पहले निकाह होगा, फिर संंबंध बनाऊँगा, तब ‘हलाला’ माना जाएगा… UP के गोरखपुर में धड़ल्ले से चल रहा है मौलानाओं का धंधा, जानें- अंडरकवर पत्रकार ने क्या खुलासा किया

देश में तीन तलाक कानून लागू होने और इसके गैरकानूनी घोषित होने के बावजूद, उत्तर प्रदेश में आज भी कुछ मौलाना चोरी-छिपे मुस्लिम महिलाओं का शोषण करने से बाज नहीं आ रहे हैं। कानून बनने के पूरे 7 साल बाद भी यह घिनौना खेल धड़ल्ले से चल रहा है। यह दैनिक भास्कर की इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट है।

इस काले कारोबार का पर्दाफाश करने के लिए दैनिक भास्कर की टीम ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का रुख किया। रिपोटर्स ने हलाला के नाम पर हो रहे इस गोरखधंधे का सच सामने लाने के लिए खुद दो मौलानाओं से संपर्क किया। इस दौरान हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि ये दोनों मौलाना मजहब की आड़ में खुद हलाला करने और इसके बदले पैसे वसूलने के लिए तुरंत तैयार हो गए।

गोरखपुर के टेलर मौलाना रहमतुल्लाह का शर्मनाक कबूलनामा

दैनिक भास्कर की टीम ने अपनी इस पड़ताल की शुरुआत गोरखपुर के मौलाना रहमतुल्लाह से संपर्क करके की। रहमतुल्लाह पेशे से एक टेलर की दुकान चलाता है। रिपोटर्स ने उसे अपनी झूठी कहानी सुनाई कि उनका तीन तलाक हो गया है और इद्दत यानी तीन महीने का समय पूरा होने वाला है। उन्होंने पूछा कि अब दोबारा साथ रहने का क्या रास्ता है।

इस पर मौलाना रहमतुल्लाह ने कुरान और हलाला का हवाला देते हुए अजीबोगरीब दलीलें दीं। उसने कहा कि बीवी को ऐसे व्यक्ति से निकाह कराना चाहिए जो जिम्मेदार हो और नए शौहर की मर्जी के मुताबिक ही सब कुछ होगा। जब रिपोटर्स ने कहा कि वे घर के किसी व्यक्ति से हलाला नहीं कराना चाहते, तो रहमतुल्लाह ने बेझिझक कहा कि आपकी बेगम का हमारे साथ निकाह हो जाएगा और उसके बाद हलाला होगा।

‘एक रात रखें या कब तक, यह मेरी मर्जी है’- मौलाना रहमतुल्लाह

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए मौलाना रहमतुल्लाह ने अपनी नीयत साफ कर दी। उसने बेहद बेशर्मी से कहा कि यह पूरी तरह उसकी मर्जी होगी कि वह आपकी बीवी को अपने साथ एक रात रखे या फिर कब तक रखे। उसने यह भी शर्त रखी कि इस दौरान होटल और अन्य चीजों का जो भी खर्च आएगा, वह शौहर को ही उठाना होगा।

मौलाना ने पैसों का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें ज्यादा खर्चा नहीं आएगा और आप 20 से 25 हजार रुपए के अंदर मानकर चलिए। जब रिपोर्टर ने पूछा कि क्या फिजिकल भी होना पड़ेगा, तो उसने जवाब दिया कि मियाँ-बीवी का रिश्ता तो निभाना ही पड़ेगा और चार दिन बाद तो संबंध बनाने ही होंगे। इसके बाद रिपोर्टर वहाँ से यह कहकर लौट आए कि वे कुछ दिन बाद अपनी बीवी को लेकर आएँगे।

मदीना मस्जिद के मुफ्ती मेराज अहमद कादरी का काला सच

रहमतुल्लाह के बाद दैनिक भास्कर की टीम की तलाश गोरखपुर की प्रसिद्ध मदीना मस्जिद के मुफ्ती मेराज अहमद पर आकर खत्म हुई। मुफ्ती मेराज अहमद के पीछे रोज सैकड़ों लोग नमाज पढ़ने आते हैं। रिपोटर्स ने उनके सामने भी अपनी वही झूठी समस्या रखी और हलाला का रास्ता पूछा।

मुफ्ती मेराज अहमद ने बड़े आराम से समझाया कि तीन तलाक के बाद अब सिर्फ हलाला ही एकमात्र रास्ता बचा है। उसने बेझिझक कहा कि इस्लाम के मुताबिक बीवी का दूसरा निकाह होना जरूरी है और उस शख्स के साथ एक या दो रात गुजारना ही होगा। उसने यहाँ तक कह दिया कि एक-दूसरे को चखना ही पड़ता है, चाहे वह संबंध सिर्फ एक ही बार क्यों न बनाया जाए।

होटल का कमरा, मेहर की रकम और मौलाना का मोटा नजराना

मुफ्ती मेराज अहमद ने रिपोर्टर्स को सलाह दी कि अगर घर में कोई वफादार नहीं है, तो वह खुद ऐसे किसी जिम्मेदार शख्स से बात कर लेगा। उसने शर्त रखी कि निकाह के बाद किसी होटल में दो-तीन दिन के लिए कमरा लेना पड़ेगा। उसने कहा कि काम एक दिन में भी हो सकता है और ज्यादा दिन भी लग सकते हैं।

खर्च के बारे में बताते हुए मुफ्ती ने कहा कि कम से कम 11 हजार रुपए मेहर की रकम देनी होगी। इसके अलावा खाने-पीने का इंतजाम करना होगा और 10 से 15 हजार रुपए का अलग से नजराना देना पड़ेगा। इस तरह दैनिक भास्कर के इस बड़े खुलासे ने यह साबित कर दिया कि कैसे मजहब के नाम पर मुस्लिम महिलाओं की इज्जत के साथ खिलवाड़ आज भी किया जा रहा है।

क्या है ‘हलाला’ का नियम और कानून का सख्त रुख

इस्लाम के नियमों के मुताबिक, अगर कोई शौहर अपनी बीवी को एक साथ तीन बार ‘तलाक’ बोल देता है, तो तलाक मान लिया जाता है। इसके बाद अगर शौहर-बीवी को दोबारा साथ रहना हो, तो बीवी को पहले किसी दूसरे व्यक्ति से निकाह करना पड़ता है। उस दूसरे व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध बनाने और उसके द्वारा तलाक दिए जाने के बाद ही वह महिला अपने पहले शौहर के पास लौट सकती है। इस पूरी गंदी प्रक्रिया को ‘हलाला’ कहा जाता है।

जब परिवार का कोई सदस्य ऐसा करने से इनकार करता है, तो ऐसे मौलाना एक संगठित गिरोह की तरह सक्रिय हो जाते हैं। ये मौलाना खुद तलाकशुदा बीवी के साथ होटल में रुकते हैं और रहने-खाने का भारी खर्च भी वसूलते हैं। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पिछले महीने इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी बहुत सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था कि मजहबी प्रथाओं की आड़ में होने वाले ऐसे अपराधों को किसी भी कीमत पर धर्म या पर्सनल लॉ के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।