पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने गोमांस रखने के मामले में आरोपित 62 वर्षीय नूर मोहम्मद को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने उसकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए साफ कहा कि गोमांस को भैंस का मांस बताकर पेश करना कानूनी कार्रवाई से बचने की एक सोची-समझी कोशिश प्रतीत होती है। जस्टिस आराधना साहनी की पीठ ने माना कि मामले में गहन जाँच और हिरासत में पूछताछ जरूरी है।
गुप्त सूचना से खुला मामला, स्कूटर से बरामद हुआ भारी मात्रा में गोमांस
यह पूरा मामला एक गुप्त सूचना के बाद सामने आया, जब एक गौरक्षक समूह के सदस्य ने पुलिस को शिकायत दी कि नूर मोहम्मद स्कूटर के जरिए कथित तौर पर बीफ की सप्लाई कर रहा है। सूचना के आधार पर स्थानीय लोगों की मदद से आरोपित को रोका गया।
पुलिस जाँच में उसके वाहन से करीब 50 किलोग्राम गोमांस बरामद हुआ। पूछताछ के दौरान नूर मोहम्मद ने दावा किया कि यह मांस भैंस का है और उसने इसे पंजाब व उत्तर प्रदेश के विक्रेताओं से खरीदा था। समर्थन में उसने दो बिल भी पेश किए।
फॉरेंसिक रिपोर्ट से बदली जाँच की दिशा, धाराएँ हुईं सख्त
पुलिस ने मांस की असलियत जानने के लिए नमूने हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय मांस अनुसंधान संस्थान भेजे। फॉरेंसिक जाँच में यह स्पष्ट हुआ कि बरामद मांस ‘बैल या सांड’ का है। रिपोर्ट सामने आने के बाद पुलिस ने मामले में गंभीर धाराएँ जोड़ दीं।
आरोपित पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 के तहत धार्मिक भावनाएँ आहत करने का आरोप लगाया गया। वहीं, पंजाब गोहत्या निषेध अधिनियम 1955 की धारा 8 भी लागू की गई।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, हिरासत में पूछताछ जरूरी
कोर्ट में बचाव पक्ष ने दलील दी कि नूर मोहम्मद को विक्रेताओं ने गुमराह किया और उसकी उम्र को देखते हुए हिरासत की जरूरत नहीं है। हालाँकि, सरकार और गौरक्षक पक्ष ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह कहानी विश्वास योग्य नहीं है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपित की हिरासत में लेकर पूछताछ आवश्यक है ताकि यह पता लगाया जा सके कि गोहत्या कहाँ हुई, इस नेटवर्क में और कौन लोग शामिल हैं और मांस की सप्लाई किन-किन तक होती थी। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि अग्रिम जमानत कोई सामान्य अधिकार नहीं बल्कि असाधारण राहत है, जिसे हर मामले में नहीं दिया जा सकता।

