बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले टेक्सटाइल सेक्टर ने आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है। ‘बांग्लादेश टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन’ (BTMA) ने घोषणा की है कि 1 फरवरी 2026 से देश की सभी कपड़ा मिलें अनिश्चितकाल के लिए बंद रहेंगी।
मिल मालिकों का कहना है कि वे भारी घाटे में हैं और अंतरिम सरकार उनकी समस्याओं को अनसुना कर रही है। यह फैसला सिर्फ एक धमकी नहीं बल्कि मजबूरी है, क्योंकि मिलों के पास अब बैंकों का कर्ज चुकाने तक के पैसे नहीं बचे हैं।
पूँजी खत्म, कर्ज का पहाड़ और सरकार की बेरुखी
BTMA के अध्यक्ष शौकत अजीज रसेल ने ढाका में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर साफ कहा कि मिलों की करीब 50% पूँजी डूब चुकी है। हालात इतने खराब हैं कि अगर मिल मालिक अपनी सारी जायदाद भी बेच दें, तब भी बैंकों का कर्ज नहीं चुका पाएँगे। पिछले 30 दिनों में इस इंडस्ट्री को लगभग 12,000 से 15,000 करोड़ टका का नुकसान हुआ है।
रसेल ने आरोप लगाया कि वे हर मंत्रालय के चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन अफसर एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टाल रहे हैं। उनका कड़वा तंज था- ‘हमारा सेक्टर जीडीपी में 13% योगदान देता है, लेकिन सरकार के पास हमारी बात सुनने के लिए 13 मिनट का समय भी नहीं है।’
सस्ते विदेशी धागे ने बिगाड़ा खेल
इस पूरे विवाद की जड़ में ‘बॉन्डेड वेयरहाउस सुविधा‘ है, जिसके तहत बाहर से बिना ड्यूटी (टैक्स) दिए धागा मँगाया जा रहा है। स्थानीय मिल मालिकों का कहना है कि बाहर से आने वाले सस्ते धागे ने बाजार को पाट दिया है, जिससे देश की अपनी मिलों का अरबों का माल बिना बिका पड़ा है।
मिलों की क्षमता 50% तक गिर गई है। BTMA चाहता है कि सरकार बाहर से धागा मँगाना बंद करे ताकि लोकल मिलें बच सकें, वरना पूरा प्राइमरी टेक्सटाइल सेक्टर ही खत्म हो जाएगा।
निर्यातकों के साथ ठनी: गारमेंट सेक्टर पर खतरा
एक तरफ टेक्सटाइल मिल मालिक हैं, तो दूसरी तरफ गारमेंट एक्सपोर्टर्स (BGMEA)। एक्सपोर्टर्स का कहना है कि अगर बाहर से सस्ता धागा मँगाना बंद किया गया, तो कपड़ों की लागत बढ़ जाएगी।
इससे इंटरनेशनल मार्केट में बांग्लादेश के कपड़ों की डिमांड कम हो सकती है। दोनों संगठनों के बीच की इस खींचतान ने सरकार को भी धर्मसंकट में डाल दिया है। फिलहाल दोनों पक्षों में कोई सहमति बनती नहीं दिख रही है।
लाखों नौकरियों पर तलवार और चुनावी टेंशन
बांग्लादेश की कमाई का 85% हिस्सा गारमेंट एक्सपोर्ट से आता है। अगर 1 फरवरी 2026 से मिलें बंद होती हैं, तो सप्लाई चेन पूरी तरह टूट जाएगी। इसका सबसे बुरा असर मजदूरों पर पड़ेगा, जिन्हें सैलरी मिलना मुश्किल हो जाएगा।
पहले ही 100 से ज्यादा फैक्ट्रियाँ बंद होने से करीब 1 लाख मजदूर बेरोजगार हो चुके हैं। चुनाव से ठीक पहले देश की सबसे बड़ी इंडस्ट्री का ठप होना बांग्लादेश के लिए किसी बड़े आर्थिक भूकंप से कम नहीं होगा।

