मुंबई के घाटकोपर में जैन संतों के ‘सफेद रास्ते’ को ‘जैन जिहाद‘ बताने वाला सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रसाद वेदपाठक अब खुद को पीड़ित बता रहा है। भारी विरोध के बाद प्रसाद ने एक Video जारी कर दावा किया है कि उसे धमकियाँ मिल रही हैं और उसके खिलाफ साजिश रची जा रही है।
प्रसाद वेदपाठक ने जो Video शेयर किया उसमें वे खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश कर रहा है। वेदपाठक का कहना है कि 4 जून की घटना के बाद से उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई है। कुछ लोग उस पर लगातार दबाव बना रहे हैं।
इसके अलावा, Video में वेदपाठक ये भी कहते सुने जा रहे हैं, कि कुछ लोग उनका पीछा कर घर तक पहुँच रहे हैं। उसे डराया और धमकाया जा रहा है। प्रसाद का दावा है कि उन्हें झूठे कानूनी मामलों में फँसाने की तैयारी चल रही है।
Just few minutes ago uploaded video of Ved asking forgiveness for the controversy that he has done just for his personal agenda from Jains.
— Jago🇦🇹Jain🇦🇹Jago (@devgurudharma) June 17, 2026
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प्रसाद वेदपाठक ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से इस पूरे मामले की जाँच करने की माँग की है। वेदपाठक का कहना है कि वे अपने घर का इकलौता सदस्य है जो कमाता है। अगर वे गिरफ्तार होता हैं, तो उसका पूरा परिवार बर्बाद हो जाएगा।
इस वजह से शुरू हुआ था पूरा हंगामा
यह पूरा विवाद इसी महीने की शुरुआत में शुरू हुआ था। प्रसाद वेदपाठक ने मुंबई की एक सोसायटी का Video पोस्ट किया था। इस सोसायटी में जैन संतों के चलने के लिए एक खास रास्ता बनाया गया था। प्रसाद वेदपाठक ने इस रास्ते पर आपत्ति जताई थी।
प्रसाद ने बिना सोचे-समझे इसे ‘जैन जिहाद’ का नाम दे दिया था। इस भड़काऊ शब्द के इस्तेमाल के बाद इंटरनेट पर लोग भड़क गए थे। जैन समाज और सोशल मीडिया यूजर्स ने उनकी जमकर क्लास लगाई थी।

लोगों ने प्रसाद वेदपाठक पर एक सीधे-साधे धार्मिक नियम को सांप्रदायिक रंग देने का आरोप लगाया था। हर तरफ से घिरने के बाद प्रसाद ने बचने के लिए अपनी सफाई पेश की। उसने कहा था कि वे जैन धर्म के अहिंसा के सिद्धांत का सम्मान करते हैं। इसके बावजूद वे इस रास्ते को धर्म थोपने का जरिया बताते रहे।
जानें क्यों बनाया जाता है यह खास सफेद रास्ता
जैन धर्म में अहिंसा को सबसे बड़ा नियम माना जाता है। जैन साधु और साध्वियाँ हमेशा नंगे पैर ही चलते हैं। मानसून के मौसम में रास्तों पर काई और छोटे-छोटे जीव पैदा हो जाते हैं। जैन दर्शन के अनुसार ये भी जीवित प्राणी हैं। इन्हें अनजाने में भी नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए। संतों के पैरों के नीचे आकर ये जीव न मरें, इसलिए रास्तों पर चूने या सफेद रंग की कोटिंग की जाती है।
यह सफेद कोटिंग गर्मियों में रास्ते को ठंडा रखती है। इससे संतों के पैर नहीं जलते हैं। बारिश में इस कोटिंग की वजह से रास्ते पर काई नहीं जमती है। इससे जैन संतों को भोजन या गोचरी के लिए आने-जाने में आसानी होती है। यह पूरी तरह से एक धार्मिक और वैज्ञानिक परंपरा है।

