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विकास के बाद अब जातिवाद की राजनीति की ओर धकेला जा रहा गुजरात, कौन हर मुद्दे में जबरन जोड़ रहा जाति का गणित

यूट्यूब के पत्रकारों से लेकर तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स तक पूरा इकोसिस्टम लगातार ऐसा माहौल बनाने में लगा हुआ है। किसी न किसी रूप में उनकी ज्यादातर खबरें जातियों के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। किसी न किसी तरीके से हमें इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

गुजरात के बाहर पत्रकारों और राजनीतिक हस्तियों से बात करते समय एक शिकायत हमेशा सुनने को मिलती है कि गुजरात राजनीतिक रूप से बहुत ‘हैपनिंग’ राज्य नहीं रहा है। यह शिकायत काफी हद तक सही है। हम इन सभी मामलों में मूल रूप से शांतिप्रिय लोग हैं। चुनाव 5 साल में एक बार होते हैं और चुनाव के दौरान ही कुछ हंगामा होता है। एक बार नई सरकार बन जाती है तो हमारा ध्यान काम पर लौट आता है। जब चुनाव 5 साल बाद आते हैं, तो उस पर बात करने का समय होता है। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा ही हो रहा था। अब यह ट्रेंड बदल रहा है। हालाँकि, हमाम में सब नंगे हैं लेकिन इस सब में एक बड़ा योगदान विपक्ष और उनके इकोसिस्टम का है। क्योंकि तीन दशकों तक सत्ता से अलग-थलग रहने के बाद शायद उनके लिए सत्ता तक पहुँचने का यही एकमात्र रास्ता है।

कुछ राज्यों में अभी भी जाति की राजनीति हावी है। हालाँकि, वहाँ भी जाति की राजनीति धीरे-धीरे अपना असर खो रही है और दूसरे मुद्दे ज्यादा अहम होते जा रहे हैं। समीकरण धीरे-धीरे बदल रहे हैं। इसके उल्ट गुजरात पिछले कुछ सालों में गलत दिशा में जाने लगा है। बल्कि, चीजों को गलत दिशा में ले जाने के लिए सिस्टमैटिक, प्लान्ड कोशिशें चल रही हैं।

अगर हम इतिहास पढ़ें तो हमें पता चलता है कि गुजरात में एक समय ऐसा रहा था। माधव सिंह की ‘खाम’ थ्योरी बहुत मशहूर है। यह सब 2001 तक चलता रहा लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद राजनीति के केंद्र ‘जाति’ धीरे-धीरे हटती गई और विकास, अर्थव्यवस्था आदि केंद्र में आते गए। यही एक वजह है कि मोदी के 13 साल के ऐतिहासिक शासन में गुजरात का कायापलट हो गया। मोदी जानते थे कि नतीजे तभी मिल सकते हैं जब हम इन सभी विषयों से ध्यान हटाकर उन पर ध्यान दें जो करने की जरूरत है। जब सरकार और समाज का ध्यान एक ही मुद्दे पर होता है, तो विपक्ष को न चाहते हुए भी उसी पिच पर खेलते रहना पड़ता है और वह कहीं भी बराबरी नहीं कर पाता।

2014 में मोदी के गुजरात छोड़ने के बाद अलग पिच पर खेलने के मौके तलाशने शुरू हो गए। 2014 के लोकसभा चुनाव के ठीक अगले साल यानी 2015 में गुजरात में आंदोलनों का एक सिलसिला शुरू हुआ जिसके केंद्र में समुदाय और जातियाँ थीं। सामाजिक मुद्दों पर शुरू हुए इन आंदोलनों के बाद कई और आंदोलन हुए और आखिर में वही हुआ जो ऐसे आंदोलनों में होता है: सरकार पर खतरा मंडराने लगा। अंतत: आनंदीबेन पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और विजय रूपाणी के नेतृत्व में नई सरकार बनी।

इस सरकार के सामने भी कई चुनौतियाँ थीं। जाति की राजनीति अभी भी हावी थी। दो साल बाद 2017 के विधानसभा चुनाव आए और उनमें BJP सत्ता से बाहर होने से सिर्फ 7 सीट दूर थी। 99 सीटों ने सरकार बचा ली लेकिन हालात अच्छे नहीं थे। विपक्ष दो दशकों में सत्ता के सबसे करीब था।

BJP 99 सीटों के साथ सत्ता में तो रही लेकिन उसकी पकड़ मजबूत नहीं थी। 2015 में अलग-अलग समुदायों को आगे करके राज्य में अस्थिरता और अराजकता लाने के बाद से ही सरकार के लिए परिस्थितियाँ मुश्किल होती गई हैं। 2017 में उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। यह कहना ज्यादा नहीं होगा कि अगर 2017 के चुनाव के नतीजे अलग होते तो केंद्र में हालात अलग होते लेकिन अब यह सब ‘अगर-मगर’ की बात है।

2017 के इन नतीजों के बाद BJP ने नए सिरे से काम करना शुरू किया और पार्टी लगातार मजबूत होती गई। दूसरी तरफ, कॉन्ग्रेस पूरी तरह से कमजोर हो गई थी इसलिए 2017 से पहले चल रही जबरदस्त लड़ाई पूरी तरह से बंद हो गई। 2022 आते-आते माहौल वैसा ही रहा। पिछले अनुभवों से सीखते हुए बीजेपी ने अपने समीकरणों को फिर से ठीक किया, कई दूसरे मुद्दों ने भी भूमिका निभाई और 2022 के चुनावों में ऐसा नतीजा आया जो पहले कभी नहीं देखा गया था। बीजेपी ने 156 सीटें जीतीं और यह संख्या अब कुल 182 सीटों में से बढ़कर 162 हो गई है।

अगर ध्यान से देखें तो गुजरात में यह पैटर्न काफी समय से देखने को मिल रहा है। जब भी कोई मामला पूरे राज्य में चर्चा का विषय बनता है या जानबूझकर बनाया जाता है, तो उसके साथ जाति का एंगल भी जोड़ दिया जाता है। समाज के कुछ नेता सामने आ जाते हैं। इंसान की यह स्वाभाविक आदत होती है कि वह खुद को आगे दिखाना चाहता है, यह साबित करना चाहता है कि वह समाज के लिए काम कर रहा है। इसलिए इसमें सिर्फ उन लोगों की गलती नहीं होती लेकिन इसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है। ऐसे नेता बीच में कूद पड़ते हैं, राजनीति घुस जाती है और आखिरकार पूरा माहौल खराब हो जाता है।

अगर कोई मुद्दा वास्तव में जाति से जुड़ा हो तो उस पर बात करना समझ में आता है। लेकिन कई बार ऐसे मामलों में भी जाति का रंग चढ़ा दिया जाता है जिनका जाति से कोई लेना-देना नहीं होता। कुछ दिन पहले अंबाजी मंदिर ट्रस्ट और राज परिवार के बीच विवाद में हाईकोर्ट ने फैसला दिया और नवरात्रि में राज परिवार के विशेष पूजा अधिकार को खत्म करने का आदेश दिया। इस मामले में भी सोशल मीडिया पर कुछ जगह इसे जाति से जोड़ने की कोशिश की गई।

हाल ही में सौराष्ट्र के बगदाणा में एक सरपंच पर हमला हुआ और ऐसा माहौल बना दिया गया कि दो जातियाँ आमने-सामने आ गईं। इसके बाद सुरेंद्रनगर में एक जमीन घोटाला पकड़ा गया जिसमें कलेक्टर की गिरफ्तारी हुई तो उस पर ED की कार्रवाई को भी उसकी जाति से जोड़ दिया गया। यहाँ तक कि शादी-ब्याह, प्रेम संबंध जैसे छोटे-छोटे मामलों को भी पूरे राज्य का मुद्दा बना दिया गया और उनमें भी समाज को घसीटा गया। कुछ समय पहले गोंडल के मामलों में भी यही देखने को मिला था।

समाज, जाति जैसे मुद्दे ऐसे होते हैं, जिन पर सरकार और राजनीतिक दल बहुत संभल-संभलकर चलते हैं। अब गुजरात में अगर किसी का नुकसान होना है, तो वह सत्ताधारी पार्टी का ही होना है। विपक्षी दलों के पास इस समय खोने के लिए कुछ खास बचा नहीं है। इसी वजह से वे समय-समय पर ऐसे मुद्दों को हवा देने की कोशिश करते रहते हैं।

विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम अच्छी तरह जानता है कि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अगले दस साल तक गुजरात में बीजेपी को हराना आसान नहीं है। ऐसे में उनके पास एक ही आखिरी रास्ता बचता है- समाज और जातियों को आगे रखकर राजनीति करना। यही कारण है कि हर मुद्दे में किसी न किसी तरह जाति का एंगल जोड़ दिया जाता है और किसी भी तरह से उस मुद्दे को जिंदा रखने की कोशिश की जाती है।

यूट्यूब के पत्रकारों से लेकर तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स तक पूरा इकोसिस्टम लगातार ऐसा माहौल बनाने में लगा हुआ है। किसी न किसी रूप में उनकी ज्यादातर खबरें जातियों के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। किसी न किसी तरीके से हमें इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। चर्चा करना गलत नहीं है लेकिन इसके नतीजों और साइड इफेक्ट्स को समझना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि 2027 तक इस तरह की गतिविधियाँ और ज्यादा देखने को मिलेंगी।

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મેઘલસિંહ પરમાર
મેઘલસિંહ પરમાર
ઇતિહાસ-રાજકારણમાં રુચિ ધરાવતો, ઘટનાઓના ઊંડાણમાં જઈને બૃહદ પરિપેક્ષથી જોવામાં-લખવામાં વિશેષ રસ ધરાવતો પત્રકાર. ક્યારેક લેખક, ક્યારેક રિસર્ચર, ક્યારેક ફેક્ટચેકર.

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