सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे व्यवहार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से सवाल किया कि ऐसे गंभीर मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई में दखलदांजी क्यों की गई ?
ये मामला 2018 का है। उस वक्त इंदौर से ट्रेन पर एक सिविल जज सवार हुए। उन्हें जबलपुर जाना था। उन्होंने रास्ते में शराब पी ली और जमकर हंगामा किया। यात्रियों के साथ बदसलूकी की। जब रेलवे कर्मचारियों ने समझाने का प्रयास किया तो उसके साथ भी खराब व्यवहार किया। टीटीई को भी काम करने से रोका। बगैर वरिष्ठ अधिकारियों को बताए छुट्टी पर जा रहे सिविल जज ने हद तो तब कर दी, जब एक महिला के सीट के पास जाकर अश्लील हरकत की और पेशाब किया।
“Disgusting”: Supreme Court on Madhya Pradesh civil judge allegedly urinating in train compartment
— Bar and Bench (@barandbench) January 12, 2026
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इस मामले में रेलवे अधिनियम के तहत आपराधिक केस दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में गवाहों के मुकर जाने की वजह से जज को बरी कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने विभागीय जाँच कराई थी जिसमें जाँच अधिकारी ने सभी आरोप सही पाए थे। जज को सेवा से हटाने की सिफारिश की गई जिसपर 2019 में अमल किया गया और राज्यपाल ने आरोपित जज को सेवा मुक्त कर दिया।
हालाँकि मई 2025 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने जज की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। इसमें आपराधिक मामले में बरी किए जाने को आधार बनाया गया।
हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इस दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि गवाहों के मुकरने से कोई दोषमुक्त नहीं हो जाता। हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है और राज्य सरकार से जवाब माँगा है।

