कोर्ट में त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) और अनुच्छेद 26(बी) के बीच संबंध को समझाते हुए कहा कि दोनों को संतुलित तरीके से पढ़ा जाना चाहिए।
सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई में 9 सदस्यों की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं, सबरीमाला रेफरेंस केस की सुनवाई कर रही है।
जस्टिस एम एम सुंदरेश ने पूछा कि क्या कोर्ट लाखों लोगों के प्रतिनिधित्व को सुने बिना ऐसे सवालों पर फैसला कर सकते हैं? इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ऐसी PIL पर तब तक विचार नहीं किया जाना चाहिए जब तक पिटीशनर सिर्फ एक इंटरलॉपर हो। उन्होंने कहा कि समाज सुधार के नाम पर धर्म के अहम मूल्यों को नहीं छीना जा सकता। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “हम समाज कल्याण सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं कर सकते।”
सबरीमाला रेफरेंस केस की सुनवाई 7 अप्रैल को शुरू हुई और 22 अप्रैल को खत्म होगी। यह रेफरेंस सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच के 2018 के फैसले के खिलाफ फाइल की गई कई रिव्यू पिटीशन से आया है। इस फैसले में कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को एंट्री की इजाजत दी थी और सदियों पुरानी परंपरा को खत्म कर दिया था। 2018 का फैसला 4:1 के बहुमत से सुनाया गया था, जिसमें बेंच की अकेली महिला जज, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने अलग राय दी थी। इस फैसले के बाद भगवान अयप्पा के भक्तों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। इनमें महिलाएँ भी शामिल थी।
2018 के फैसले के खिलाफ 60 से ज्यादा रिव्यू और रिट पिटीशन फाइल की गईं। 2019 में तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच ने नवंबर 2019 में सबरीमाला रिव्यू और रिट पिटीशन पर बहुमत से फैसला सुनाया। बेंच ने कहा कि एसेंशियल रिलीजियस प्रैक्टिस टेस्ट से जुड़े मुद्दे, आर्टिकल 25 और 26 और आर्टिकल 14 के बीच तालमेल और शिरूर मठ केस और दरगाह कमेटी केस के फैसलों के बीच टकराव पर एक बड़ी बेंच को फैसला करना होगा। इसलिए मामला 9 जजों की बेंच को भेज दिया गया।
अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार हर व्यक्ति को देता है, वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक मामले के प्रबंधन का अधिकार धार्मिक संस्थानों को देता है। अनुच्छेद 25(2)(बी) सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाने और हर व्यक्ति को धार्मिक स्थलों में प्रवेश करने की अनुमति देता है। ऐसे में अगर सभी हिन्दुओं को धार्मिक संस्था में घुसने की आजादी दी जाती है तो उसके प्रबंधन की आजादी भी धार्मिक संस्थानों को है। वह धार्मिक रीति रिवाजों को संचालित करने का अधिकार रखते हैं। इसलिए तालमेल बेहद जरूरी है।

