Tuesday, April 20, 2021
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क्या मर गया है बिहारियों का स्वाभिमान? क्या नीतीश कुमार को घेर कर नहीं पूछ सकते सवाल?

आप सड़क पर नहीं आएँगे तो ये लोग आपकी छाती पर रैलियों के टेंट गाड़ेंगे और आपको बताएँगे कि बिहार में बहार है। ये लड़ाई आपकी ही है, कोई और नहीं लड़ेगा क्योंकि नेता न सिर्फ पतितखंती होते हैं बल्कि उच्च कोटि के थेथर भी होते हैं। उनको फर्क नहीं पड़ता। उनको फर्क पड़वाइए।

बिहार का हूँ, बिहारी हूँ और पाटलिपुत्र एवम् पटना का फर्क जानता हूँ। कई बिहारी इन दोनों जगहों का फर्क नहीं समझते। अभी भी बिहारियों को डिबेट में जीतना हो तो वो भगवान बुद्ध से शुरु करते हैं और चाणक्य, चंद्रगुप्त, अशोक, पतंजलि और पता नहीं कहाँ-कहाँ पहुँच जाते हैं। जबकि बिहार की सच्चाई यह है कि हम भारत के सबसे बेकार राज्य में से एक हैं। सबसे ज्यादा गरीबी, अशिक्षा, और बीमारी यहीं है।

पटना को पाँचवाँ मेट्रो बताने वाले बिहारी ये कभी नहीं बताते कि पटना से घटिया, सड़ाँध मारती सड़कें, कुव्यवस्था और अराजक जगह बहुत कम होगी इस देश में। हाँ, भारत में मिलती जुलती जगहें हैं, लेकिन वो राज्य की राजधानी नहीं है, और न ही वहाँ के लोग ये दावा करते हैं कि हम तब से बसे हुए हैं, जब से गंगा के किनारे लोगों ने बसना शुरु किया था।

लेकिन ऐसे तथ्यों का अचार भी नहीं डाला जा सकता। इतिहास की बातें करके खुश होने का हक सिर्फ उसे है जिसने उस महान विरासत को संग्रहालयों से बाहर सड़कों पर भी बचा कर रखा है। बिहार ने पहले लालू के हाथों बर्बादी झेली, फिर नीतीश आए। पहले पाँच सालों में लगा कि ये आदमी कुछ करना चाह रहा है, और सच कहूँ तो कुछ काम भी किया। लेकिन फिर इस नीतीश कुमार को कटकाहा कुत्ता काट लिया। ये आदमी तब से बस ‘गरीब-गुरबा’ और अदरक-लहसुन कह कर बहाने मारता फिरता है।

समस्या कई तरह की हो सकती है। बर्बादी कई तरह से आ सकती है। इसलिए आप ये नहीं कह सकते कि लालू ने बर्बाद किया, तो नीतीश कैसे करेगा। लालू की बर्बादी अलग तरह की थी, नीतीश वाली अलग तरह की है। इसका प्राप्य लेकिन एक ही है: तबाह बिहार। बिहार बस वही है, जिस पर पुती कालिख को पोछते हुए बिहारियों के चेहरे की खाल उतर गई लेकिन इन नेताओं की करतूतों ने खाल से रिसने वाले रक्त तक को स्याह करना नहीं छोड़ा है।

बाढ़ आपदा है, क्योंकि नदियों में पानी बढ़ता है और वो हर तरफ फैलता है। लेकिन 15 साल के शासन के बाद भी बाढ़ आपदा ही है और निर्लज्जता, बेहयाई और बेहूदगी से सने आप यह बता रहे हैं कि अमरीका में पानी नहीं आता क्या, तो आपको कुर्सी की आदत तो हो गई है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है। बाढ़ जब हर साल आती है, और हर साल राहत पैकेज के लिए मुँह बाए, आप खड़े रहते हैं तो आदमी सोचने लगता है कि क्या इस सत्ताधीश को बाढ़ से कोई मतलब भी है, या इसको उस राहत पैकेज से मतलब है जिसका हिसाब नहीं किया जाता? क्या आपको पता है कि राहत पैकेज कितना बड़ा धंधा बन चुका है?

बिहार में कोसी क्षेत्र और गंगा के किनारे के दियारा क्षेत्रों में हर साल बाढ़ आती है। कभी ज्यादा, कभी कम। लेकिन सिवाय बयानबाजी के, इसको लेकर किसी ने कुछ नहीं किया है। लेकिन ये लेख उस संदर्भ में नहीं है। बाढ़ से पटना को बहुत ज्यादा तबाही नहीं झेलनी पड़ती, खास कर उन विधायकों और मंत्रियों को बिलकुल नहीं जो उस पानी से दूर हैं।

पटना का पानी

सितम्बर में बाढ़ नहीं आया, बारिश हुई और जम कर हुई। पटना में गंगा का पानी नहीं घुसा, बल्कि बारिश का पानी बाहर जा ही नहीं पाया। बाहर इसलिए नहीं जा पाया क्योंकि बारिश लगातार होती रही, नाले कागजों में बने रहे, और जो धरती के नीचे थे, वो सौ साल पुराने हैं। उन नालों में गाद, कीचड़, कचरा और हर तरह की चीजें हैं जिससे वो अपनी दुर्गंध के कारण नाला कहा जाता है, न कि पानी को कहीं ले जाने के लिए।

एक जगह जहाँ पानी जमा था, उसका कारण 2006 में बनना शुरु हुआ वो नाला था, जो 2019 में भी बन नहीं पाया। हो सकता है नीतीश ने सोचा होगा कि नाला स्टेम सेल तकनीक से बन रहा है जो स्वयं ही तय आकार ले लेगा। इसलिए बारिश थम गई, फिर भी पानी घटा नहीं। अगस्त 2014 में भी यही खबर आई थी, उससे कई साल पहले भी। कारण हमेशा अंग्रेजों के जमाने की नालियों का होना रहा।

ऐसा नहीं है कि इस बात पर चर्चा नहीं होती। 2013 में NIT पटना के रिटायर्ड प्रोफेसर संतोष कुमार ने कहा कि पटना में सीवेज और बारिश के पानी के बाहर जाने की नालियाँ अलग-अलग हैं। बारिश के पानी को निकालने वाले नाले कीचड़, गाद और कचरे से बंद पड़े हैं, इसलिए एक बारिश में भी घुटने भर पानी भर आता है। पम्पिंग स्टेशन काम नहीं करते। क्यों? क्योंकि कहीं बिजली की दिक्कत है, कहीं पम्प नहीं है, और कहीं है तो वो इतनी पुरानी है कि चलती नहीं।

पटना के लोगों का रोष, बिहारियों की जिजीविषा

रंजीत कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में फोटो लगा कर दिखाया कि हालत क्या है। घर में पानी जमा हुआ है, वो सड़ रहा है। पम्प हाउस का बोर्ड चकाचक है, लेकिन वहाँ पम्प नहीं है क्योंकि नगर निगम ने पम्प नहीं दिया। पम्प हाउस में ही पानी घुसा हुआ है, और चिराग चले अंधेरा की जगह पम्प हाउस बिना पम्प के पानी में कहना उचित रहेगा।

लोग जी रहे हैं क्योंकि लोग जी लेते हैं। जब आदमी भूख से मरने लगता है तो शरीर जीवित रहने के लिए मांसपेशियों को ही ऊर्जा के लिए तोड़ना शुरु कर देता है। जब हमारा शरीर इस तरह से बना हुआ है, और जब हमने लालू जैसे राज को झेल लिया है तो प्रशासन की अकर्मण्यता, उपेक्षा और मानव जीवन के लिए उदासीनता तो हमारे गुणसूत्रों तक पहुँच चुकी होगी! इसलिए बिहारी शिकायत नहीं करता, वो अमूमन जिंदा बच जाता है।

जो ज़िंदगियाँ बचाई जा सकती थीं, वो सौ के हिसाब से जन्म के कुछ महीनों में ‘चमकी बुखार’ के ग्लैमरस नाम की भेंट चढ़ जाते हैं। कुछ लोग बारिश के कारण जम गए पानी के कारण मर जाते हैं। और नीतीश कुमार क्या करते हैं? छत पर चढ़ कर छाता लगा कर बारिश का जायजा लेते हैं, कोई कभी हेलिकॉप्टर से दौरा कर लेता है। याद आता है पुराना समय जब सुशील मोदी ने इसी कारण अनशन किया था और अब हालत यह है कि उन्हें भी उनके घर से बाहर निकाल कर बचाया जा रहा है।

ये न देखने में अच्छा लगता है, न ही सांकेतिक तौर पर सही है। मुझे हॉलीवुड फिल्मों का कप्तान याद आता है जो जहाज के साथ डूबना पसंद करता है। लेकिन ऐसी उम्मीद, सांकेतिक तौर पर भी, उस व्यक्ति से करना मूर्खता है जो अपने बारे में छपी खबरों को ट्विटर पर शेयर करके बताता है कि उसका नाम अखबारों में आया है! सुशील मोदी भूल जाते हैं कि वो प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं, और कायदे से, प्रतीक के तौर पर ही उसी पानी में, गाँधी के जन्मदिन पर झाड़ू पकड़ने की तरह, लोगों को पानी और दूध की थैलियाँ देते नजर आते, तो लगता कि थोड़ी चिंता है बिहारियों की।

वो क्षुब्ध नवयुवक जो हर बिहारी है

‘हम बिहारी चू@# हैं जो ऐसे नेता चुनते हैं,’ कहता है वो लड़का। वो बार-बार कहता है कि बिहारियों को भीख नहीं चाहिए, दया नहीं चाहिए, वो बीमार नहीं हैं बल्कि वो नेता बीमार हैं जिन्हें हम बिहारी ही वोट देते हैं और वो इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कुछ नहीं बनाते। वो कहता है कि जिम्मेदार भी वही हैं जो वोट देते हैं, और यही समस्या हर साल आती है।

सही बात यही है कि ‘नीतीश का विकल्प कौन’ की समस्या बिहार को सालों से परेशान कर रही है। नीतीश कुमार भी शायद इस बात को समझते हैं कि भाजपा थक-हार के आएगी तो उनके पास ही, और इसी का फायदा उन्हें मिलता है कि भाजपा-जदयू गठबंधन को लगभग सारी लोकसभा सीटें देने वाले भाजपाई भी बिहार की स्थिति पर सरकार को कोस नहीं पा रहे।

पिछले तीन दशक में बिहार के पास ऐसा कुछ नहीं है कहने को कि उसने यहाँ के लोगों की बेहतरी को लिए कोई कदम उठाया हो। केन्द्र की नीतियों से फायदा हुआ हो तो अलग बात है, लेकिन शिक्षा की बर्बादी जैसी लालू के समय थी, वही आज भी है। सरकारी अस्पतालों की हालत में बहुत ज्यादा सुधार नहीं है। अपराध वापस पुराने दिनों की तरह लय पकड़ चुका है।

दुर्भाग्य यह है कि बिहार में शायद कुछ भी सही नहीं है। इसलिए हमें बुद्ध और चाणक्य की शरण में जाना पड़ता है। लेकिन अशोक स्तम्भ और गरुड़ध्वज की छाया क्षीण हो चुकी है। हम चर्चा में बेहतर शब्दों से किसी का मुँह ज़रूर बंद कर सकते हैं लेकिन नीतीश और लालू जैसे नेता यह बताते हैं कि हम चुनने में भी गलती करते हैं, और उसके बाद काम करवाने के लिए प्रयास भी नहीं करते।

वो वही बिहारी थे जिन्होंने गाँधी मैदान को पाट दिया था और छात्रों के आंदोलन ने पहले बिहार सरकार को हिलाया और बाद में इंदिरा गाँधी की सरकार चली गई थी। इस सौभाग्य का तिलक बिहारी कपाल पर मल सकते हैं, लेकिन उसी आंदोलन से निकले लालू और नीतीश ने जो कालिमा बिहार के नक्शे पर मली है, वो दुर्भाग्य के सिवा और कुछ रही ही नहीं।

एक बारिश ने घेरा है, अब लोग भी घेरें तो शायद सुनेंगे

अहिंसक आंदोलनों का इतिहास है हमारे देश और राज्य में। इस साल ज्यादा बारिश हुई तो बाढ़ के अलावा, एक अलग महीने में बिहार पर बात हुई। हो सकता है ऐसी बारिश दस साल बाद आए, तब तक फिर से जोश ठंढा पड़ जाएगा। चुनाव में तो जो होगा, सो होगा लेकिन, अभी क्या किया जाए?

जेपी वाले आंदोलन में बस एक लाख लोग थे, और सरकार घुटने पर आ गई थी। अगर नीतीश कुमार के आवास के बाहर एक लाख लोग जमा हो जाएँ, तो क्या बिहार पुलिस इस स्थिति में होगी कि उसे हटा सके? नीतीश कुमार को यह बताना जरूरी है कि जब समस्या किसी की अकर्मण्यता के कारण ‘आपदा’ बन जाए, तो उसके पीड़ितों को कैसा महसूस होता है। इन नेताओं को बताना आवश्यक है कि घर के भीतर जब किचन का सामान खत्म हो जाए, बाथरूम में पानी घुस जाए, पीने का पानी न आए, सोते वक्त दिमाग में पानी में न गिरने की बात चलती रहे, तब कैसा महसूस होता है।

सेलिब्रिटी से, मीडिया से कोई आशा क्यों करना? मुंबई की बाढ़ से मुंबई बंद होती है, और पटना तो मुंबई है नहीं, फिर कोई क्यों करेगा ट्वीट आपके लिए? बिहार की स्थिति को लेकर मीडिया में भी अजीब स्थिति बनी होती है कि भाजपा समर्थित सरकार होने के बावजूद नीतीश को कोसना, थर्ड फ्रंट के नेता को नीचा दिखाने जैसा है, क्योंकि कल को वो नेता चोरों के गठबंधन का नेता बन सकता है जिसकी चरणवंदना इनके पास हमेशा तैयार रहती है। इसलिए, मशाल लेकर कहीं भी नैरेटिव की आग लगा देने वाले पत्रकार बिहार की बारिश को छोड़ देते हैं।

सड़क पर निकलिए, इन भयावह रातों को याद कीजिए, याद कीजिए कि आपको सड़कों पर पानी के लिए हाथ फैलाना पड़ा था, दूध की थैलियाँ डीएसपी ने अपने परिवार वाले को दे दी थी, याद कीजिए आपको दैनिक कार्यों को लिए कठिनाई का सामना करना पड़ा था, याद कीजिए कि दर्जनों लोग मर गए, या बीमार पड़े हैं इसी पानी के जमने से। इस बात को याद करके सड़क पर निकलिए कि 2006 में शुरु हुआ नाला, आज भी क्यों नहीं बना? इस बात को ध्यान में रख कर नितीश जैसे नेताओं के घरों को घेरिए कि ये लोग नाले बनाने की तो छोड़िए, उन्हें साफ तक नहीं कर पाते। ये सोच कर सड़क पर आइए कि 2200 करोड़ रुपए की योजना का नितीश ने क्या किया। यह याद करके नीतीश कुमार को घेरिए कि सीवेज सिस्टम में गाद, कीचड़ और कचरा क्यों है जो बारिश होते ही आपके घरों में घुस जाता है।

आप सड़क पर नहीं आएँगे तो ये लोग आपकी छाती पर रैलियों के टेंट गाड़ेंगे और आपको बताएँगे कि बिहार में बहार है। बिहार में बारिश का पानी जम जाता है, पम्प हाउस में पम्प नहीं है, नीतीश कुमार पूछते हैं कि अमेरिका में पानी नहीं जमता है क्या? उनके घर को घेरिए और लाउडस्पीकर लगा कर कहिए कि वहाँ पानी नहीं जमता है। ये लड़ाई आपकी ही है, कोई और नहीं लड़ेगा क्योंकि नेता न सिर्फ पतितखंती होते हैं बल्कि उच्च कोटि के थेथर भी होते हैं। उनको फर्क नहीं पड़ता। उनको फर्क पड़वाइए।

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