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30 साल से ‘लालू’ पर था ममता बनर्जी का सिर फोड़ने का आरोप, गवाहों की मौत के बाद अदालत ने किया रिहा

16 अगस्त 1990 को घायल होने के बाद ममता बनर्जी को काफी वक्त अस्पताल में गुज़ारना पड़ा था, हालाँकि इसके बाद उनकी माकपा से सड़कों पर जूझने वाली नेत्री के तौर पर प्रसिद्धि आसमान छूने लगी थी। जब ममता 2011 में सत्ता में आईं, तो 'लालू' ने उनसे माफ़ी की गुज़ारिश की थी।

30 साल पहले बंगाल की यूथ कॉन्ग्रेस नेत्री ममता बनर्जी का सिर फोड़ने का आरोप जिन लालू आलम पर था, उन्हें अलीपुर सेशंस कोर्ट के जज पुष्पल सतपति ने अब रिहा कर दिया है। आलम को बरी करने का कारण मुकदमे के फैसले में हो रही देरी और कई गवाहों का इस बीच मर जाना बताया जा रहा है। यहाँ तक कि खुद ममता बनर्जी ने पिछले महीने अदालत के समन पर कहीं और तात्कालिक व्यस्तता व सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पेशी से मना कर दिया था।

माकपा नेता के भाई

आरोपित लालू आलम को माकपा नेता बादशाह आलम का भाई बताया जा रहा है। 16 अगस्त 1990 को घायल होने के बाद ममता बनर्जी को काफी वक्त अस्पताल में गुज़ारना पड़ा था, हालाँकि इसके बाद उनकी माकपा से सड़कों पर जूझने वाली नेत्री के तौर पर प्रसिद्धि आसमान छूने लगी थी। जब ममता 2011 में सत्ता में आईं, तो ‘लालू’ ने उनसे माफ़ी की गुज़ारिश की थी।

लोक अभियोजक राधा कांत मुखर्जी ने ममता बनर्जी के अदालत में आने से मना करने के बाद अदालत को सूचित किया कि जज अब अपने स्वविवेक के अनुसार मामले को चलाते रहने या बंद करने पर निर्णय ले सकते हैं। लेकिन मुखर्जी ने साथ ही जस्टिस सतपति से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को ध्यान में रखने की भी गुज़ारिश की थी। ममता बनर्जी हालाँकि वीडियो कॉन्फ्रेंस के लिए तैयार थीं, लेकिन इसके लिए ज़रूरी सुविधाएँ अलीपुर कोर्ट में नहीं थीं। इसके पहले वह 1994 में इस अदालत में बतौर गवाह हाज़िर हुईं थीं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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