Monday, August 2, 2021
Homeदेश-समाजIIT-M के वैज्ञानिकों ने बेहद कम तापमान और दबाव पर पता लगाया भविष्य के...

IIT-M के वैज्ञानिकों ने बेहद कम तापमान और दबाव पर पता लगाया भविष्य के ईंधन का स्रोत

आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने क्लैथरेट हाइड्रेट को निर्वात में, एक ट्रिलियन गुना कम वायुमंडलीय दबाव पर, माइनस 263 डिग्री तापमान पर लेबोरेटरी में निर्मित किया है। ऐसी परिस्थितियाँ सुदूर अंतरिक्ष में पाई जाती हैं।

आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी खोज की है। प्रोफेसर थलप्पिल प्रदीप और डॉ रजनीश कुमार के मार्गदर्शन में शोधकर्ताओं के समूह ने पता लगाया है कि मीथेन गैस क्लैथरेट हाइड्रेट के रूप में बेहद कम तापमान और दबाव की परिस्थिति में भी मौजूद हो सकती है। क्लैथरेट हाइड्रेट कार्बन डाइऑक्साइड या मीथेन जैसे तत्वों के अणु होते हैं जो कि जल के अणुओं के बीच क्रिस्टल के रूप में विद्यमान होते हैं।

ये उच्च दबाव और कम तापमान वाले स्थान जैसे साइबेरिया के ग्लेशियर में या समुद्रतल से सैकड़ों मीटर नीचे पाए जाते हैं। इस प्रकार के हाइड्रेट पदार्थ विशेष रूप से मीथेन के हाइड्रेट को भविष्य के ईंधन के रूप में देखा जा रहा है। कई राष्ट्र महासागरों की तलहटी से हाइड्रेट निकालने की तकनीक विकसित करने के प्रयास कर रहे हैं।

आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने क्लैथरेट हाइड्रेट को निर्वात में, एक ट्रिलियन गुना कम वायुमंडलीय दबाव पर, माइनस 263 डिग्री तापमान पर लेबोरेटरी में निर्मित किया है। ऐसी परिस्थितियाँ सुदूर अंतरिक्ष में पाई जाती हैं। मीथेन अपने हाइड्रेट स्वरूप में ज्वलनशील गैसों का उत्पादन कर सकता है जिनका प्रयोग ईंधन के रूप में किया जा सकता है।

बेहद कम दबाव और लगभग शून्य केल्विन तापमान जैसी परिस्थितियों में हाइड्रेट का निर्माण होना एकदम अप्रत्याशित है। ऐसे में आईआईटी के वैज्ञानिकों द्वारा यह खोज करना उल्लेखनीय है। यह खोज अमेरिका के प्रोसीडिंग्स ऑफ़ नेशनल अकादमी ऑफ़ साइंस नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुई है।

बेहद कम दबाव और लगभग शून्य केल्विन तापमान जैसी परिस्थितियों में हाइड्रेट का निर्माण होना एकदम अप्रत्याशित है। ऐसे में आईआईटी के वैज्ञानिकों द्वारा यह खोज करना उल्लेखनीय है। यह खोज अमेरिका के प्रोसीडिंग्स ऑफ़ नेशनल अकादमी ऑफ़ साइंस नामक प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुई है।

यह प्रयोग करने के लिए वैज्ञानिकों ने लेबोरेटरी उपकरणों में ‘अल्ट्रा हाई वैक्यूम’ वातावरण निर्मित किया। अल्ट्रा हाई वैक्यूम वह स्थिति होती है जब चैम्बर में सौ नैनो पास्कल (दबाव की इकाई) से कम का दबाव बनाया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में स्पेक्ट्रोस्कोपी का अध्ययन किया जाता है। स्पेक्ट्रोस्कोपी द्वारा हाइड्रेट का अध्ययन किया जाता है।

प्रोफेसर प्रदीप ने ऑपइंडिया से साझा किए अपने आधिकारिक बयान में इस खोज में बारे में विस्तार से लिखते हुए बताया कि सामान्य परिस्थितियों में स्पेक्ट्रोस्कोपिक परिवर्तन कुछ मिनटों अथवा घंटों के लिए ही देखा जाता है।

ज्वलनशील गैस हाइड्रेट पदार्थ

किन्तु इस प्रयोग में उन्होंने कई दिनों तक प्रतीक्षा की और प्रयोग को मॉनिटर करते रहे क्योंकि अंतरिक्ष में भी बर्फ और मीथेन लाखों करोड़ों वर्षों से छिपे हुए हैं। प्रयोग करने के तीन दिन बाद वैज्ञानिकों को सफलता मिली। डॉ रजनीश कुमार ने बताया कि हाइड्रेट के अणुओं के बीच कार्बन डाइऑक्साइड फँस जाती है और यदि हम ऐसी तकनीक विकसित कर पाए कि समुद्र की तलहटी में मौजूद हाइड्रेट कार्बन डाइऑक्साइड को सोख ले तो ग्लोबल वार्मिंग से निजात पाई जा सकती है।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

चक दे इंडिया: ओलंपिक के 60 मिनट और भारतीय महिला हॉकी टीम ने रचा इतिहास

यह पहली बार हुआ है कि भारतीय महिला हॉकी टीम ने सबको हैरान करते हुए इस तरह जीत हासिल की। 1980 के मॉस्को ओलंपिक में टीम को चौथा स्थान मिला था।

JNU का छात्र-AISA से लिंक, छात्राओं के यौन शोषण में घिरा: अश्लील तस्वीरें भी वायरल की, स्कॉलरशिप पर जा रहा रूस

JNU के छात्र केशव कुमार पर दो छात्राओं के साथ यौन शोषण के आरोप लगे हैं। वो AISA से जुड़ा रहा है। यौन हिंसा व तस्वीरें वायरल करने के भी आरोप।

प्रचलित ख़बरें

- विज्ञापन -

 

हमसे जुड़ें

295,307FansLike
112,557FollowersFollow
394,000SubscribersSubscribe