BHU: लिबरलो, वामपंथियो, मीठे हिन्दुओ, धिम्मियो… यज्ञ की विधि मुसलमान नहीं सिखाएगा

अगर आप कह रहे हैं कि मेरे घर के कलश स्थापन में, कलश के नीचे की मिट्टी में छींटे जौ को कोई मुसलमान सिर्फ इसलिए छू देगा क्योंकि वो तो एक पौधा है, तो उसमें मुझे समस्या है। वो मेरे और मेरे आराध्य के बीच की शुद्धता और उस ऊर्जा के प्रवाह को प्रदूषित करने जैसा है।

समय में थोड़ा पीछे चलते हैं। गुलामी के उस दौर में चलिए जब अंग्रेज़ विलियम जोन्स जैसे उपन्सासकारों की प्रपंची कल्पना को भारत के इतिहास के नाम पर दर्ज कर रहे थे। मैक्स मूलर जैसे लोग किसी कपोल-कल्पना को आधार मान कर भारत के इतिहास ही नहीं, वेद-पुराण आदि पर ‘शोध’ करके दुनिया को आने वाले समय की सबसे प्रचलित भाषा में हिन्दू धर्म साहित्य उपलब्ध करा रहे थे।

फिर जो हुआ, वो तो होना ही था। मैक्स मूलर को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ‘बोडन प्रोफेसर ऑफ संस्कृत’ का चेयर बनाया गया। मैक्स मूलर वेद-पुराण का अनुवाद करते हुए, अपने अब्राहमिक रिलीजन के रंगीन चश्मे से लिखने लगे कि वेद गड़रियों के गीतों का संग्रह था। आगे यह भी बताया कि ब्रह्म और ब्राह्मण एक ही बात है।

आप यह समझिए कि जिस व्यक्ति की समझ इतनी कम हो, जिसे संदर्भ का पता न हो, वो किस स्तर पर एक छोटी गलती करता है, और आगे पूरे विश्व में उसके अनुवाद, और फिर उसके अनुवादों के अनुवाद प्रचलन में आते हैं। फिर, इन अनुवादों पर रिसर्च होता है, तब बताया जाता है कि हिन्दू धर्म तो ये है, कान में सीसा डाल देते थे… एक पूरे धर्म को कलुषित और प्रदूषित किया जाता है, और इसके आधार में एक व्यक्ति द्वारा किया गया वह अनुवाद होता है जो उसकी अनभिज्ञता से उपजा है।

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कालांतर में भारत उस विद्वान को आँखों का तारा बनाता है, दिल्ली में उसके नाम पर भवन का नामकरण होता है, भारत-जर्मनी वार्ताओं में उसकी चर्चा होती है। यही वो बीज था जो सनातन धर्म के धार्मिक साहित्य की जड़ों को खोखला करने के लिए करीब दो सौ साल पहले बोया गया था। तब, फेसबुक पर चंद्र प्रकाश जी लिखते हैं, महर्षि दयानंद ने मैक्स मूलर द्वारा अनुवाद करने की खबर का विरोध करते हुए कहा – “यस्मिन् देशे द्रुमो नास्ति तत्रैरण्डोऽपि द्रुमायते” यानी जिन देशों में विशाल वृक्ष नहीं होते, वहाँ के लोग अरंड (Castor) की झाड़ियों को ही पेड़ समझते हैं।

ऐसे लोग शब्दों को समझते हैं, संदर्भ को नहीं:
यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य।
एवं हि शास्त्राणि बहून्यधीपत्य चार्थेषु मूढाः खरवत् वहन्ति॥

भावार्थ यह है कि किसी गधे के ऊपर आपने चंदन की लकड़ियों की गठरी रख दी हो, तो वो गधा सिर्फ उसके भार को ही जानता है, न कि चंदन की विशिष्टता को। उसी प्रकार मूर्ख लोग, कई शास्त्रों के अभ्यास करके भी गधे के भार वहन करने के समान उसके स्थूलार्थ को ही जानते है, गूढ़ार्थ या तत्वार्थ को नहीं।

तब के विरोध का कोई असर नहीं हुआ और आज भारतीय लोग स्वयं, देवदत्त पटनायक जैसे कुबुद्धि के रूप में उसी अनुवाद को आधार मान कर धर्म की विवेचना करते हैं और जो परिणाम है वो आपके सामने है। कभी महिषासुर को मूलनिवासी बताया जाता है, कभी व्यभिचारी, बलात्कारी रावण को महान बनाया जाता है, कभी राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा की आधी बात बता कर पूरे रामायण को नारीविरोधी बता दिया जाता है…

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिस मुद्दे की, जिस ज्ञान की व्याख्या करने आप बैठे हैं, उसके समाज की, उसके संचित ज्ञान की, उससे जुड़े अंग-प्रत्यंग की समझ आपको होनी चाहिए। वरना ईसाई धर्म का पादरी जो स्त्रियों के पीरियड्स को ईव के पतन से जोड़ कर एक पाप की तरह देखता है, उसे यह समझ में नहीं आएगा कि कामख्या में किस देवी की, किस स्थिति में पूजा होती है। उनका समाज अलग है, अतः व्याख्या अलग होगी।

अब बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की

महामना मदन मोहन मालवीय ने जब बनारस में इस विश्वविद्यालय की नींव रखी थी, तो पूरा विश्वविद्यालय भारतीय छात्र-छात्राओं, अनुसंधानकर्ताओं, शिक्षकों, शोधार्थियों से ले कर अकादमिक क्षेत्र के हर कार्य के लिए, बिना किसी मनाही के, किसी सीमा के सब के लिए समान रूप से उपलब्ध था। हालाँकि, पंडित जी ने मैक्स मूलर और ब्रिटेन के अन्य कलाकारों को हिन्दू धर्म की थातियों को, इसके ग्रंथों की व्याख्या को समझा होगा, अतः उन्होंने इस संस्थान में एक जगह ऐसी भी बनाई जहाँ स्पष्ट रूप से किसी भी गैर-हिन्दू का प्रवेश वर्जित था।

यह जगह थी ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’, जिसका पूर्व नाम ‘वैदिक महाविद्यालय’ था। इसका लक्ष्य यह नहीं था कि यह संकाय किसी को अपमानित कर रहा है, किसी के ऊपर सवाल उठा रहा है कि उसको हिन्दू धर्म में आने से मनाही है, या वो संस्कृत पढ़ या पढ़ा ही नहीं सकता। बिलकुल नहीं, क्योंकि इसी विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा और संस्कृत साहित्य के पठन-पाठन हेतु कला संकाय, यानी आर्ट्स फैकल्टी के अंतर्गत संस्कृत विभाग है। अतः यह कहना कि मुसलमान को संस्कृत पढ़ाने से रोका जा रहा है, न सिर्फ गलत है बल्कि अपने स्तर पर आलस्यजनित धूर्तता भी है।

ऑपइंडिया ने बार-बार यह बताया है कि डॉक्टर फिरोज खान की विद्वता, उनके संस्कृत ज्ञान, और यहाँ तक कि उनके हिन्दू धर्म से स्नेह पर किसी ने सवाल नहीं उठाए हैं। न ही विश्वविद्यालय के धरनारत छात्रों को उस पर आपत्ति है। वो जहाँ से आते हैं, उनके बारे में कुछ छात्रों ने मुझे भी ईमेल के जरिए बताया कि वो प्रतिभावान हैं। इसलिए, इस पर विवाद नहीं है कि उन्हें संस्कृत आती है कि नहीं, और उनकी डिग्रियाँ किस भाषा में हैं, कहाँ से हैं।

अगर विश्वविद्यालय प्रशासन, या वीसी प्रोफेसर राकेश भटनागर, इसे सम्मान का मुद्दा बना कर डॉ फिरोज खान को इसी संकाय में रखवा लेते हैं, और इस पर विद्यार्थी उनकी कक्षा में जाने से इनकार करने लगें, जाएँ ही नहीं, तो प्रशासन क्या करेगा? उन्हें जबरदस्ती क्लास में बिठाएगा? डॉ फिरोज खान को ये बच्चे अगर आज नहीं स्वीकार रहे, तो जाहिर है कि उनसे वो कर्मकांड तो पढ़ेंगे नहीं। इसलिए भी, वामपंथी वीसी भटनागर जी को, जो विश्वविद्यालय परिसर के धार्मिक आयोजनों का हिस्सा बनने से हमेशा कतराते हैं, या वहाँ अनुपस्थिति रहते हैं, डॉ फिरोज खान को भविष्य में होने वाले नए तरह के विरोध से बचाना चाहिए।

भाषा और धर्मशास्त्रों की भाषा

विश्वविद्यालय के शिल्पकार मालवीय जी ने इस एक संकाय को हिन्दू धर्म विधान, मीमांसा, वेद-वेदांग, कर्मकांड, यज्ञ, अनुष्ठान आदि के लिए सिर्फ हिन्दुओं के लिए सीमित कर दिया था क्योंकि यहाँ अगर कोई विधर्मी आएगा, तो जाहिर है कि वो इसे अपने पूर्वग्रहों और अपने मजहबी संदर्भों से ही देखेगा। यहाँ पठन-पाठन के लिए आप, चाहे किसी भी जाति/वर्ग आदि के हों, पहले जनेऊ संस्कार कराते हैं (अगर न हुआ हो तो), फिर शास्त्रोचित तरीके से वेदाध्ययन हेतु ब्राह्मण बनते हैं, तब इसमें उतरते हैं।

मैं नहीं समझता कि डॉक्टर फिरोज खान जनेऊ पहनेंगे और फिर किसी के अंतिम संस्कार के कर्मकांड हेतु आवश्यक धार्मिक अनुष्ठानादि के लिए मार्गदर्शन दे पाएँगे। दे भी दें, तो मेरा प्रश्न है कि आवश्यकता क्या है? क्या हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठानों में संस्कृत भाषा के प्रयोग होने मात्र से वो सांस्कृतिक या धार्मिक अनुष्ठान न हो कर मात्र भाषाई बात हो जाएगी? क्या ‘कयामत के दिन सारे मुर्दे कब्र से बाहर निकलेंगे’ की बात मानने वाले अंतिम संस्कार के कर्मकांड में मृतक के अगले जन्म की बात पर सहजता से समझा सकेंगे?

अधिकतर लोग, जो आज बीएचयू के इस संकाय के छात्रों के विरोध में खड़े हो कर दूसरों को बिगट, या धर्मांध, साम्प्रदायिक और पता नहीं किन-किन विशेषणों से नवाज रहे हैं, वो संस्कृत को महज एक भाषा की तरह देख रहे हैं जिसका ज्ञान अगर फिरोज खान को है तो वो क्यों नहीं पढ़ा सकते। यहाँ ये तर्क लेने की भी आवश्यकता नहीं है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सुन्नी थियोलॉजी विभाग में कितने हिन्दू हैं।

तर्क यह है कि संस्कृत भाषा अलग बात है और हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों और धर्मविज्ञान से संबंधित साहित्य, जो कि धार्मिक प्रकृति के हैं, वो भी संस्कृत में हैं। जैसे कि आपको नमाज याद है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप बिना मुसलमान बने, जामा मस्जिद के माइक पर अजान देने लगेंगे! भाषा का ज्ञान आपको भाषा सीखने, समझने, उसके साहित्य को समझने के लिए मददगार है, लेकिन जहाँ बात धर्म की है, मान्यताओं की है, आस्था की है, वहाँ ये तर्क बेकार हो जाता है कि ‘पढ़ाने दो न, क्या हो जाएगा’।

यहाँ से जो छात्र बाहर जाते हैं, वो किसी के जनेऊ संस्कार में मंत्र पढ़ते हैं, किसी के विवाह में अग्निदेव के सात फेरे लगवाते हैं। ये वही अग्नि है जिससे मुसलमान बचते हैं। यहाँ के छात्र यज्ञ में हवनकुंड के सामने बैठते हैं और अभीष्ट की प्राप्ति के लिए एक तय तरीके से, शारीरिक और आत्मशुद्धि के बाद, आचरण करते हुए अनुष्ठान करते हैं। चूँकि इसकी भाषा संस्कृत है तो फिरोज या डेनियल को बिना यज्ञोपवीत पहनाए, वहाँ नहीं बिठाया जा सकता।

जब कुतर्क ही करना है तो यही कह दिया जाए कि जनेऊ क्या है, धागा ही तो है, पहना दो। जवाब यह है कि चूँकि आपकी समझ में कुछ चीजें नहीं आतीं तो शिवलिंग आपके लिए पत्थर हो जाएगा, मंगलसूत्र एक बंधन हो जाएगा, और मृतक को चिता पर जलाना एक क्रूर कृत्य। इसलिए एक भाषा को अकारण केन्द्र में मत रखिए क्योंकि संयोगवश उसी भाषा में हिन्दुओं के धर्मग्रंथ भी हैं।

कोई हिन्दू धर्म को प्रेम करता है उसे मत रोको…

अब बात उन लोगों की आती है जो डॉ कलाम, मोहम्मद रफी, परमवीर अब्दुल हमीद, बलिदान अशफाक आदि का नाम ले आते हैं कि उन्होंने हिन्दुओं के साथ मिल कर काम किया, कभी भेदभाव नहीं किया। ये तर्क भी लचड़ है और अनभिज्ञता से उपजा हुआ है। किसी ने इन लोगों की उपलब्धियों पर प्रशन्चिह्न लगाए क्या? किसी ने कहा कि मोहम्मद रफी को भजन नहीं गाने देंगे? किसी ने कहा कि महाभारत के संवाद डॉ राही मासूम रजा से नहीं लिखवाएँगे?

वो इसलिए नहीं कहा गया क्योंकि भारत की सर्वसमावेशी विरासत हैं आज के भारतीय। हिन्दुओं को इससे कभी समस्या नहीं रही कि उनके भजन कौन लिख रहा है और बिस्मिल्ला खाँ शहनाई पर क्या बजा रहे हैं। हमने उन्हें सम्मान दिया क्योंकि उन्होंने भारत की विरासत का मान बढ़ाया। डॉ फिरोज खान और बीएचयू के धर्म विज्ञान संकाय पर यह तर्क लागू नहीं होता। वहाँ भजन या मनोरंजन के लिए धारावाहिक नहीं बनाए जा रहे।

वहाँ हिन्दू धर्म के मूल विषयों की पढ़ाई ही नहीं होती बल्कि उनके तंत्र-मंत्र, यज्ञ-अनुष्ठान की विधियाँ बताई जाती हैं ताकि वहाँ से बाहर निकल कर वो विद्यार्थी वृहद समाज में पुरोहितों का भी कार्य कर सकें। अगर किसी बच्चे को सत्यनारायण भगवान के बनने वाले प्रसाद को पूजा से पहले खाने नहीं दिया जाता, तो वहाँ आपके वाले तर्क सही लगने लगेंगे कि ‘खा ही लेगा तो क्या होगा’।

यज्ञ करते BHU SVDV के छात्र

बात यह है कि बच्चे के जूठे हाथों से छूने से प्रसाद की शुद्धता प्रभावित होती है, इसलिए बेहतर है कि उसे प्रसाद से दूर रखा जाए। यह बच्चे के साथ भेदभाव नहीं है, यह एक तय विधि से चलना है ताकि अभीष्ट की प्राप्ति उसकी पूर्णता में हो। कल को दुर्गा की मूर्ति के आठ हाथ हटवा दिए जाएँ क्योंकि बहुतों को दस हाथ के होने का औचित्य समझ में नहीं आता?

फिरोज खान हिन्दू धर्म से प्रेम करते हैं, करते रहें। उनका स्वागत है। हम उनके गाए भजनों को सुनेंगे और अपने मंदिरों में भी बजाएँगे, इस बात को ले कर चर्चा हो ही नहीं रही। समस्या तो यही है कि किसी को यह भी नहीं पता कि संस्कृत विभाग अलग है और संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय अलग है। चूँकि, दोनों में संस्कृत शब्द है, डॉ फिरोज के पास संस्कृत भाषा की डिग्री है, तो बवाल काट दो कि हिन्दू धर्मांध हो गए हैं, ये हमारी संस्कृति नहीं है, हमें ऐसे लोगों का स्वागत करना चाहिए!

क्या इसी स्वागत के नाम पर मंदिरों में क़व्वालियों का आयोजन कराया जाए कि ‘काली-काली जुल्फों के फंदे न डालो, हमें जिंदा रहने दो ऐ हुस्नवालों’? मंदिरों के रंगभवनों में भरतनाट्यम की जगह ‘शीला की जवानी’ पर टू-पीस बिकिनी में नृत्य का आयोजन हो क्योंकि दोनों तो नृत्य ही हैं और सुश्री कटरीना जी ने भरतनाट्यम की शिक्षा भी ली है! मैं ये तो कह ही नहीं रहा हूँ कि मस्जिदों के प्रांगण में बहुत सारी जगह होती है, वहाँ दशहरे में रामलीला का आयोजन होना चाहिए, और होली में होलिका दहन।

क्या ये सेकुलर होना है? या ये बेहूदगी है? आप धर्म को अपने नजरिए से मत देखिए, खास कर तब जब आप उस धर्म से वास्ता नहीं रखते, उसमें आपकी श्रद्धा या गहन आस्था नहीं हो। जब तक हम उसके मूल्यों को, उसके तत्वों को, उसके दर्शन को, उसके विज्ञान को नहीं समझते, उसे उनके पास ही रहने देना चाहिए जो समझते हैं। ये ‘क्या हो जाएगा’ वाली पीढ़ी अनभिज्ञता और अज्ञान में नहाई हुई है इसलिए उसके चश्में में बस संस्कृत ही नाच रहा है और सिर्फ मुझे गलत साबित करने के लिए वेदों के कुछ मंत्र, गोमांस खाते हुए सुना कर, बोल देगी कि ‘देखो तो, क्या हो गया, मैंने तो पढ़ दिया’।

हर जगह, हर दलील लागू नहीं होती। अचानक से ‘नारीविरोधी’ कहा जाने वाला रामायण, जिससे हिन्दू समाज प्रभावित है, और पितृसत्तात्मक हो गया है, संस्कृत भाषा का एक ग्रंथ नहीं हो जाता क्योंकि अभी आपके नैरेटिव को हिन्दू वाला एंगल सूट कर रहा है। उसे अभी आप ये नहीं कह सकते कि इसमें हिन्दुओं का क्या है, ये तो संस्कृत में लिखी हुई एक किताब है। कल तक वो हिन्दुओं की ही किताब थी। जैसे कि ‘योग’ करना कभी विशुद्ध हिन्दू चीज हो जाती है जिसे पाठ्यक्रम में शामिल करने का जेएनयू में ‘भगवाकरण’ के नाम पर विरोध होता है लेकिन जब आपकी इच्छा हो, तो कहेंगे ये तो व्यायाम है, इसको हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धर्म से क्यों जोड़ रहे हैं कि हिन्दुओं ने दुनिया को योग दिया।

प्रदर्शनकारी छात्रों को अपनी घृणा का पात्र न बनाएँ

हिन्दुओं ने ‘भक्ति आंदोलन’ के बाद से सनातन परंपराओं को सबसे ज्यादा बिगाड़ा है। किसी के घर में धर्म चर्चा नहीं होती, बच्चों को अपनी ही धार्मिक पुस्तकों का ज्ञान नहीं, सीता को महाभारत में पांडवों की पत्नी बताते हैं, और कुरुक्षेत्र में राम-रावण युद्ध देखते हैं। ये हुआ कैसे? इसके बीज मैक्स मूलर जैसों ने बो दिए थे जिसने वेदों को ज्ञान की निधि समझने की जगह गड़रियों का गीत कह दिया क्योंकि गड़रियों से ही भगवान आए हैं उनके, तो सब कुछ भेड़ चराते हुए ही प्राप्त हो जाता होगा!

सर्वसमावेशन और प्लूरलिज्म क्या है, इसके नाम पर भी लोग खेल जाते हैं। सर्वसमावेशन का मतलब यह नहीं है कि आपने किसी को अपने पास बुलाया और अपने मूल को भुला कर उसके तरीकों से रहने लगे। प्लूरलिस्ट होने का मतलब यह नहीं होता कि कई तरह के लोगों के साथ रहने के चक्कर में चर्च के पादरी हिन्दू हो जाएँ जिससे सारे ईसाई रिलीजन के लोगों को समस्या होने लगे। दूसरे मतों के सम्मान का कतई मतलब नहीं होता कि हम उन्हें अपने मतों को छेड़ने को लिए आमंत्रित करें।

मेल्टिंग पॉट, सहिष्णुता, प्लूरलिज्म आदि अपने मूल को बचाते हुए, दूसरों को ससम्मान उनके मूल को बचाने में सहयोग देना है। इसका मतलब ये बिलकुल भी नहीं है कि चूँकि उसे पता है कि मंदिर में घंटी बजाना होता है तो वो मंदिर की घंटी तक न पहुँचे तो हम उसे अपने सामने शिवलिंग पर लात रख कर घंटी तक पहुँचते देखते रहें, और कुछ न करें। साथ ही, ये प्लूरलिज्म म्यूचुअल होता है, एकमार्गी नहीं।

इसलिए, इन प्रदर्शनकारी छात्रों का समर्थन कीजिए अगर आपकी हिन्दू धर्म में आस्था है। इन्हें जो धर्मांध और विभाजनकारी कह रहे हैं, वो वही लोग हैं जिन्हें फर्क नहीं पड़ता कि अयोध्या में मंदिर बने या मस्जिद। ये वही लोग हैं जिन्हें माँ दुर्गा को वेश्या कहना अभिव्यक्ति आजादी लगती है। इन्होंने माँ सरस्वती की नग्न पेंटिंग करने वाले को महान बनाया है। इसलिए इन्हें इस बात में अंतर नहीं पता चल रहा संस्कृत भाषा और यज्ञ के संस्कृत श्लोकों में क्या अंतर है।

आप दरवाजे खोलिए, दीवाली में दीये जलाइए, होली में रंग खेलिए उनके साथ, ईद की सेवइयाँ खाइए, किसी को कई समस्या नहीं। ये उत्सव है। लेकिन अगर आप कह रहे हैं कि मेरे घर के कलश स्थापन में, कलश के नीचे की मिट्टी में छींटे जौ को कोई मुसलमान सिर्फ इसलिए छू देगा क्योंकि वो तो एक पौधा है, तो उसमें मुझे समस्या है। वो मेरे और मेरे आराध्य के बीच की शुद्धता और उस ऊर्जा के प्रवाह को प्रदूषित करने जैसा है। ऐसा मेरी अनुपस्थिति में हो, और मुझे पता न चले तो मैं कुछ नहीं कर सकता, लेकिन मेरे सामने ऐसा हो, तो वो मैं होने नहीं दूँगा।

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