वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज (1 फरवरी 2026) को लगातार नौंवी बार बजट पेश करने जा रही हैं। आम बजट में देश की अर्थव्यवस्था, विकास योजनाओं और नीतियों की दिशा तय होगी, इस बजट में रेलवे को लेकर भी कई बड़े ऐलान किए जाने की संभावना है। हालाँकि, हमेशा ऐसा नहीं था और लंबे वक्त तक रेलवे का बजट आम बजट से अलग पेश किया जाता रहा था। यह परंपरा करीब नौ दशकों तक चली लेकिन 2017 में इसे समाप्त कर रेल बजट को आम बजट में शामिल कर दिया गया। इस फैसले के पीछे ऐतिहासिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण रहे।
रेल बजट की शुरुआत कैसे हुई
रेल बजट को अलग से पेश करने की परंपरा 1924 में ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुई थी। उस समय भारतीय रेलवे का आकार और महत्व इतना बड़ा था कि इसे आम बजट के तहत समायोजित करना कठिन माना गया। ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के चेयरमैन सर विलियम एक्वर्थ ने रेलवे के प्रशासन और वित्तीय व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई सुधार सुझाए। उनकी सिफारिशों के आधार पर यह तय किया गया कि रेलवे का बजट आम बजट से अलग पेश किया जाएगा ताकि इसके खर्च, आय और योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जा सके।
स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही परंपरा
1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद भी रेल बजट को अलग पेश करने की परंपरा जारी रखी गई। स्वतंत्र भारत का पहला रेल बजट देश के पहले रेल मंत्री जॉन मथाई ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में दो आम बजट भी पेश किए। उस समय रेलवे देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार था और इसकी आय का योगदान इतना बड़ा था कि इसे अलग बजट के रूप में बनाए रखना जरूरी समझा गया।
रेलवे की आय और अलग बजट का औचित्य
आजादी के समय रेलवे से होने वाली राजस्व प्राप्ति आम बजट की आय से लगभग 6% अधिक थी। इस वजह से सर गोपालस्वामी आयंगर समिति ने सिफारिश की थी कि रेलवे बजट को अलग ही पेश किया जाना चाहिए। 21 दिसंबर 1949 को संविधान सभा ने भी इस संबंध में एक प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। हालांकि यह व्यवस्था प्रारंभ में केवल पांच वर्षों के लिए तय की गई थी, लेकिन यह परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही और 2016 तक कायम रही।
समय के साथ रेलवे के राजस्व में बदलाव
देश की अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था में बदलाव के साथ रेलवे के राजस्व का अनुपात धीरे-धीरे कम होता गया। 1970 के दशक तक रेलवे का योगदान कुल राजस्व का लगभग 30% रह गया। 2015-16 तक यह घटकर करीब 11.5% तक पहुँच गया। इस गिरावट ने विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या अलग रेल बजट की परंपरा अब भी जरूरी है।
रेल बजट के विलय की प्रक्रिया
नवंबर 2016 में रेल मंत्रालय ने घोषणा की कि रेल बजट को केंद्रीय बजट में शामिल किया जाएगा। यह फैसला नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों और बिबेक देबरॉय तथा किशोर देसाई द्वारा लिखे गए एक पेपर पर आधारित था। समिति का तर्क था कि आधुनिक सार्वजनिक वित्त प्रणाली में अलग रेल बजट का कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं रह गया है और भारत दुनिया का लगभग अकेला देश था, जहाँ यह परंपरा अभी भी जारी थी।
सरकार के भीतर इस प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा हुई। तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इसका समर्थन किया और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे संसद में प्रस्तुत किया। आखिरकार 2017-18 के बजट से पहली बार रेल बजट और आम बजट को एकीकृत कर दिया गया, जिससे दशकों पुरानी परंपरा खत्म हो गई।
वित्तीय व्यवस्था में हुए बदलाव
रेल बजट के आम बजट में विलय के साथ कई महत्वपूर्ण वित्तीय बदलाव भी किए गए। वित्त मंत्रालय ने रेलवे के अनुमानों के साथ एक विनियोग विधेयक तैयार करने और संसद में प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी संभाली। रेलवे को सरकार को लाभांश देने की बाध्यता से मुक्त कर दिया गया, जिससे उस पर वित्तीय दबाव कम हुआ। पहले रेलवे के लिए अलग पूंजी प्रवाह (कैपिटल फ्लो) की व्यवस्था थी, जिसे समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर वित्त मंत्रालय से सकल बजटीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था की गई। इसके साथ ही रेलवे को बाजार से अतिरिक्त संसाधन जुटाने की स्वतंत्रता भी दी गई ताकि वह अपने पूंजीगत व्यय को पूरा कर सके।
रेल बजट के विलय के पीछे उद्देश्य
रेल बजट को आम बजट में शामिल करने का मकसद यह था कि सरकार देश की आमदनी और खर्च को एक साथ और साफ तरीके से देख सके। इससे रेलवे, सड़क और जलमार्ग जैसे परिवहन क्षेत्रों की योजनाओं को मिलाकर बेहतर तरीके से बनाया जा सका। इसके साथ ही वित्त मंत्रालय को पैसों के बंटवारे में ज्यादा सुविधा और लचीलापन मिला, ताकि जरूरत के अनुसार बीच साल में भी संसाधनों में बदलाव किया जा सके।
इस फैसले से कैसे आई पारदर्शिता
रेल बजट को आम बजट में मिलाने से बजट बनाने और पेश करने की प्रक्रिया आसान और साफ हो गई। पहले रेल बजट और आम बजट अलग-अलग होने के कारण संसद में तैयारी और चर्चा में ज्यादा समय लगता था लेकिन अब यह समय बचने लगा। अब सरकार की कमाई और खर्च एक ही दस्तावेज में दिखाए जाते हैं, जिससे संसद, निवेशकों और आम लोगों के लिए देश की आर्थिक स्थिति को समझना ज्यादा सरल हो गया।
रेल बजट को आम बजट में शामिल करना सिर्फ एक सरकारी फैसला नहीं था बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था और नई वित्तीय सोच का नतीजा था। पहले रेलवे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था लेकिन समय के साथ उसकी भूमिका बदलती गई। अलग रेल बजट की परंपरा लंबे समय तक भारतीय इतिहास का अहम हिस्सा रही लेकिन आधुनिक व्यवस्था में इसे खत्म कर एक ही बजट प्रणाली अपनाई गई। इस बदलाव से देश की वित्तीय व्यवस्था ज्यादा व्यावहारिक, साफ और बेहतर तालमेल वाली बन गई।


