अरविन्द केजरीवाल! घटिया राजनीति के झाड़ू से मांगलिक चिह्न ‘स्वस्तिक’ का अपमान मत करो

जिस जनता से पूछकर केजरीवाल हर काम करते हैं क्या उन्होंने उस जनता से जाकर पूछा कि उसके लिए स्वस्तिक चिह्न के क्या मायने हैं? शहरी नहीं तो ग्रामीण जनता से ही पूछ लेते कि गाँवों में पुराने जमाने में मिट्टी के घरों की दीवारों पर कौन सा चिह्न बना होता था।

राजनीति सबके बस की बात नहीं। और जो व्यक्ति बदलाव की राजनीति करने आया हो उसके बस की बात तो बिलकुल भी नहीं। क्योंकि राजनीति की दशा और दिशा में तो बदलाव संभव है लेकिन बदलाव की राजनीति ऐसी प्रक्रिया है जो हो ही नहीं सकती। कारण यह है कि चिंतन की किसी भी धारा में बदलाव एक सतत और नैसर्गिक प्रक्रिया है जिसे धरने के मंच से चिल्लाकर नहीं किया जा सकता।

लोकतंत्र में राजनीति कोई ‘एकल दिशा मार्ग’ नहीं बल्कि बहुआयामी व्यवस्था है जिसमें जनता राज्य को अपने ऊपर शासन करने की शक्ति प्रदान करती है और बदले में लोक कल्याण सहित सुरक्षा की गारंटी की मांग करती है। जबकि परिवर्तन एक लीनियर प्रोसेस है, इतिहास में एक समय में राजनीति के किसी एक आयाम में ही परिवर्तन हुआ है। सब कुछ एक ही दिन में या एक रात में नहीं बदल जाता।

अरविन्द केजरीवाल जिस बदलाव की राजनीति करने आए थे वह कभी संभव ही नहीं थी। इसीलिए मैंने एक बार इस व्यक्ति के लिए लिखा था कि इसकी हरकतें राजनीति और शासन व्यवस्था के लिए घातक हैं। निरंतर प्रधानमंत्री मोदी को लक्षित कर गालियाँ देना, अराजक माहौल उत्पन्न करना, लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधिकारों से टकराना जैसे कृत्य कोई बदलाव तो नहीं ला सके अलबत्ता व्यवस्था परिवर्तन के नारों को बाबा भारती का घोड़ा जरूर बना दिया।

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अरविन्द केजरीवाल के कारनामों का ताजा उदाहरण है उनका एक ट्वीट जिसमें एक प्रतीकात्मक चित्र में झाड़ू लिया हुआ व्यक्ति ‘स्वस्तिक’ चिह्न को खदेड़ कर भगा रहा है। केजरीवाल के अनुसार यह चित्र किसी ने उन्हें मोबाइल पर भेजा लेकिन इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस प्रकार का हिन्दू विरोधी चित्र केजरीवाल की टीम ने खुद बनाया हो। चित्र से जो संदेश निकलकर सामने आ रहा है वह स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी का झाड़ू एक दिन हिन्दू संस्कृति के प्रतीक स्वस्तिक को खदेड़कर भगा देगा।

प्रश्न यह नहीं कि इस प्रकार के चित्र से केजरीवाल क्या दिखाना चाहते हैं, सवाल यह है कि नगरों में रहने वाली आम जनता- जिसके प्रतिनिधि के रूप में केजरीवाल ने खुद को प्रोजेक्ट किया- के मस्तिष्क में स्वस्तिक का क्या अर्थ छिपा हुआ है। आमतौर पर मांगलिक कार्यों जैसे विवाह इत्यादि समारोह में ही शहरी जनता स्वस्तिक का चिह्न देखती है। दिल्ली जैसे नगर की जनता स्वस्तिक का सही अर्थ न जानती है न जानना चाहती है।

देश का युवा वर्ग जो कि आज वोटरों का भी सबसे बड़ा हिस्सा है उसके दिमाग में हॉलीवुड सिनेमा ने यही भर दिया है कि स्वस्तिक नाज़ी विचारधारा के जनक हिटलर का ‘निशान’ है। अंग्रेज़ी मीडिया में भी हिटलर की नाज़ी पार्टी के चिह्न के लिए स्वस्तिक शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है जिसके कारण लोग स्वस्तिक का वास्तविक अर्थ भूलकर उसकी फासिस्ट व्याख्या को ही सच मान बैठे हैं।

पहली बात तो यह है कि भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक चिह्न का प्रयोग शुभ एवं मंगल कामनाओं के लिए किया जाता है यह किसी राजनैतिक विचारधारा का प्रतीक नहीं है। वैदिक मंत्रों में स्वस्ति वाचन की परंपरा है। स्वस्ति का शाब्दिक अर्थ है ‘मंगल हो’ (सु+अस्ति)। ‘स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः’ आदि मंत्रों में भी इंद्र और पूषा जैसे देवताओं से मंगल कामनाएँ की जाती हैं। उपनिषदों के प्रारंभ और अंत में शांति मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि त्रिविध तापों की शांति हो। यह मंत्र गृह प्रवेश से लेकर बच्चे के जन्म, उपनयन संस्कार और विवाह तक में प्रयोग होते हैं। स्वस्तिक का चिह्न ऐसी सुंदर परंपरा का वाहक है।

इतिहास में देखें तो हिटलर ने कभी नाज़ी पार्टी के चिह्न को स्वस्तिक शब्द से संबोधित नहीं किया। नाज़ी जिस प्रतीक चिह्न का प्रयोग करते थे उसे वे Hakenkreuz कहते थे। यह उल्टा स्वस्तिक भले ही दीखता हो लेकिन हिन्दू सनातनी परंपरा से इसका कोई संबंध नहीं था। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात कुछ पश्चिमी स्कॉलरों ने Hakenkreuz को उल्टा स्वस्तिक कहना प्रारंभ किया जिसके कारण विमर्श में यह शब्द आ गया। विडंबना यह है कि आज भारत के शहरी युवाओं का एक बड़ा वर्ग स्वस्तिक चिह्न का गलत अर्थ जानता है। इस अज्ञानता का लाभ लेकर केजरीवाल जैसे घाघ नेता सांकेतिक रूप से भारत की संस्कृति पर कीचड़ उछालने से बाज नहीं आते।

आज समय आ गया है कि जनता केजरीवाल से पूछे कि हिन्दू सनातनी संस्कृति पर कीचड़ उछालने से कौन सी ‘बदलाव की राजनीति’ हो रही है। माना कि मोदी केजरीवाल के  राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन भारत की सांस्कृतिक परंपराओं से केजरीवाल का क्या अहित होता है? भाजपा को फासिस्ट सिद्ध करने के और भी हथकंडे और मुद्दे हैं जिनका प्रयोग किया जा सकता था। लेकिन जिस जनता से पूछकर केजरीवाल हर काम करते हैं क्या उन्होंने उस जनता से जाकर पूछा कि उसके लिए स्वस्तिक चिह्न के क्या मायने हैं?

शहरी नहीं तो ग्रामीण जनता से ही पूछ लेते कि गाँवों में पुराने जमाने में मिट्टी के घरों की दीवारों पर कौन सा चिह्न बना होता था। आज भी भारत की जनता दीपावली पर पूजा की थाली में लाल रोली से स्वस्तिक चिह्न बनाकर ही गणेश लक्ष्मी की पूजा करती है। स्वयं केजरीवाल जिस बनिया समुदाय से आते हैं वे अपनी तिजोरी पर भी स्वस्तिक चिह्न बनाते हैं। हिन्दू के अतिरिक्त जैन और बौद्ध मतावलंबी भी धार्मिक आयोजनों पर स्वस्तिक का प्रयोग करते हैं।

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