26 जनवरी स्पेशल: अशोक स्तम्भ का इतिहास, जो बना हमारा राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न

सम्राट अशोक ने धर्म प्रचार और नैतिक उपदेशों को प्रजा तक पहुँचाने के लिए धर्म लेखों का सहारा लिया था। इन धर्म लेखों को पर्वत शिखरों, पत्थर के खंभों और गुफ़ाओं में अंकित किया जाता था।

भारत आज अपना 70वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। गणतंत्र दिवस के इस ख़ास मौक़े पर आज हम इतिहास के पन्नों से कुछ जानकारी आपसे साझा करेंगे जिसका सीधा संबंध हमसे और हमारे देश से है।

उत्तर प्रदेश के सारनाथ स्थित अशोक स्तम्भ के सिंहों को 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मान्यता मिली थी। ये दहाड़ते हुए सिंह धर्म चक्र प्रवर्तन के रूप में दृष्टिमान हैं। बुद्ध ने वर्षावास समाप्ति पर भिक्षुओं को चारों दिशाओं में जाकर लोक कल्याण हेतु ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ का आदेश दिया था, जो आज सारनाथ के नाम से विश्विविख्यात है। इसलिए यहाँ पर मौर्य साम्राज्य के तीसरे सम्राट व सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने चारों दिशाओं में गर्जना करते हुए शेरों को बनवाया था।

सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए स्तम्भों में सारनाथ के स्तम्भ को सबसे बेहतर माना जाता है। इसमें सबसे ऊपर चारों दिशाओं में चार सिंह बने हुए हैं। यह चुनार के बलुआ पत्थर के लगभग 45 फुट लंबे प्रस्तरखंड का बना हुआ है। सिंहों की आकृति बेहद सौम्य प्रतीत नज़र आती है, इसमें उनकी माँसपेशियों, उनके बालों और शारीरिक बारीकियों को बेहद कुशलता के साथ पत्थर पर उकेरा गया है। इन सिंहों के नीचे एक पट्टी पर चारों दिशाओं में चक्र बने हुए हैं, इन चक्रों में 32 तीलियाँ हैं। इन्हीं तीलियों को धर्म चक्र प्रवर्तन का प्रतीक माना जाता है।

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बता दें कि हमारे राष्ट्रीय झंडे के बीच में जो अशोक चक्र का चिह्न विद्यमान है वो अशोक के स्तम्भ से ही लिया गया है। नीचे वाली पट्टी में चार पशु जिनमें हाथी, घोड़ा, बैल और सिंह बने हुए हैं वो देखने में संजीवता का आभास कराते हैं। अशोक द्वारा बनाए गए स्तम्भ सम्राट अशोक की शक्ति का प्रतीक भी माने जाते हैं। इन सभी स्तम्भों की ख़ासियत यह है कि इन्हें एक ही पत्थर को तराशकर बनाया गया है। इसलिए इन्हें एकाश्म (Monolithic) स्तम्भ भी कहा जाता है।

सारनाथ के सिंह स्तम्भ का ऊपरी हिस्सा या शीर्ष सारनाथ में पुरात्तव विभाग के संग्राहलय में रखा हुआ है और उसका बाक़ी हिस्सा या स्तम्भ संग्रहालय के पास ही में सारनाथ स्तूप के पास रखा गया है। सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए सभी स्तम्भ भारतीय कला का अद्भुत नमूना हैं। प्राचीन भारतीय विज्ञान और कला का बेजोड़ उदाहरण हैं।

इन स्तम्भों की ख़ासियतों में एक और ख़ास बात यह है कि इनकी चमकदार पॉलिश आज भी वर्षों बाद जस की तस बरक़रार है। सारनाथ के क़रीब 70 किलोमीटर दूर चुनार की खदानों में मिलने वाले बलुआ पत्थर से बनाए गए इस स्तम्भ में पत्थर की काली चित्तियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं बावजूद इसके इस स्तम्भ पर लाई गई चमक का आख़िर क्या राज़ है वो आज भी किसी को नहीं मालूम।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस बलुआ पत्थर को चमकाने की कला ईरान से भारत आई है जबकि कुछ का मानना है कि यह कला भारत में पहले से ही विद्यमान थी। इतिहासकारों के अनुसार मौर्यकाल में चुनार पत्थर की कला को काफी प्रोत्साहन मिला था और मौर्य दरबार द्वारा इसे पूर्णत: संरक्षण भी प्राप्त था। अशोक सम्राट ने प्रमुख राजपथों व मार्गों पर भी धर्म लेख आदि स्थापित करवाए थे। ऐसा करने के पीछे देश की प्रजा को धार्मिक आचरण से अवगत कराने का उद्देश्य था। बता दें कि अशोक संसार के उन सम्राटों में से एक थे जिन्होंने धर्म-विजय के द्वारा संपूर्ण देश और पड़ोसी देशों में अहिंसा, शांति, मानव कल्याण और आपसी प्रेम का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया।

सम्राट अशोक के समय में धार्मिक प्रचार से कला को काफ़ी बढ़ावा मिला था। अशोक ने धर्म प्रचार के लिए, नैतिक उपदेशों को प्रजा तक पहुँचाने के लिए धर्म लेखों का सहारा लिया था। इन धर्म लेखों को पर्वत शिखाओं, पत्थर के खंभों और गुफ़ाओं में अंकित किया जाता था। अशोक ने अपने धर्म लेखों के अंकन के लिए ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का उपयोग किया और पूरे देश में बड़े स्तर पर लेखनकला का प्रचार-प्रसार हुआ।

धार्मिक स्थापत्य और मूर्तिकला का अभूतपूर्व विकास भी अशोक के राज में ही हुआ। परंपरा के अनुसार सम्राट अशोक ने अपने तीन वर्ष के अंतर्गत लगभग 84,000 स्तूपों का निर्माण करवाया। सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में लगभग 30 स्तम्भों का निर्माण करवाया जो भारत के अलग-अलग हिस्सों में आज भी मौजूद हैं। इनमें वैशाली, प्रयागराज, दिल्ली, चेन्नई, सारनाथ और लुम्बिनी जैसे स्थान शामिल हैं।

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