Friday, January 15, 2021
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वेलेंटाइन डे स्पेशल: ‘राजुला-मालूशाही’ की कहानी जो बन गया प्यार के लिए संन्यासी

बुलावे के न आने से निराश होकर राजुला ने अपने हाथ की हीरे की अंगूठी और एक पत्र मालूशाही को भेज दिया। पत्र में लिखा था, "क्योंकि मेरे पिता अब मुझे हूण देश ब्याह रहे हैं, तो मुझे लेने तुम तिब्बत के हूण देश ही आना।"

वेलेंटाइन डे आ चुका है। कहते हैं कि फ़िज़ाओं में प्रेम की महक फैल रही है। प्रेम तो ऐसा भाव है कि अपने अलग आयामों में बहुत कुछ समेट लेता है। यह कालातीत है, जीवत्व और जीवन के बंधनों से परे है। बहुत कम जीव हैं जिन्हें प्रेम की अनुभूति नहीं होती। हर समय, हर समाज, हर जगह प्रेम से जुड़ी ऐसी कहानियाँ मिलती हैं, जो अपनी पवित्रता और आत्मीयता से हमें आश्चर्यचकित कर देती हैं।

ऐसी ही एक ‘टाइमलेस कहानी’ आपके लिए देवभूमि उत्तराखंड के इतिहास से, जिसके प्रमुख पात्र हैं राजुला और मालूशाही। कहानियों के अनुसार, कुमाऊँ के पहले राजवंश कत्यूर से ताल्लुक रखने वाले मालूशाही शौका वंश की राजुला के प्रेम में राज-पाट छोड़ संन्यासी हो गए थे।

ये प्रेम कथा है 15वीं शताब्दी की जो उत्तराखंड में आज भी लोकगीतों, लोकनाटकों और लोकगाथाओं में देखी, सुनी, कही जाती है। कत्यूर राजवंश के राजकुमार मालूशाही और शौका वंश की सुंदरी राजुला ‘शौक्याणी’ की इस प्रेम कहानी के अलग-अलग संस्करण उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में खूब प्रचलित हैं।

कुमाऊँ के पहले कत्यूर राजवंश की ये कहानी अपनी प्रेमिका के लिए मालूशाही के राजा से जोगी बन जाने तक का सफर है। उस समय कत्‍यूरों की राजधानी बैराठ (वर्तमान चौखुटिया) थी। ‘रंगीले बैराठ’ में तब राजा दुलाशाह शासन करते थे। सम्पन्नता के बावज़ूद संतानविहीन होना दुलाशाह की एक बड़ी वेदना थी। किसी ने राजा को बताया कि वह बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करें, तो उन्‍हें अवश्य संतान प्राप्‍ति होगी।

भाग्यवश, सूर्य के उत्तरायण का पर्व था और इसी दिन पंचाचूली पर्वत शृंखला में स्थित क्षेत्र ‘मल्ला दारमा’ का सम्पन्न व्यापारी ‘सुनपति शौक’ अपनी पत्नी ‘गांगुली शौक्याण’ के साथ बागेश्वर के बागनाथ मंदिर में दर्शन करने गए थे। यहीं पर दुलाशाह की मुलाकात भोट (दारमा) के व्‍यापारी सुनपति शौक और उसकी पत्‍नी गांगुली से हुई, वह भी संतान की चाह में ही वहाँ आए थे।

दोनों पक्षों की व्यथा एक ही होने के कारण दोनों ने आपस में समझौता किया कि यदि संतानें लड़का और लड़की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगें। आशुतोष भगवान बागनाथ के आशीष से रंगीले बैराठ के राजा को पुत्र प्राप्ति हुई, उसका नाम ‘मालुशाही’ रखा गया। व्यापारी सुनपत शौक के घर में लड़की हुई, उसका नाम ‘राजुला’ रखा गया।

राजुला और मालू

समय बीतता गया, बैराठ में मालू जवान हो चुका था और भोट में राजुला का सौन्‍दर्य चर्चा का विषय था। बुराँस का पुष्प उसे देखकर खिलता और वसंत उसके केशों में झूमता था। राजुला का मुख कंचन की तरह दमकता, जिस दिशा से वो गुजरती, उसका लावण्‍य समय की गति रोक देता।

लेकिन भाग्य को कुछ और ही था मंजूर

मालू छोटा था जब एक ज्योतिषी ने राजा दुलाशाह को बताया कि यह अल्पायु होगा, ज्योतिषी ने कहा, “राजा! तेरा पुत्र बहुरंगी है, लेकिन इसका तो अल्प-मृत्यु का योग है, इसका निवारण करने के लिए जन्म के 5वें दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से कराना होगा।” राजा ने फ़ौरन अपने पुरोहित को शौक देश भेजा और उसकी कन्या राजुला से ब्याह करने की बात की, सुनपति शौक तैयार हो गए और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया। इसी बीच राजा दुलाशाह की मृत्यु हो गई जिस पर दरबारियों ने कहा कि जो लड़की मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, यदि वो इस राज्य में आएगी तो अनर्थ हो जाएगा। इसलिए मालूशाही से यह बात गुप्त रखी गई।

धीरे-धीरे दोनों जवान होने लगे, राजुला जब बड़ी हो गई तो सुनपति शौक ने सोचा राजुला को रंगीली वैराट में मालूशाही से ब्याहने का वचन राजा दुलाशाह को दिया था, लेकिन वहाँ से कोई खबर अब तक नहीं आई।

एक दिन राजुला ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, दिशाओं में कौन दिशा प्यारी? पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा? देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?” इस पर राजुला की माँ ने जवाब दिया, “दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंडी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीलो वैराट।”

इस पर राजुला ने अपनी माँ से अपना विवाह रंगीले वैराट प्रदेश में ही करने की इच्छा व्यक्त की। जनश्रुतियों के अनुसार राजुला ने कहा,
“मिकणी बिवाय बाबू, पाली पछाऊँ का देश।
पाली पछाऊँ का देश म, रंगेलो गेवाड़ा।
रंगीलो गेवाडा म, रंगीलो वेरठा।
मिकणी बिवाय बाबू, रंगेलो गेवाड़ा।”

इसी समय तिब्बत के हूण राजा विक्खीपाल ने हमला करने की धमकी देकर सुनपति शौक से राजुला से शादी करने का विचार रखा। वैराट में मालूशाही को स्वप्न में बचपन में हुए विवाह का स्मरण हुआ और राजुला को दिया हुआ विवाह का वचन उसे याद आया। यही सपना राजुला को भी हुआ और अब एक ओर मालूशाही का वचन था तो दूसरी ओर हूण राजा विक्खीपाल की धमकी। इस सब से व्यथित होकर राजुला ने निर्णय लिया कि वह स्वयं वैराट जाएगी और मालूशाही से मिलेगी। उसने अपनी माँ से वैराट का रास्ता पूछा, लेकिन उसकी माँ ने कहा कि अब राजुला को हूण देश ही जाना है, इसलिए वैराट और मालूशाही का विचार वो मन से निकाल दे।

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’

निराश होकर राजुला ने अपने हाथ की हीरे की अंगूठी और एक पत्र मालूशाही को भेज दिया। पत्र में लिखा था, “क्योंकि मेरे पिता अब मुझे हूण देश ब्याह रहे हैं, तो मुझे लेने तुम तिब्बत के हूण देश ही आना।”

…. इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

राजुला का पत्र पढ़कर मालूशाही शोक में डूब गया, राजुला के विवाह की ख़बर ने मानो उसे निर्जीव कर दिया। मालूशाही की आँखें सूख गई, उसका अन्न-जल त्याग हुआ, लेकिन वो जानता था कि यह समय विलाप का नहीं है।

मालूशाही ने व्यथित होकर अपना राजसी मुकुट, राजसी कपड़े नदी में बहा दिए और गुरु गोरखनाथ की शरण में पहुँच गया। वो जानता था की हूण देश के लोग तंत्र-विद्या के महारथी हैं और उनसे टकराव आसान न होगा। मालूशाही ने गोरखनाथ से निवेदन किया कि राजुला से मिलवाने में वो उसकी मदद करें। लेकिन गुरु गोरखनाथ आने वाले कष्टों को भाँप चुके थे, जिस कारण उन्होंने मालूशाही से वापस जाकर राजपाठ संभालने को कहा। लेकिन, मालूशाही का मर्म तो प्रेम था और राजुला की व्यथा सोचकर वह अपनी जिद पर अड़े रहें।

यह देखकर गुरु गोरखनाथ ने मालूशाही को दीक्षा दी और ‘बोक्साड़ी विद्या’ सिखाई। उन्होंने मालूशाही को वे तंत्र-मंत्र भी सिखाए जिससे वह हूण और शौका देश के विष से बच सके। इसके बाद मालूशाही ने राजुला से मिलने के लिए राजपाट छोड़ा, सर मुंडाया, जोगी का वेश धर लिया और धूनी की राख शरीर में मल कर जोगी का वेश धर लिया।

धरकर जोगी का भेष, मालूशाही पहुँचा राजुला के देश

मालूशाही जोगी के वेश में घूमता हुआ हूण देश पहुँचा, साथ में चालाकी से अपनी कत्यूरी सेना भी लेकर गया। मालू घूमते-घूमते राजुला के महल पहुँचा, वहाँ बड़ी चहल-पहल थी, क्योंकि विक्खीपाल राजुला को ब्याह कर लाया था। मालू ने भिक्षा के लिए आवाज लगाई। गहनों से लदी राजुला सोने के थाल में भिक्षा लेकर आई और जोगी को भिक्षा देने लगी। लेकिन जोगी एकटक राजुला को देखता रह गया, उसने अपने स्वप्न में देखी राजुला को साक्षात देखा, तो अवाक रह गया और अपनी सुध-बुध खोकर स्तब्ध हो गया।

जोगी ने राजुला से कहा, “अरे रानी, तू तो बड़ी भाग्यवती है, यहाँ कहाँ से आ गई?”
राजुला ने जोगी की ओर अपना हाथ बढ़ाकर अपने हाथ की रेखाएँ देखकर बताने को कहा। जोगी ने कहा कि वो बिना नाम-ग्राम के हाथ न देखेगा।
राजुला ने उसे बताया, “मैं सुनपति शौक की लड़की राजुला हूँ, अब बता जोगी, मेरा भाग्य क्या है।”
जोगी बने मालूशाही ने प्यार से राजुला का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा “तेरे भाग्य में तो रंगीलो वैराट का मालूशाही था।”

तो राजुला ने रोते हुए कहा, “हे जोगी, मेरे माँ-बाप ने तो मुझे जानवरों की तरह विक्खीपाल के पास हूण देश भेज दिया।”
इसके बाद मालूशाही अपना जोगी वेश उतारकर कहा, “मैंने तेरे लिए ही जोगी वेश लिया है राजुला, मैं तुझे यहाँ से ले जाने आया हूँ।”

राजुला-मालूशाही, दोनों प्रेमी-प्रेमिका ने एक दूसरे को पहचान लिया। हूण राजा विक्खीपाल को मालूशाही के चेहरे और हाव-भाव से उसके राजा होने का संदेह हो गया और अंदेशा होने पर वो मालूशाही और उसके साथियों को मार देने की योजना बनाने लगा। राजा विक्खीपाल ने अपने सेवकों से मेहमानों (साधू और उसके चेले) के लिए हलवा-पूरी, खीर आदि पकवान खिलाने को कहा और मालूशाह की खीर में जहर मिलाकर उन सबको बेहोश कर दिया।

इसकी सूचना मिलते ही गुरु गोरखनाथ ने एक सेना के साथ हूण देश जाकर अपनी बोक्साड़ी विद्या का प्रयोग कर के मालू को जीवित कर दिया। फिर मालूशाही ने हूण राजा विक्खीपाल को उसकी सेना समेत मार गिराया और रंगीले वैराट लौट गया।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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