दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने के सरकारी फैसले को उचित ठहराते हुए कहा है कि उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए सरकार का यह कदम मनमाना नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वांगचुक को अस्पताल में जबरन इलाज नहीं दिया जा रहा है और डॉक्टर उनकी सहमति के अनुसार ही चिकित्सा कर रहे हैं।
इसी के साथ कोर्ट ने उनकी पत्नी की ओर से उन्हें निजी अस्पताल मेदांता भेजने की माँग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। साथ ही हाई कोर्ट ने कहा है कि सोनम वांगचुक डॉक्टरों का सहयोग करें।
सरकार का फैसला सही, हर जीवन की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी: हाई कोर्ट
जस्टिस मिनी पुष्करणा की एकल पीठ ने कहा कि सरकार ने वांगचुक की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था, इसलिए इस कार्रवाई को मनमाना नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के बावजूद स्वयं अस्पताल में भर्ती नहीं होता है, तो सरकार उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक कदम उठा सकती है।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि पहले डिवीजन बेंच भी स्पष्ट कर चुकी है कि प्रत्येक जीवन मूल्यवान है। ऐसे में सरकार का हस्तक्षेप उचित था। कोर्ट ने यह भी माना कि वांगचुक हिरासत में नहीं हैं और अस्पताल में डॉक्टर लगातार उनकी निगरानी कर रहे हैं। चूँकि उन्हें उनकी सहमति से ही इलेक्ट्रोलाइट्स और अन्य मौखिक चिकित्सा दी जा रही है, इसलिए उनके अधिकारों के उल्लंघन का प्रश्न नहीं उठता।
परिवार को मेडिकल रिपोर्ट देने का आदेश, 24 जुलाई को अगली सुनवाई
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और अस्पताल प्रशासन को निर्देश दिया कि वांगचुक की सभी मेडिकल रिपोर्ट उनके परिवार के साथ साझा की जाएँ। मामले में सभी पक्षों को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 24 जुलाई 2026 तय की गई है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि 16 जुलाई को हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के आदेश के अनुसार वांगचुक के सभी चिकित्सकीय हस्तक्षेप और इलाज की जिम्मेदारी सरकारी डॉक्टरों को सौंपी गई थी।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में सफदरजंग अस्पताल और एम्स के विशेषज्ञ डॉक्टर मिलकर उनका उपचार कर रहे हैं। सरकार ने कोर्ट को बताया कि लगातार 18 दिनों की भूख हड़ताल और उमस भरे मौसम के कारण शरीर में पानी की कमी, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन और अन्य गंभीर चिकित्सकीय जटिलताओं का खतरा था।
इसी वजह से उन्हें अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में भर्ती किया गया। एम्स के डॉक्टर डॉ अक्षय ने कोर्ट को बताया कि वांगचुक ने बिना शुगर वाला ORS और कुछ मौखिक तरल पदार्थ लेना स्वीकार किया है, लेकिन उन्होंने IV फ्लूइड, विटामिन और अन्य उपचार लेने से इनकार कर दिया।
डॉक्टरों के अनुसार, वह डिहाइड्रेशन से पीड़ित हैं और उनके शरीर में पोटैशियम की कमी बनी हुई है, जिसे दूर करना आवश्यक है। सरकार ने यह भी बताया कि वांगचुक की ब्लड जाँच एम्स, सफदरजंग अस्पताल और निजी लैब में कराई गई है, इसलिए इलाज पर संदेह की कोई वजह नहीं है।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि वांगचुक के परिवार को पूरे दिन उनसे मिलने की अनुमति दी गई है, जबकि अन्य मरीजों के परिजनों को केवल निर्धारित समय पर ही मिलने दिया जाता है। परिवार के लिए अस्पताल में अलग कमरा भी उपलब्ध कराया गया है।
मेदांता ले जाने की माँग पर बहस, कोर्ट ने फिलहाल राहत देने से किया इनकार
वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे एंगमो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, विवेक तन्खा और अखिल सिब्बल ने दलील दी कि वांगचुक को अपनी पसंद के अस्पताल और डॉक्टर से इलाज कराने का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में भर्ती होने के बाद वांगचुक की अपने वकीलों और निजी डॉक्टरों तक पहुँच समाप्त हो गई है।
उनका कहना था कि यदि जरूरत हो तो एम्स और सफदरजंग के डॉक्टर भी मेदांता की मेडिकल टीम का हिस्सा बन सकते हैं, लेकिन इलाज उनकी पसंद के अस्पताल में होना चाहिए। सिब्बल ने कोर्ट में यह भी कहा कि वांगचुक किसी हिरासत में नहीं हैं और उनके खिलाफ कोई मामला भी दर्ज नहीं है।
ऐसे में सरकार उनके शरीर और इलाज पर नियंत्रण नहीं कर सकती। वहीं केंद्र सरकार ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि कोर्ट के पहले के आदेश के तहत सरकारी डॉक्टर ही उनका इलाज कर रहे हैं और उन्हें पूरी चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।
ASG ने यह भी कहा कि अस्पताल कोई अदालत नहीं है, इसलिए वकीलों की लगातार मौजूदगी आवश्यक नहीं है। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोर्ट उचित समझे तो वांगचुक को एम्स स्थानांतरित किया जा सकता है, लेकिन इसे किसी रियायत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
मामले में पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि निजी लैब से जाँच कराने के लिए ब्लड सैंपल देने में देरी की गई, जिससे उनका अस्पताल के इलाज पर भरोसा कम हुआ। उन्होंने दावा किया कि निजी लैब की रिपोर्ट में पोटैशियम का स्तर सामान्य सीमा में पाया गया, जबकि अस्पताल की रिपोर्ट में इसे काफी कम बताया गया था।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने फिलहाल किसी भी अंतरिम राहत से इनकार करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में सरकार द्वारा वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराना उचित था। कोर्ट ने केवल मेडिकल रिकॉर्ड परिवार को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 24 जुलाई को निर्धारित की।

