम कैथोलिक लोग प्रोटेस्टेंट को तिरस्कृत दृष्टि से ही देखते थे। हम कैथोलिकों को लगता था की हम सही थे और दूसरे गलत और हेथन लोग तो बहुत ही गलत थे। 

उन्नीस सौ अस्सी के दशक में, मैंने शांतिवन के एक ईसाई आश्रम में कुछ समय बिताया था, जो कि हम विदेशियों जो हिन्दुओं और बौद्धों के प्रति मित्रता पूर्ण व्यव्हार रखते थे, के प्रति उदार था। फिर एक बार मैंने एक बेनडिक्टिन मोंक, बेडे ग्रिफिथ्स को वहाँ की नौसिखिया भारतीय ननों से बात करते सुना। मैं स्तंभित थी यह देख कर कि कितना डट कर वह ननों को सिखा-पढ़ा रहा था कि सिर्फ उनकी आस्था सच्ची है और मैंने बाद में उससे प्रश्न किया। उसका जवाब था, “मुझे इनकी आस्था को मजबूत करना है ताकि वो जान सकें कि हिन्दू धर्म की सीमा कहाँ तक है।”

हिन्दू सीमाओं की चिंता नहीं करते। वे सभी आस्थाओं को स्वीकारते हैं। हर उस तरीके को स्वीकारते हैं जो अपने सत्व को पहचानने में मदद कर सकता है। परन्तु ऐसी सोच दूसरे धर्म के अनुयायिओं की नहीं है, जिन्हें गुजारे के लिए सीमाओं की जरुरत है। हिन्दू सामान्यतः इस सोच को नहीं समझते। वो अपनी सहज बुद्धि का उपयोग करते हैं और इस तरह की बातों को कि अगर उन्होंने धर्मांतरण नहीं किया तो वे नरक की आग में जलेंगे, अनदेखा कर देते हैं। वो कभी इस बात की कल्पना नहीं करते कि कोई इस तरह की बकवास को गंभीरता से लेता होगा। 

पर वे गलत हैं। बहुत से लोग इन बातों (बकवास) पर भरोसा करते हैं। इस तरह की धारणा खतरनाक और विभाजनकारी है। इससे घृणा प्रेरित अपराधों का सृजन होता है। चूंकि इन बातों के कोइ प्रमाण नहीं हैं और कभी हो भी नहीं सकते, इसलिए इन खतरनाक धारणाओं की तरफ उंगली उठाने और आलोचना करने की जरुरत है। इस को बच्चों को नहीं सिखाया जाना चाहिए 

हालाँकि ईसाईयों ने हाल के दशकों में हत्याएँ करना बंद कर दिया है, लेकिन ख़ास मजहब ने नहीं किया। और यह रोज होता है। और वो आतंकवादी असल में भरोसा करते हैं कि वो सही कर रहे हैं और उन्हें जन्नत (स्वर्ग) में ऊँचा स्थान मिलेगा (Q 4. 95)। कौन-सा युवा अपनी जान आत्मघाती हमले में गँवा देगा अगर उसे यह भरोसा न दिला दिया गया होता कि काफिरों को मारने के बाद उसके साथ अच्छा होगा।

यह स्थिति गंभीर है। यह बहुत बुरा है कि खुद को पवित्र समझने वाले ईसाई हिन्दुओं को नीची दृष्टि से देखते हैं। यह और भी बुरा है कि पवित्र ‘मजहबी’ दूसरों को हेय दृष्टि से देखें, हमसे सफेद झूठ (तक़ैय्या) बोलें और हमें नुकसान पहुँचाएँ और मार भी दें, और उनका जमीर भी इसको बुरा न माने। एक सामान्य तर्क कि कुरान 5.32 एक भी आदमी को मारने को वर्जित करता है एक धोखा है। पहली बात तो यह कि, अल्लाह इजराइल के पुत्रों को सम्बोधित कर रहा है और दूसरी, एक व्यक्ति अगर बुरा करे तो उसे मारा जा सकता है। और एक कट्टर आस्थावादी के नज़रों में इससे बड़ी बुराई क्या होगी कि कोई अल्लाह और उसके पैगम्बर में भरोसा नहीं करे?

भाग्यवश, बहुत से लोग हैं जिनकी आस्था खो चुकी है। खास तौर से ईसाईयों के बड़े समूह, जब से विरुद्ध मत के लिये सजा बंद हुई है, चर्च से मुक्त हो चुके हैं। बहुत सारे अल्पसंख्यकों के मन में भी संदेह है। एक परिचित के अनुमान के अनुसार सऊदी अरब में 10 प्रतिशत लोग नास्तिक हो चुके हैं। ऐसे बहुत से विडियो हैं जिनमें समुदाय विशेष वाले अपनी पूर्व-आस्था की खुलेआम आलोचना करते हैं। ये उनके लिए खतरनाक है। सामाजिक दबाव बहुत बड़ा होता है और उनका अपना परिवार उन्हें मार सकता है। ऊपर से कई देशों में धर्मत्याग के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है।

और यहाँ फिर हिन्दू अपना काम नहीं करते हैं। वे उन्हें सहारा नहीं देते जो अपने कट्टर धर्म को छोड़ देते हैं। उससे भी बुरा तो जब सरकार भी लोगों को अपने धर्म में ही रहने के लिए प्रोत्साहन देती है ‘अल्पसंख्यक लाभ’ देकर।

क्या किया जा सकता है? हम मिल कर इस बारे में सोंचे। पर एक बात की अवश्य जरुरत है: हमें ईमानदार होना पड़ेगा और निडर होना होगा इस्लाम और ईसाई धर्म के हानिकारक पक्ष को उघाड़ने में, दोनों को ही इस बात में कोई दुराव छिपाव नहीं है कि वे हिन्दू धर्म को ख़त्म करना चाहते हैं।

हर किसी को अधिकार है कि वो उस परम शक्ति कि उपासना करे। इसकी गारंटी धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि इस अविश्वसनीय ब्रह्माण्ड के मूल में एक महान बुद्धि और शक्ति है। परन्तु किसी को भी इस तरह के आधारहीन दावे करने का हक़ नहीं है कि वह परमशक्ति कुछ से प्रेम करता है और किन्हीं दूसरों से नहीं और यहाँ तक कि ऐसे अधिकांश मानवों को हमेशा के लिए नरक की आग में फ़ेंक देता है जो इस बात को नहीं स्वीकारते कि परम सत्य सिर्फ एक व्यक्ति (यहाँ दो है…) को दिया गया है। इस बात को कोई मतलब नहीं है। और इसने मानवता को इतना कष्ट पहुँचाया है।

स्पष्ट रूप से इस तरह का दावा (कि सिर्फ एक व्यक्ति का ही अनुसरण किया जाये ) सत्य नहीं है। फिर भी काफी लम्बे समय से हिन्दुओं ने अपनी जान के डर से इस का विरोध नहीं किया। पर अब धीरे धीरे हिन्दुओं को ताकत मिलने लगी है। कई लोगों को अपनी विरासत की बड़ी कीमत महसूस होने लगी है और पता लगने लगा है कि उन्हें धोखा दिया गया है इस बात का विश्वास दिला कर कि हिन्दू धर्म का कोई मोल नहीं। 

क्या उनमें इतना साहस आ पाएगा जब वो आग्रह करें कि उनकी धरोहर का सम्मान किया जाये और भारत और विश्व भर में छात्रों को पढ़ाया जाये? ऋषियों की अंतर्दृष्टि कभी भी किसी भी परीक्षण में गलत साबित नहीं हुई और इसने विज्ञान, कला और तारतम्य को प्रेरित किया है।

झूठ को फैलते रहने देने में कोई सदाचार नहीं है। 

मूल लेख: मारिया वर्थ
अनुवाद : प्रो प्रशांत शुक्ला

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