Thursday, February 22, 2024
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वो रात जब 6 साल की ‘अम्मा’ को भागना पड़ा, घर पर आज भी मुस्लिमों का कब्जा: मोपला हिंदू नरसंहार की एक कहानी यह भी

"महिलाओं और बच्चों को घर के पिछले दरवाजे से जंगल में भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हमले की रात कई परिवार अपने घरों, खेतों को छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए अँधेरे में ही नदी पार कर गए थे।"

स्मिता राजन की गिनती मोहिनीअट्टम के सबसे उम्दा कलाकारों में होती है। स्मिता प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना कल्याणीकुट्टी अम्मा की नतिनी हैं। उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट के जरिए उन इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों को निशाने पर लिया है जो मोपला हिंदू नरसंहार पर पर्दा डाल इसे ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ बताने की कोशिश करते हैं। साथ ही बताया है कि कैसे इस नरसंहार के दौरान इस्लामवादियों ने उनकी नानी के पुश्तैनी घर पर हमला किया था। आज भी इस घर पर मुस्लिमों का कब्जा है।

स्मिता ने बताया है कि जब उनकी नानी को मजहबी कट्टरता के कारण 1921 में जान बचाकर भागना पड़ा तब वह केवल छह साल की थीं। उन्होंने लिखा है कि मजहबी कट्टरपंथियों के एक समूह ने कल्याणीकुट्टी अम्मा के घर को मोपला हिंदू नरसंहार के दौरान एक रात घेर लिया था। उनका परिवार उस समय खतरे में था।

स्मिता राजन अपनी पोस्ट में आगे लिखती हैं, “महिलाओं और बच्चों को घर के पिछले दरवाजे से जंगल में भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हमले की रात कई परिवार अपने घरों, खेतों को छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए अँधेरे में ही नदी पार कर गए थे। कई अभागे जो पलायन नहीं कर सके, उन्हें बेरहमी से मार दिया गया। मशहूर शास्त्रीय नृत्यांगना कल्याणीकुट्टी अम्मा उस समय सिर्फ छह साल की बच्ची थी, जो जान बचाने के लिए अपनी मातृभूमि से भाग गईं थी।”

स्मिता राजन ने बताया है कि इस नरसंहार को प्रत्यक्ष देखने के बाद कल्याणीकुट्टी अम्मा जीवन भर दुख और पीड़ा से उबर नहीं पाईं। राजन ने यह भी कहा कि मुस्लिम परिवारों ने कल्याणीकुट्टी अम्मा के पैतृक घर पर कब्जा कर रखा है।

उन्होंने मोपला हिंदू नरसंहार को स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बताने वाले इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और नेताओं की आलोचना करते हुए कहा है कि आतंक के शिकार लोगों की एक पीढ़ी आज भी उस भयावह मंजर को नहीं भूल पाई है, जिसमें हजारों लोगों ने अपनी जान गँवाई थी। स्मिता ने अपने पोस्ट के अंत में उम्मीद जताई कि अगली पीढ़ी कम से कम समझ जाएगी कि सच क्या है और वे गलतियों को नहीं दोहराएँगे।

गौरतलब है कि मोपला हिन्दू नरसंहार को अक्सर ‘मालाबार विद्रोह’, या अंग्रेजी में ‘Rebellion‘ कह कर सम्बोधित किया जाता है। केरल भाजपा के अध्यक्ष रहे कुम्मनम राजशेखरन की मानें तो 1921 में हुई ये घटना राज्य में ‘जिहादी नरसंहार’ की पहली वारदात थी। केरल के मालाबार में हिंदुओं पर अत्याचार के उन 4 महीनों ने हजारों हिंदुओं की जिंदगी तबाह की। बताया जाता है कि मालाबार में ये सब स्वतंत्रता संग्राम के तौर पर शुरू हुआ, लेकिन जब खत्म होने को आया तो उसका उद्देश्य साफ पता चला कि वरियमकुन्नथु जैसे लोग केवल उत्तरी केरल से हिंदुओं की जनसंख्या कम करना चाहते थे।

खिलाफत आंदोलन का सक्रिय समर्थक वरियमकुन्नथु ने अपने दोस्त अली मुसलीयर के साथ मिलकर मोपला दंगों का नेतृत्व किया, जिसमें 10000 हिंदुओं का केरल से सफाया हुआ। माना जाता है कि इसके बाद करीब 1 लाख हिंदुओं को केरल छोड़ने पर मजबूर किया गया। इस दौरान हिंदू मंदिरों को ध्वस्त किया गया। जबरन धर्मांतरण हुए और कई प्रकार के ऐसे अत्याचार हिंदुओं पर किए गए, जिन्हें शब्दों में बयान कर पाना लगभग नामुमकिन है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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