Thursday, November 26, 2020
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महुआ मोइत्रा, देश में फ़ासीवाद ‘घुसता’ दिख गया, बंगाल में फासीवाद का नंगा नाच नहीं दिखा?

तृणमूल सांसद अगर किसी और को फ़ासीवाद का पाठ पढ़ाए, ये बताए कि मोदी सरकार की चाल-ढाल में फ़ासीवाद के 'प्रारंभिक लक्षण' हैं, फिर तो उस आधार पर पश्चिम बंगाल, जो महुआ का गृह-राज्य भी है और निर्वाचन-क्षेत्र भी, में तो फासीवाद चौथी स्टेज का कैंसर बन चुका है।

तृणमूल की नवनिर्वाचित सांसद और पूर्व इन्वेस्टमेंट बैंकर महुआ मोइत्रा ने लोक सभा में अपना पहला भाषण देते हुए देश में ‘फ़ासीवाद के पैर पसारने’ के ‘सात चिह्न’ गिनाए। इसमें नया कुछ नहीं था- वही पुराना रोना-गाना जिससे पिछले पाँच साल में एनडीटीवी-वायर गिरोह का रोटी-पानी चला और महुआ मित्रा और उनके जैसे ‘लिबरल, सेक्युलर नेताओं’ ने वोट बटोरे। लेकिन दिलचस्प बात यह है उनके इस भाषण में कि वह ममता बनर्जी की पार्टी से हैं- और तृणमूल कॉन्ग्रेस का किसी को फ़ासीवाद पर लेक्चर देना ‘सूप बोले तो बोले, छलनी क्या बोले जिसमें खुद ही बहत्तर छेद’ की मिसाल पर आराम से फिट बैठेगा।

पिछले दिनों ममता बनर्जी के तानाशाही रवैये ने जिस प्रकार से पश्चिम बंगाल ही नहीं, पूरे देश में एक मेडिकल संकट की स्थिति केवल अपनी अकड़ और अपने तुष्टिकरण से पैदा कर दी थी, वह अभी कोई नहीं भूला है। और उसी पार्टी की सांसद अगर किसी और को फ़ासीवाद का पाठ पढ़ाए, ये बताए कि मोदी सरकार की चाल-ढाल में फ़ासीवाद के ‘प्रारंभिक लक्षण’ हैं, तो यह गिनाना बनता है कि कैसे यही तथाकथित ‘प्रारंभिक लक्षण’ पश्चिम बंगाल, जो महुआ का गृह-राज्य भी है और निर्वाचन-क्षेत्र भी, में चौथी स्टेज का फासीवादी कैंसर बन गए हैं।

राष्ट्रवाद का राष्ट्रीय विमर्श में घुस जाना

पहली बात तो यह रुपए में बीस आने झूठ है हिंदुस्तान के मामले में कि राष्ट्रवाद से फासीवाद बढ़ता है, भले ही यह पाश्चात्य देशों (खासकर कि बीसवीं सदी में) के केस में सच रहा हो। कारण यह है कि भारत राष्ट्र उन बुनियादों पर नहीं खड़ा है जिनपर यूरोप के राष्ट्र-राज्य बने थे- अतः बात ही बेमानी है।

लेकिन अगर एक मिनट के लिए उनकी बात को सच मान भी लिया जाए कि भारतीय राष्ट्रवाद फ़ासीवाद का ही प्रारम्भिक रूप है, तो वह उस ‘बंगाली, गैर-हिंदुस्तानी राष्ट्रवाद’ को किस रूप में देखती हैं, जो उनकी पार्टी बंगाल में चलाती है? “अगर बंगाल में आ रहे हो तो बंगाली बोलनी ही पड़ेगी।” एक नारे (“जय श्रीराम”/”वन्दे मातरम”) के आग्रह से चिढ़ने वालीं, महुआ की सुप्रीम लीडर बंगाल में आने वाले देश के ही लोगों के लिए एक पूरी भाषा सीखना और बोलना जबरन करना चाहतीं हैं। राज्य सरकार के मेडिकल कॉलेजों में गैर-बंगाल निवासियों को (यानि मोटे तौर पर गैर-बंगालियों को) प्रवेश लेने से रोकना भी महुआ की नेत्री ममता बनर्जी की ही धमकी थी, जब उनसे डॉक्टरों का प्रदर्शन संभाला नहीं गया। महुआ मित्रा को यह सब नहीं दिखा?

मानवाधिकारों के लिए तिरस्कार का भाव

पंचायतों जैसे छोटे निर्वाचन के समय ममता की विरोधी माकपा के नेता-दम्पति देबू और उषा दास को जिन्दा जला दिया जाता है; उनका बेटा घर आता है तो माँ-बाबा नहीं, जली लाशें मिलतीं हैं। तृणमूल की ही पंचायत समिति के पूर्व सदस्य और उसकी पत्नी का पार्टी वालों के साथ झगड़ा होता है, बहस हो जाती है तो खमियाजा पति को पिट कर और पत्नी को जूतों की माला पहनकर भुगतना पड़ता है। निर्वाचन अधिकारी ‘उठा’ लिया जाता है और वीभत्स लाश रेलवे ट्रैक के किनारे मिलती है। महुआ मोइत्रा के लिए इतना ‘मानवाधिकार के लिए तिरस्कार’ काफी है, या और चाहिए?

मीडिया को दबाना और झुकाना

हालाँकि यह सच है कि अभी तक किसी मुख्यधारा मीडिया के बड़े पत्रकार को ममता के कोप का भाजन नहीं बनना पड़ा है, लेकिन यह केवल वक्त की बात है- अभी तक मुख्यधारा के मीडिया ने उन्हें इतना नाराज़ नहीं किया है। जिसने किया है, जैसे प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्र जिन्होंने ममता पर बना एक कार्टून महज़ फॉरवर्ड भर कर दिया, वह जानते हैं कि क्या हो सकता है। उस समय महुआ मोइत्रा कहाँ थीं? या उस समय तक उनकी फासीवाद की परिभाषा ही अलग थी?

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘सनक’

एक बार फिर, पहले तो महुआ मोइत्रा का यह दावा ही गलत है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंतित होना फासीवाद है- और शर्म की बात यह है कि वह उस राज्य से आतीं हैं जिसकी पड़ोसी देशों के साथ सबसे लम्बी खुली सीमाओं में से एक है; उन्हें तो राष्ट्रीय सुरक्षा पर सबसे ज्यादा मुखर आवाज़ होना चाहिए था संसद में। लेकिन उनकी सुप्रीम लीडर की राजनीति ही बांग्लादेशियों को बंगाली हिंदुस्तानी बनाने के मॉडल पर कायम है।

खैर, एक बार फिर अगर उनकी इस गलत बात को सही मान भी लिया जाए तो भी इस डिपार्टमेंट में भी ममता बनर्जी का फासीवाद मोदी के किसी भी तथाकथित फ़ासीवाद को मात देता है। ममता बनर्जी ने देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की देखा-देखी ‘राज्य सुरक्षा सलाहकार’ का न नया केवल नया पद निर्मित कर डाला, जो कि अपने आप में देश में पहली बार हुआ, बल्कि उसे इतनी ताकतें दे दीं कि राज्य सुरक्षा सलाहकार राज्य का प्रॉक्सी गृह मंत्री हो गया। महुआ मोइत्रा ‘राज्य की सुरक्षा’ के नाम पर चल रही इस सनक के बारे में क्या कहेंगी?

मज़हब और शासन का घालमेल

इसमें तो मैं हाइपरलिंक भी नहीं दूँगा, यह इतना जाना-माना चेहरा है महुआ मोइत्रा की सुप्रीम लीडर का। समुदाय विशेष को खुश करने के लिए कभी राम नवमी को कभी देवी-विसर्जन में बाधा उत्पन्न करना, पुजारियों को नहीं, पर मदरसों के इमामों को खास भत्ते का प्रावधान, प्राचीन तारकेश्वर मंदिर के ट्रस्ट में एक मजहब विशेष वाले को (जिसका मज़हब उसे सीधे-सीधे इससे दुश्मनी पालने का हुक्म देता है) घुसाना- वह भी मुखिया के तौर पर, इंद्रधनुष का बांग्ला नाम ‘रामधोनु’ बदल कर न्य शब्द ‘रॉन्गधोनु’ गढ़ना… ममता बनर्जी को यूँ ही सुब्रमण्यम स्वामी ने ‘जिहादी दीदी’ नहीं कह दिया था!

बौद्धिकों और कला के लिए घृणा

ऊपर अम्बिकेश महापात्र का उदाहरण आप को विस्मृत नहीं ही हुआ होगा। इसके अलावा प्रियंका शर्मा, भाजयुमो नेत्री का बनाया मीम तो ममता बनर्जी से बर्दाश्त हुआ नहीं। अपनी सरकार की आलोचना करने वाली फिल्म को भी उन्होंने प्रतिबंधित कर दिया। महुआ मोइत्रा बौद्धिकों की बात करना चाहतीं हैं? तस्लीमा नसरीन को माकपा से ज्यादा दुर्व्यवहार तृणमूल के समय में बंगाल में झेलना पड़ा, क्योंकि वह इस्लाम के खिलाफ किताबें लिखतीं हैं। तृणमूल की आलोचना करने वाली टीना बिस्वास ने अपनी किताब के कोलकाता लॉन्च में उत्पीड़न का आरोप लगाया था। अपनी मुस्लिम नीति की आलोचना करने वाली किताब को भी प्रतिबंधित कर दिया, जबकि उसके लेखक नज़रुल इस्लाम एक मुस्लिम और आईपीएस हैं। महुआ मोइत्रा को इसमें कला के प्रति सम्मान दिख गया या बौद्धिकता के प्रति?

राजनीतिक तंत्र में स्वतंत्रता का क्षरण

इससे ज्यादा दोहरापन क्या हो सकता है कि जिसके राज्य में, जिसकी पार्टी के शासन में एक-तिहाई पंचायतों में (सत्ताधारी दल के डर से) निर्विरोध निर्वाचन होते हों, विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं की लाशें किसी काले, मध्ययुगीन समय की तरह पेड़ों से लटकी मिलें, यहाँ तक कि निर्वाचन अधिकारी भी दिनदहाड़े गायब हो जाते हों, वह दूसरों के राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रति आचरण पर बात करने की जुर्रत करे? महुआ मोइत्रा अगर अपनी पार्टी के गिरेबान में झाँक लें तो शायद राजनीतिक स्वतंत्रता पर दूसरों को उपदेश देने के बाद वह संसद आना तो दूर, घर से निकलने में शर्माएँ!

दिल तो कर रहा है कि महुआ मोइत्रा से पूछ लूँ कि कौन सा महुआ पीकर उन्होंने मोदी के तथाकथित ‘आते हुए फ़ासीवाद’ पर सवाल उठाए थे, जब उनका खुद का राज्य, उनकी खुद की पार्टी की सुप्रीम लीडर की जूतियों तले असली फासिस्ट स्टेट न केवल आ चुका है, बल्कि उसके हाहाकार से पूरा बंगाल त्रस्त भी है। लेकिन फिर याद आता है कि ठीक यही तंज कसे जाने पर महुआ ने बाबुल सुप्रियो को अपनी शीलता के अपमान की पुलिस कंप्लेंट कर दी थी। अतः मैं यह नहीं पूछूँगा। बल्कि आरोप लगाऊँगा कि पुलिसिया हथकण्डे अपनाने वाली महुआ मोइत्रा मिज़ाज से अपनी सुप्रीम लीडर से कोई कम फासीवादी नहीं हैं।

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