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बुंदेलखंड का सूर्य मंदिर बनेगा UP का नया पर्यटन केंद्र, चंदेल राजाओं ने कोणार्क से भी पहले कराया था निर्माण: अब UNESCO विश्व धरोहर में शामिल करा रही योगी सरकार

यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। ऊँचे शिखर, अलंकृत आधार, पत्थरों पर उकेरी गई सुंदर आकृतियाँ और दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी उस समय के शिल्प कौशल को दर्शाती हैं।

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका हमेशा से अपने शौर्य, जल प्रबंधन, किलों और मंदिरों के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन अब इसी क्षेत्र की एक ऐतिहासिक धरोहर फिर से चर्चा में है। महोबा का प्राचीन सूर्य मंदिर जिसे राहिलिया सूर्य मंदिर भी कहा जाता है, एक बार फिर सुर्खियों में है।

इसकी वजह सिर्फ इसका इतिहास नहीं, बल्कि वह नई पहल भी है जिसके जरिए उत्तर प्रदेश सरकार इस मंदिर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की तैयारी कर रही है। करीब 1100 साल पुराने इस मंदिर को लेकर दावा किया जाता है कि यह ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर से भी कई शताब्दियों पुराना है।

यही कारण है कि इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और स्थानीय सामाजिक संगठनों की नजरें अब इस धरोहर पर टिकी हुई हैं। सरकार भी इसे पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।

पर्यटन के नए नक्शे पर उभर रहा है महोबा का सूर्य मंदिर

पिछले कुछ वर्षों में प्रशासन और पर्यटन विभाग ने इस ऐतिहासिक मंदिर को नई पहचान देने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। मंदिर परिसर में आकर्षक लाइटिंग की व्यवस्था की गई है। यहां आने वाले पर्यटकों के लिए बेहतर सड़क संपर्क विकसित किया गया है।

रात के समय मंदिर की भव्यता को दिखाने के लिए लाइट एंड साउंड शो की तैयारी की गई है, जबकि आधुनिक सुविधाओं के तहत स्मार्ट सोलर बेंच जैसी व्यवस्थाएँ भी विकसित की जा रही हैं। राहिल सागर के घाटों की सफाई, मंदिर परिसर के चारों ओर बाउंड्री वॉल का निर्माण और पर्यटकों के लिए सुविधाओं का विस्तार भी इसी योजना का हिस्सा है।

प्रशासन का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक धरोहर का व्यवस्थित संरक्षण और प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह बुंदेलखंड के पर्यटन उद्योग को नई दिशा दे सकता है।

स्थानीय संगठनों और बुंदेली समाज की ओर से लगातार यह माँग भी उठ रही है कि मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए प्रस्ताव भेजा जाए। यदि ऐसा होता है तो महोबा न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से बल्कि आर्थिक और पर्यटन के लिहाज से भी नई पहचान हासिल कर सकता है।

आखिर क्यों कहा जाता है कि यह कोणार्क से भी पुराना है?

जब भी भारत में सूर्य मंदिरों की चर्चा होती है तो सबसे पहले ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर का नाम सामने आता है। लेकिन महोबा का सूर्य मंदिर इतिहास की दृष्टि से उससे कहीं अधिक पुराना माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, महोबा का यह मंदिर चंदेल शासक राहिल देव वर्मन ने नौवीं से दसवीं शताब्दी के बीच बनवाया था।

कई ऐतिहासिक अभिलेख इसके निर्माण काल को लगभग 890 से 910 ईस्वी के बीच बताते हैं। दूसरी ओर कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने 13वीं शताब्दी में करवाया था, जिसे लगभग 1250 ईस्वी का माना जाता है। इसका अर्थ है कि महोबा का सूर्य मंदिर कोणार्क से लगभग 300 से 350 वर्ष पहले अस्तित्व में आ चुका था।

हालाँकि दोनों मंदिरों की वास्तुकला और संरचना अलग-अलग है, लेकिन सूर्य उपासना की परंपरा के संदर्भ में महोबा का मंदिर भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

चंदेल राजाओं की विरासत और सूर्य उपासना का केंद्र

महोबा कभी चंदेल राजाओं की राजधानी हुआ करता था। यही वह राजवंश था जिसने खजुराहो जैसे विश्वविख्यात मंदिर समूहों का निर्माण कराया। चंदेल शासकों की पहचान केवल युद्ध कौशल से नहीं बल्कि स्थापत्य कला, जल संरक्षण और धार्मिक संरचनाओं के निर्माण से भी जुड़ी रही है।

महोबा सूर्य मंदिर (फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)

राहिल देव वर्मन को चंदेल वंश के प्रमुख शासकों में गिना जाता है। माना जाता है कि उन्होंने सूर्य देव को शक्ति, ऊर्जा और समृद्धि का प्रतीक मानते हुए इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर का निर्माण राहिल सागर के किनारे कराया गया, जिससे यह धार्मिक स्थल होने के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य का भी केंद्र बन गया।

उस दौर में सूर्य पूजा का विशेष महत्व था। कृषि आधारित समाज में सूर्य को जीवनदाता माना जाता था और यही कारण था कि सूर्य देव को समर्पित भव्य मंदिरों का निर्माण कराया जाता था। महोबा का सूर्य मंदिर उसी परंपरा का जीवंत उदाहरण माना जाता है।

बिना सीमेंट के बना स्थापत्य का अद्भुत नमूना

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्माण शैली है। यह विशाल संरचना ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है और माना जाता है कि इसके निर्माण में सीमेंट या गारे का उपयोग नहीं किया गया। बड़े-बड़े पत्थरों को इस तरह जोड़ा गया कि एक हजार वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मंदिर की मूल संरचना आज खड़ी दिखाई देती है।

यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। ऊँचे शिखर, अलंकृत आधार, पत्थरों पर उकेरी गई सुंदर आकृतियाँ और दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी उस समय के शिल्प कौशल को दर्शाती हैं। मंदिर की एक और विशेषता इसकी दिशा और संरचना को लेकर कही जाती है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सूर्योदय की पहली किरण सीधे गर्भगृह तक पहुँचती थी और सूर्य देव की प्रतिमा को प्रकाशित करती थी। यद्यपि इस दावे पर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है, लेकिन यह तथ्य मंदिर की लोकप्रियता और रहस्य को और बढ़ा देता है।

आक्रमणों की मार झेलकर भी बची रही पहचान

इतिहास के लंबे सफर में इस मंदिर ने कई उतार-चढ़ाव देखे। माना जाता है कि 1203 ईस्वी के आसपास कुतुबुद्दीन ऐबक की फौज ने धन और बहुमूल्य मूर्तियों की लालसा में इस मंदिर पर हमला किया। मंदिर को क्षति पहुँचाई गई और इसके कई हिस्सों को तोड़ने का प्रयास किया गया।

इसके बावजूद यह संरचना पूरी तरह नष्ट नहीं हो सकी। आज भी मंदिर परिसर और राहिल सागर के आसपास बिखरे हुए पत्थर तथा अवशेष उस दौर की कहानी सुनाते हैं। कई शिलाखंडों पर की गई नक्काशी अब भी स्पष्ट दिखाई देती है और यह बताती है कि अपने मूल स्वरूप में यह मंदिर कितना भव्य रहा होगा।

ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है मंदिर की विशाल संरचना (फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)

समय के साथ उपेक्षा और प्राकृतिक क्षरण ने भी मंदिर को नुकसान पहुँचाया, लेकिन इसकी मूल पहचान आज भी बरकरार है। यही वजह है कि पुरातत्वविद इसे बुंदेलखंड की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल करते हैं।

सूर्य कुंड, रहस्य और धार्मिक आस्था

सूर्य मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित सूर्य कुंड भी लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। लगभग तीस फीट गहरे इस कुंड के बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका पानी कभी पूरी तरह नहीं सूखता। श्रद्धालु यहाँ स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं।

सूर्य मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित सूर्य कुंड (फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)

कुंड तक पहुँचने के लिए नीचे उतरती सीढ़ियाँ बनाई गई हैं, जो प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली की झलक भी दिखाती हैं। मंदिर परिसर में काली माता का एक प्राचीन मंदिर भी स्थित है, जिससे यह क्षेत्र केवल सूर्य उपासना तक सीमित नहीं रह जाता बल्कि एक विस्तृत धार्मिक परिसर का रूप ले लेता है।

बुंदेलखंड क्षेत्र में जल संरक्षण की जो परंपरा चंदेल राजाओं ने विकसित की थी, सूर्य कुंड और राहिल सागर उसके महत्वपूर्ण उदाहरण माने जाते हैं।

विश्व धरोहर बनने का सपना और भविष्य की संभावनाएँ

आज महोबा का सूर्य मंदिर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसका गौरवशाली अतीत और संभावनाओं से भरा भविष्य एक-दूसरे से मिलते दिखाई देते हैं। स्थानीय समाज, इतिहास प्रेमी और प्रशासन सभी चाहते हैं कि इस धरोहर को वह पहचान मिले जिसकी यह हकदार है।

यदि यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में इसे स्थान मिलता है तो यह न केवल महोबा बल्कि पूरे बुंदेलखंड के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। इससे पर्यटन बढ़ेगा, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और दुनिया को भारतीय स्थापत्य कला के एक ऐसे अध्याय से परिचित होने का अवसर मिलेगा जो अब तक अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है।

कोणार्क सूर्य मंदिर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है, लेकिन महोबा का सूर्य मंदिर यह याद दिलाता है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल प्रसिद्ध स्मारकों तक सीमित नहीं है। बुंदेलखंड की धरती पर खड़ा यह 1100 साल पुराना सूर्य मंदिर आज भी इतिहास, आस्था और अद्भुत वास्तुकला का जीवंत प्रतीक बनकर समय की गवाही दे रहा है।

संदर्भ के तौर पर कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण काल (13वीं शताब्दी) और महोबा सूर्य मंदिर के 9वीं-10वीं शताब्दी के होने संबंधी ऐतिहासिक जानकारी विभिन्न स्रोतों में दर्ज है।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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