पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के बीच कलकत्ता हाई कोर्ट के एक फैसले ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। कोर्ट ने चुनाव आयोग के उस अहम मेमो पर रोक लगा दी है, जिसमें करीब 800 संभावित ‘ट्रबल-मेकर’ (उपद्रवियों) के खिलाफ एहतियाती कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।
कोर्ट का तर्क है कि ‘ट्रबल-मेकर’ शब्द कानून में परिभाषित नहीं है। लेकिन, चुनावी हिंसा के इतिहास वाले बंगाल में इस तकनीकी आधार पर दी गई राहत से शांतिपूर्ण मतदान की तैयारियों को बड़ा झटका लगा है। यह रोक जून 2026 के अंत तक जारी रहेगी।
800 लोगों की ‘ब्लैक लिस्ट’ और चुनाव आयोग का फरमान
चुनाव आयोग का यह मेमो 21 अप्रैल 2026 को जारी हुआ था। इसे पश्चिम बंगाल के पुलिस ऑब्जर्वर ने तैयार किया था। इस मेमो के साथ करीब 800 लोगों की एक लिस्ट भेजी गई थी। आयोग ने इन सभी को ‘ट्रबल-मेकर’ यानी उपद्रवी माना था। हैरानी की बात यह है कि इस लिस्ट में कई बड़े नाम थे।
इनमें पार्षद, विधायक और सांसद तक शामिल थे। मेमो में पुलिस को इन पर कड़ी नजर रखने का आदेश था। साथ ही इनके खिलाफ एहतियाती कार्रवाई करने को कहा गया था। आयोग का मकसद चुनाव में गड़बड़ी और डर को रोकना था। लेकिन कानूनी तौर पर ‘ट्रबल-मेकर’ शब्द की कोई परिभाषा नहीं है। इसी आधार पर इस आदेश को कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुरक्षा पर भारी पड़ी कानूनी बारीकियाँ?
22 अप्रैल 2026 को सुनाए गए इस फैसले में हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग के पुलिस ऑब्जर्वर द्वारा चिह्नित 800 संदिग्धों पर कार्रवाई को ‘गैर-कानूनी’ बताया। सवाल यह उठता है कि संवेदनशील समय में अगर आयोग को उपद्रवियों पर अंकुश लगाने से रोका जाएगा, तो क्या इससे जमीनी स्तर पर अशांति फैलने का डर नहीं बढ़ेगा? कोर्ट ने इसे ‘ब्लैंकेट निर्देश’ (एकमुश्त आदेश) करार देकर खारिज कर दिया है।
अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हवाला देते हुए कहा कि बिना ठोस कानूनी प्रक्रिया के किसी की आजादी सीमित नहीं की जा सकती। हालांँकि, जानकारों का मानना है कि चुनाव जैसे नाजुक वक्त में जब हिंसा की आशंका चरम पर होती है, तब सुरक्षा संबंधी ऐसे कड़े फैसलों पर रोक लगाने से अराजक तत्वों के हौसले बुलंद हो सकते हैं।
अब चुनाव आयोग को चार सप्ताह में जवाब देना है। फिलहाल स्थिति यह है कि आयोग ने जिन संदिग्धों को शांति के लिए खतरा माना था, वे अगले पाँच सप्ताह तक किसी भी निवारक कार्रवाई से सुरक्षित रहेंगे।

