अयोध्या में मस्जिद के लिए 5 एकड़ क्यों: SC में याचिका दाखिल करेगी हिन्दू महासभा

"विवादित इमारत के बाहरी और भीतरी हिस्से पर हिन्दुओं का दावा मज़बूत होने के चलते जगह हमें मिली। पूरा इंसाफ करने के नाम पर मुसलमानों को 5 एकड़ जमीन देने का हम विरोध करेंगे।"

अयोध्या मामले में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की अंतिम तिथि पास आते ही दिलचस्प मोड़ भी आने लगे हैं। हिन्दूवादी राजनीतिक दल अखिल भारत हिन्दू महासभा ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के एवज में मुआवजे के रूप में मुस्लिम पक्ष को मिल रही 5 एकड़ ज़मीन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने जा रही है। इस आदेश पर आपत्ति जताते हुए महासभा अदालत से इस आदेश पर पुनर्विचार करने के लिए कहेगी।

पार्टी के वकील विष्णु शंकर जैन के अनुसार, “विवादित इमारत के बाहरी और भीतरी हिस्से पर हिंदू दावा मज़बूत होने के चलते जगह हमें मिली। पूरा इंसाफ करने के नाम पर मुसलमानों को 5 एकड़ जमीन देने का हम विरोध करेंगे। फैसले में 1949 और 1992 की घटनाओं पर जो टिप्पणी की गई है, उसे भी हटाने की माँग करेंगे।” गौरतलब है कि अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 1949 में 22-23 दिसंबर की रात राम लला की मूर्तियाँ वहाँ प्रकट नहीं हुईं थीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से रखवाईं गईं थीं। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में हुए बाबरी ध्वंस (जिसकी कि संयोगवश आज, 6 दिसंबर, 2019 को बरसी है) को भी असंवैधानिक और गैर-क़ानूनी बताया था।

पूरी जमीन दे दी थी राम लला को

9 नवंबर, 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों वाली संविधान बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं को दिया था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिए मुसलमानों को अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें मुस्लिम जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था।

लाला लाजपत राय ने बनाई, मालवीय बने पहले अध्यक्ष

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याचिकाकर्ता अखिल भारत हिन्दू महासभा 1907 में स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने अपने आर्य समाजी साथियों लाल चंद और शादी लाल के साथ मिलकर “पंजाब हिन्दू महासभा” के तौर पर बनाई थी। लाहौर में हुए पहले अधिवेशन की अध्यक्षता महामना पण्डित मदन मोहन मालवीय ने की थी, जो आगे जाकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक हुए। 1921 के 6ठे अधिवेशन में “अखिल भारत हिन्दू महासभा” के रूप में इसका नामकरण हुआ था।

वीर सावरकर के नेतृत्व में इस संगठन को सबसे अधिक विभाजन के दंगों के समय हिन्दुओं की रक्षा के लिए कदम उठाने के लिए जाना जाता है। इसके अलावा हिन्दू महासभा ने विभाजन के लिए राज़ी हो जाने पर कॉन्ग्रेस और उसके नेताओं गाँधी-नेहरू का भी विरोध किया था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी हिन्दू महासभा के नेता रहे हैं।

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