Thursday, August 5, 2021
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मोगा हत्याकांड: RSS के 25 स्वयंसेवकों ने बलिदान देकर खालिस्तानी आतंकियों की तोड़ी थी ‘कमर’

"कौन कहंदा हिन्दू-सिख वक्ख ने, ए भारत माँ दी सज्जी-खब्बी अक्ख ने" - RSS के 25 स्वयंसेवक बलिदानी हो गए लेकिन अगले ही दिन इस गीत ने खालिस्तानी आतंकियों और उनके मनसूबों की 'कब्र' खोद दी।

खालिस्तानी और जिहादी आतंकवाद हो या नक्सलवाद या फिर दुश्मन देशों की गुप्तचर एजेंसियाँ… आखिर इनमें साझा क्या है? उत्तर है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। संघ इनका स्वभाविक और साझा दुश्मन है। देश में जब भी, जहाँ भी और किसी भी तरह की राष्ट्रविरोधी गतिविधि होती है, तो संघ स्वत: इनके सामने आ खड़ा होता है।

पंजाब में डेढ़ दशक तक चले आतंकवाद के दौर में भी संघ ने आतंकवाद को इस तरह नाकों चने चबवाए कि खाकी निक्कर डालने वाला हर व्यक्ति पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाले आतंकवादियों का दुश्मन नम्बर वन बन गया और इसी का परिणाम निकला मोगा में 25 जून, 1989 को संघ की शाखा पर हुआ आतंकी हमला, जिसमें 25 स्वयंसेवकों ने अपना जीवन बलिदान कर देश की एकता-अखण्डता को सम्बल प्रदान किया।

इस घटना के बारे में शहीद स्मारक से जुड़े पदाधिकारी डॉ राजेश पुरी बताते हैं कि आतंकवादियों ने संघ का ध्वज उतारने के लिए कहा था, पर स्वयंसेवकों ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया और उनको रोकने का यत्न किया था, पर किसी की बात न सुनते हुए आतंकवादियों ने अन्धाधुन्ध फायरिंग करनी शुरू कर दी थी, जिसमें 25 कीमती जानें गईं थीं। इस घटना ने न केवल पंजाब में हिन्दू-सिख एकता को नवजीवन दिया बल्कि आतंकवाद पर भी गहरी चोट की क्योंकि घटना के अगले ही दिन उस जगह दोबारा शाखा लगी, जिससे आतंकियों के हौसले पस्त हो गए और हिन्दू-सिख एकता जीत गई।

25 जून, 1989 को (अब के शहीदी पार्क) रोजाना की ही तरह भारी तदाद में शहर निवासी सैर के लिए आए थे। रोजाना की तरह उस दिन भी जहाँ नागरिक पार्क में सैर का आनन्द ले रहे थे, वहीं दूसरी तरफ शाखा भी लगी हुई थी। इस दिन शहर की सभी शाखाएँ नेहरू पार्क में एक जगह पर लगी थीं और संघ का एकत्रीकरण था। सुबह 6 बजे संघ का विचार शुरू हुआ तो अचानक 6.25 पर सभा को सम्बोधित कर रहे स्वयंसेवकों पर आतंकवादियों ने आकर हमला कर दिया, हर तरफ भगदड़ मच गई। गोलियों की बरसात रुकने के बाद हर तरफ खून का तालाब दिखाई दे रहा था। घायल स्वयंसेवक तड़प रहे थे। गोलियाँ लगने के कारण कई सेवकों के शरीर भी बेजान हो गए और कईयों ने अस्पताल में जाकर अन्तिम सांस ली।

इस गोली कांड के दौरान जहाँ 25 लोग बलिदान हो गए, वहीं शाखा में शामिल लोगों के साथ आसपास के करीब 31 लोग घायल भी हो गए थे। इस गोली कांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था लेकिन फिर भी आरएसएस सेवकों ने हिम्मत नहीं छोड़ी और अगले ही दिन 26 जून, 1989 को फिर से शाखा लगाई। बाद में नेहरू पार्क का नाम बदल कर शहीदी पार्क कर दिया गया, जो आज देशभक्तों के लिए तीर्थस्थान बना हुआ है।

अमर बलिदानी

इस गोली कांड में बलिदानी होने वालों में लेखराज धवन, बाबू राम, भगवान दास, शिव दयाल, मदन गोयल, मदन मोहन, भगवान सिंह, गजानन्द, अमन कुमार, ओमप्रकाश, सतीश कुमार, केसो राम, प्रभजोत सिंह, नीरज, मुनीश चौहान, जगदीश भगत, वेद प्रकाश पुरी, ओमप्रकाश और छिन्दर कौर (पति-पत्नी), डिंपल, भगवान दास, पण्डित दुर्गा दत्त, प्रह्लाद राय, जगतार राय सिंह, कुलवन्त सिंह शामिल हैं।

खालिस्तानी आतंक की गोली से बलिदान हुए वीर

गोली काण्ड में प्रेम भूषण, राम लाल आहूजा, राम प्रकाश कांसल, बलवीर कोहली, राज कुमार, संजीव सिंगल, दीनानाथ, हंसराज, गुरबख्श राय गोयल, डॉ. विजय सिंगल, अमृत लाल बांसल, कृष्ण देव अग्रवाल, अजय गुप्ता, विनोद धमीजा, भजन सिंह, विद्या भूषण नागेश्वर राव, पवन गर्ग, गगन बेरी, रामप्रकाश, सतपाल सिंह कालड़ा, करमचन्द और कुछ अन्य स्वयंसेवक घायल हुए थे।

निहत्थे दंपति ने आतंकियों को ललकारा

गोलीकाण्ड के बाद छोटे गेट से भाग रहे आतंकवादियों को वहाँ मौजूद एक साहसी पति-पत्नी ओम प्रकाश और छिन्दर कौर ने बड़े जोश से ललकारा और पकड़ने की कोशिश की लेकिन एके-47 से हुई गोलीबारी ने उनको भी मौत की नीन्द सुला दिया। साथ ही आतंकवादियों को पकड़ते समय पास के घरों के पास खेल रहे 2-3 बच्चों में से डेढ़ साल की डिम्पल को भी मौत ने अपनी तरफ खींच लिया।

मौत के सामने डटे स्वयंसेवक

जब सभा हो रही थी तो अचानक पिछले गेट से भाग-दौड़ की आवाज सुनाई दी। पता चला कि वहाँ से आतंकी अन्दर घुस आए हैं बावजूद इसके कोई भागा नहीं और उनका डटकर सामना किया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आतंकवादियों ने आते ही सभा में स्वयंसेवकों से ध्वज उतारने के लिए कहा लेकिन स्वयंसेवकों से साफ मना कर दिया। इस पर आतंकवादियों ने अंधाधुंध फायरिंग करनी शुरू कर दी।

10 साल की उम्र में गोलीकांड आँखों से देखने वाले एक नौजवान नितिन जैन ने बताया कि उनका घर शहीदी पार्क के बिल्कुल सामने था। रविवार का दिन होने के कारण वह सुबह पार्क में चला गया। जैसे ही आतंकवादियों ने धावा बोलकर गोलियाँ चलानी शुरू कीं, वह धरती पर लेट गया और जब आतंकवादी भाग रहे थे तो सभी ने उनको पकड़ने की कोशिश की। नितिन भी इसको खेल समझ कर भागने लगा, तो एक व्यक्ति ने उसको पकड़ कर घर भेजा।

दंगा चाहने वाले भी हुए निराश

ये दिन वे थे, जब दिल्ली सहित देश के सिख विरोधी दंगों की आग में अभी तपिश जारी थी। आतंकियों ने तो संघ पर हमला कर हिन्दू-सिख एकता में दरार डालने का प्रयास किया ही, साथ में कुछ दंगा सन्तोषियों ने भी कहना शुरू कर दिया कि सिखों ने अब लगाया है शेर की पूँछ को हाथ। संघ ने न तो देश में सांप्रदायिक माहौल खराब होने दिया और न ही शहर में। अगले ही दिन शाखा लगा कर आतंकियों व देशविरोधी ताकतों को संदेश दिया कि हिन्दू-सिख एकता को कोई तोड़ नहीं सकता और न ही सिख पंथ के नाम पर चलने वाला आतंकवाद पंजाबी एकता को तोड़ सकता है।

25 जून के अगले दिन संघ के स्वयंसेवक गीत गा रहे थे – कौन कहंदा हिन्दू-सिख वक्ख ने, ए भारत माँ दी सज्जी-खब्बी अक्ख ने’ अर्थात कौन कहता है कि हिंदू-सिख अलग-अलग हैं, ये तो भारत माता की बाईं और दाईं आँख के समान हैं। संघ के इस गीत को सुन कर आतंकियों ने भी माथा पीट लिया था।

अगली ही सुबह जब स्वयंसेवकों की ओर से शाखा का आयोजन किया गया तो उस दौरान बलिदानियों की याद को जीवित रखने के लिए शहीदी स्मारक बनाने का संकल्प लिया गया। इसी कार्य के अधीन मोगा पीड़ित मदद और स्मारक समिति का भी गठन हुआ।

मोगा बलिदानियों की याद में शहीदी पार्क

शहीदी स्मारक की नींव का पत्थर 9 जुलाई को माननीय भाऊराव देवरस द्वारा रखा गया। इस स्मारक का उद्घाटन 24 जून, 1990 को रज्जू भैया द्वारा किया गया। आज भी हर साल बलिदानियों की याद में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जाता है।

  • लेखक: राकेश सैन

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