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आज जहाँ से पकड़ा गया है आतंकी मोहम्मद शेख, वहीं के रहने वाले थे बाटला हाउस एनकाउंटर में ढेर हुए आतंकी: ‘आतंक की नर्सरी’ है संजरपुर, क्या आजमगढ़ में सपा की मजबूती से मिलता है खाद-पानी?

आजमगढ़ के संजरपुर से पकड़ा गया मोहम्मद शेख वहाँ से जुड़ा पहला आतंकी नहीं है, जो यहाँ से पकड़ा गया हो। देश में जब जब आतंकी हमले हुए हैं, उनके तार इस कुख्यात जगह से जुड़ते हैं। मुंबई हमलों से लेकर दिल्ली ब्लास्ट और बटला हाउस एनकाउंटर तक...

उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ जिला खासतौर पर इसका संजरपुर और सरायमीर इलाका दशकों से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहा है। अभी उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधक दस्ते (UP-ATS) द्वारा खुदादादपुर (संजरपुर) से 22 वर्षीय संदिग्ध आतंकी मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी ने एक बार फिर इस शांत दिख रहे इलाके के नीचे सुलग रही खतरनाक साजिशों को सतह पर ला दिया है।

मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी महज एक अपराधी की धरपकड़ नहीं है, बल्कि यह उस खूंखार आतंकी सिंडीकेट के पुनर्जीवित होने का संकेत है जो सीमा पार बैठी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) और अंतरराष्ट्रीय गैंगस्टरों के इशारे पर भारत को दहलाने की फिराक में है।

इस स्पेशल रिपोर्ट में हम आजमगढ़ के संजरपुर के आतंकी इतिहास, इसके सियासी कनेक्शन, स्लीपिंग मॉड्यूल्स की कार्यप्रणाली और राजनीतिक बदलावों के साथ इसके उतार-चढ़ाव के हर पहलू के बारे में बता रहे हैं

मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी से बड़ी आतंकी साजिश का पर्दाफाश

उत्तर प्रदेश एटीएस को खुफिया तंत्र से लगातार इनपुट मिल रहे थे कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और सीमा पार बैठे भारत विरोधी तत्व सोशल मीडिया के जरिए देश के युवाओं को कट्टरपंथी बनाने की मुहिम चला रहे हैं। इसी निगरानी के दौरान एटीएस ने आजमगढ़ के सरायमीर थाना क्षेत्र के संजरपुर के पास स्थित खुदादादपुर गाँव में रहने वाले मोहम्मद शेख पुत्र रेहान अहमद को दबोचा। करीब 22 साल का यह युवक पहली नजर में एक सामान्य ग्रामीण लग सकता है, लेकिन इसके मोबाइल और डिजिटल फुटप्रिंट्स ने सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए।

मोहम्मद शेख के पास से एक अत्याधुनिक 9 एमएम की पिस्टल और चार जिंदा कारतूस बरामद किए गए। जाँच में सामने आया कि शेख पूरी तरह से जिहादी मानसिकता की गिरफ्त में आ चुका था। वह व्हाट्सएप और अन्य सुरक्षित मैसेंजर ऐप्स के जरिए पाकिस्तान और दुबई के कई संदिग्ध नंबरों के संपर्क में था। यह नंबर किसी और के नहीं, बल्कि कुख्यात पाकिस्तानी गैंगस्टर शहजाद भट्टी और उसके गुर्गों अजमल गुर्जर और रजा पाकिस्तानी के थे।

मोहम्मद शेख को पाकिस्तानी आकाओं द्वारा भारतीय जनता पार्टी (BJP) की एक प्रमुख महिला नेता की रेकी करने, उन्हें धमकाने और अंततः उनकी हत्या करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस टारगेट किलिंग को अंजाम देने के बाद शेख को पाकिस्तान या दुबई सुरक्षित निकालने और उसे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी मिशन में शामिल करने का वादा किया गया था।

मोहम्मद शेख स्थानीय स्तर पर अन्य युवाओं को भी मोटी रकम का लालच देकर और मजहबी भावनाएँ भड़काकर इस नेटवर्क से जोड़ने का प्रयास कर रहा था। समय रहते हुई इस गिरफ्तारी ने उत्तर प्रदेश को एक बड़े सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक हत्या की आग में झुलसने से बचा लिया।

संजरपुर क्यों कहा जाता है ‘आतंक की नर्सरी’?

आजमगढ़ का संजरपुर गाँव कोई पहली बार चर्चा में नहीं आया है। देश में जब भी कोई बड़ा बम धमाका या आतंकी गतिविधि हुई, सुरक्षा एजेंसियों के कदम घूम-फिरकर संजरपुर की गलियों में ही पहुँचे। इस गाँव को ‘आतंक की नर्सरी’ का तमगा मिलने के पीछे एक लंबा और खौफनाक इतिहास है। संजरपुर और उसके आसपास के इलाकों का नाम देश के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ (IM) के जन्म और उसके विस्तार से गहराई से जुड़ा हुआ है।

बात चाहे साल 2007 के उत्तर प्रदेश की अदालतों में हुए धमाकों की हो, या 2008 के जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली के सिलसिलेवार बम ब्लास्ट की, इन सभी के मास्टरमाइंड और शूटर इसी संजरपुर और सरायमीर इलाके से निकले थे। इंडियन मुजाहिद्दीन का सह-संस्थापक यासीन भटकल जब देश में नेटवर्क खड़ा कर रहा था, तब उसे सबसे सुरक्षित पनाहगाह और सबसे मुफीद लड़ाके इसी संजरपुर से मिले थे।

इस गाँव के युवाओं का ब्रेनवॉश इस कदर किया गया था कि वे देश के भीतर ही देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने को तैयार हो गए। संजरपुर की इसी कड़वी हकीकत के कारण राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और उत्तर प्रदेश एटीएस को इस इलाके पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखनी पड़ती है। यहाँ के कई परिवार ऐसे हैं जिनके बेटे या तो देश की विभिन्न जेलों में आतंकी गतिविधियों के आरोप में बंद हैं या फिर वे फरार होकर पाकिस्तान, दुबई और सीरिया जैसे देशों में बैठकर भारत के खिलाफ साजिशें रच रहे हैं।

बटला हाउस एनकाउंटर और संजरपुर के मोस्ट वांटेड आतंकी

संजरपुर का नाम वैश्विक पटल पर सबसे ज्यादा तब गूँजा जब 19 सितंबर 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में कुख्यात ‘बटला हाउस एनकाउंटर‘ हुआ। दिल्ली सीरियल ब्लास्ट के बाद जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आतंकियों के ठिकाने पर छापा मारा, तो वहाँ मौजूद आतंकियों का संबंध सीधे आजमगढ़ के संजरपुर से निकला।

इस मुठभेड़ में संजरपुर का रहने वाला आतंकी आतिफ अमीन और साजिद मारे गए थे, जबकि मोहम्मद सैफ नाम का आतंकी मौके से पकड़ा गया था। इस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए थे।

बटला हाउस एनकाउंटर के बाद संजरपुर के कई अन्य आतंकी देश छोड़कर फरार हो गए। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने इस इलाके के छह सबसे खतरनाक फरार आतंकियों पर 10-10 लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा है। इन आतंकियों की प्रोफाइल भी जानना जरूरी है-

  • डॉक्टर शाहनवाज: संजरपुर का रहने वाला यह आतंकी पेशे से डॉक्टर था, लेकिन इसका दिमाग बम बनाने और युवाओं को कट्टरपंथी बनाने में चलता था। यह देश के कई शहरों में हुए धमाकों का मुख्य साजिशकर्ता रहा है।
  • शादाब उर्फ बड़ा साजिद उर्फ जुनैद चिकना: बटला हाउस एनकाउंटर के दौरान यह मौके से भागने में सफल रहा था। बाद में इसके पाकिस्तान और वहां से सीरिया जाकर वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस (ISIS) में शामिल होने की पुष्टि हुई।
  • अबू राशिद: इंडियन मुजाहिद्दीन का यह खतरनाक कमांडर भी बटला हाउस के बाद से फरार है और इसके भी आईएसआईएस के साथ जुड़कर इंटरनेट के जरिए भारतीय युवाओं को भर्ती करने के इनपुट मिले हैं।
  • राशिद उर्फ सुल्तान, आसिफ और आफताब: ये तीनों भी संजरपुर और सरायमीर इलाके के रहने वाले हैं और देश के विभिन्न हिस्सों में हुए धमाकों में शामिल रहे हैं।

लंबे समय तक स्थानीय पुलिस के पास इन आतंकियों के पुख्ता डोजियर या तस्वीरें नहीं थीं, जिसका फायदा उठाकर इनके नेटवर्क चोरी-छिपे काम करते रहे। साल 2018 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक बड़ा कदम उठाते हुए सरायमीर थाने में इन सभी छह फरार आतंकियों की हिस्ट्रीशीट खोली।

डॉक्टर शाहनवाज (46ए), बड़ा साजिद (37ए), अबू राशिद (70ए), राशिद (26ए), आसिफ (20ए) और आफताब (11ए) की हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद स्थानीय स्तर पर इनके रिश्तेदारों और मददगारों पर कानूनी शिकंजा कसा गया, जिससे इनका घरेलू सपोर्ट सिस्टम ध्वस्त हो गया था।

आईएसआईएस (ISIS) के वीडियो से सामने आया आजमगढ़ का वैश्विक कनेक्शन

आजमगढ़ के आतंकियों के तार केवल भारत या पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि इन्होंने वैश्विक जिहाद में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। वर्ष 2016 में दुनिया के सबसे बर्बर आतंकी संगठन आईएसआईएस (ISIS) ने एक प्रोपेगैंडा वीडियो जारी किया था, जिसने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को हिलाकर रख दिया था। इस वीडियो में सीरिया और इराक के युद्धक्षेत्र में कुछ भारतीय आतंकी हथियार लहराते हुए भारत के खिलाफ जंग का एलान कर रहे थे और बाबरी मस्जिद, मुजफ्फरनगर दंगों तथा गोधरा का बदला लेने की बात कह रहे थे।

इस वीडियो में दिख रहे आतंकियों में से दो प्रमुख चेहरों की पहचान आजमगढ़ के संजरपुर निवासी बड़ा साजिद और अबू राशिद के रूप में हुई। वीडियो सामने आने के बाद संजरपुर में हड़कंप मच गया था। हालाँकि उनके परिजनों ने हमेशा की तरह यह दावा किया कि 2008 के बाद से उनका अपने बेटों से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन खुफिया एजेंसियों के पास इस बात के पक्के सबूत थे कि ये फरार आतंकी इंटरनेट और डार्क वेब के जरिए संजरपुर और आजमगढ़ के स्थानीय स्लीपर सेल्स के संपर्क में बने हुए थे और वहाँ से नई भर्तियाँ करने की कोशिश कर रहे थे।

लश्कर का ‘शेख अब्दुल नईम’ कनेक्शन और पूर्वांचल में स्लीपिंग मॉड्यूल्स

आजमगढ़ का यह आतंकी सिंडीकेट कितना गहरा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) भी इस नर्सरी का इस्तेमाल करता रहा है। साल 2017 में लखनऊ से लश्कर के एक बड़े आतंकी शेख अब्दुल नईम को गिरफ्तार किया गया था। नईम साल 2014 में मुंबई पुलिस की हिरासत से फरार हो गया था और वह हैदराबाद बम धमाकों का मुख्य आरोपित था।

गिरफ्तारी से पहले नईम ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र, विशेष रूप से आजमगढ़, जौनपुर और वाराणसी का सघन दौरा किया था। जाँच में सामने आया कि नईम आजमगढ़ के ही तीन फरार आतंकियों का बेहद करीबी था। उन्हीं पुराने संपर्कों का इस्तेमाल करके नईम आजमगढ़ और बनारस के निष्क्रिय हो चुके स्लीपिंग मॉड्यूल्स को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश कर रहा था।

नईम ने वाराणसी के प्रसिद्ध अस्सी घाट और दशाश्वमेध घाट के पास स्थित होटलों और धर्मशालाओं में हिंदू नाम और फर्जी पहचान पत्रों के आधार पर हफ्तों तक पनाह ली थी। उसने उन क्षेत्रों की टोह ली थी जहां इजरायली और अमेरिकी पर्यटक बड़ी संख्या में आते हैं। उसने गोरखपुर के रास्ते नेपाल सीमा तक जाकर पूरे रूट की वीडियो और तस्वीरें अपने पाकिस्तानी आकाओं को भेजी थीं। इस पूरी साजिश का केंद्र बिंदु भी आजमगढ़ का वही आतंकी नेटवर्क था, जो नईम को स्थानीय स्तर पर रसद, छिपने की जगह और पहचान पत्र मुहैया करा रहा था।

अंडरवर्ल्ड और आतंकवाद का कॉकटेल, अबू सलेम की विरासत

आजमगढ़ का इतिहास केवल वैचारिक आतंकवाद से ही नहीं, बल्कि अंडरवर्ल्ड के उस खूंखार नेटवर्क से भी जुड़ा है जिसने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को लहूलुहान किया था। मुंबई बम धमाकों का मुख्य आरोपित और अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम भी इसी आजमगढ़ के सरायमीर का रहने वाला है। अबू सलेम ने सरायमीर से निकलकर मुंबई के डी-कंपनी (D-Company) में अपनी पैठ बनाई और जबरन वसूली, हत्याओं तथा हथियारों की तस्करी का एक बड़ा साम्राज्य खड़ा किया।

साल 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट में हथियारों को मँगाने और उन्हें ठिकाने लगाने में अबू सलेम की मुख्य भूमिका थी। सलेम ने आजमगढ़ के अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल करके कई स्थानीय युवकों को मुंबई और खाड़ी देशों में काम दिलाया और धीरे-धीरे उन्हें जरायम की दुनिया में धकेल दिया। आजमगढ़ में अपराध और आतंकवाद का यह कॉकटेल दशकों पुराना है, जहाँ अंडरवर्ल्ड के शूटर और हथियारों के तस्कर आसानी से वैचारिक आतंकवादियों के स्लीपर सेल में तब्दील हो जाते हैं।

क्या जब-जब सपा मजबूत हुई, तब-तब पनपा सिंडीकेट?

आजमगढ़ में आतंकवाद और संगठित अपराध के इस कदर फलने-फूलने के पीछे सबसे बड़ा कारण इस क्षेत्र को मिला राजनीतिक संरक्षण और तुष्टिकरण की राजनीति रही है। यदि अतीत के पन्नों को पलटकर तथ्यों का विश्लेषण किया जाए, तो यह साफ दिखाई देता है कि जब-जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) सत्ता में रही या राजनीतिक रूप से मजबूत हुई, तब-तब इस इलाके के गैंगस्टरों और संदिग्ध आतंकियों के हौसले बुलंद हुए।

इसके कई ठोस और ऐतिहासिक तथ्य मौजूद हैं-

  • बटला हाउस के बाद राजनीतिक हमदर्दी: जब 2008 में बटला हाउस एनकाउंटर हुआ, तो समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेताओं ने वोट बैंक की राजनीति के चलते इस एनकाउंटर पर ही सवाल खड़े कर दिए थे। संजरपुर के मारे गए और पकड़े गए आतंकियों को ‘मासूम छात्र’ बताकर पेश किया गया। नेताओं का एक पूरा हुजूम संजरपुर के उन परिवारों से मिलने पहुँचा जिनके तार आतंकियों से जुड़े थे, जिससे स्थानीय स्तर पर कानून व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल कमजोर हुआ।
  • आतंकी मुकदमों की वापसी का प्रयास: साल 2012 में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तो सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर देश के विभिन्न बम धमाकों में पकड़े गए आजमगढ़ और अन्य जिलों के संदिग्ध आतंकियों के मुकदमों को वापस लेने का फैसला शामिल था। हालाँकि बाद में माननीय उच्च न्यायालय ने इस असंवैधानिक कदम पर रोक लगा दी, लेकिन इस राजनीतिक प्रयास ने यह संदेश दे दिया था कि सत्ता में बैठे लोग इन तत्वों के प्रति नरम रुख रखते हैं।
  • गैंगस्टरों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाना: आजमगढ़ और आसपास के जिलों में मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण देना और उन्हें माननीय बनाना इसी राजनीति का हिस्सा रहा। जब सत्ता का हाथ इन अपराधियों के सिर पर होता था, तो स्थानीय पुलिस और खुफिया इकाइयाँ संजरपुर जैसे संवेदनशील इलाकों में हाथ डालने से कतराती थीं, जिसके कारण स्लीपर सेल बिना किसी डर के अपनी जड़ें मजबूत करते रहे।

सत्ता परिवर्तन और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का असर

साल 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता में बड़ा बदलाव हुआ। नई सरकार के आते ही अपराधियों और आतंकवादियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति लागू की गई। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को पूरी छूट दी गई कि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के राष्ट्रविरोधी तत्वों पर कार्रवाई करें।

इस नीति का असर आजमगढ़ पर भी साफ तौर पर देखने को मिला-

  • आतंकी नेटवर्क का ध्वस्त होना: एटीएस और एनआईए ने संजरपुर, सरायमीर और खुदादादपुर जैसे इलाकों में लगातार छापेमारी करके फंडिंग के रास्तों को ब्लॉक कर दिया। पुराने स्लीपर सेल्स के मददगारों को जेल भेजा गया।
  • हिस्ट्रीशीट और कुर्की की कार्रवाई: जैसा कि पहले बताया गया, 2018 में छह बड़े इनामी आतंकियों की हिस्ट्रीशीट खोलकर बीट स्तर पर निगरानी शुरू की गई। माफियाओं और आतंकियों की संपत्तियों को कुर्क किया गया और उन पर बुलडोजर चलाए गए।
  • भय का माहौल खत्म होना: राजनीतिक संरक्षण खत्म होने से अपराधियों में खौफ पैदा हुआ और आजमगढ़ का यह आतंकी सिंडीकेट पूरी तरह से कमजोर, पंगु और भूमिगत हो गया था। कई सालों तक इस इलाके से किसी बड़ी राष्ट्रविरोधी गतिविधि की खबर सामने नहीं आई।

साल 2024 का राजनीतिक मोड़ और संजरपुर में जिहादी मानसिकता का पुनरुत्थान

सुरक्षा बलों की लगातार सख्ती के बावजूद, यह मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी, बल्कि केवल एक अनुकूल राजनीतिक अवसर के इंतजार में शांत बैठी थी। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ संसदीय सीट पर एक बार फिर बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी धर्मेंद्र यादव ने जीत हासिल की और आजमगढ़ की सीट पर फिर से सपाई परचम लहराया।

राजनीतिक विश्लेषकों और खुफिया इनपुट्स के अनुसार, इस चुनावी नतीजे के बाद से ही संजरपुर और उसके आसपास के इलाकों में सक्रिय रेडिकल तत्वों और जिहादी मानसिकता के लोगों को यह लगने लगा है कि उनके पुराने दिन और पुराना राजनीतिक संरक्षण वापस लौट सकता है। धर्मेंद्र यादव की इस जीत के बाद से ही इस इलाके के स्लीपिंग मॉड्यूल्स के भीतर एक नई हलचल देखी गई। सोशल मीडिया पर भारत विरोधी प्रोपेगैंडा अचानक तेज हो गया और युवाओं को दोबारा लामबंद करने की कोशिशें शुरू हो गईं।

मोहम्मद शेख की हालिया गिरफ्तारी इसी राजनीतिक बदलाव और उसके बाद पैदा हुई जिहादी मानसिकता के पुनरुत्थान का सीधा परिणाम है। सीमा पार बैठे पाकिस्तानी आकाओं और गैंगस्टर शहजाद भट्टी ने भाँप लिया था कि आजमगढ़ में राजनीतिक माहौल बदलते ही स्लीपर सेल्स को फिर से सक्रिय किया जा सकता है। इसी का फायदा उठाकर उसने मोहम्मद शेख जैसे 22 साल के युवक को हथियार मुहैया कराए और उसे भाजपा की महिला नेता की हत्या जैसे सनसनीखेज मिशन पर लगा दिया, ताकि राज्य में एक बार फिर से अशांति और सांप्रदायिक तनाव फैलाया जा सके।

सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश एटीएस की इस मुस्तैद और त्वरित कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि भले ही आजमगढ़ में आतंकी नर्सरी को जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हों, लेकिन देश की सुरक्षा एजेंसियाँ पूरी तरह अलर्ट पर हैं। मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद का खतरा कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता; यह केवल रूप बदलता है और अनुकूल राजनीतिक व सामाजिक माहौल मिलते ही दोबारा फन उठाने लगता है।

आजमगढ़ और संजरपुर के इस पूरे बैकग्राउंड से यह साफ है कि जब तक इस इलाके के रेडिकल तत्वों को राजनीतिक और सामाजिक रूप से अलग-थलग नहीं किया जाएगा, तब तक सीमा पार बैठे आईएसआई जैसे संगठन यहाँ के युवाओं का इस्तेमाल स्लीपर सेल के रूप में करते रहेंगे।

सुरक्षा एजेंसियों के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती मोहम्मद शेख के पूरे डिजिटल नेटवर्क को खंगालना, उसके अन्य स्थानीय सहयोगियों की पहचान करना और संजरपुर की इस ‘आतंकी नर्सरी’ को जड़ से उखाड़ फेंकना है, ताकि देश की अखंडता और सुरक्षा पर आँच न आने पाए।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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