परीक्षाओं के दौर में आत्महत्या की ख़बरें आएँगी और बतौर समाज हम कुछ नहीं करेंगे

ध्यान देने लायक है कि कम नंबर आने पर आत्महत्या करने वाली छात्राओं की गिनती लड़कों से कहीं ज़्यादा है। कौन-से शिक्षाविद और मनोचिकित्सक ये मान लेंगे कि लड़कियों पर कम नंबर लाने पर शादी कर दिए जाने का दबाव भी रहता है?

जनवरी बीत रही है और हर साल की तरह थोड़े ही दिनों में इस साल भी परीक्षाओं की तारीख़ों का शोर होगा। इसके साथ ही अख़बारों में दिखने लगेंगे, कम नंबर आने के डर से या फिर परीक्षा खराब जाने की वजह से आत्महत्या करने वाले बच्चों की दर्दनाक कहानियाँ। पसंद हो या न हो, ये होता तो हर साल है! सवाल है कि माँ-बाप का, समाज का, अच्छी यूनिवर्सिटी में जाने, एक मोटी तनख़्वाह वाली नौकरी की संभावनाएँ बनाने का कैसा दबाव है जो अख़बारी भाषा में बच्चों को ये ‘अंतिम विकल्प’ चुनने पर मजबूर करता है? बतौर एक समाज हमने किया क्या है इस दिशा में?

कोई फाँसी के फंदे पर बस इसलिए झूल जाना चाहता है क्योंकि उसे अंग्रेज़ी नहीं आती या फिर वो गणित में कमज़ोर है? हाल में ही पटना के एक इंजीनियरिंग के छात्र ने हॉस्टल की छत से सिर्फ इसलिए छलाँग लगा ली क्योंकि उसे छह लाख सालाना का पैकेज मिला था। ‘सूरत में एक छात्र ने फाँसी लगा ली’ या ‘इलाहाबाद में कोई ट्रेन के आगे कूद गया’ जैसी ख़बरें अब अजीब नहीं लगती। परीक्षाओं का आना, छात्रों के आत्महत्या की घटनाओं के अख़बार में न्यूज़ चैनल पर आने का मौसम भी हो गया है। ऐसा ही चलता रहा तो हो सकता है इसे दूसरी राष्ट्रीय आपदाओं की श्रेणी में डाला जाए – बाढ़, भूकंप जैसा ही परीक्षा भी हो!

अख़बारों के ज़रिए ही 2006 का सरकारी आँकड़ा भी मिल जाता है, जब 5,857 छात्रों ने आत्महत्या की, 2016 तक ये गिनती 9,500 हो गई। इतने पर ये हिसाब हर घंटे एक मौत का हिसाब बनता है। जहाँ देश की आबादी क़रीब आधी ही युवाओं की हो, वहाँ इतनी बड़ी संख्या पर ध्यान कैसे नहीं गया? ये भी एक आश्चर्य है। बच्चों को कैसी प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ती है, वो आम आदमी को पता न हो ऐसा भी नहीं। दिल्ली के ज्यादातर नामी-गिरामी कॉलेज 98% से ऊपर नंबर पर एडमिशन ले रहे हैं, ये भी एक ख़बर है जो हर साल सब ने सुनी भी होती है।

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आई.आई.टी. और आई.आई.एम. जैसे दर्जन भर के लगभग संस्थान और सभी नामचीन कॉलेज एक साथ मिला लें तो वो पचास हज़ार बच्चों का भी दाख़िला नहीं ले सकते। इस से दस गुना बच्चे तो हर साल स्कूल से ही निकलते हैं। कस्बों के छोटे कॉलेज जोड़ लें तो गिनती और बढ़ जाएगी। दस साल पहले तक जहाँ बोर्ड की परीक्षा में 80-85% पर राज्य भर के टॉपर होते थे, आज 90-95% बड़ी ही आम बात लगती है। 90 फीसदी लाने वाले बच्चे के माँ-बाप सकुचाते हुए बताएँगे कि फलाँ विषय में बच्चे ने कम मेहनत की, बस वहीं मार खा गया। ‘थोड़ी मेहनत की होती तो और आते जी’!

इस से अपराधों को भी बढ़ावा मिलता है। केन्द्रीय बोर्ड (सी.बी.एस.सी. या आई.सी.एस.सी.) जहाँ बड़े आराम से 90% देते हैं, वहीं राज्य के बोर्ड में 65% पार करना भी मुश्किल है। आश्चर्य नहीं कि हरियाणा से लेकर यू.पी. और बिहार तक अभिभावक खिड़कियों से लटक-लटक कर छात्रों को चोरी-नक़ल करने में सहयोग करते पाए जाते हैं। बिहार का पिछले वर्षों का टॉपर घोटाला अभी याद से गया नहीं होगा। जिस लड़की के पास लाखों की रकम देने के ना तो आर्थिक स्रोत थे, न जान-पहचान, वो जेल में है। कदाचार और भ्रष्ट व्यवस्था के पोषक अभी फिर मोटा माल कमाने का मौसम आने पर मुदित हो रहे होंगे।

बिहार टॉपर काण्ड की रूबी

प्रोफ़ेसर यशपाल की समिति की पतली-दुबली 25-30 पन्नों की रिपोर्ट धरी रह गई और छात्रों की आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ती रही। हम आखिर कब ध्यान देंगे इसपर? ध्यान देने लायक है कि कम नंबर आने पर आत्महत्या करने वाली छात्राओं की गिनती लड़कों से कहीं ज़्यादा है। कौन-से शिक्षाविद और मनोचिकित्सक ये मान लेंगे कि लड़कियों पर कम नंबर लाने पर शादी कर दिए जाने का दबाव भी रहता है? पढ़ने में अच्छी नहीं तो शादी करवा दो, जैसे शादी कोई जेल हो, सज़ा सुनाई गई हो। बिहार के मुख्यमंत्री जो बाल विवाह के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं उनका बाल विवाह के इस अनोखे कारण पर ध्यान गया या नहीं, पता नहीं।

कम नंबर लाने वाले छात्र-छात्राओं को अक्सर प्राइवेट संस्थानों से पढ़ाई करनी पड़ती है जो कि महँगे भी है और कई बार मान्यता प्राप्त नहीं होते। अच्छे नंबर ना हुए और आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं तो ‘पढ़ाई छूट जाएगी’ का डर, या फिर दो-चार साल पढ़ने के बाद पता चलना कि उनकी डिग्री का नौकरी के बाज़ार में कोई मोल ही नहीं। यह भी बच्चों के आत्महत्या का एक बड़ा कारण होता है। हाल के दौर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार जैसे नेता, राजनीति से इतर, सामाजिक मुद्दों पर भी चर्चा करने लगे हैं। अच्छा है कि उनके बोलने से सामाजिक सरोकार, अख़बार के पहले पन्ने पर आ गए।

पिछले साल (फ़रवरी 3, 2018) को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक किताब, जो कि परीक्षाओं से सम्बंधित बच्चों के तनाव पर है, आई थी। उम्मीद है कि जो बच्चे आज वोट नहीं देते और नेताओं के लिए या व्यापार, समाज की दृष्टि से उतने मूल्यवान नहीं दिखते थे, उनकी बात भी अब होगी। हमारे बच्चे हमारा भविष्य हैं, उनकी चर्चा हमारी पहली चर्चा होनी भी चाहिए।

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