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‘शराब के गंध से साबित नहीं होता कि व्यक्ति नशे में है’: केरल HC ने सरकारी कर्मचारी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने को कहा

इसी के साथ हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल शराब की गंध से यह साबित नहीं किया जा सकता है कि व्यक्ति नशे में है। यह आदेश जस्टिस सोफी थॉमस ने सरकारी कर्मचारी सलीम कुमार की याचिका पर दिया।

केरल हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि निजी स्थानों पर शराब का सेवन अपराध नहीं है, जब तक कि वहाँ कोई उपद्रव न हुआ हो। इसी के साथ हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल शराब की गंध से यह साबित नहीं किया जा सकता है कि व्यक्ति नशे में है। यह आदेश जस्टिस सोफी थॉमस ने सरकारी कर्मचारी सलीम कुमार की याचिका पर दिया। सलीम अपने विरुद्ध केरल पुलिस द्वारा साल 2013 में दर्ज प्राथमिकी को निरस्त करवाने के लिए यह कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। याचिकाकर्ता मूल रूप से कोल्लम जिले के निवासी हैं और वर्तमान में कासरगोडा जिले के राजस्व विभाग में कार्यरत हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सलीम कुमार पर केरल के कासरगोड जिले के बडियाडका (Badiyadka) थाने में धारा 118 (A) के तहत केस दर्ज हुआ था। इस केस में शिकायतकर्ता और गवाह दोनों ही पुलिसकर्मी थे। कुमार की तरफ से वकील वी प्रमोद और जी चंद्रमोहन ने अपने तथ्य अदालत के आगे रखे। अपने विरुद्ध दर्ज केस के निरस्त हो जाने से वो काफी खुश हैं। इस संबंध में उन्होंने मनोरमा ऑनलाइन से बातचीत की है।

कुमार के अनुसार, फरवरी 2013 में उन्होंने अपने एक सहयोगी के साथ अवैध खनन की सूचना पर एक वाहन पकड़ा था। तब ड्राइवर ने अंदर से दरवाजा और खिड़की बंद कर लिया था। इसकी सूचना पुलिस को दी गई, लेकिन पुलिस 1 घंटे तक नहीं पहुँची। इस बीच 3 हथियारबंद लोग बाइक से आए, जिनके डर से वे एक पहाड़ी के पीछे छिप गए। इस दौरान मौका पाकर संदिग्ध वाहन भाग निकला।

कुमार का कहना है, “खुद पर हमले की शिकायत दर्ज करवाने के लिए पुलिस ने हमें थाने बुलवाया। 26 फरवरी 2013 को मुझे थाने में संदिग्ध वाहन और आरोपितों की शिनाख्त के लिए बुलाया गया। मेरा सहयोगी बाहर था, इसलिए मैं अकेला गया। पुलिस ने थाने में हमसे बहस की और बेवजह गलतफहमी पैदा करने की कोशिश की। पुलिस ने मुझ पर उन लोगों को पकड़वाने का दबाव बनवाया, जो इस मामले में शामिल नहीं थे।”

कुमार का कहना है कि इस दौरान पुलिस ने उन पर शराब पिए होने का आरोप लगाया और जबरदस्ती उनकी साँसों का परीक्षण किया। कुमार ने बताया कि जब उन्होंने नजदीकी अस्पताल में परीक्षण कराने के लिए कहा तो पुलिसकर्मियों ने मना कर दिया। उन्होंने बताया कि इस दौरान उनका फोन छीन लिया गया और उनके साथ मारपीट कर उनसे एक कागज़ पर जबरन हस्ताक्षर भी करवाया गया। उसके बाद उन्हें थाने से जमानत पर छोड़ा गया।

कुमार के अनुसर, इस केस में पुलिस ने तमाम मनगढ़ंत बातें लिखी थीं। इसलिए उन्होंने इसे हाईकोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया। यह केस हाईकोर्ट में साल 2019 में ट्रांसफर कर दिया गया और आखिरकार अब मुझे इसमें जीत मिली है। कुमार के अनुसार, पुलिस के आरोपों में उनके मुँह से शराब की दुर्गंध आना भी शामिल था। न्यायालय ने अपने परीक्षण में यह भी पाया कि अगर मैंने थोड़ी बहुत शराब पी भी थी तो इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मैंने नशे में किसी के साथ दुर्व्यवहार किया।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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