Friday, May 24, 2024
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पुलिस पत्थर खाए, जिंदा जल कर मर जाए… लेकिन दंगाइयों पर न करे कार्रवाई: हल्द्वानी के कट्टरपंथियों को ‘विक्टिम’ दिखाने का काम शुरू

हल्द्वानी में भीड़ ने तोड़फोड़ की। आगजनी की। पत्थर फेंके। 300 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को घायल किया और जब इन सबके खिलाफ पुलिस ने अपनी कार्रवाई को शुरू की तो इन्होंने खुद को 'विक्टिम' दिखाना शुरू कर दिया।

उत्तराखंड के हल्द्वानी में क्या हो रहा है ये किसी से छिपा नहीं है। 8 फरवरी 2024 को एक बार फिर इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ अपने पुराने पैटर्न के साथ सड़कों पर आई। भीड़ ने जगह-जगह तोड़फोड़ की। आगजनी की-पत्थर फेंके। 300 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को घायल किया, उन्हें जिंदा जलाकर मारने की कोशिश की और जब इन सबके खिलाफ पुलिस ने अपनी कार्रवाई को शुरू की तो इन्होंने खुद को विक्टिम दिखाना शुरू कर दिया।

इनके बचाव में सोशल मीडिया पर बैठे इस्लामी कट्टरपंथी भी अपने काम में जुट गए और ऐसी-ऐसी वीडियो की क्लिप काटकर डालने लगे जिसमें उलटा पुलिस को ही दोषी दिखाया जा रहा है और ये समझाया जा रहा है कि अवैध मस्जिद का ढाँचा गिरने पर दंगे कट्टरपंथी मुस्लिम भीड़ ने नहीं किए।

जैसे एक वीडियो क्लिप में आगजनी साफ देखी जा रही है और कुछ लोग क#% जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस क्लिप को दिखाकर ये साबित करने की हो रही है कि इस अवैध मस्जिद हटाए जाने की कार्रवाई पर हिंसा को कट्टरपंथी भीड़ अंजाम नहीं दे रही। बल्कि वो लोग दे रहे हैं जो इन कट्टरपंथियों से घृणा करते हैं।

इसी तरह एक वीडियो है जिसमें ये दिखाने का प्रयास हो रहा है पुलिस ने निहत्थी बुर्काधारी महिलाओं पर लाठी चार्ज किया तब भीड़ भड़की, जबकि हल्द्वानी की जिलाधिकारी ने अपने बयान में साफ कहा है कि अवैध मस्जिद हटाने की कार्रवाई से पहले ही वहाँ अराजक तत्वों (इस्लामी कट्टरपंथियों) ने हमले की तैयारी की हुई थी। उन्होंने सोचा हुआ था अवैध अतिक्रमण हटाने जब टीम आएगी तो वो हमला करेंगे। उनकी छतों पर पत्थर थे, हाथों में पेट्रोल बम थे।

अब आप अगर इन इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा किए गए उत्पात या दंगों की कोई भी खबर को पढ़ेंगे तो यही निष्कर्ष पाएँगे कि दंगा उन्हें उकसाने से नहीं होता बल्कि वो तय करके रखते हैं कि कब कौन सी कार्रवाई के बाद उन्हें कैसे हमला करना है। इस पैटर्न में छतों पर खड़े होकर पत्थरबाजी करने का काम बुर्काधारी महिलाओं को दे दिया जाता है और कट्टरपंथी युवक खुद सड़कों पर आ जाते हैं। इसके बाद इनके पास से पेट्रोल बम फेंके जाते हैं। गाड़ियों में आग लगा दी जाती है। पुलिस का घेराव होता है और ठीक उसी तरह से पुलिस को निशाना बनाया जाता है जैसे इस बार हल्द्वानी पुलिस को बनाया गया।

अजीब बात ये है कि इंसानियत का नाम लेकर बुर्काधारी महिलाओं के बचाव में सोशल मीडिया पर बैठी टीम को वो फुटेज नहीं मिली जहाँ हमलों में महिला पुलिकर्मियों पर जानलेवा हमले हुए। उन्हें मारने की कोशिश हुई। उन्हें मिली तो ऐसी महिलाओं की वीडियो जो दंगों के वक्त पुलिस के सामने खड़ी थीं। क्या पुलिस ये सोचकर उन्हें तितर-बितर न करती कि वो अवैध ढाँचे की कार्रवाई देखने आई ‘दर्शक’ थीं।

दंगों के वक्त 300 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। ये कोई सामान्य आँकड़ा नहीं है। सोचिए कितने कट्टरपंथियों की अनियंत्रित भीड़ उनपर टूटी होगी जो इतना पुलिस बल मौजूद होकर भी उनका कुछ नहीं कर पाया और जब बचाव में अपनी कार्रवाई की तो सोशल मीडिया पर सवाल खड़े हो गए कि आखिर क्यों बेचारी निहत्थों को लाठी मारी जा रही है। क्या ऐसे में पुलिस को दंगाइयों के सामने खड़े होकर मार खानी चाहिए, जलकर मर जाना चाहिए या फिर स्थिति कंट्रोल करने के लिए उपयुक्त कार्रवाई करनी चाहिए वो चाहे छतों से पत्थर फेंकती बुर्काधारी महिलाओं के खिलाफ हो या फिर पेट्रोल बम लेकर सड़क पर उतरी भीड़ पर।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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