Sunday, July 21, 2024
Homeविविध विषयमनोरंजन'भारत की कश्मीर नीति फासीवादी': भद्द पिटने के बाद भी नहीं सुधर रहे नादव...

‘भारत की कश्मीर नीति फासीवादी’: भद्द पिटने के बाद भी नहीं सुधर रहे नादव लैपिड, अनुपम खेर ने कहा – जिन्हें सच पच नहीं रहा, आँखें बंद कर लें और मुँह सिल लें

"मुझे यहाँ बतौर जूरी हेड आमंत्रित किया गया था। यहाँ आपके साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया जाता है। इस समारोह में ऐसी प्रतिक्रिया देना एक आशंका थी। एक बेचैनी थी। मुझे नहीं पता था कि इसके क्या परिणाम होंगे।"

गोवा में आयोजित ‘इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI)’ के जूरी ​हेड और ​इजरायल के फिल्म निर्माता नादव लैपिड (Nadav Lapid) के ‘द कश्मीर फाइल्स’ को अश्लील और प्रोपेगेंडा फिल्म बताने से विवाद गहरा गया है। इस मुद्दे पर भारत और इजरायल के कई अधिकारियों ने नादव की कड़ी निंदा की। उन्हें माफी माँगने के लिए कहा। यहाँ तक कि उनके खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई गई। मामला तूल पकड़ने के बाद लैपिड ने अपनी सफाई देते हुए बताया कि आखिर उन्होंने क्यों ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म को अश्लील और प्रोपेगंडा फिल्म कहा।

वहीं, बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर (Anupam Kher) ने कहा कि ‘कश्मीर फाइल्स’ का सच कुछ लोगों को पच नहीं रहा है।

‘द कश्मीर फाइल्स’ के अभिनेता ने कहा, “लोगों को सच जैसा है उसे वैसा देखने और दिखाने की आदत नहीं होती। वो उस पर अपनी मनपसंद खुशबू, अपना मनपसंद जायका, अपने मनपसंद रंग लेप कर, सजा कर देखने के आदी होते हैं। उन्हें कश्मीर का सच पच नहीं रहा है। वे चाहते हैं कि उसे किसी रंगीन और खुशनुमा चश्मे से देखा और दिखाया जाए। पिछले 25-30 साल से वे यही करते आए हैं। आज जब ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने सच को जैसा है वैसा दिखाकर पेश किया, तो उन्हें तकलीफ हो रही है।

उन्होंने कहा, “इन लोगों के पेट में मरोड़ उठ रहे हैं। वे गाहे-बगाहे अपने मुँह से इस तकलीफ को बयाँ करते रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा, “अगर आप इस भयावह सच को नहीं देख पाते हैं, तो अपना मुँह सिल लीजिए और आँखें बंद कर लीजिए। लेकिन, उसका मजाक उड़ाना बंद करिए। हम इस सच के भुक्तभोगी हैं। भारत और इजरायल अच्छे दोस्त है। दोनों ही आतंकवाद का शिकार रहे हैं। एक आम इजरायली कश्मीरी हिंदुओं का दर्द समझता है। बाकी हर देश में देश के दुश्मन अपने ही कुछ होते हैं। ये भी एक सच है।”

वहीं, नादव लैपिड ने आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि उन्होंने इसके बारे में बोलना सर्वोपरि समझा। उन्होंने कहा कि वह कश्मीर में भारतीय नीति को सही ठहराने वाली फिल्म से हैरान थे। साथ ही आरोप लगाया कि इसमें फासीवादी विशेषताएँ हैं और यह फिल्म 90 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं के पलायन पर आधारित है। नादव ने कहा कि अगर इस तरह की फिल्म आने वाले वर्षों में इजरायल में भी बनती है, तो उन्हें आश्चर्य होगा।

उन्होंने स्थानीय मीडिया Ynet से बात करते हुए कहा, “इस तरह से बोलना और राजनीतिक बयान देना आसान नहीं था। मुझे पता था कि यह एक ऐसी घटना है, जो देश से जुड़ी हुई है। हर कोई यहाँ सरकार की प्रशंसा करता है। यह कोई आसान स्थिति नहीं है, क्योंकि आप एक अतिथि के तौर पर यहाँ पर हैं।”

उन्होंने कहा, “मुझे यहाँ बतौर जूरी हेड आमंत्रित किया गया था। यहाँ आपके साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया जाता है। इस समारोह में ऐसी प्रतिक्रिया देना एक आशंका थी। एक बेचैनी थी। मुझे नहीं पता था कि इसके क्या परिणाम होंगे। इसलिए मैंने इसे कुछ आशंका के साथ व्यक्त किया। हाँ, मैंने आशंकित दिन बिताया। आइए इसे इस तरह से याद रखें कि मैं अब हवाई अड्डे के लिए अपने रास्ते पर खुश हूँ।”

लैपिड ने आगे कहा, “मैं यहाँ हजारों लोगों के साथ एक हॉल में मौजूद था। हर कोई स्थानीय सितारों को देखने और सरकार की जय-जयकार करने के लिए उत्साहित था। उन देशों में जो तेजी से अपने मन की बात कहने या सच बोलने की क्षमता खो रहे हैं, किसी को बोलने की जरूरत है। जब मैंने यह फिल्म देखी, तो मैं इसके साथ इजरायली परिस्थिति की कल्पना किए बिना नहीं रह सका, जो यहाँ मौजूद नहीं थे। लेकिन, वे निश्चित रूप से मौजूद हो सकते थे। इसलिए मुझे ऐसा लगा कि मुझे यह करना ही पड़ेगा, क्योंकि मैं एक ऐसी जगह से आया हूँ, जहाँ खुद में सुधार नहीं हुआ है। वह खुद भी इसी रास्ते पर है।”

बता दें कि IFFI का 53वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया 20 नवंबर से 28 नवंबर के बीच गोवा में आयोजित किया गया था। फेस्टिवल के आयोजकों ने नादव लैपिड को प्रमुख जूरी के तौर पर इजरायल से बुलाया था। फिल्म देखने के बाद नादव ने कहा था कि वह ‘द कश्मीर फाइल्स’ देखकर न सिर्फ हैरान हुए, बल्कि परेशान भी हुए हैं। नादव लैपिड ने आगे कहा कि उन्हें यह फिल्म दुष्प्रचार करने वाली लगी, जो ऐसे महोत्स्व में दिखाने लायक नहीं थी।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

ऑपइंडिया स्टाफ़
ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

शुक्र है मीलॉर्ड ने भी माना कि वो इंसान हैं! चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखने को मद्रास हाई कोर्ट ने नहीं माना था अपराध, अब बदला...

चाइल्ड पोर्नोग्राफी को अपराध नहीं बताने वाले फैसले को मद्रास हाई कोर्ट के जज एम. नागप्रसन्ना ने वापस लिया और कहा कि जज भी मानव होते हैं।

आरक्षण के खिलाफ बांग्लादेश में धधकी आग में 115 की मौत, प्रदर्शनकारियों को देखते ही गोली मारने के आदेश: वहाँ फँसे भारतीयों को वापस...

बांग्लादेश में उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के भी आदेश दिए गए हैं। वहाँ हिंसा में अब तक 115 लोगों की जान जा चुकी है और 1500+ घायल हैं।

प्रचलित ख़बरें

- विज्ञापन -