Tuesday, August 3, 2021
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हर घर से 1 शिला, 1 मुट्ठी मिट्टी और 11 रुपए: जहाँ सीता ने ली थी भू-समाधि वहाँ बनेगा भव्य मंदिर

सीता माता मंदिर को सीता सर्किट के रुप में विकसित करने की कार्ययोजना तैयार की गई है। सर्किट में फलस्वाड़ी के सीता माता मंदिर, कोटसाड़ा के महर्षि वाल्मीकि मंदिर, देवल गांव स्थित श्री लक्ष्मण मंदिर समूह, विदाकोटी व देवप्रयाग स्थित श्री रघुनाथ मंदिर को जोड़ने की योजना है।

अयोध्या में राम मंदिर का रास्ता साफ होने के साथ ही पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में सीता माता का मंदिर बनाए जाने की बात सामने आई है। सीता की भू-समाधि वाले स्थान के रूप में प्रख्यात उत्तराखंड के पौड़ी जिले के फलस्वाड़ी गाँव में एक भव्य मंदिर बनाया जाएगा। प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने पौड़ी में आयोजित शरदोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि अपने संबोधन में कहा कि प्रस्तावित सीता माता सर्किट, पौड़ी के विकास में मील का पत्थर साबित होगा।

इस पर काम भी शुरू कर दिया गया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि इस सर्किट के विकास से दुनिया का हर वह व्यक्ति जिसकी भगवान राम और माता सीता में आस्था है, फलस्वाड़ी गाँव में ज़रूर आना चाहेगा, जहाँ माता सीता ने भू-समाधि ली थी। उन्होंने आह्वान किया है कि फलस्वाड़ी में माता सीता का भव्य मंदिर बने, इसके लिए क्षेत्र के हर गाँव-हर घर से एक शिला (पत्थर), एक मुट्ठी मिट्टी और 11 रुपए दान लिया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके लिए जल्द ही यात्रा की जाएगी। वे स्वयं देवप्रयाग से यह यात्रा करेंगे। संत-महात्माओं ने भी इसमें शामिल होने की इच्छा व्यक्त की है। इस यात्रा में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी साथ होंगे। मुख्यमंत्री ने त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि जिले के कोट ब्लॉक के फलस्वाड़ी गाँव स्थित सीता माता मंदिर को सीता सर्किट के रुप में विकसित करने की कार्ययोजना तैयार की गई है। सर्किट में फलस्वाड़ी के सीता माता मंदिर, कोटसाड़ा के महर्षि वाल्मीकि मंदिर, देवल गांव स्थित श्री लक्ष्मण मंदिर समूह, विदाकोटी व देवप्रयाग स्थित श्री रघुनाथ मंदिर को जोड़ने की योजना है।

बता दें कि जैसे श्रीराम को पुरुषों में उत्तम कहा गया है, उसी तरह माता सीता को भी महिलाओं में सबसे उत्तम माना जाता है। माता सीता मिथिला के राजा जनक की पुत्री थीं इसलिए उन्हें ‘जानकी’ भी कहा जाता है। वनवास भगवान राम को मिला था, लेकिन बचपन से महलों में पली-बढ़ी माता सीता ने अपना पतिव्रत धर्म निभाने के लिए महलों के सारे सुख, धन और वैभव को छोड़ कर पति के साथ वन के लिए चल दीं। 14 वर्ष का वनवास काटा। रावण द्वारा हरण के बाद उन्हें अग्नि परीक्षा भी देनी पड़ी।

पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के माता सीता को त्यागने के बाद लक्ष्मण उन्हें विदाकोटी में छोड़ वापस अयोध्या लौट गए थे। कोटसाड़ा गाँव स्थित महर्षि वाल्मीकि ने सीता माता को अपने आश्रम में रखा था। जब भगवान राम ने माता सीता की पवित्रता पर संशय व्यक्त किया तो माता सीता ने हाथ जोड़कर नीचे मुख करके बोलीं, “हे धरती माँ, यदि मैं पवित्र हूँ तो धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊँ।” सीता के यह कहते ही नागों पर रखा एक सिंहासन पृथ्वी फाड़कर बाहर निकला। सिंहासन पर पृथ्वी देवी बैठी थीं। उन्होंने सीता को गोद में बैठा लिया। माता सीता के बैठते ही वह सिंहासन धरती में धँसने लगा और सीता माता धरती में समा गईं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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