Sunday, September 27, 2020
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क्या गाँधी की हत्या को रोका जा सकता था? कौन से लूपहोल्स थे? क्यों हो गए थे अपने ही लोग लापरवाह?

गाँधी नहीं रहे पर आज भी उनका जीवन निष्कलंक तो नहीं कहा जा सकता, फिर भी अनुभूत सच का पक्षधर ज़रूर है। आज भी गाँधी जैसा व्यक्तित्व इस मुखौटा प्रधान छद्म समाज में शायद ही मिले। गाँधी सत्य की अनुभूति के लिए उसे प्रयोगों की कसौटी पर कसने की जो सीख दे गए हैं, वो आने वाली पीढ़ियों का सदैव मार्गदर्शन करती रहेंगी।

आज जब हम गाँधी जी की 150वीं जयंती मना रहे हैं तो याद आता है बापू आज़ाद हिंदुस्तान में केवल साढ़े पाँच महीने जीवित रह सके। हमने ऐसा क्या किया कि 125 साल तक ज़िंदा रहने कि इच्छा रखने वाले गाँधी अपने आखिरी दिनों में मौत की कामना करने लगे थे।

आज़ाद हिंदुस्तान में उन्होंने अपनी एक ही वर्षगाँठ देखी उस दिन प्रार्थना सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा, “मेरे लिए तो आज मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक ज़िंदा पड़ा हूँ। इस पर मुझको खुद आश्चर्य होता है। शर्म लगती है, मैं वही शख्स हूँ जिसकी जुबान से एक चीज निकलती तो करोड़ो मानते थे लेकिन आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। मैं कहूँ कि तुम ऐसा करो, ‘नहीं, ऐसा नहीं करेंगे’ ऐसा कहते हैं। ऐसी हालत में हिन्दुस्तान में मेरे लिए जगह कहाँ है और मैं उसमें ज़िंदा रह कर क्या करूँगा?…..”

आखिर क्यों? कहना पड़ा गाँधी को यह सब अपनी हत्या से ठीक पहले की वर्षगाँठ पर? क्या गाँधी की हत्या को रोका जा सकता था? कौन से थे वे लूप होल्स जहाँ लगा कि कुछ लोग हैं जिनके लिए अब गाँधी का नाम ही काफी है, गाँधी नहीं? चलिए थोड़ा पीछे ले चलता हूँ।

शुक्रवार 30 जनवरी 1948 की शुरुआत गाँधी जी के जीवन में एक आम दिन की तरह ही हुई। हालाँकि माहौल इतना शान्तिपूर्ण नहीं था, गाँधी जी को भी पता था उनकी वज़ह से उनके अपने ही देश में कुछ लोग नाराज़ हैं। वज़ह गाँधी जी की यह ज़िद कि पाकिस्तान को उसके हिस्से का 55 करोड़ रुपए मिलना चाहिए। बेशक़, वह उससे भारत के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए हथियारों की ख़रीद में ही क्यों न इस्तेमाल करे। पाकिस्तान को उसका हक़ दिलाने के लिए कई दिनों तक गाँधी जी ने अनशन भी किया था। गाँधी जी, शरीर जर्ज़र होने के बावज़ूद भी उस दिन हमेशा की तरह तड़के साढ़े तीन बजे सोकर उठ गए थे। प्रार्थना की, उसके बाद दो घंटे अपनी डेस्क पर कॉन्ग्रेस की नई जिम्मेदारियों के मसौदे पर काम किया और इससे पहले कि दूसरे लोग उठ पाते, छह बजे फिर सोने चले गए।

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कौन जानता था कि आज शाम गाँधी जी हमेशा के लिए आँखें मूँद लेंगे। एक ऐसी चिरकालीन निद्रा में चले जाएँगे, जहाँ से शायद फिर कभी वापसी न हो।

नोआखाली के दंगों के बाद से ही गाँधी जी की जान को ख़तरा बढ़ गया था। जग़ह-जग़ह उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी हो रही थी। फिर भी, गाँधी जी उसे नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी धुन में जिए जा रहे थे। लेकिन उनके आस-पास के लोग जो सत्ता में थे, वो उनपर बढ़ते खतरे को देखते हुए भी क्यों इतने लापरवाह हो गए थे, ये सवाल आज भी है? क्यों गाँधी जी कॉन्ग्रेस को भंग कर देना चाहते थे? क्यों ख़ुद को खोटा सिक्का कहने लगे थे? क्यों अपने ही देश में उपेक्षित महसूस कर रहे थे?

तनाव के उस दौर में, उनका ज़्यादातर समय नेहरू और पटेल के मतभेद सुलझाने में जा रहा था। पटेल ने सत्ता से दूर हटने के संकेत दे दिए थे? शायद नेहरू मंजूरी भी दे देते लेकिन गाँधी जानते थे कि पटेल देश की ज़रूरत हैं। सच्चाई ये भी है कि नेहरू, गाँधी के उनके प्रति मोह की वज़ह से ही सत्ता के केंद्र बने हुए थे। तनातनी के माहौल में गाँधी का ख़ुद को उपेक्षित महसूस करना अनायास नहीं था, बल्कि माहौल ही ऐसा था।

शायद आज की नई पीढ़ी उस समय के घटनाक्रमों से वाकिफ़ न हो! पिछले कई दिनों से जब मैं उस समय की परिस्थितियों पर गौर कर रहा था, तो बार-बार कुछ बातें दिमाग में हलचल पैदा करती रहीं कि कैसे थोड़ी सी लापरवाही, थोड़ी सजगता की कमी और थोड़ी सी ज़िद ने इतिहास के घटनाक्रमों का रुख मोड़कर, उस दौर में देश, तमाम विरोधाभाषी विचारों और व्यक्तित्वों के टकराव का केंद्र बन चुका था।

कहते हैं “इतिहास गौरव से ज़्यादा विश्लेषण का विषय वस्तु है” जिससे सबक लेकर आने वाली पीढ़ियाँ उन गलतियों के दोहराव से बच सकती हैं। चलिए आपको जनवरी 1948 के कुछ तारीख़ों से परिचय कराते हैं कि कैसे षड्यंत्रों के बीज बोए गए, कहाँ सुरक्षा में चूक हुई, कि तमाम आहटों और स्पष्ट जानकारियों के बावजूद भी हमने गाँधी को खो दिया।

20 जनवरी 1948, की सुबह साफ़ और चमकदार थी। फ़िज़ा में अनशन के बाद गाँधी जी के स्वास्थ्य में सुधार की ख़बर थी। सुबह के 8.30 बजे गाँधी जी हत्या कर देने के इरादे से चार षडयंत्रकारी आप्टे, करकरे, बागड़े और किस्तैया बिड़ला निवास के लिए निकले। गोपाल गोडसे इस योजना का हिस्सा था, लेकिन किसी कारण से नाथूराम गोडसे ने षड्यंत्र की प्रारंभिक योजना में भाग नहीं लिया था। 20 जनवरी को गाँधी को पीछे से हथगोला फेंक कर मार देने की योजना थी। उनके हथियारों में पाँच हथगोले और दो पिस्तौल थी लेकिन पिस्तौल सही हालत में न थी।

उस दिन प्रार्थना सभा में ऐन वक़्त पर प्लानिंग के हिसाब से कुछ भी नहीं हुआ। उस शाम एक षड्यंत्रकारी पाहवा के भगदड़ मचाने के लिए पलीते में आग लगाने के बाद भी प्रार्थना सभा में कोई भगदड़ नहीं मची। हालाँकि, उस समय बागड़े और किस्तैया गाँधी के पास ही ही खड़े थे, पर फिर भी किसी तरह के ख़ास हलचल न मचने की वज़ह से गाँधी को मार देने की योजना बुरी तरह विफ़ल हो गई थी। और षड्यंत्रकारी पाहवा पुलिस की हिरासत में था। विडम्बना कहें या लापरवाही? पूछताछ में पाहवा ने उस रात बाकी सभी षड्यंत्रकारियों के नाम बता दिए थे। फिर भी न गाँधी की सुरक्षा बढ़ाई गई, न बाकी के षड्यंत्रकारियों को पकड़ने की कोई योजना ही बनी। अगले दिन मदनलाल पाहवा के हिरासत में होने की ख़बर प्रमुखता से अख़बारों में छपी।

जब ये ख़बर बम्बई में डॉ. जैन ने पढ़ी तो वे तुरंत अधिकारियों से मिलने की सोचने लगे क्योंकि उनके पास बाकी षड्यंत्रकारियों के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी थी। हुआ यूँ था कि 13 जनवरी को जब पाहवा मुंबई में ही था और कोई भी षड्यंत्रकारी दिल्ली के लिए नहीं निकला था, तब पाहवा ने डॉ. जैन के माध्यम से समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से मिलने का समय माँगा था। लेकिन आखिरी वक़्त में एक दुर्घटना के कारण पाहवा की मुलाक़ात डॉ. जैन, जयप्रकाश नारायण से नहीं करा पाए।

प्रार्थना सभा में धमाके के अगले दिन, डॉ.जैन हड़बड़ी में एक से दूसरे सरकारी विभाग फोन कर रहे थे। सरदार पटेल भी उस दिन बम्बई में ही थे लेकिन वो भी व्यस्त थे। बम्बई कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष एस के पाटिल के बम्बई में मौजूद नहीं होने से उनसे मिलना सम्भव नहीं था। अंततः बी जी खेर से जैन की मुलाक़ात हुई और डॉ. जैन ने उन्हें पाहवा और विष्णु करकरे के नाम के बारे में बताया। पाहवा ने इस षड्यंत्र के बारे में खुद ही जैन को बताया था। उसने सावरकर का आशीर्वाद होने की बात भी कही थी। जब डॉ. जैन ये कहानी सुना रहे थे, तब उनको भी अंदेशा था कि उनकी बात पर कोई भरोसा नहीं करेगा क्योंकि ये आम धारणा है कि कोई साज़िश कर्ता अपने षड्यंत्रों के बारे में किसी को क्यों बताएगा और यही हुआ भी। हालाँकि, डॉ. जैन के अति प्रतिष्ठित होने की वजह से उन पर भी किसी ने शक नहीं किया।

महात्मा गाँधी , नेहरू और पटेल

बी जी खेर ने डॉ. जैन पर भरोसा जताते हुए उन्हें मोरारजी देसाई से मिलाया। उस समय मोरारजी बम्बई सरकार के गृहमंत्री थे इसलिए पुलिस और अपराधों की छानबीन की जिम्मेदारी उनकी थी। पर जो कहानी डॉ. जैन ने मोरारजी को सुनाई थी, वह इतनी अनपेक्षित थी कि मोरारजी उस पर यकीन ही नहीं कर पाए। उन्होंने सोचा कि भला मदनलाल पाहवा भाषा के एक प्राध्यापक को अपने षड्यंत्र के बारे में क्यों बताएगा, जो कि उसे संयोग से बम्बई की व्यस्त गलियों में मिल गए थे? दूसरी बात, डॉ. जैन ये बात उन्हें बताने के लिए इतने उतावले क्यों थे? हालाँकि डॉ. जैन ने उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश की थी, जो उनसे पूछे गए थे। लेकिन इसके बावजूद मोरारजी उनसे सन्तुष्ट नहीं हुए। और उन्होंने ख़ुश्क और अशिष्ट स्वर में डॉ. जैन से पूछा कि फिर तो आपको भी उन षड्यंत्रकारियों में से एक होना चाहिए। एक क्षण को वो हिल गए पर संभलते हुए उन्होंने एक और कोशिश की कि उन्हें दिल्ली भेजा जाए, हो सकता है कि पाहवा उन्हें अपनी योजना के बारे में बता दे। मोरारजी ने ये सुझाव भी एक तरफ सरका दिया और कोई ध्यान नहीं दिया।

यहाँ लगता है कि किस तरह किसी घटना को ठीक से समझ न पाने के कारण हम भारी अनिष्ट को निमंत्रण दे देते हैं। उस समय भी अँग्रेज सरकार में 11 साल मजिस्ट्रेट रह चुके मोरारजी देसाई से एक भारी भूल हुई थी।

फिर भी मोरारजी उसी दिन अहमदाबाद जाते हुए बम्बई के उपायुक्त जे डी नागरवाला को इस षड्यंत्र के बारे में ब्रीफ करते हुए, सावरकर के घर पर नज़र रखने को बोल गए। अगले कुछ दिनों तक डॉ. जैन परेशान रहे कि इतनी महत्वपूर्ण सूचना को नज़र अंदाज़ किया जा रहा है। षड्यंत्रकारियों को पकड़ने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। हालाँकि, 20 जनवरी को गाँधी से महज़ 70 फ़ीट की दूरी पर भगदड़ के लिए पाहवा द्वारा आग लगाए गए बम फटने से सरदार पटेल ने बिड़ला हाउस में पुलिस बल बढ़ा ज़रूर दिया था पर डॉ. जैन को पुलिस पर भरोसा नहीं था।

पता नहीं क्यों षड्यंत्रकारियों को पकड़ने की चिंता न पटेल को थी, न मोरारजी को और न पुलिस को। क्या ऐसा नासमझी की वज़ह से हो रहा था। या लोग मन ही मन गाँधी से छुटकारा चाहने लगे थे? जीवित गाँधी अब उनके काम के नहीं थे। पता नहीं क्या रहा होगा उस समय के सत्ताधीशों के मन में, जिसका अब सिर्फ़ अनुमान ही किया जा सकता है।

इस पर पड़ी धुंध थोड़ी तब छटती है, जब इस घटना के 20 वर्ष बाद गाँधी से जुड़ी कुछ अनसुलझी बातों का पता लगाने के लिए जस्टिस कपूर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन हुआ। समिति की रिपोर्ट से पता चला कि पुलिस महकमे ने आलस्य और ढिलाई का परिचय देते हुए इस मामले की तफ़्तीश का कोई लिखित विवरण भी नहीं रखा था। शायद कोई तफ़्तीश हुई ही न हो। गाँधी की हत्या के षड्यंत्र के मामले में उच्च पदस्थ लोग इतने उदासीन हो चुके थे कि जैसे उन्हें गाँधी से कोई मतलब ही न हो। ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता का सुख भोगने के लिए, सब इस षड्यंत्र को अपने हिसाब से पूरा हो जाने देना ही चाहते थे। शीघ्र ही, एक ऐसी हत्या इतिहास में दर्ज़ हो जाने वाली थी, जिस पर उच्च सरकारी अधिकारियों के साथ पुलिस की भी मौन सहमति थी।

20 जनवरी की असफलता के बाद बागड़े और किस्तैया ने पूना तथा नाथूराम गोडसे और आप्टे ने बम्बई की ट्रेन पकड़ी। गोपाल गोडसे और करकरे ने फ्रंटियर होटल में रात गुज़ारी। इस असफलता से वे सभी निराश नहीं हुए थे बल्कि चारों तरफ़ फैली सुस्ती से अब गाँधी की हत्या के लिए पहले से कहीं अधिक दृढ़ थे।

महात्मा गाँधी और नाथूराम गोडसे

जल्द ही, पुनः योजना बनी पर हमेशा की तरह इस बार भी समस्या पिस्तौल की थी। क्योंकि गोपाल गोडसे द्वारा ठीक की गई बंदूकों का कोई भरोसा नहीं था। एक बार फिर पुरानी फिल्म जैसे चल पड़ी थी।

26 जनवरी 1948 की रात को थाने स्टेशन पर नाथूराम, आप्टे और करकरे मिले, जहाँ गोडसे ने पाहवा द्वारा उनके नाम उजागर कर देने की बात भी कही। उसके विचार में अब 9-10 के ग्रुप में चलने की मूल योजना ग़लत थी। अतः गोडसे अब बार-बार कहने लगा कि गाँधी की हत्या वही करेगा। लेकिन उसे किसी की मदद की भी ज़रूरत है। शायद इतने बड़े महामानव का सामना करने के लिए, नैतिक बल चाहता हो। यहीं पर, नाथूराम गोडसे ने इस योजना से अपने भाई गोपाल गोडसे को भी बाहर रखने का निर्णय लिया। इस प्रकार अब यही तीनों हत्या की योजना में शामिल थे।

योजना के अनुसार, नाथूराम और आप्टे हवाई जहाज़ से और करकरे को रेल से दिल्ली पहुँचकर 29 जनवरी को बिड़ला मंदिर में मिलना था।

नारायण आप्टे, नाथूराम गोडसे, मदन लाल पाहवा, विष्णु करकरे

षड्यंत्रकारियों ने अपने आप को छिपाने का कोई प्रयत्न नहीं किया था। हमेशा की तरह नाथूराम गोडसे अनगिनत लोगों से अपनी योजना की चर्चा कर रहा था। यहाँ तक कि बम्बई से दिल्ली की हवाई यात्रा के लिए उसने अपना नाम एन विनायकराव लिखवाया, उसका पूरा नाम था नाथूराम विनायक गोडसे। इसी प्रकार आप्टे ने डी नारायण के नाम से यात्रा की, उसका पूरा नाम था नारायण दत्तात्रेय आप्टे। कोई भी बुद्धिमान जासूस या अधिकारी उन्हें हवाई जहाज़ में ही आराम से पकड़ सकता था। पर पता नहीं क्यों, उस समय के महकमे को इसकी भनक नहीं लगी या पूरा महक़मा जान बूझकर मौन साधे रहा। ये भी इतिहास के गर्भ में छिपी सच्चाई ही है।

27 जनवरी को दिल्ली पहुँचकर, गोडसे और आप्टे दिल्ली-मद्रास एक्सप्रेस से रात 10.38 पर ग्वालियर पहुँचे। यहाँ से जगदीश प्रसाद गोयल से 500 रुपए में नई रिवॉल्वर और सात गोली ली। उसी रात रेल से ही वे दिल्ली वापस आ गए। रिवॉल्वर के लिए 400 किलोमीटर की यात्रा में भी किसी को भनक नहीं लगी। ये भी कमाल है। शायद ही कहीं कोई तफ़्तीश हुई या कार्यवाही की रूप रेखा बनी, जबकि घटना के विस्तार के साथ सूत्रों के स्रोत फैलते जा रहे थे।

यहाँ तक कि, दिल्ली आने पर विनायकराव के नाम से इस बार होटल न लेकर, रेलवे स्टेशन के सस्ते विश्राम गृह में रुकने का निर्णय लिया गया। हालाँकि उस दिन भी प्रार्थना सभा थी पर थके होने की वजह से हत्या की योजना अगले दिन के लिए टाल दी गई। शाम को, दिमाग की शांति के लिए करकरे और आप्टे सिनेमा देखने गए, गोडसे वहीं विश्राम गृह में ही एक क़िताब पढ़ता रहा।

30 जनवरी को गोडसे जल्दी तैयार हो गया था। जंगल में जाकर गोडसे ने रिवॉल्वर का परीक्षण भी किया। सुबह से ही वह किसी से ज़्यादा बात नहीं कर रहा था। दोपहर तक गोडसे ख़ुद में सिमट गया था।

शाम को 4.30 बजे गोडसे ने ताँगा लिया और अकेले ही बिड़ला हॉउस पहुँच कर प्रार्थना सभा की भीड़ में शामिल हो गया। कुछ देर बाद करकरे और आप्टे भी वहाँ पहुँचकर भीड़ में शामिल हो गए।

शाम 5.15 पर गाँधी जी आभा और मनुबेन के कन्धों पर हाथ रखे बिड़ला हाउस से प्रार्थना सभा के लिए आए। रोज़ उनका रास्ता साफ़ करने वाला गुरुवचन आज पीछे आ रहा रहा था क्योंकि पटेल से मुलाकात के कारण थोड़ी देर होने की वजह से गाँधी जी मैदान के बीच से तेजी से आ गए थे।

गाँधी जब प्रार्थना स्थल की सीढियाँ चढ़ रहे थे, तब गुरुवचन को देखकर मुस्करा रहे थे। सीढ़ियाँ चढ़कर कुछ ही कदम चले होंगे कि नाथूराम गोडसे भीड़ से निकलकर उनके सामने आ गया। उसने मनुबेन को इतनी जोर से धक्का दिया कि वह ज़मीन पर गिर पड़ी और गोडसे ने बिलकुल निकट से तीन गोलियाँ गाँधी पर दाग दीं। तभी दौड़ कर रॉयल इंडियन एयरफ़ोर्स का सार्जेंट देवराज सिंह ने एक हाथ से गोडसे की कलाई पीछे मोड़ते हुए दूसरे हाथ से उसके मुँह पर घूँसों की बरसात कर दी।

थोड़ी देर में वहां इकट्ठे कई लोग गोडसे को पीटने लगे। प्रार्थना स्थल पर अफरा-तफ़री मच गई। जब तक लोग कुछ समझ पाते, तब तक गाँधी जी दम तोड़ चुके थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार गाँधी जी अंतिम शब्द ‘हे राम’ नहीं थे। आघात इतना तेज़ और अचानक था कि उन्हें कुछ सोचने-समझने का अवसर ही नहीं मिला।

महात्मा गाँधी का अंतिम दर्शन

वहाँ डर, सिसकियों और उसे मार डालो की चीख़ के बीच लहूलुहान गोडसे को ले जाते हुए भी किसी ने नहीं देखा। दस मिनट तक भीड़ दुःख के आवेग में डूबी रही, लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि करना क्या है? जहाँ गाँधी गिरे थे, अब भी वहीं थे। उनका सर आभा और मनुबेन की गोद में था और उनकी चादर पर निरंतर खून फैलता जा रहा था। अंततः उन्हें बिड़ला हॉउस के भीतर ले जाया गया।

जहाँ गाँधी का शरीर धराशाई हुआ था, वहाँ लोगों के बार-बार आने-जाने से एक फ़ीट गड्ढा हो गया था। थोड़ी ही देर में पुलिस वाले छानबीन के लिए पहुँच चुके थे। घास से दो गोलियाँ तत्काल बरामद हुई थी, तीसरी उनके सीने में फँसी रह गई थी।

कुछ ही दिनों के भीतर सारे षड्यंत्रकारियों को गिरफ़्तार कर लिया गया था। बागड़े को अगले दिन, गोपाल गोडसे और परचुरे को चार दिन बाद व किस्तैया को 14 फ़रवरी को गिरफ़्तार कर लिया गया। 11 अप्रैल को जगदीश प्रसाद गोयल को भी गिरफ़्तार कर लिया गया पर कुछ कारणों से उस पर अन्य क़ैदियों के साथ मुक़दमा नहीं चलाया गया।

कभी-कभी सोचता हूँ, काश पुलिस थोड़ी पहले हरक़त में आई होती तो क्या आज हम जिस भारत में साँस ले रहे हैं, उसकी तस्वीर ऐसी ही होती! मालूम नहीं, गाँधी नहीं रहे पर आज भी उनका जीवन निष्कलंक तो नहीं कहा जा सकता फिर भी अनुभूत सच का पक्षधर ज़रूर है। आज भी गाँधी जैसा व्यक्तित्व इस मुखौटा प्रधान छद्म समाज में शायद ही मिले। गाँधी सत्य की अनुभूति के लिए उसे प्रयोगों की कसौटी पर कसने की जो सीख दे गए हैं, वो आने वाली पीढ़ियों का सदैव मार्गदर्शन करती रहेंगी।

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की स्मृति को ऑपइंडिया की तरफ़ से कोटिशः प्रणाम!

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रवि अग्रहरि
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