Tuesday, November 24, 2020
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‘मणिकर्णिका’ आजकल के समीक्षकों के संकीर्ण दायरों से परे है

रानी के कई आयाम हैं, इतने कि उनके सामने आजकल प्रचलित किए जाने वाले पितृसत्ता, धर्मनिरपेक्षता और अंधराष्ट्रवाद जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं है। वह इन सब से परे हैं, वह इन परिभाषाओं को तय करती हैं, इनके दायरे में नहीं बंधती।

‘मणिकर्णिका’ जैसी फ़िल्म का बनना और सुपरहिट होना भारतीय सिनेमा व बॉलीवुड के लिए एक अच्छा संकेत है। समीक्षकों के एक गिरोह द्वारा इसे नकारने के बावज़ूद दर्शकों का फ़िल्म को इतना प्यार देना, यह दिखाता है कि आज का दर्शक अपने इतिहास को लेकर संज़ीदा हो रहा है और अपनी गौरव गाथा को नए सिरे से याद करने की कोशिश कर रहा है। भारत एक विशाल देश है और उस से भी बड़ा है इसका इतिहास। और, अगनित भारतीय वीरों की गौरव गाथाएँ को समेटे वह इतिहास, जो आज तक पुस्तकालयों की भारी-भरकम किताबों में दबा हुआ था, अब धीरे-धीरे जनमानस की चर्चा का विषय बन रहा है। यही ‘मणिकर्णिका’ जैसी फ़िल्मों की कामयाबी है।

मणिकर्णिका: यह ‘वीरे दी वेडिंग’ नहीं है

जैसा कि ट्रेलर देखने से ही प्रतीत हो गया था, कंगना रनौत ने झाँसी की रानी के किरदार को अदा नहीं किया है, बल्कि हर एक दृश्य में उसे जिया है। रानी लक्ष्मीबाई एक माँ हैं, एक रानी हैं, और एक पिता की पुत्री भी हैं। मराठा साम्राज्य में पली-बढ़ी मनु कैसे उत्तर प्रदेश के एक राज्य का दिल जीत लेती है, ग्वालियर की सेना के अंदर देशभक्ति जगा देती है, और अंग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर देती है- इसे फ़िल्म ने काफ़ी अच्छी तरह से उकेरा है। यहाँ हम फ़िल्म की कहानी की चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि ऐसी फिल्मों को बनाने मे झोंकी गई मेहनत और बजट को देखते हुए आपको इसे सिनेमा हॉल में अनुभव करना चाहिए।

यहाँ हम फ़िल्म की थीम, प्रभाव, अदाकारी और इसको लेकर फैलाए जा रहे प्रोपगेंडा की बात करेंगे और परत दर परत समीक्षकों के उस गिरोह की पोल खोलेंगे, जिसने देशभक्ति से ओत-प्रोत फ़िल्म में भी खोट ढूँढ कर इसे बदनाम करने की असफल कोशिश की। सबसे पहले ‘द प्रिंट’ के शरण्या मुंशी की बात करते हैं, जिन्होंने अपनी समीक्षा में कहा है कि फ़िल्म में महारानी लक्ष्मीबाई तलवार तो उठाती हैं, लेकिन पितृसत्ता से लड़ाई नहीं करती।

फ़िल्म के एक दृश्य में कंगना को नाना साहेब और तात्या टोपे जैसे वीरों के साथ लड़ते हुए दिखाया गया है (मैत्रीपूर्ण तलवार युद्ध क्योंकि सभी एक साथ ही पले-बढे थे), जिसमे रानी उन पर भी भारी पड़ती है। इस युद्ध में प्रेम है, वीरता है, एक लड़की का साहस है- अगर इसे पितृसत्ता से लड़ाई वाले दृष्टिकोण से देखें तो भी यह एक लड़की के तीन पुरुषों पर भारी पड़ने वाली बात है। लेकिन नहीं, अगर राष्ट्रभक्ति और बलिदान की गाथा का चित्रण करने वाली इस फ़िल्म में रानी सिगरेट फूँक कर उनका धुआँ हवा में नहीं उड़ाती है, वह दारू की बोतल लिए टल्ली होकर लड़खड़ाते हुए और उलूलजलूल कुछ भी बकते हुए अपने बॉयफ्रेंड के साथ रातों में नहीं घूमती हैं- शायद यही कारण है कि तीन-तीन वीरों पर भारी पड़ने के बावज़ूद, वह पितृसत्ता से नहीं लड़ पाती।

रानी के एक नहीं, कई पहलू हैं

रानी अपने पालक पिता से नखरे करती हैं, वह उनका अधिकार है। रानी अपने पति का आदर-सम्मान करती हैं, क्योंकि वह राजा हैं और उम्र में उनसे बड़े हैं। इसमें पितृसत्ता नहीं, एक बेटी का अपने पिता के सामने नटखटपन और एक पत्नी का अपने पति के सामने शालीन, सहज और सौम्य व्यवहार वाला दृष्टिकोण है। वह व्यवहार जो राजा का भी अपनी पत्नी के लिए है। रानी अपने पति की मृत्यु की सोच कर ही भयभीत हो उठती है। इसमें उनका उनके पति के प्रति स्नेह है, लगाव है, अपनों के लिए किसी अनहोनी की आशंका का भय है। वह ‘ब्रेक अप के बाद पार्टी’ वाली महिला नहीं है, बल्कि बीमार पति की तन-मन-धन से सेवा करने वाली आदर्श हैं।

पति की मृत्यु के बाद शोकाकुल रानी एक पत्नी का फ़र्ज़ निभाती हैं। ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी राजाविहीन झाँसी की चिंता कर वह एक रानी का फ़र्ज़ निभाती हैं। विधवाओं के लिए समाज के एक वर्ग में तय किए गए आडम्बरपूर्ण नियम-क़ानून की धज्जियाँ उड़ा कर एक समाज-सुधारक की भूमिका निभाती हैं। रानी के कई आयाम हैं, इतने कि उनके सामने आजकल प्रचलित किए जाने वाले पितृसत्ता, धर्मनिरपेक्षता और अंधराष्ट्रवाद जैसे शब्दों का कोई मोल नहीं है। वह इन सब से परे हैं, वह इन परिभाषाओं को तय करती हैं, इनके दायरे में नहीं बंधती।

विधवा होने के बाद तमाम आडम्बरों को धता बताते हुए (जो कि एक महिला द्वारा ही उन पर थोपे जा रहे थे, किसी पुरुष द्वारा नहीं) राजकाज संभालने वाली रानी को पितृसत्तात्मक नज़रिए से देखना अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देने के सामान है। वह हज़ारों लोगों के सामने एक विधवा को कुमकुम लगा कर समाज के एक वर्ग द्वारा ढोए जा रहे आडम्बरों को धता बताती हैं। हर एक जोड़े की तरह, राजा-रानी को भी एक संतान की इच्छा है। यहाँ हम इतिहास को नहीं, फ़िल्म की कहानी के हिसाब से पितृसत्ता का मूल्यांकन करेंगे क्योंकि उंगली फ़िल्म पर ही उठाई गई है।

पितृसत्तात्मक अँगरेज़ हैं, और रानी उनसे लड़ती हैं। अंग्रेज़ पितृसत्तात्मक हैं क्योंकि आक्रांता डलहौजी की हड़प नीति में किसी पुत्र के न होने पर राज्य का अंग्रेजी शासन में विलय करने की बात कही गई थी, यह उनकी पितृसत्तात्मकता दिखाती है। एक महिला के शासन को मान्यता न देना, यह उनकी पितृसत्तात्मकता को दिखाता है। एक ‘हिन्दू महिला के विधवा होने के बाद काशी जाने की कामना करना, यह उनकी पितृसत्तात्मकता का परिचायक है। राजनैतिक अंधविरोध में पागल हो चुके समीक्षकों को आजकल सबकुछ उलटा ही नज़र आता है, जिसके परिणामस्वरूप हो सकता है कि उन्हें अंग्रेज़ों की पितृसत्तात्मकता ‘कूल’ लगी हो और रानी का विधवा आडंबरों को धता बताना रास न आया हो।

वह महिला नहीं, पहले भारतीय हैं

ऐसा इसीलिए, क्योंकि उन्होंने पितृसत्तात्मकता की एक परिभाषा तय कर ली है, अपने अजेंडे के हिसाब से नए मानदंड तैयार कर लिए हैं। रानी इनके इन मानदंडों से परे हैं, वह ऐसी गिरी हुई मानसिकता वाले लोगों के द्वारा तय किए गए एक दायरे में बँध कर रहना नहीं जानती, वह लोहा लेना जानती है। झाँसी की जनता के बीच मिल-बैठ कर सत्ता और जनता के बीच संवाद का माध्यम स्थापित करने वाली रानी को लोग सहज स्वीकार करते हैं। राज्य के सभी स्त्री-पुरुष उनके पीछे हो लेते हैं, यह किसी महिला की कामयाबी नहीं है, यह पितृसत्ता के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं है- यह एक देशभक्त भारतीय की आक्रांताओं के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़ने की कहानी है। मणिकर्णिका परिवार, राज्य और मातृभूमि- तीनो की मर्यादाएँ सिखाती है।

अपने पुत्र की मृत्यु पर शोकाकुल रानी धीरज नहीं रख पाती, वह रोती-बिलखती है, गम के सागर में डूब कर अपने मृत पुत्र को भी बाहों में समेटे रहती है। संतान की मृत्यु का गम किसी भी महिला के लिए इतना दुखदाई है, जिसकी परिकल्पना हम-आप नहीं कर सकते। पुत्र-शोक से ग्रसित रानी अपने शोक को मिटाने के लिए किसी क्लब में नहीं जाती- जो कि आजकल के समीक्षकों को खुश करने का एक ज़रिया हो सकता था। वह अपने बीमार पति की देखभाल में समय व्यतीत करती हैं, झाँसी की भावी रणनीति पर चर्चा करते हुए अपनी क्षमता दिखाती है।

मणिकर्णिका क्रूर अंग्रेज़ों के सामने सर नहीं झुकाती है। वह अपने पिता के लिए मणिकर्णिका हैं, पति के लिए मनु हैं, राज्य के लिए लक्ष्मी हैं और इतिहास के लिए एक वीरांगना हैं, झाँसी की रानी हैं। वह बात-बात में अंग्रेज़ी शब्द दुहरा कर अपनी बौद्धिकता का परिचय नहीं देती, बल्कि अंग्रेज़ी को एक ‘mere language’ बता कर अपनी मातृभाषा का सम्मान करने सिखाती है। पुस्तकों की प्रेमी मणिकर्णिका पठान-पाठन में समय व्यतीत करती हैं, उनके पुस्तकालय में आग लगा कर अंग्रेज़ अपनी मानसिकता का परिचय देते हैं।

मणिकर्णिका ट्रेलर (साभार: Zee Studios)

ग़ुलाम गौश ख़ान को गौश बाबा कहने वाली रानी उनका सम्मान करती है। गौश बाबा एक मुस्लमान नहीं है, वह भी एक भारतीय हैं जो अपनी मातृभूमि में दफ़न होने की कामना रखते हैं। पीर अली ग़द्दार है, वह देश का नमक खाता है लेकिन उसके मन में ज़हर भरा है। गौश बाबा की मृत्यु के वक़्त भावुक रानी वहाँ उपस्थित रहती है। ख़ान मरते वक़्त रानी को ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद देते हैं। एक देशभक्त और बुज़ुर्ग की इज्ज़त करना जानती है रानी, इसे पितृसत्ता और धर्म के नज़रिए से आँकने वालों के मुँह पर तमाचा मारती है।

सार यह, कि अगर आपने मणिकर्णिका नहीं देखी तो आपको देखनी चाहिए। अगर आपने देख ली है, तो आपको इतिहास में झाँक कर उस गौरव गाथा के बारे में और जानना चाहिए, समीक्षकों की बेहूदगी पर सवाल खड़े करने चाहिए। फ़िल्म ऐतिहासिक रूप से भले ही शत प्रतिशत प्रामाणिक न हो, लेकिन कहानी वही है जो हमें दशकों से प्रेरणा देती आई हैं। कंगना इस फ़िल्म के निर्देशक हैं, बाहुबली के लेखक विजयेंद्र प्रसाद ने कहानी लिखी है और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसूनजोशी ने डायलॉग्स लिखे हैं। फ़िल्म देखिए, उस गौरव गाथा को री-विजिट कीजिए और इन सबका धन्यवाद कीजिए।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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