Tuesday, August 16, 2022
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जहाँ महादेव ने कालकूट हलाहल पिया, उस कालिंजर को गजनवी और ऐबक भी नहीं जीत पाए: जानिए बीरबल के जागीर इस रहस्यमयी किले के बारे में

सामरिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कालिंजर का दुर्ग 16वीं सदी तक अपराजेय रहा। इस दौरान महमूद गजनवी, कुतुबद्दीन ऐबक, हूमायूँ, शेर शाह सूरी जैसे कितनों ने इस पर आक्रमण कर अपने अधीन करने की कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे।

भारत में एक से बढ़कर एक कालातीत विरासत एवं धरोहर हैं, जिनको लेकर रहस्य आज भी बरकरार है। ये धरोहर सनातन धर्मांवलंबियों के प्रमुख केंद्र भी हैं। आज हम इस श्रृंखला में बात करेंगे बुंदेलखंड के कालिंजर दुर्ग (Kalinjar Fort) की। कालिंजर का अर्थ होता है, काल का क्षय। यानी जहाँ समय का पहिया ठहर जाए। कालिंजर वही जगह है, जहाँ आध्यात्म और इतिहास का पहिया ठहर जाता है।

उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में विंध्य पर्वतमाला पर 800 फीट की ऊँचाई पर स्थित कालिंजर किले को कालजयी कहा जाता है। कहा जाता है कि यह किला हर युग में विद्यमान रहा। सतयुग में यह कीर्ति नगर, त्रेतायुग में मध्यगढ़, द्वापर में सिंहलगढ़ और कलियुग में कालिंजर के नाम से प्रख्यात रहा।

भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले कालकूट विष को यहीं पिया

कालिंजर का उल्लेख वेदों, पुराणों, उपनिषदों और तमाम प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। पद्म पुराण में इस क्षेत्र को नवखल कहा गया है और इसे विश्व का सबसे प्राचीन स्थल बताया गया है। वहीं, मत्स्य पुराण में इसे अवंतिका एवं अमरकंटक के साथ अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है। जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म के जातक कथाओं में इसे कालगिरी नाम से जाना गया है।

कहा जाता है कि सृष्टि के आरंभिक काल में जब समुद्र मंथन हुआ तो उससे 14 रत्न निकले। उन रत्नों में कालकूट नाम का एक विष भी था। इस घातक विष को ना ही देवता और ना ही दानव पीने को तैयार थे। अंत में भगवान शिव इस विषपान के लिए तैयार हुए।

भगवान शिव ने यहीं पर कालकूट का पान कर इसे कंठ में धारण किया था। जब विष की तीव्रता शांत हुई तो वे कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करने लगे, लेकिन इसके प्रभाव के कारण वे असहज महसूस करने लगे। फिर भगवान शिव यहीं कालिंजर पर्वत पर ही रूक कर तपस्या करने लगे और उसके ज्वाला से मुक्ति पाई। यहाँ एक अति प्राचीन भगवान नीलकंठ का मंदिर भी है, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

त्रेता युग से लेकर कलियुग तक में है अस्तित्व

हिंदू महाकव्यों के अनुसार, सतयुग में कालिंजर चेदि नरेश राजा उपरिचरि बसु के अधीन रहा, जिसकी राजधानी सूक्तिमति थी। त्रेता युग में यह कौशल कोसल नरेश श्री रामचंद्र के अधीन था। द्वापर युग में यह चेदि वंश के राजा शिशुपाल के अधीन रहा। उसके बाद यह राजा विराट के अधिकार में आ गया।

कलियुग में कालिंजर के किले पर अधिकार का सर्वप्रथम उल्लेख हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र महाराजा भरत का मिलता है। इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार, चक्रवर्ती सम्राट भरत ने चार महत्वपूर्ण किले बनवाए थे, जिनमें कालिंजर का किला भी था और यह सर्वाधिक महत्व का था।

कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि इस किले का निर्माण नागों ने कराया था। कालिंजर का किला गुप्तकालीन जेजाकभुक्ति क्षत्रियवंश के महाराजा जयशक्ति चंदेल के अधीन था। यह 14वीं सदी के मध्य तक चंदेल क्षत्रियों के अधीन रहा, उसके बाद यह सोलंकी क्षत्रियों के हाथों में आ गया।

भगवान गौतम बुद्ध के समय यानी 563-480 ईसा पूर्व यहाँ चेदि वंश का शासन था। इसके बाद यह क्षेत्र मौर्य साम्राज्य के अधिकार में आ गया। मशहूर चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी 7वीं शताब्दी में अपने दस्तावेज़ों में कालिंजर और खजुराहो का जिक्र किया है। इसके ऐतिहासिक साक्ष्य गुप्त काल से मिलने शुरू होते हैं। पुरातत्ववेताओं को वहाँ से गुप्त काल के कुछ शिलालेख मिले हैं।

गजनवी से लेकर पेशवा तक का आक्रमण, शेरशाह की मौत का बना कारण

सामरिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कालिंजर का दुर्ग 16वीं सदी तक अपराजेय रहा। इस दौरान महमूद गजनवी, कुतुबद्दीन ऐबक, हूमायूँ, शेर शाह सूरी, बाजीराव पेशवा जैसे कितनों ने इस पर आक्रमण कर अपने अधीन करने की कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे।

कालिंजर को जीतना अपना शौर्य सिद्ध करने की एक कसौटी भी थी। इसकी दीवारें पाँच मीटर मोटी थीं। दुर्ग की ऊँचाई ही 108 फुट थी। ख़ास बात यह कि जिस पहाड़ी पर इसे बनाया गया है, उसके चारों तरफ खड़ी ढलान है। इसी वजह से दुर्ग पर तोप से हमला करना भी बेहद मुश्किल था।

इसके महत्व को समझते हुए शेरशाह सूरी कालिंजर किले को किसी भी हाल में हथियाना चाहता था। एक महीने की लगातार घेराबंदी के बावजूद वह किले को जीत नहीं पाया तो उसने इसके दीवारों को तोप से उड़ाने का आदेश दिया। कहा जाता है कि तोप का एक गोला कालिंजर के दीवार से टकराकर वापस आकर शेरशाह को लगा और वह बुरी तरह जख्मी हो गया। इस जख्म के कारण बाद में उसकी मौत हो गई।

हालाँकि, बाद में मुगल आक्रांता अकबर ने 1569 ई. में इस किले को जीत लिया। इसके बाद उसने किले को अपने प्रमुख दरबारी और नवरत्न बीरबल को जागीर के रूप में दिया। आगे चलकर यह किला फिर से क्षत्रिय राजा छत्रसाल के अधीन आ गया।

अकबर का नवरत्न बीरबल पूरी जिंदगी इसी किले में रहा

अकबर के नवरत्नों में सबसे प्रमुख था बीरबल। वह अकबर का प्रधान सेनापति और प्रधान राजनीतिक सलाहकार भी था। बीरबल ने इसी कालिंजर के राजा के प्रमुख पुरोहित की बेटी से शादी की थी और बाद में उसने कालिंजर को जीतने में अकबर की मदद की थी। जिस कालिंजर को आजतक कोई जीत नहीं पाया था, वह बीरबल का जागीर बन गया था।

बीरबल के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम जानकारियाँ मिलती हैं। सबसे पहले हमने जानने की कोशिश है कि बीरबल कौन था, जिसकी रण-कौशल और सूझबूझ से अकबर इस किले को जीतने में समर्थ हो पाया। बीरबल को बेहद बुद्धिमान मुगल दरबारी माना जाता है। कहा जाता है कि अकबर आँख मूँद कर बीरबल पर भरोसा करता था। वह बीरबल की बातों को प्रायः कम ही काटता था।

बीरबल दरबार में अकबर के बराबर और ठीक बगल में बैठता था। मुगल सल्तनत में कोई राजनीतिक या रणनीतिक कदम बीरबल के सलाह के बिना अकबर नहीं लेता था। बीरबल पहला व्यक्ति और हिंदू था जिसने अकबर के शुरू किए दीन-ए-इलाही धर्म को अपनाया था। यही कारण था कि अकबर के चार प्रमुख मुस्लिम दरबारी बीरबल से मन ही मन द्वेष भी रखते थे, लेकिन चाह कर भी कुछ कह नहीं पाते थे।

बीरबल का असली नाम महेश दास था। कुछ विद्वान उनका जन्म यूपी के कानपुर में तो कुछ मध्य प्रदेश के सीधी में बताते हैं। हालाँकि, अधिकांश विद्वान सीधी के घोघरा गाँव को ही उसका जन्मस्थान मानते हैं। महेश दास के परिवार को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान उन्हें भट्ट तो कुछ उन्हें कान्यकुब्ज ब्राह्मण बताते हैं। हालाँकि, इस बात पर सभी एकमत हैं कि वह ब्राह्मण ही था।

महेश दास बचपन से से चतुर और होनहार था। उसे कविता का बेहद शौक था। पिता गंगा दास की मृत्यु के बाद वह आमेर के राजा भगवान दास के दरबार में ब्रह्म कवि के नाम से दरबारी हो गया। कहा जाता है कि राजस्थान में उसे पहली बार संगरमर के बारे में पता चला और उसने अकबर को चिट्ठी लिखकर इसके बारे में बताया था। वह रीवा के राजा रामचंद्र का भी दरबारी रहा और वहाँ से वह तानसेन के माध्यम से 1556 ईस्वी या इससे थोड़ा बाद में (तिथि स्पष्ट नहीं है) अकबर के दरबार में चला गया।

‘स्टोरीज ऑफ राजा बीरबल’ में कुलीख राम लिखे हैं कि महेश दास से खुश होकर अकबर ने उसे वीर वर नाम दिया, जो आगे चलकर बीरबल हो गया। समय के साथ और अकबर से विश्वासभाजन की वजह से उसे राजा सहित कई उपाधियाँ मिलीं।

पी.पी. सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘राजा बीरबल: लाइफ एंड टाइम्स’ में लिखा है कि बीरबल अकेला ऐसा व्यक्ति था, जिसके लिए अकबर ने अपने महल में महल में बनवाया था। फतेहपुर सिकरी के महल में बीरबल के लिए अलग महल था और यहाँ तक इसके नौ दरवाजों में से एक बीरबल के नाम पर था।

अकबर लड़ाई में जाता था, वह अपने साथ बीरबल को रखता था। बिहार और गुजरात अभियान के दौरान भी बीरबल अकबर के साथ था। बीरबल ने 1584 ईस्वी में रीवा के उसी राजा रामचंद्र को अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया, जिसका वह कभी दरबारी कवि था। बीरबल ही था, जिसने अकबर को राजाओं से वैवाहिक संबंध स्थापित करने की सलाह दी था। इसके बाद पहली बार भारमल की बेटी से अकबर ने शादी की थी। उसकी यह नीति कारगर साबित हुई थी।

‘राजा बीरबल: लाइफ एंड टाइम्स’ के अनुसार, राजपूत-समर्थक नीति का पालन करने में अकबर को राजा बीरबल से अमूल्य सहायता प्राप्त हुई था। बीरबल ने अपना प्रारंभिक जीवन आमेर के राजा भगवान दास और रीवा के राजा रामचंद्र के दरबारों में बिताया था और वह राजपूतों के लक्षणों और आदतों के बारे में भली-भाँति परिचित था। इतिहासकारों के अनुसार, बीरबल ने देश के दर्जनों राजाओं पर विजय प्राप्त करने में अकबर की मदद की थी।

बीरबल मुगल अकबर को इरोटिक कहानियाँ और कविताएँ सुनाया करता था। इसे वह श्रृंगार रस कहता था। इसमें वह महिलाओं के अंग-प्रत्यंग और नख से लेकर शिख तक का वर्णन करता था। बाल-चाल-आँखे और खूबसूरती को वह उत्तेजक अंदाज में अकबर को सुनाया करता था। अकबर का नवरत्न दरबारी बदायूँनी बीरबल को गदई यानी तुच्छ और चापलूस कहता था। बदायूँनी के अनुसार, चापलूसी के दम पर उससे बाद में आया बीरबल अकबर का करीबी बन गया था।

बदायूँनी लिखता है कि बीरबल के खिलाफ दो आरोप लगे- एक वेश्यावृत्ति कराने का और दूसरा अपनी बेटी के साथ नाजायज संबंध रखने का। पहले मामले में जिन-जिन लोगों का नाम आया, अकबर ने सबको दंड दिया, लेकिन बीरबल को कुछ नहीं कहा। वहीं, दूसरे मामले में बीरबल ने कहा कि वह बेटी के साथ वैष्णव आश्रम गया था। कहा जाता है कि बीरबल का कोई बेटा नहीं था और उनकी सिर्फ एक बेटी थी कमला, जिसने शादी नहीं की थी।

बीरबल 1572-73 में काँगड़ा में मुगल अभियान में शामिल था। इस अभियान में मुगल सैनिकों ने प्रसिद्ध महामाई देवी मंदिर की छतरी को तीरों से बिंध दिया था। मुस्लिमों सैनिकों ने 200 गायों को मंदिर परिसर में लाकर मारा और मंदिर की दीवारों और दरवाजों पर खून से भरे जूते फेंक दिए थे। उसके बाद मंदिर को मस्जिद में बदल दिया गया। महामाई मंदिर को अपवित्र करने के लिए बदायूँनी ने सीधे तौर पर बीरबल को जिम्मेदार ठहराया था। इससे दुखी होकर बीरबल ने नगरकोट और कालिंजर की जागीर अकबर को लौटा दी थी।

बीरबल के गुजरात अभियान के दौरान भी जैन मूर्तियों को बर्बरता से तोड़ दिया गया। हालाँकि, अफगानिस्तान के युसुफजई अभियान में बीरबल की मौत हो गई। बीरबल की मौत पर अकबर बहुत उदास हुआ था। इतिहासकार बीरबल को चतुर रणनीतिकार, कूटनीतिज्ञ के साथ-साथ एक कुशल योद्धा मानते थे।

किले का स्थापत्य और बनावट

कई राजवंशों के अधिकार क्षेत्र में रहने के कारण कालिंजर दुर्ग में स्थापत्य कला की कई शैलियाँ दिखाई देती हैं। इसमें गुप्त शैली, प्रतिहार शैली, पंचायतन नागर शैली आदि प्रमुख हैं। कहा जाता है कि वास्तुकार ने इसका निर्माण अग्निपुराण, बृहद् संहिता तथा अन्य वास्तु ग्रन्थों के अनुसार किया था।

कालिंजर पहाड़ी की चोटी पर स्थित इस किले में अनेक स्मारक और मूर्तियाँ हैं। इसे मूर्तियों का खजाना कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यह किला चंदेल वंश के शासन काल की भव्य वास्तुकला का उदाहरण है। इस विशाल किले में भव्य महल और छतरियाँ हैं, जिन पर बारीक डिजाइन और नक्काशी की गई हैं।

दुर्ग में प्रवेश के लिए सात द्वार हैं और ये सभी एक-दूसरे से भिन्न शैलियों से अलंकृत हैं। किले की दीवारों पर कई कलाकृतियाँ हैं, जो कि अपने आप में अद्भुत हैं। किले के बीचों-बीच अजय पलका नाम का एक झील है। इसकी परिधि में कई प्राचीन मंदिर स्थित हैं। यहाँ ऐसे तीन मंदिर हैं, जिन्हें अंकगणितीय विधि से बनाया गया है।

मंदिर के ठीक पीछे की तरफ पहाड़ काटकर पानी का एक कुंड बनाया गया है। इसमें बने मोटे-मोटे स्तंभों और दीवारों पर प्रतिलिपियाँ लिखी हुई हैं। इस मंदिर के ऊपर पहाड़ है, जहाँ से पानी रिसता रहता है। बुंदेलखंड सूखे वाला इलाका है, लेकिन इस पहाड़ से सैकड़ों सालों से लगातार पानी रिस रहा है। इसके बारे में किसी को भी ठोस जानकारी नहीं है।

भगवान नीलकंठ का मंदिर

कालिंजर किले को भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। इसमें नीलकंठ महादेव का एक अनोखा मंदिर है, जिसे चंदेल शासक परमादित्य देव ने बनवाया था। मंदिर में 18 भुजा वाली विशालकाय प्रतिमा के अलावा नीले पत्थर का एक शिवलिंग है। शिवलिंग की खासियत यह है कि उससे पानी रिसता रहता है।

नीलकंठ मंदिर के ऊपर ही जल का एक प्राकृतिक स्रोत है, जो कभी सूखता नहीं है। इसी जल से मंदिर में मौजूद शिवलिंग का निरंतर प्राकृतिक तरीके से जलाभिषेक होते रहता है। यहीं पर काल भैरव की प्रतिमा के बगल में चट्टान काटकर एक जलाशय बनाया गया है। इसे ‌’स्वर्गारोहण जलाशय’ कहा जाता है। कहा जाता है कि इसी जलाशय में स्नान करने से कीर्तिवर्मन का कुष्ठ रोग खत्म हुआ था। ये जलाशय पहाड़ से पूरी तरह से ढँका हुआ है।

मंदिर जाने के रास्ते में पत्थरों पर भगवान शिव, काल भैरव, गणेश, हनुमान आदि की प्रतिमाएँ उकेरी गई हैं। इसके अलवा, यक्ष-यक्षिणी, योगिनी एवं विभिन्न मुद्राओं वाली नर्तकियों की भी प्रतिमाएँ यहाँ उकेरी गई हैं, जो अद्भुत हैं।

इसके अलावा यहाँ सीता सेज नाम का एक स्थान है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीराम माता सीता के साथ चित्रकूट आए थे, तब वे यहाँ भी आए थे। इस दौरान इसी जगह पर माता सीता ने विश्राम किया था। यहाँ पर ताल भी है, जिसमें कहा जाता है कि नहाने के बाद कोढ़ जैसा रोग दूर हो जाता है।

किले में पाताल गंगा, पांडव कुंड, बुढ्डा-बुढ्डी ताल, भगवान सेज, भैरव कुंड, मृगधार, कोटितीर्थ, चौबे महल, जुझौतिया बस्ती, मूर्ति संग्रहालय, रामकटोरा ताल, भरचाचर, राठौर महल, रनिवास, ठा. मतोला सिंह संग्रहालय, बेला ताल, सगरा बाँध प्रमुख है।

कुछ समय तक इस्लामी शासन के अधीन रहने के कारण किले में शाही मस्जिद, मजार ताल, शेरशाह सूरी का मक़बरा, वाऊचोप मकबरा, हुमायूँ की छावनी और बीरबल की छतरी भी मौजूद है। यहाँ आज भी कई दुर्लभ जड़ी-बुटियाँ पाई जाती हैं।

रहस्यमयी किला है कालिंजर

कहा जाता है कि कालिंजर के किले में कई रहस्यमयी गुफाएँ हैं। ये गुफाएँ किले से शुरू होती हैं, लेकिन कहाँ तक जाती हैं ये कोई नहीं जानता। इसके अलावा, किले में रात के वक्त घुँघरुओं की आवाज आने की बात भी कही जाती है।

लोग कहते हैं रात होते ही यहाँ एक अजीब तरह की वीरानगी छा जाती है और उस वीरानगी में भी एक हलचल महसूस होती है। यहाँ के एक महल से रात को घुंघरुओं की आवाजें सुनाई देती हैं। किवदंतियों के अनुसार, प्राचीन काल में राज दरबार में पद्मा नाम एक बेहद खूबसूरत नर्तकी रहती थी।

पद्मा भगवान शिव की अन्यन्य भक्त थी। कार्तिक पूर्णिमा की रात को वह भगवान शिव के लिए समर्पित होकर नृत्य करती थी। आज 1500 साल बाद भी उस नर्तकी के घुँघरुओं की आवाज किले में सुनाई देती है। इतिहासकार भी इस घटना को सच मानते हैं।

कुछ लोगों का यह भी मानना है इस किले में अकूत खजाना छिपा हुआ है। इसमें हीरे-जवाहरातों जैसे अमूल्य रत्न हैं। कहा जाता है कि इस किले पर अधिकार को लेकर जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ी गई हैं, वे खजाने को लेकर ही हुई हैं।

खैर कालिंजर को लेकर जो भी लोगों की मान्यता हो, लेकिन इतिहास में इस किले का अमूल्य स्थान है। आज भी यहाँ लाखों पर्यटक आते हैं और इतिहास का साक्षी बनने की कोशिश करते हैं। इसके साथ ही किले में स्थित मंदिर में भगवान नीलकंठ का दर्शन करने आने वाले लोगों की भी कमी नहीं है।

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सुधीर गहलोत
सुधीर गहलोत
पत्रकार और इतिहास प्रेमी

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