Tuesday, June 25, 2024
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बाँटने की राजनीति, बाहरी ताकतों से हाथ मिला कर साजिश, प्रधान को तानाशाह बताना… क्या भारतीय राजनीति के ‘बनराकस’ हैं राहुल गाँधी?

'पंचायत' के भूषण, या वास्तविक राहुल गाँधी की सबसे बड़ा पैंतरा है विभाजन पैदा करना। 'बनराकस' पूर्वी और पश्चिमी फुलेरा गाँव में विभाजन पैदा कर देता है।

आपने ‘पंचायत 3’ देखी? कई लोग इसके रिलीज की प्रतीक्षा कर रहे थे, कइयों ने ‘Amazon Prime’ पर इसे अपलोड किए जाने के साथ ही आठों एपिसोड देख डाले। ‘पंचायत’ के तीसरे सीजन में क किरदार की भूमिका काफी बढ़ाई गई है, उसका नाम है – भूषण। हालाँकि, गाँव के लोग उसे ‘बनराकस’ नाम से बुलाते हैं। ‘जंगल का राक्षस, यानी उसका स्वभाव कुछ ऐसा ही है। ‘पंचायत 2’ का उसका डायलॉग ‘देख रहे हो न विनोद’ काफी लोकप्रिय हुआ था।

यहाँ हमें ‘पंचायत 3’ की कहानी का भी हल्का-फुल्का जिक्र करना पड़ेगा, इसीलिए अगर आप Spoiler नहीं चाहते हैं तो सीरीज देखने के बाद ही इसे पढ़ें। भूषण का किरदार ‘पंचायत 3’ में 2 ग्रामीणों को लेकर घूमता है जो उसकी बातों में ऐसे आ जाते हैं कि ‘भइया-भइया’ कर के हमेशा उसके पिछलग्गू बने रहते हैं। इनमें से एक का नाम है विनोद और एक का नाम है माधव। दोनों गरीब होते हैं, जिनके पास अपना पक्का घर तक नहीं होता है। ऐसे में वो भूषण की बातों में आ जाते हैं।

भारत में भी वास्तविकता में भी एक ऐसा नेता है, लेकिन वो पंचायत नहीं बल्कि राष्ट्र स्तर का है। उसका नाम है – राहुल गाँधी। राहुल गाँधी में जनता को ऐसे ही बेवकूफ बनाते हैं, जैसे कि भूषण। भूषण बार-बार कहता है कि क्रांति लानी होगी, बलिदान देना होगा। वो बार-बार ग्राम प्रधान को तानाशाह बताता है। ठीक वैसे ही, जैसे राहुल गाँधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तानाशाह बताते हैं। जनता को बार-बार उकसाते हैं। एक ‘बनराकस’ तो राहुल गाँधी में भी है ही है।

‘बनराकस’ गाँव के खिलाफ जाकर उस विधायक से मिल जाता है, जो गाँव से नफरत करता है। ठीक वैसे ही, जैसे राहुल गाँधी कभी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ करार का हिस्सा बनते हैं तो कभी लंदन में जाकर भड़काऊ बयान देते हैं। मोदी सरकार के खिलाफ अरबपति कारोबारी जॉर्ज सोरोस भी तो करोड़ों डॉलर की फंडिंग कर रहा है। ऐसी ही ताकतों से राहुल गाँधी की भी मिलीभगत है। वो UK में वहाँ के सांसद जेरेमी कोर्बिन से मिलते हैं, जो जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानता।

‘पंचायत 3’ के अंत में जब पूरे गाँव और विधायक के बीच लड़ाई का मौका आ जाता है, तब भूषण बीच में सफ़ेद झंडा लेकर पत्नी और दोनों चमचों के साथ बैठ जाता है। वो दिखावा करता है कि वो समझौता करा रहा है, शांति के लिए ये सब कर रहा है, जबकि असल में वो विधायक की तरफ होता है। दुनिया को दिखाने के लिए वो ‘बलिदान के लिए तैयार रहने’, निडर होने और शांति का पक्षधर होने का दावा करता है, उसके लिए नाटक करता है।

ये तो वैसे ही है न, जैसे लद्दाख में जाकर कहते हैं कि वहाँ की जमीन चीन ने कब्ज़ा ली है। वो खुद को साहसी और निडर दिखाने के लिए सीमा का दौरा करते हैं, लेकिन उनका एजेंडा भारत विरोधी रहता है। उनके समर्थन में पाकिस्तान से स्वर उठते हैं, उन्हें वोट देने की अपील होती है। गाँव का प्रधान ‘पंचायत’ में ‘बनराकस’ को नज़रअंदाज़ करता है, जब बर्दाश्त से बाहर हो जाता है तो डपट देता है। ठीक वैसे ही, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को अहमियत नहीं देते, लेकिन चुनाव के समय उनके एजेंडे की धज्जियाँ उड़ा देते हैं।

लेकिन, ‘पंचायत’ के भूषण, या वास्तविक राहुल गाँधी की सबसे बड़ा पैंतरा है विभाजन पैदा करना। ‘बनराकस’ पूर्वी और पश्चिमी फुलेरा गाँव में विभाजन पैदा कर देता है। वो दावा करता है कि प्रधान खुद पूर्वी फुलेरा का है, इसीलिए उसने उधर के लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ अधिक संख्या में दिया है, जबकि पश्चिमी फुलेरा को नज़रअंदाज़ किया गया है। इसके बाद गाँव 2 हिस्सों में बँट जाता है। प्रधान के खिलाफ माहौल बन जाता है।

देखिए, राहुल गाँधी ठीक इसी तरह उत्तर भारत और दक्षिण भारत की बात करते हैं। केरल के वायनाड से सांसद राहुल गाँधी ने वहाँ भाषण देते हुए कहा था कि वो 15 वर्षों तक उत्तर भारत में सांसद रहे लेकिन दक्षिण भारत में आना उनके लिए काफी ताजगी भरा अनुभव था क्योंकि यहाँ के लोग न सिर्फ मुद्दों में रुचि लेते हैं बल्कि चीजों को डिटेल में देखते हैं। उन्होंने कहा था कि दक्षिण भारत के मतदाता उत्तर भारतीयों से अलग हैं। चुनाव आयोग में भी उनके उत्तर-दक्षिण को लेकर दिए गए एक बयान के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई थी।

विनोद को भूषण वैसे ही फुसला कर रखता है, जैसे राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस समर्थकों को फुसलाते हैं। विनोद या माधव का प्रधान ने कुछ नहीं बिगाड़ा, लेकिन ‘बनराकस’ उसे कहता रहता है कि आवाज़ उठाओ, आवाज़ उठाओ। जैसे राहुल गाँधी जनता से कहते रहते हैं कि देश का माहौल ख़राब है, देश में तानाशाही आ गई है, सारी संस्थाएँ गुलाम हो गई हैं। हालाँकि, जनता को ऐसा नहीं लगता। ‘बनराकस’ की तरह ही राहुल गाँधी भी बाहरी ताकतों के साथ साँठगाँठ करते रहते हैं।

गाँव का माहौल ख़राब कर के और लड़ाई लगवा कर खुद शांति समझौते के लिए बैठने का दिखावा करना, ‘बनराकस’ के इसी किरदार को तो राहुल गाँधी ने शाहीन बाग़ आंदोलन और किसान आंदोलन को समर्थन देकर वास्तविकता में जिया है। जैसे भूषण विधायक आवास के दौरे पर साजिश रचने जाता है, राहुल गाँधी भी विदेश जाते ही रहते हैं। वहाँ गाँव का मामला है, यहाँ देश का। ‘बनराकस’ के कारण पूरे फुलेरा गाँव को हथियार निकालना पड़ा, राहुल गाँधी के चमचे 4 जून के बाद ‘जन-आंदोलन’ की बात कर रहे हैं।

‘बनराकस’ छोटी-छोटी बातों को बड़ा बना देता है, जैसे पिछले सीजन में उसने जबरन सड़क पर से गाड़ी हटवाई थी। एक चप्पल के लिए मंदिर का CCTV कैमरा देखा था। उसी तरह, राहुल गाँधी बिना मुद्दे के ही मुद्दों की बात करते रहते हैं। कभी कहते हैं कि LIC बिक गया, जबकि इस कंपनी की संपत्ति पाकिस्तान की GDP से भी दोगुनी हो जाती है। 4 जून के बाद फिर से हमें वास्तविकता में ‘बनराकस’ का ड्रामा देखने को मिल सकता है, या फिर वो ‘विधायक आवास’ निकल जाएगा?

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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