भोजशाला में हिंदुओं को अब हर दिन पूजा-पाठ की अनुमति, परिसर से हटा ‘मस्जिद’ का नाम: ASI ने जारी किया नया आदेश, मान लिया- ‘संस्कृत पाठशाला’

मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित भोजशाला को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक अहम कदम उठाया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा भोजशाला को माँ सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर बताए जाने के बाद अब ASI ने हिंदुओं को वहाँ पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक गतिविधियों के लिए बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश की अनुमति दे दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ASI ने पहली बार इस स्थल को ‘राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला एवं संस्कृत पाठशाला’ के रूप में संबोधित किया है। इस आदेश में पहले से चले आ रहे ‘कमाल मौला मस्जिद’ संबंधी उल्लेख इस आदेश में नहीं किया गया है।

ASI के नए आदेश के अनुसार भोजशाला सिर्फ एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि संस्कृत भाषा, व्याकरण और साहित्य के अध्ययन एवं शोध का ऐतिहासिक केंद्र भी रही है। इसी आधार पर हिंदू समुदाय को माँ सरस्वती की पूजा और प्राचीन शिक्षा परंपरा से जुड़े कार्यों के लिए परिसर में स्वतंत्र रूप से आने-जाने की अनुमति दी गई है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि भोजशाला एक सरस्वती मंदिर है और इसके प्रशासन व प्रबंधन को लेकर केंद्र सरकार और ASI फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं। कोर्ट ने ASI के 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें हिंदुओं को केवल मंगलवार को पूजा की अनुमति दी गई थी जबकि मुस्लिम समुदाय को हर शुक्रवार नमाज पढ़ने की इजाजत थी।

इस मामले के मुख्य याचिकाकर्ता ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के आशीष गोयल ने कहा कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में भोजशाला के ऐतिहासिक स्वरूप और वहाँ लंबे समय से चली आ रही हिंदू पूजा परंपरा पर विशेष जोर दिया है। इसी के बाद ASI ने हिंदुओं को साल के 365 दिन वहाँ पूजा करने का अधिकार दे दिया है।

भोजशाला को लेकर विवाद काफी पुराना है। मुस्लिम पक्ष का दावा रहा है कि यह कमाल मौला मस्जिद है जबकि हिंदू पक्ष का कहना है कि यहाँ परमार वंश के राजा भोज द्वारा बनवाया गया माँ सरस्वती का मंदिर था जिसे बाद में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान तोड़ दिया गया था।