Wednesday, April 1, 2020
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आज ही के दिन नेहरू के कड़े विरोध के बावजूद डॉ राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति चुन लिए गए थे

डॉ अंबेडकर द्वारा हिंदू कोड बिल प्रस्ताव पेश करने के बाद नेहरू हर हाल में बिल को कानूनी रूप देना चाहते थे, जबकि राजेंद्र प्रसाद इस मामले में जनमत के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहते थे।

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अनुराग आनंद
अनुराग आनंद मूल रूप से (बांका ) बिहार के रहने वाले हैं। बैचलर की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया से पीजी डिप्लोमा इन हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद राजस्थान पत्रिका व दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों में काम किया। अनुराग आनंद को कहानी और कविता लिखने का भी शौक है।

देश के राजनीतिक इतिहास में 24 जनवरी की तारीख़ बेहद ख़ास है। इसी दिन संविधान सभा ने राजेंद्र बाबू को देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुन लिया था। लेकिन राजेंद्र प्रसाद का राष्ट्रपति पद तक पहुँचना बेहद उतार-चढ़ाव से भरा हुआ था। कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता और बाद में देश के पहले प्रधानमंत्री बनने वाले पंडित नेहरू किसी भी कीमत पर राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे।

नेहरू के नहीं चाहने के बावजूद कॉन्ग्रेस संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले सरदार पटेल ने राष्ट्रपति पद के लिए अपनी तरफ़ से संविधान सभा में राजेंद्र प्रसाद के नाम का प्रस्ताव रखा और इस तरह प्रसाद संविधान सभा द्वारा देश के पहले राष्ट्रपति चुन लिए गए। लेकिन इतना पढ़ने के बाद क्या आपने सोचा कि पंडित नेहरू आखिर क्यों डॉ प्रसाद को देश का राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे? आइए इस सवाल का जवाब आपको बताते हैं।

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राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति चुने जाने से दो साल तीन महीने पहले अक्टूबर 1947 की बात है। संविधान सभा में डॉ भीमराव अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल नाम से एक प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव पर बहस के दौरान संविधान सभा दो हिस्से में बँटी नजर आई।

संविधान सभा में बैठे हुए कुछ लोग हिंदू कोड बिल को कानूनी रूप देने के समर्थन में थे, जबकि कुछ इस पर किसी भी तरह की जल्दबाजी करने के पक्ष में नहीं थे। डॉ अंबेडकर द्वारा हिंदू कोड बिल प्रस्ताव पेश करने के बाद नेहरू हर हाल में बिल को कानूनी रूप देना चाहते थे, जबकि राजेंद्र प्रसाद इस मामले में जनमत के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहते थे।

दरअसल हिंदू कोड बिल के तहत देश में रहने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं के लिए एक नियम संहिता बनाई जानी थी। इस नियम संहिता के तहत हिंदुओं के लिए विवाह, विरासत जैसे मामले पर कानून बनाया जाना था। इस बिल के तहत हिंदुओं के लिए एक समान विवाह की व्यवस्था करने के अलावा भी कई तरह के कानून बनाए जाने थे।

इस मामले में राजेंद्र प्रसाद चाहते थे कि परंपराओं से जुड़े किसी भी मसले पर कानून बनाने से पहले पूरे देश में लोगों की राय जान लेना चाहिए। राजेंद्र प्रसाद मानते थे कि ऐसे मामलों पर महज नेताओं द्वारा बहस करके कोई कानून बनाने से बेहतर है कि आम लोगों की राय के आधार पर कानून बनाया जाना जाए।

परंपरा और संस्कृति से जुड़ाव होने की वजह से जैसे ही यह मामला सभा के समक्ष रखा गया बतौर संविधान सभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने तुरंत मामले में दखल दिया।

राजेंद्र प्रसाद के मामले में दख़ल देने के बाद नेहरू ने इस मसले पर सख़्त रूख अपना लिया था । यही नहीं नेहरू ने इस मसले को अपने प्रतिष्ठा से भी जोड़ लिया। इस तरह पंडित नेहरू द्वारा इस मामले में ज़ज्बाती फ़ैसले लेने से राजेंद्र प्रसाद इतने दु:खी हुए कि उन्होंने गुस्सा हो कर नेहरू को एक पत्र लिखा।

अपने पत्र में डॉ प्रसाद ने नेहरू को अलोकतांत्रिक व्यक्ति बताया। इंडिया टुडे के एक लेख में इस बात का ज़िक्र है कि नेहरू के पास पत्र भेजने से पहले राजेंद्र प्रसाद ने यह पत्र सरदार पटेल को दिखाया। पटेल ने पत्र पढ़ने के बाद अपने पास रख लिया और डॉ प्रसाद को गुस्सा करने के बजाय पार्टी में अपनी बात रखने के लिए कहा। पटेल आने वाले समय में राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, शायद इसीलिए उन्होंने ऐसा किया था।

26 जनवरी 1950 को देश में संविधान लागू होना था। ऐसे में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना था। नेहरू सी राजगोपालाचार्य को देश का राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। जबकि सरदार पटेल ने राजेंद्र प्रसाद का नाम आगे किया। नेहरू के नहीं चाहने के बावजूद संगठन में मजबूत पकड़ रखने की वजह से संविधान सभा द्वारा डॉ राजेंद्र प्रसाद को देश का पहला राष्ट्रपति चुन लिया गया।

राष्ट्रपति बनने के बाद भी नेहरू व राजेंद्र प्रसाद के बीच मतभेद जारी रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि नेहरू आस्था व संस्कृति जैसी चीजों को ढकोसला मानते थे। जबकि इसके ठीक उल्टा राजेंद्र प्रसाद तरक्की पसंद ज़रूर थे, लेकिन अपनी परंपराओं को साथ लेकर चलना चाहते थे। राजेंद्र प्रसाद जानते थे कि वह राष्ट्र अपने स्वाभिमान को कभी नहीं गिरवी रख सकता, जहाँ के लोगों की रोम-रोम में अपनी परंपरा और संस्कृति बसती हो।

एक तरह से डॉ प्रसाद की छवि ऐसे लोगों की थी जिनका इरादा आसमान की तरह ऊँचा व विशाल था, परंतु पैर अपनी परंपरा के जमीन पर थी। जबकि नेहरू परंपरा व संस्कृति जैसी चीजों से नफ़रत करते हुए एक ऐसे भारत के निर्माण का सपना देखते थे, जिसकी बुनियाद भारतीय संस्कृति से बिल्कुल जुड़ी नहीं थी।

इसी तरह सोमनाथ मंदिर के मामले में भी राजेंद्र प्रसाद पर नेहरू अपना निजी राय थोपने लगे थे। दरअसल सोमनाथ मंदिर बनकर तैयार होने के बाद जब उद्घाटन के लिए राजेंद्र प्रसाद के पास न्योता भेजा गया तो उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।

इसके बाद नेहरू ने उनके इस फ़ैसले की जमकर आलोचना की। हालाँकि, नेहरू को करारा जवाब देते हुए डॉ प्रसाद ने कहा, “मैं एक हिंदू हूँ, लेकिन सारे धर्मों का आदर करता हूँ। कई मौकों पर चर्च, मस्जिद, दरगाह और गुरुद्वारा भी जाता रहता हूँ।”

इस तरह स्वतंत्र भारत में राजेंद्र प्रसाद आज ही के दिन एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप चुने गए जिन्होंने धर्म, आस्था, संस्कृति व परंपराओं की जमीन पर विकसित राष्ट्र के सपने की बीज को बोया था, जो बीज आज के समय में एक पौधे का रूप ले रही है।

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अनुराग आनंद
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