वैरागी जीवन जीते हुए वीतरागी हो जाना है नागा संन्यासी होना

वैरागी जीवन जीते हुए वीतरागी हो जाने की यात्रा है संन्यासी होना। नागा संन्यासियों के जीवन का प्रमुख उद्देश्य और अंतिम लक्ष्य धार्मिक, आध्यात्मिक साधना सिद्धि से जीवन के अनुभवों को सघन करते हुए उसके पार निकल जाना है।

भारत त्याग और तितिक्षा की भूमि है। भारतीय सनातन परम्परा स्वतः स्फूर्त जीवन का विज्ञान है। फिर भी भारत की सनातन भूमि पर जब भी साधु, संत, संन्यासी, गृहत्यागी अध्यात्म के पथिकों की बात होती है तो लोग तपाक से कह देते हैं कि जिन्हें कोई काम नहीं वो ही ये सब बनते हैं, या ऐसे मार्गों का अनुसरण करते हैं। अपने पिछले लेखों में भी मैंने जिक्र किया और आज फिर आपसे निवेदन है कि हो आइये कुम्भ आपके कई पूर्वग्रह भी वहीं गंगा मइया में डुबकी के साथ धुल जाएँगे। गर मुक़्त हो गए अपनी जड़ता से तो कुम्भ आपको ऐसे साधकों से भी मिलावाएगा, जिन्होंने चरम भौतिकता का आस्वाद लेने के बाद उसकी निरर्थकता को समझ सत्य की ख़ोज एवं जीवन के रहस्यों की तलाश व उससे परिचित होने के लिए जंगलों, पर्वतों की ख़ाक छान रहें हैं, या निर्जन से निर्जन जगहों पर भी धुनि रमाए बैठे हैं।

मेरी नज़र में कुम्भ मानव सभ्यता का एक जीवंत दस्तावेज़ है। जिसे जीवन को समझना हो, तो कहीं और भटकने के बजाय कुम्भ देख आए। वहाँ जानने, समझने और महसूस करने के लिए बहुत कुछ है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि कुम्भ की जान अखाड़े हैं और अखाड़े नागा साधुओं से चलते हैं। अखाड़ों का अपना एक पूरा तंत्र है। अगर कुम्भ में हैं या गए तो अखाड़ों को समझे बिना आपकी यात्रा अधूरी होगी।

नागा साधु होना कोई मजाक नहीं है, संयम और साधना की कठिन परीक्षा के बाद ही किसी को नागा साधु की उपाधि दी जाती है। नागा साधु होने का मतलब है सर्वस्व त्याग कर, यहाँ तक कि अपनी सात पीढ़ियों का पिण्डदान कर इस पथ पर आगे बढ़ना।

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चलिए आज आपको विस्तार से बताते हैं कि अखाड़ों में शामिल नागा साधु क्या-क्या हैं? उनकी एजुकेशनल बैकग्राउंड क्या है। क्या वो जीवन से ऊबे हुए हैं या आनंद से सराबोर? आज तमाम उच्च शिक्षित युवा भी आख़िर क्यों शामिल होना चाहते हैं अखाड़ों में? भौतिक सुख सुविधाओं को छोड़कर नागा साधु बन इतना कठिन जीवन जीने के निर्णय के पीछे आख़िर क्या है रहस्य?

नागा साधुओं का इतिहास

सबसे पहले, नागा साधुओं की परंपरा की बात करें तो ये हजारों साल पुरानी है। कई प्राचीन वैदिक ग्रंथों में भी दिगंबर नागा साधुओं के संदर्भ मिलते हैं। हिंदू धार्मिक परंपराओं के अध्येता हरिद्वार के लेखक विष्णु दत्त राकेश के अनुसार, “नागा साधुओं को पहली बार 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा सनातन धर्म की रक्षा और आध्यात्मिक उन्नति के लिए समूहों में संगठित किया गया था। आदि शंकराचार्य ने ही दशनामी संन्यासी परम्परा की स्थापना की थी। इसमें उस समय सात अखाड़े शामिल थे। अखाड़ा – निरंजनी, जूना, महानिर्वाणी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन।”

वर्तमान में कुल 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जिनमे से 7 की स्थापना ख़ुद शंकराचार्य ने की थी। इनकी स्थापना का शुरूआती उद्देश्य आध्यात्मिक साधना के साथ, शस्त्र संचालन में भी प्रवीण हो, हिंदू मंदिरों और आम लोगों को मुग़ल आक्रमणकारियों से बचाना था।

शस्त्र और शास्त्र दोनों में प्रवीण

राकेश कहते हैं, “अखाड़े के सदस्य शास्त्रों के साथ शस्त्र विद्या में भी निपुण होते थे ताकि अपने देश और धर्म की रक्षा के लिए ज़रूरत पड़ने पर यज्ञ की समिधा के साथ अपने प्राणों की आहुति देने के लिए भी तैयार रहें।”

शस्त्रों में भाले को अखाड़ों के प्रतीक के रूप में अपनाया गया था। अभी भी नागा साधुओं द्वारा उन शस्त्रों की पूजा की जाती है, साथ ही अखाड़े अपनी सुरक्षा के लिए भी रखते हैं। अखाड़े अपनी शस्त्र प्रवीणता का परिचय कुम्भ के शाही स्नान के समय प्रदर्शित भी करते हैं। हालाँकि, अब किसी मुग़ल आक्रमणकारी का ख़तरा नहीं है। फिर भी शस्त्र और शास्त्र दोनों की जुगलबंदी आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में आज भी अखाड़ों की शान है।

संन्यासी स्वमेव शौर्य का प्रतिक भी है

सनातन धर्म की रक्षार्थ की मंदिरों की रक्षा

बता दें कि नगा साधुओं ने सनातन धर्म के रक्षार्थ योद्धाओं के रूप में कई लड़ाइयों में भाग लिया। ऐसा ही एक वाकया है, 1664 में जब औरंगजेब के सेनापति मिर्जा अली तुरंग ने काशी (वाराणसी) पर हमला किया, तो हजारों नागाओं ने सैनिकों की भाँति युद्ध किया और काशी विश्वनाथ मंदिर की सुरक्षा में मदद की। 1666 में जब औरंगजेब की सेना ने हरिद्वार पर हमला किया तो भी नागा साधु उनका विरोध करने के लिए योद्धाओं के रूप में आगे आए। आज ऐसे कई मंदिर जो औरंगजेब के समय ध्वस्त हो मस्जिद बनने से रह गए। उसमें तत्कालीन शासकों के साथ नागा साधुओं का बड़ा योगदान है।

प्राचीन काल में जिस उद्देश्य से अखाड़ों की स्थापना की गई थी, अखाड़ों ने उसे पूरा करने में ख़ुद को समर्पित कर दिया। विदेशी आक्रांताओं से जीवन के रक्षार्थ लड़ना भी जीवन साधना ही है। हालाँकि, अब अखाड़ों का प्रमुख कार्य धार्मिक, आध्यात्मिक साधना ही है। साथ ही समाज के भलाई के लिए भी अखाड़े कई कार्यक्रम संचालित कर रहे हैं। जिसकी चर्चा आगे आएगी।

सबसे प्रसिद्ध निरंजनी अखाड़ा

वर्तमान अखाड़ों में सबसे बड़ा अखाड़ा जूना अखाड़ा है। इसके बाद निरंजनी और महानिर्वाणी अखाड़ा हैं। इनके अध्यक्ष श्री महंत और अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामंडलेश्वर के रूप में जाने जाते हैं।

सभी अखाड़ों में निरंजनी अखाड़ा सबसे प्रसिद्ध है। इतना ही नहीं, दुनियावी पैमाने पर भी इसमें सबसे ज्यादा क्वालिफाइड साधु-संत हैं, जो शैव परंपरा के मानने वाले हैं। जटा रखते हैं। इस अखाड़े के इष्टदेव कार्तिकेय हैं। जो देव सेनापति हैं। निरंजनी अखाड़े का प्रमुख स्थान दारागंज है। हरिद्वार, काशी, त्र्यंबक, ओंकारेश्वर, उज्जैन, उदयपुर, बगलामुखी जैसी जगहों पर इस अखाड़े के आश्रम हैं।

दीक्षा प्रक्रिया: कैसे शामिल होते हैं अखाड़ों में

जूना अखाड़ा के मुख्य प्रशासक और एबीएपी के जनरल सेक्रेटरी महंत हरि गिरी का कहना है कि दीक्षा समारोह केवल कुम्भ के दौरान ही होता है और हर बार इसमें शामिल होने वाले लोगों की संख्या हजारों में होती है।

दीक्षा प्रक्रिया का अनुष्ठान

साधकों को दीक्षा की प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए सर्वप्रथम अपने शरीर और मन की स्थिरता के लिए कठिन साधनाओं से गुजरकर ख़ुद को ब्रह्मचर्य के पालन के लिए तैयार करना पड़ता है। इस प्रक्रिया के प्रारम्भ में एक ’पंच संस्कार’ समारोह का आयोजन किया जाता है। जिसमें पाँच गुरु उसके लिए अलग-अलग अनुष्ठान करते हैं। इनमें प्रमुख गुरु शिखा (बाल) काटते हैं, भगवा गुरु उन्हें भगवा वस्त्र और रुद्राक्ष गुरु उन्हें रुद्राक्ष की माला भेंट करते हैं, विभूति गुरु शरीर पर भश्म लगाते हैं जबकि लंगोट गुरु उनके शरीर से आख़िरी कपड़ा भी उतरवाते हैं।

अंततः ‘विराज होम संस्कार’ अर्थात गृह त्याग संस्कार अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर द्वारा संचालित किया जाता है। आकांक्षी को माता और पिता दोनों पक्षों से अपने पूर्वजों की सात पीढ़ियों के साथ स्वयं का भी पिंड दान करना होता है। नागा दीक्षा नामक अंतिम अनुष्ठान का आयोजन उनके छठे गुरु द्वारा अखाड़े के ध्वज के सानिध्य में किया जाता है, जिसके बाद उन्हें नागा घोषित किया जाता है।

कई वर्षों की कठिन परीक्षाओं और आध्यात्मिक साधनाओं में प्रगति के बाद, नागा साधु अपने अखाड़ों में महंत और उसके बाद महामण्डलेश्वर और अंत में आचार्य महामण्डलेश्वर की उपाधि धारण करते हैं, जो कि अखाड़ों के पदानुक्रम में सर्वोच्च स्थान है।

नागा साधु बनने में कम से कम 6 वर्ष का समय लगता है, इस दौरान सन्यासी एक लँगोट के आलावा कुछ नहीं पहनते और कुम्भ में अंतिम दीक्षा के बाद उन्हें लंगोट भी त्यागना होता है। कौन किस कुम्भ में नागा साधु बना है। इसकी पहचान की प्रक्रिया भी है जैसे जिसने प्रयाग में उपाधि धारण की उसे नागा, जिसने उज्जैन में धारण की उसे ख़ूनी नागा, जो हरिद्वार में सन्यासी हुआ उसे बर्फ़ानी नागा तथा नासिक कुम्भ में बने नागा को खिचड़िया नागा कहते हैं।

कितने संपन्न और शिक्षित हैं नागा संन्यासी

अखाड़ों में शिक्षा और सम्पन्नता की बात हो तो सर्वप्रथम बात करते हैं निरंजनी अखाड़ा की, जिसमें क़रीब 70% नागा साधुओं ने हायर एजुकेशन हासिल की है। अखाड़ों के पदाधिकारियों में 100 से ज्यादा महामंडलेश्वर और 1100 से ज़्यादा संत-महंत उच्चशिक्षित हैं। इनमें डॉक्टर, लॉ एक्सपर्ट, प्रोफेसर, संस्कृत के विद्वान और आचार्य भी शामिल हैं।

इस अखाड़े के महेशानंद गिरि ज्योग्राफी के प्रोफेसर हैं तो वहीं बालकानंद जी डॉक्टर और पूर्णानंद गिरि लॉ एक्सपर्ट और संस्कृत के विद्वान हैं। संत स्वामी आनंदगिरि नेट क्वालिफाइड हैं। वे आईआईटी खड़गपुर, आईआईएम शिलांग में लेक्चर दे चुके हैं। फ़िलहाल, बनारस से पीएचडी कर रहे हैं। संत आशुतोष पुरी भी नेट क्वालिफाइड और पीएचडी कर चुके हैं।

हाल ही में प्रयागराज कुम्भ में कई युवा नागा साधु भी बने हैं। बीते सप्ताह हुए दीक्षा समारोह में हजारों युवाओं ने अपने बाल त्यागे और पिंड दान कर रातभर चली साधना के बाद ये सभी प्राचीन परंपरा के अनुसार नागा साधु बने। शायद आपको हैरानी हो कि इनमें भी बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के ग्रेजुएट शामिल हैं।

नागा साधु बनने आए 27 वर्षीय रजत कुमार राय का कहना है, “उन्होंने कच्छ से मरीन इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया है। नागा साधु बने 29 वर्षीय शंभु गिरी यूक्रेन से मैनेजमेंट ग्रेजुएट हैं। 18 वर्षीय घनश्याम गिरी उज्जैन से 12वीं बोर्ड के टॉपर हैं।

घनश्याम गिरी का कहना है कि उसे बोर्ड की परीक्षाएँ पास करने के बाद अपने उद्देश्य का अहसास हुआ। उस वक्त उसकी उम्र 16 साल थी, जब वह अपने गुरु महंत जयराम गिरी के आश्रम गया। उसका कहना है कि वह अपने गुरु की कृपा के कारण दो साल बाद नागा बनने के लिए दीक्षा लेने कुम्भ समारोह में आया है।

नागा सन्यासी बनने के लिए कोई भेदभाव या बंधन नहीं है

जब उनसे पूछा गया कि नागा बनने के लिए बैकग्राउंड कैसा होना चाहिए तो उन्होंने कहा कि जाति, धर्म, रंग चाहे जो हो लेकिन जो व्यक्ति वैराग्य की तीव्र इच्छा रखता है वह नागा साधु बनने के योग्य है। कई मुस्लिम, ईसाई और बाकी धर्मों के लोग भी नागा संन्यासी के रूप में स्वीकार किए गए हैं। इनमें वो लोग भी शामिल हैं जो पहले डॉक्टर और इंजीनियर रह चुके हैं।

अखाड़ों में भी कोतवाल होते हैं जिनकी ज़िम्मेदारी अखाड़े की देखभाल के साथ नागा संन्यासियों की पहचान करना होता है। निरंजनी अखाड़े के कोतवाल ने बताया कि एक बार जब संन्यासी अखाड़े का हिस्सा बन जाते हैं तो रास्ता बेहद कठिन हो जाता है। कुछ सालों तक उम्मीदवारों की जाँच की जाती है कि वह अपनी इच्छा से संन्यासी बन यहाँ रह रहे हैं या फिर किसी संकट से बचने के लिए यहाँ आए हैं। जब वह सभी परीक्षाएँ पास कर लेते हैं और हमें संतुष्ट करते हैं, तभी वह असली नागा संन्यासी ठहराए जाते हैं।

सामाजिक सरोकार

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि कहते हैं कि निरंजनी अखाड़ा प्रयागराज-हरिद्वार में पाँच स्कूल-कॉलेज संचालित कर रहा है। हरिद्वार में एक संस्कृत कॉलेज भी है। इनका मैनेजमेंट और व्यवस्थाएँ स्वेच्छा से संत संभालते हैं। यहाँ पर छात्रों की पढ़ाई के साथ, उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास पर ध्यान दिया जाता है।

अंतिम लक्ष्य

वैरागी जीवन जीते हुए वीतरागी हो जाने की यात्रा है संन्यासी होना। अंततः नागा संन्यासियों के जीवन का प्रमुख उद्देश्य और अंतिम लक्ष्य धार्मिक, आध्यात्मिक साधना सिद्धि से जीवन के अनुभवों को सघन करते हुए उसके पार निकल जाना है। बाहरी प्रलोभनों से ख़ुद को काटकर अस्तित्व की गहराई को समझना ही उनका एकमात्र साध्य रह जाता बाकि भौतिक सुविधाएँ मात्र जीवन संचालन के लिए युक्तियुक्त साधन।

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