कहानी Zomato के लालच और जबरदस्ती की: ‘डार्क किचन’ से लेकर रेस्टॉरेंट्स का बेड़ा गर्क करने तक

जोमैटो व उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने फ़ूड सेक्टर को इतना नुकसान पहुँचाया है कि अब सब कुछ सामान्य नहीं रहा। अगले राउंड की फंडिंग के चक्कर में इन्होने रेस्टॉरेंट्स की ऐसी की तैसी कर दी है। छोटे रेस्टॉरेंट्स को लगातार धमकाने में लगे जोमैटो ने बड़ी चालाकी से अपनी कॉन्ट्रैक्ट पॉलिसी में भी इच्छित बदलाव कर दिया।

पिछले कुछ दिनों में जोमैटो को लेकर तरह-तरह के विवाद चल रहे हैं और कम्पनी ग़लत कारणों से सुर्ख़ियों में लगातार बनी हुई है। हलाल फ़ूड से लेकर मुस्लिम डिलीवरी बॉय तक, जोमैटो का विवादों से एक नाता सा जुड़ गया है। अब कई रेस्टॉरेंट्स जोमैटो से दूर हो रहे हैं। पक्षपात, मोनोपोली और डीप डिस्कॉउंटिंग के कारण डिलीवरी प्लैटफॉर्म्स और रेस्टॉरेंट्स के बीच खींचातानी चल रही है।

बिजनेस प्लान

जब जोमैटो की शुरुआत हुई, तब यह रेस्टॉरेंट्स की ऑनलाइन लिस्टिंग का कार्य करता था। एक पीले रंग के पेज खुलता था, जिसमें लोग विभिन्न रेस्टॉरेंट्स को रेटिंग दिया करते थे। वे अपने अनुभव शेयर करते थे कि खाना कैसा था, अनुभव कैसा रहा, माहौल कैसा था, स्टाफ कैसे थे इत्यादि। बाजार के बदलते समीकरणों और नए खिलाड़ियों के प्रतिस्पर्धा में उतरने के बाद जोमैटो ने नवंबर 2018 में ख़ुद को एक फ़ूड डिलीवरी एप्लीकेशन के रूप में बदल दिया।

क्या आपको पता है कि फ़ूड डिलीवरी के लिए जोमैटो रेस्टॉरेंट से कितने रुपए लेता है? जितने का बिल बनता है, उसका 18-25% जोमैटो उस रेस्टॉरेंट से ले लेता है। डिलीवरी फी के रूप में ग्राहकों को भी थोड़ा-बहुत ख़र्च करना पड़ता है। हालाँकि, यह कई अन्य चीजों पर भी निर्भर करता है। जोमैटो प्रचार के लिए ‘क्लिक पर व्यू’ का प्रयोग भी करता है, यानी किसी भी रेस्टॉरेंट को अपने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिखाना। इसका मतलब यह हुआ कि उस रेस्टॉरेंट को होमपेज पर खास जगह दी जाती है।

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किस क्षेत्र में रेस्टॉरेंट्स को फ़्लैश किया जाएगा, यह पहले से ही निर्धारित होता है। इसके अलावा कम्पनी ‘जोमैटो गोल्ड’ की भी सुविधा देती है, जिसमें कुछ रेस्टोरेंट्स के द्वारा एक पर एक फ्री जैसी सुविधाओं का लाभ ग्राहकों को दिया जाता है। इसके लिए रेस्टॉरेंट्स से भी रुपए लिए जाते हैं। कितने रुपए लिए जाते हैं, यह रेस्टॉरेंट की लोकप्रियता, मोलभाव की क्षमता और लोकेशन के आधार पर तय किया जाता है। ग्राहकों को ‘गोल्ड’ की वार्षिक सदस्यता के लिए चार्ज किया जाता है।

रेटॉरेंट्स ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के लिए ‘जोमैटो गोल्ड’ की सदस्यता लेते हैं। इसके तहत नियम है कि डिस्काउंट का लाभ उठाने के लिए रजिस्टर्ड यूजर के साथ कम से कम एक और व्यक्ति होना चाहिए। रेटॉरेंट्स भी सारी फ़ूड आइटम्स पर ऑफर का लाभ नहीं देते।

डार्क किचन

जोमैटो और स्विगी, दोनों ही भोजन की डिलीवरी करते हैं। डिलीवरी करने वाले कर्मचारी ग्राहकों को रेस्टॉरेंट्स से खाना पहुँचाते हैं और साप्ताहिक रूप से ग्राहकों द्वारा दिए गए रुपयों को रेस्टॉरेंट्स को ट्रांसफर करते हैं। लेनदेन रेस्टॉरेंट और ग्राहक के बीच होता है, जबकि जोमैटो और स्विगी एक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। इसीलिए ग्राहकों का डेटा भी रेस्टॉरेंट्स द्वारा ही लिया जाता है। लेकिन, जोमैटो और स्विग्गी ने यहीं से गड़बड़ियाँ शुरू कर दीं।

दोनों कंपनियों ने न सिर्फ़ ग्राहकों का डेटा चुराया बल्कि उसका इस्तेमाल करते हुए कई इलाक़ों में अपने ‘डार्क किचन’ स्थापित किए हैं। यह ग्राहकों के विश्वास के साथ धोखा है और उनकी प्राइवेसी का भी हनन है। संसद में एक ऐसा बिल भी इंट्रोड्यूस हो चुका है, जिसमें प्राइवेसी को किसी भी नागरिक का मूलभूत अधिकार बताया गया है और यह पास हुआ तो ऑनलाइन पोर्टल्स द्वारा ग्राहकों के डेटा का ग़लत उपयोग अपराध की श्रेणी में आ जाएगा।

अभी का विवाद क्या है?

हाल के कुछ दिनों में जोमैटो, स्विगी, उबेरीट्स और फ़ूडपांडा ने अपने-अपने प्लैटफॉर्म्स पर ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया है। कुछ ने भारी डिस्काउंट के जरिए ग्राहकों को लुभाने का प्रयास किया है। इन्होने कई ऐसे रस्टॉरेंट्स को इस ऑफर में शामिल किया, जो इंडस्ट्री में तरफदारी को बढ़ावा देता है। ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स पर मिल रहे ऑफर्स का लाभ उठाने के लिए लोगों ने भी रेस्टोरेंट्स में जाना कम कर दिया। अतः, इससे बिजनेस लाइन के ऊपर और नीचे, दोनों पायदानों को नुकसान पहुँचाया।

जनवरी 2019 में कई छोटे व मँझोले रेस्टॉरेंट्स ने प्रधानमंत्री कार्यालय को शिकायत देकर इस अनुचित व प्रतिबंधक ट्रेड प्रैक्टिस के बारे में सूचित किया और उचित कार्रवाई करने का आग्रह किया। ‘उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग’ ने इन कंपनियों के अधिकारियों को इस मामले पर बात करने के लिए तलब भी किया। इस बैठक के बाद जोमैटो ने अपने सभी ‘गोल्ड’ रेस्टॉरेंट्स को बता दिया कि अगस्त 14, 2019 को इसके तहत फिलहाल मिलने वाले सारे ऑफर्स ख़त्म हो जाएँगे और ‘गोल्ड’ का लाभ अब सिर्फ़ रेस्टॉरेंट जाकर खाने वालों को नहीं बल्कि ऑनलाइन ऑर्डर करने वालों को भी मिलेगा।

जोमैटो की O2 स्कीम के तहत, रेस्टॉरेंट ग्राहकों के पसंद का एक फ़ूड आइटम उन्हें मुफ्त में देगा और नेट बिल का 18-25% कमीशन भी पे करेगा। इससे रेस्टॉरेंट को ग्रॉस इनवॉइस का 38-42% हिस्सा ही मिलेगा। जोमैटो से रेस्टॉरेंट्स को दिक्कत यह है कि कम्पनी ने अपना कमीशन कम नहीं किया और डिस्काउंट का कोई भी हिस्सा वहन करने से मना कर दिया। अब रेस्टॉरेंट्स खफा हैं और जोमैटो के ख़िलाफ़ ‘लॉगआउट’ अभियान चला रहे हैं।

अब जोमैटो ने इन सभी रेस्टॉरेंट्स को लीगल नोटिस भेज दिया है। चूँकि, लॉगआउट करने के लिए 45 दिनों के नोटिस पीरियड की समयावधि तय थी, जोमैटो ने इन सबके ख़िलाफ़ अदालत जाने की धमकी दी है।

अभी की स्थिति क्या है?

लीगल नोटिस मिलने के बाद रेस्टॉरेंट्स और भी ज्यादा उग्र हो गए हैं और जोमैटो के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं। अब जोमैटो इस स्थिति को किसी तरह संभालने के लिए रेस्टॉरेंट्स को बातचीत करने के लिए कह रहा है। जोमैटो के सीईओ ने ट्वीट कर बातचीत के लिए कहा लेकिन उन्होंने लगे हाथ रेस्टॉरेंट्स को कॉस्ट घटाने और अच्छे तरीके से प्रबंधन करने की सलाह दे डाली। रेस्टॉरेंट्स के मालिकों में इससे ग़लत सन्देश गया।

जोमैटो: लालच की एक नई कहानी

जोमैटो व उसकी प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने फ़ूड सेक्टर को इतना नुकसान पहुँचाया है कि अब सब कुछ सामान्य नहीं रहा। अगले राउंड की फंडिंग के चक्कर में इन्होने रेस्टॉरेंट्स की ऐसी की तैसी कर दी है। ख़ासकर छोटे व मँझोले रेस्टॉरेंट्स खाना और प्रबंधन का खर्च अपने उत्पाद बेच कर ही निकालती है। दीपेंद्र गोयल इस मामले में एकदम विफल साबित हुए हैं।

छोटे रेस्टॉरेंट्स को लगातार धमकाने में लगे जोमैटो ने बड़ी चालाकी से अपनी कॉन्ट्रैक्ट पॉलिसी में भी इच्छित बदलाव कर दिया। एक तरफ रेस्टॉरेंट्स से भी रुपए लेना और फिर ग्राहकों से भी वसूलना, दोनो हाथों में लड्डू रख कर व्यापार करने के लिए जोमैटो ख़ुद के लाभ के लिए कुछ भी करता जा रहा है।

(अंकुर पांडेय और चंद्रभूषण जोशी द्वारा OpIndia में लिखे अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद अनुपम के सिंह ने किया है।)

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