Sunday, March 7, 2021
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मुंबई से मेडिकल साइंस की एक ख़बर और महर्षि दधीचि के बलिदान की महान गाथा

राजेश की हड्डियों से बोन कैंसर का इलाज़, दिल और लिवर से 2 लोगों को नई ज़िंदगी। स्किन किसी अन्य मरीज के काम, उनका कॉर्निया लक्ष्मी आई बैंक को ताकि...

युगद्रष्टा वाजपेयी की कविता

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा लिखित ये पंक्तियाँ सिर्फ़ एक कपोल-कल्पना नहीं है। ये देश के युवाओं से एक निवेदन भर नहीं है। और न ही ये आजकल की इंटरनेट पर वायरल होती साधारण कविताओं की पंक्तियाँ हैं। वाजपेयी की ये पंक्तियाँ आजकल के युवाओं को भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना से प्रेरणा लेने को कहती है, जिसका आज कोई साक्ष्य भले ही उपलब्ध न हो, लेकिन जिसकी कहनियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी होते-होते हम तक यूँ पहुँची है, जैसे रामायण और महाभारत।

वाजपेयी यहाँ जिस कहानी को प्रेरणा के रूप में पेश कर रहे हैं, वो बलिदान की वो महान गाथा है, जिसका न कभी कोई सानी था और न होगा। आज संस्थाओं द्वारा ‘नेत्रदान’ के लिए अभियान चलाया जाता है। अमिताभ बच्चन तक इसके लिए अपील करते हैं। अंगदान का अपना एक विशेष महत्व है। जो अंगदान करते हैं, उन्हें महादानी की श्रेणी में रखा जाता है। कई विभूतियों ने अपने शरीर तक का दान किया है। मृत्योपरांत उनके शरीर का मेडिकल शोध जैसे कार्यों में उपयोग किया जाता है। ऐसे में यह जान कर आश्चर्य होता है कि अंगदान की परिकल्पना भारतीय धरती पर तभी अस्तित्व में आ गई थी, जब भारत ऋषि-मुनियों की भूमि हुआ करती थी। जब जम्बूद्वीप मनीषियों की तपस्या का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता था, जब इंसान देवी-देवताओं तक को इस धरती पर आने को विवश कर देता था।

बांद्रा के शिक्षक, जिन्होंने मरने के बाद बचाई कई ज़िंदगियाँ

अभी एक ऐसी घटना हुई, जिस ने हमारे उस इतिहास को पुनर्जीवित कर दिया, उसे फिर से स्मरण करने और कराने को विवश कर दिया। दरअसल, ये घटना बांद्रा के BMC विद्यालय में पढ़ाने वाले एक शिक्षक से जुड़ी है, जो मरते-मरते भी कइयों को जीवनदान दे गए। 44 वर्षीय राजेश गांघव गुरुवार (जनवरी 17, 2019) को अचेत होकर गिर पड़े। इस कारण उनके सर में गहरी चोट लगी। उनके परिवार वाले उन्हें लेकर नवीं मुंबई स्थित अपोलो हॉस्पिटल में गए, जहाँ पता चला कि वो इंटरकॉर्निअल हेमरेज से जूझ रहे हैं।

लाख इलाज़ के बावज़ूद उन्हें ठीक नहीं किया जा सका और क्लिनिकल प्रोटोकॉल के अनुसार उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। वो अपने पीछे अपनी पत्नी और पाँच वर्षीय बेटी को छोड़ गए, जिन्होंने उनके अंग दान करने का निर्णय लिया। उनके परिवार ने स्वर्गीय राजेश की हड्डियों के अलावे अन्य अंगों का भी दान करने का निर्णय लिया। बहुत कम लोग इस प्रकार का निर्णय ले पाते हैं और राजेश की पत्नी ने यह दिखा दिया कि एक महिला के दिल में जितनी ममता होती है, उतना ही साहस और सामर्थ्य भी होता है।

राजेश की हड्डियों को टाटा मेमोरियल हॉस्टिपल में भेज दिया गया, जहाँ उनका उपयोग बोन कैंसर से पीड़ित मरीजों को नई ज़िंदगी देने के लिए किया जाएगा। राजेश के दिल और लिवर को भी दान कर दिया गया, जिस से दो लोगों को नई ज़िंदगी मिली। उनका दिल अब एक ऐसे व्यक्ति के अंदर धड़क रहा है, जो कभी फोर्टिस हॉस्पिटल में मौत से जूझ रहा था। वहीं उनके लिवर को अपोलो हॉस्पिटल में ही एक 46 वर्षीय मरीज को ट्रांसप्लांट किया गया। उनकी स्किन को मसिना हॉस्पिटल भेजा गया है, जहाँ ये किसी अन्य मरीज के काम आएंगे। उनके परिवार ने उनका नेत्रदान का भी फ़ैसला लिया और उनके कॉर्निया को लक्ष्मी आई बैंक (Lakshmi Eye Bank) भेज दिया गया।

राजेश तो दुनिया में नहीं रहे लेकिन मरते-मरते जितने लोगों को ज़िंदगी दे गए, उसके लिए पूरी मानवता उनकी और उनके परिवार की ऋणी रहेगी। उनकी पत्नी ने एक ऐसी मिशाल कायम की, जो हमें महर्षि दधीचि की याद दिलाती है। जो यह दिखाती है कि मानव जाति के उद्धार के लिए जब-जब बलिदान की आवश्यकता पड़ी है, भारत की धरती पर ऐसे वीरों ने जन्म लिया है- जिन्होंने बिना किसी हथियार के उपयोग के मानवता को बचाने के लिए महादान दिया है। ऋषि दधीचि ने भी एक समय ऐसे ही अपनी हड्डियाँ दान कर दी थीं ताकि एक ऐसे राक्षस का वध किया जा सके, जो मानव ही नहीं बल्कि देवी-देवताओं के अस्तित्व के लिए भी संकट बन खड़ा हुआ था।

कौन थे महर्षि दधीचि?

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में दाधीच ब्राह्मण रहते हैं, जो ब्राह्मण समाज का ही एक अंग है। कई सामाजिक आयोजनों और दधीचि जयंती पर सामाजिक कार्यों के लिए कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रसिद्ध दाधीच समाज के लोग अपने-आप को महर्षि दधीचि का वंशज मानते हैं। आज जब भारत में हर साल 5 लाख लोग सिर्फ इसीलिए मर जाते हैं क्योंकि उन्हें समय पर ऑर्गन नहीं मिल पाता, महर्षि दधीचि की प्रेरणादायी कहानी का स्मरण करने का यह बिलकुल सही समय है। वार्षिक आंकड़ों की बात करें तो अंगदान के मामले में भारत दुनिया के कई देशों से काफ़ी पीछे है। 2013 के आंकड़ों के अनुसार 20 लाख लोगों में सिर्फ एक भारतीय ने अंगदान किया। इस मामले में क्रोएशिया और स्पेन जैसे देश भारत से काफ़ी आगे हैं।

ब्रह्मविद्या सारे विद्याओं में सबसे दुर्लभ है और इसका अभ्यास करने वाले बहुत कम लोग हुए हैं। हिंदुत्व के अलावे बाकी के पंथ और धर्म की पवित्र पुस्तकों में भी इस विद्या का किसी न किसी रूप में जिक्र है और इसके अभ्यास करने के तरीके बतलाए गए हैं। दधीचि इस विद्या के प्रमुख उपासकों में से एक थे और ये इतनी दुर्लभ विद्या है कि देवराज इंद्र तक इसे सीखने को व्याकुल थे। उन्होंने दधीचि से इसके लिए निवेदन भी किया लेकिन महर्षि ये मानते थे कि देवराज इसके योग्य नहीं हैं और उन्होंने उन्हें ये विद्या सिखाने से इनकार कर दिया। गुस्साए देवराज ने यह प्रण किया कि अगर ये विद्या उन्हें नहीं मिली तो वह किसी और को भी नहीं सीखने देंगे।

इंद्र ने शपथ ली कि अगर दधीचि ने ब्रह्मविद्या, जिसे मधुविद्या भी कहा जाता था, किसी और को सिखाई तो वो उनका सर धड़ से अलग कर देंगे। अश्विनीकुमार ने दधीचि से यह विद्या सीखी और उन्हें इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए एक योजना तैयार की। उन्होंने महर्षि के सर को धड़ से अलग कर दिया और उसकी जगह घोड़े का सर लगा दिया। इसी कारण उन्हें अश्वसिर के नाम से भी जाना गया। मेडिकल और आयुर्वेद की कई पुस्तकों में अश्विनीकुमार का जिक्र मिलता है। उन्होंने दधीचि के कटे हुए सर को आयुर्वेद का उपयोग कर कहीं संभाल कर रख दिया। हालाँकि इस बात से गुस्साए इंद्र ने दधीचि के घोड़े वाले सर को काट डाला, जिसके बाद अश्विनीकुमार ने फिर से उनके असली सर को उनके धड़ पर स्थापित कर दिया।

वृत्रासुर वध और दधीचि का महा बलिदान

वृत्रासुर एक ऐसा राक्षस हुआ, जिसने पूरे विश्व से जीवन का अंत करने के लिए एक ऐसी योजना तैयार की, जिस से मानव तो मानव, देवताओं तक में खलबली मच गई। उसने समस्त ब्रह्माण्ड के जलस्रोतों को अपने आधीन करना शुरू कर दिया ताकि जीव-जंतु पानी के बिना तड़प-तड़प कर मर जाएँ। देवेश इंद्र को स्वर्गलोक से बचाने के पश्चात उसने सम्पूर्ण मानवता का अस्तित्व ख़त्म करने की ठान ली। ऐसे में इंद्र भगवान विष्णु के पास गए लेकिन उन्होंने कहा कि इस समस्या का हल ऋषि दधीचि ही निकाल सकते हैं क्योंकि यह राक्षस उन्हीं की हड्डियों द्वारा निर्मित अस्त्र से मरेगा। अब देवराज के पास कोई अन्य उपाय न बचा था।

इंद्र यह सोच रहे थे कि जिस दधीचि को उन्होंने डराया-धमकाया था, अपमानित किया था और यहाँ तक की सर भी काट डाला था- क्या वही ऋषि उन्हें बचाने के लिए अपने शरीर का बलिदान देंगे? ग्लानि से भरे इंद्र ने दधीचि से इसके लिए निवेदन किया। कभी इंद्र को ब्रह्मविद्या सिखाने से मना करने वाले दधीचि उन्हें अपनी हड्डियाँ देने को सहर्ष तैयार हो गए। इसके बाद महर्षि ने जो किया, वो भारतीय मनीषियों के स्नेह और करुणा भरे कृत्य की अमर निशानी बन गई। उन्होंने अपने प्राण त्यागने से पहले विश्व के समस्त तीर्थों की यात्रा करने की शर्त रखी, जिसे इंद्र ने पूरा किया।

ये कहानी अब हमें सीतापुर से कुछ दूर स्थित नरसिम्हारण्य ले जाती है। वहाँ स्थित मंदिर इस बात की गवाही देता है कि देवराज इंद्र ने तीनों लोकों के तीर्थ का जल यहाँ पर सिर्फ़ इसीलिए मंगाया ताकि शरीर त्यागने से पहले महर्षि दधीचि इन सबका दर्शन कर सकें। दर्शनोपरांत महर्षि ध्यानमग्न हो गए और उन्होंने गहन समाधि लगा कर अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद कामधेनु गाय ने एक अन्य विद्या का प्रयोग कर उनके शरीर से उनकी हड्डियों को अलग किया, जिसके प्रयोग से देवताओं ने कई अस्त्र तैयार किए। उन्हीं हड्डियों से इंद्र का वज्र भी बना, जिस से अंततः वृत्रासुर का वध किया गया।

हमारे योगदान का श्रेय कभी तो मिलेगा हमें

ये कहानी काफ़ी-कुछ कहती है। हजारों-लाखों साल पहले इंसान की मृत्यु के बाद उसकी हड्डियों को अलग करने की प्रक्रिया की परिकल्पना यह बतलाती है कि आधुनिक सोच और मानवता की रक्षा के लिए बलिदान के मामले में भारत की धरती सर्वोपरि रही है। भले ही इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण आज मौज़ूद नहीं हो, भले ही कई लोगों के लिए ये सिर्फ़ एक कपोल-कल्पना हो, भले ही रामायण और महभारत तक को फिक्शन वाले उपन्यास की श्रेणी में रखने वालों के लिए ये सिर्फ़ बच्चों के मनोरंजन की कथाएँ हों- लेकिन इस कहानी से जो प्रेरणा मिलती है, इसके पीछे के महातम्य का जो उद्देश्य मिलता है, हजारों साल पुरानी पुस्तकों में जो इसका वर्णन मिलता है- वो यह बताने के लिए काफ़ी है कि अगंदान की परिकल्पना यहाँ हजारों साल पहले की गई थी।

तभी अटल बिहारी वाजपेयी युवाओं को प्रेरणा देने के लिए दधीचि का नाम लेते हैं। तभी बांद्रा के राजेश की कहानी हमें दधीचि की याद दिलाती है, तभी जब हम ऑर्गन की कमी से एक साल में 5 लाख लोगों के मरने की ख़बरें पढ़ते हैं तो हमें दधीचि की प्राचीन, पुरातन और वैदिक कहानी अनायास ही याद आ जाती है। अभी हाल ही में कोलोम्बिया यूनिवर्सिटी ने माना है कि सर्जरी के जनक शुश्रुत थे और हजारों साल पहले भारत में इसकी प्रक्रिया का वर्णन किया गया और इसका इस्तेमाल दुनिया भर के डॉक्टर और अस्पताल कर रहे हैं।

एक ऐसा समय आएगा, जब परत दर परत पुरातन भारतीय तकनीक की खोज होगी, हमारी धरती को इसका श्रेया मिलेगा और इसके लिए प्रयास किए जाएँगे। इसी इन्तजार में स्वर्गीय राजेश और उनके जैसे लोगों और उनके परिवारों को धन्यवाद करते हुए, उनके कभी न चुका पाने वाले ऋण के लिए, हम सम्पूर्ण मानवता की तरफ से उन्हें धन्यवाद करते हैं और कामना करते हैं कि दधीचि की कहानी ऐसे ही प्रेरणा देती रहे।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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