Saturday, April 4, 2020
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राहुल गाँधी का इस्लाम और शांति: अक़बर और नरमुंडों का पहाड़ (भाग-1)

अकबर 'महान' के ताज़पोशी की एक ऐसी कहानी जो भारत को अपना देश मानने वालों के रूह कँपा दे। शांति का एक ऐसा सन्देश जो इस्लाम से भारत को मिला।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

राहुल गाँधी ने दुबई में एक बयान देते हुए कहा है कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इस्लाम से भी शांति सीखी। हालाँकि उन्हें ‘हिन्दू’ बोलने में उन्हें कुछ सकुचाहट महसूस हुई और तमाम नाम लेने के बाद वो सनातनियों की अहिंसा तक नहीं पहुँच पाए। हो सकता है जनेऊ पार्टी कार्यालय में ही छूट गया हो। राहुल गाँधी के दुबई में दिए गए इस बयान के बाद इस बात पर तर्क-वितर्क आवश्यक हो जाता है कि आख़िर राहुल गाँधी किस इस्लाम की बात कर रहे हैं। इस्लाम के इतिहास में आख़िर वो कौन-सा वाक़या था जिसने राहुल गाँधी के अनुसार गाँधीजी तक को शांति का सन्देश दिया। इसकी पड़ताल ज़रूरी है।

भारत में जब इस्लाम का नाम आता है और सहिष्णुता की चर्चा की जाती है तब लिबरल और सेक्युलर लोग सबसे पहले अक़बर ‘महान’ की बात करते हैं। इसीलिए यहाँ भी हम बात अक़बर से ही शुरू करेंगे। जी हाँ, इस्लाम, शांति, सहिष्णुता और सद्भाव को एक साथ रख कर चलने वाले अक़बर के चेलों की जब चर्चा हो रही है, तो बात वहीं से शुरू की जाएगी।

हेमचन्द्र विक्रमादित्य- एक ऐसा नाम जो सिलेबस में बहुत कम मिलता है, एक ऐसा नाम जिस पर हमारे इतिहास के किताबों में कोई चैप्टर नहीं है। एक ऐसी गाथा- जो हर भारतीय के जबान पर होनी चाहिए लेकिन अधिकतर लोग इससे अवगत नहीं हैं। लेकिन अब समय आ गया है जब हम इतिहास की गलतियों से सीख लेकर वर्तमान को ठीक करें।

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तो आइए, एक छोटी सी कहानी से शुरू करते हैं। एक कहानी जो भारत में इस्लामिक सद्भावना के सबसे बड़े प्रतीक- अक़बर ‘महान’ से जुडी है, अक़बर की ताज़पोशी से जुड़ी है, भारतीय इस्लामिक इतिहास के सबसे बड़े अध्याय की शुरुआत से जुड़ी है।

कुछ दिनों पहले अमित शाह ने 2019 के लोकसभा चुनावों को पानीपत की तीसरी लड़ाई बताई थी। हो सकता है इसमें सच्चाई हो। लेकिन, उससे पहले हमें यह जानना चाहिए कि पानीपत के दूसरे युद्ध में क्या हुआ था। 5 नवंबर 1556 का दिन था। यानि कि आज से लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पहले। दिल्ली के सिंहासन पर अंतिम हिन्दू सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य उर्फ़ हेमू विराजमान थे। एक ऐसा वीर योद्धा जिसने 22 युद्ध जीत कर इतिहास रच दिया था। एक ऐसा वीर जो एक साधारण गरीब परिवार से मंत्री, सेनाध्यक्ष और फिर सम्राट तक की पदवी पर पहुँचा। लेकिन उसके सिंहासन धारण किए एक महीने भी नहीं हुए थे। तब तक अक़बर की सेना ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया।

हेमू की सेना, दिल्ली के लोग, चाणक्य के अखंड भारत के स्वप्न को फिर से साकार होने का स्वप्न देख रही भारत की जनता- सब आश्वस्त थे कि 22 युद्ध जीतने वाला महान योद्धा उनके लिए फिर जीत की सौग़ात लाएगा। लेकिन हुआ इसके उलट। संख्याबल, शस्त्र और साधन- हर मामले में हेमू की सेना मुग़लों पर भारी थी। पर शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। अपनी सेना का खुद नेतृत्व कर रहे हेमचन्द्र ने जब हाथी पर बैठ कर विकराल रूप धरा तो अकबर का क़रीबी और तुर्क सेना का नेतृत्व कर रहा आततायी बैरम खान भी एक पल के लिए काँप गया।

जीत क़रीब थी तभी न जाने कहाँ से एक तीर आकर हेमू की आँख को बेध गया। मूर्छित हेमू हाथी से सीधा गिर पड़ा और उसकी सेना में ऐसा हाहाकार मचा कि भारत में अगले 300 से भी अधिक वर्षों के लिए इस्लामिक राजसत्ता स्थापित हो गई। यहाँ तक जो भी हुआ वो तख़्त की लड़ाई में दुनिया भर में बहुतों बार हो चुका है। लेकिन इसके बाद जो हुआ वो अक़बर को महान बताने वाले और इस्लाम से शांति सीखने का सन्देश देने वाले हर एक आदमी को अपना मुँह छिपाने पर मजबूर कर दे। अक़बर के आदेश से अधमरे हेमचन्द्र विक्रमादित्य का गला काट कर उसके धड़ और सर को अलग कर दिया गया।

उसके बाद अक़बर की सेना ने दिल्ली में जो तबाही मचाई उसकी तुलना चंगेज़ खान द्वारा बीजिंग में की गई क्रूरता से की जा सकती है। आख़िर, अक़बर के अंदर भी तो बीजिंग को लाशों का शहर बनाने वाले मंगोल चंगेज़ खान का ही खून दौड़ रहा था। हेमू के सर को काबुल भेज दिया गया और उसके धड़ को दिल्ली के एक द्वार से लटका दिया गया ताकि हर एक भारतवासी जो उधर से गुज़रे, अपने राजा का क्षत-विक्षत शव देख कर क्रंदन करे और अपने देश के भाग्य को हज़ार बार कोसे। आज भी अगर आप पानीपत में हेमू के समाधी स्थल के दर्शन करने जाएँ तो सोचे कि वो कौन सी शांति थी जिसका सन्देश अक़बर और बैरम खान ने भारत में आकर दिया था। अक़बर को महान बताने वाले किस मुँह से उसे भारत में धर्मनिरपेक्षता का चेहरा बताते हैं?

अकबरनामा में किया गया चित्रण: स्कल टॉवर (नरमुंडों का पहाड़) ; फोटो साभार: ट्रू इंडोलॉजी

इसके बाद दिल्ली में खोपड़ियों का एक इतना बड़ा टावर खड़ा किया गया जिसे पूरी दिल्ली देख सके। नरमुंडों का एक इतना विशाल ढेर, जिसे देख कर नृशंसता भी हज़ार बार काँपे। भारत में इस्लामिक आक्रांताओं द्वारा किये गए सैकड़ों आक्रमणों में से ये सबसे ज़्यादा क्रूर, नृशंस और घिनौना था। उसके बाद अकबर की सेना ने दिल्ली में घुस कर हज़ारों महिलाओं का बलात्कार किया, जिन्होंने इस्लाम अपनाने से मना किया- उनका सर बेहद ‘शांति’ से अलग कर दिया गया। ऐसी मारकाट मचाई गई जिस से दिल्ली में या तो लाश बचे या फिर ज़िंदा लाश।

नरमुंडों के कंकाल के बीच शांति का एक बहुत ही अच्छा सन्देश दिया गया। और उस पर विडम्बना ये कि उस घटना के बाद जो शहंशाह बन कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा- वो ‘महान’ बना और उसे भारत में सांप्रदायिक समावेश का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया गया। ये कहाँ का न्याय है? ऐसा किसी देश में नहीं हुआ की जिस आक्रांता ने वहाँ जाकर उनके पूर्वजों को मारा-काटा हो, महिलाओं की इज़्ज़त लूटी हो- उसे ही भगवान बना दिया गया।

अगर यही इस्लाम है, अगर यही इसके लिए शांति का सन्देश है- तो फिर ईश्वर न करे कि ऐसी शांति भविष्य में कभी देखने को मिले। ऐसे शांति के अनगिनत सन्देश दिए गए हैं भारत को- इस्लाम द्वारा, इस्लामिक आक्रांताओं द्वारा, आज के लिबरल्स के पोस्टर बॉय्ज़ द्वारा। इस सबकी पड़ताल होगी एक-एक कर। इतिहास में जाकर हर उस घटना को खँगाला जाएगा जहाँ इस्लाम ने शांति का सन्देश देने की कोशिश की है और उसे आज के लोगों के सामने बताया जाएगा। इंतज़ार कीजिये हमारे इस सीरीज़ के अगले लेख का।

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